गुरुवार, 2 जुलाई 2009

आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान

हे मानव श्रेष्ठों,
कई दिन हुए, हुआ यह कि एक मानवश्रेष्ठ की जिज्ञासा पर समय सपनों की दुनिया की यात्रा पर निकल गया था। चलिए देखते हैं कि समय अपने पिटारे में वहां से क्या-क्या ले कर आया है।
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सपने शुरू से ही यानि जब मनुष्य नाम का प्राणी कार ले रहा था, मानवजाति के लिए रहस्यमयी अवस्था रही है। वह सपनों को अपनी जागृत ज़िंदगी से अलग नहीं कर पाता था, और जाहिर है इसीलिए इनमें एक वस्तुगत सत्य का आभास महसूस करता था। जागृत अवस्था की वास्तविकता का अनुभव धीरे-धीरे उसकी चेतना में सुषुप्त अवस्था में देखे गये सपनों की काल्पनिकता की समझ विकसित करता रहा।

शुरूआती चेतना में सपनों की यह रहस्यमयता अनेक रूपों में परावर्तित होती है। धर्म और दर्शन में भी सपनों के जरिए कई सार्विक समस्याओं के संभावित हलों के तर्क ढूढ़ें गये हैं। आदर्शवादी दर्शन में तो सपनों के मिथ्या अनुभवों के तर्कों के जरिए, संपूर्ण जगत की वस्तुगतता और संज्ञान को मिथ्या घोषित कर दिया गया।

जैसा कि समय पहले चर्चा कर चुका है, मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर मानवजाति के इतिहास को दोहराता है, अतएव इस मामले में भी उसकी समझ उसी तरह के अपरिपक्व रास्ते से गुजरती है, विकसित होती है और यदि आगे की संभावनाएं नहीं हो तो यहीं रूक भी जाती है। साधारणतया उपलब्ध आस-पास का परिवेश इस बारे में उसे इस समझ के आगे नहीं ले जा पाता कि सपने जैसे एक अलग ही जगत का अलौकिक अनुभव हैं, ये आपको अपने भूत और भविष्य का पूर्वाभास देते हैं, इनमें देखी गयी हर अटपटी चीज़ और परिस्थितियां आपको भावी जीवन के बारे में कुछ इशारे करती है जिन्हें समझना किसी विशेषज्ञ के ही बस की बात है। इसीलिए समान्यतया मनुष्य अपने सपनों के मतलब जानने को, ख़्वाबों की ताबीर पा जाने को बैचेन रहता है, सुखांत सपनों को भावी खुशियों से जोडता है और अटपटे एवं दुखांत एवं डरावने सपनों को अपशकुनों के रूप में देखता है।

जो मनुष्य थोडा बहुत तार्किकता को अपने जीवन में स्थान देते हैं वे तार्किक परिवेशगत उपलब्ध ज्ञान के अनुसार इन्हें अपनी स्मृति से जोडते है और इन्हें इस रूप में देखते हैं कि जो आपके मन में चल रहा होता है या सोते वक्त जो मनुष्य सोच रहा होता है वही सपने में आता है, परंतु जब सपने इनसे इतर भी आते हैं तो वे भी सपनों को एक रहस्यात्मक अबूझ पहेली के रूप में देखने को विवश हो जाते हैं।
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तो फिर सपने क्या होते है? ये क्यूं आते हैं? इन्हें कैसे विश्लेषित किया जा सकता है?
ये प्रश्न उठते हैं।

चलिए, समय की मानवजाति के अद्यतन ज्ञान के आधार पर जो समझ विकसित हुई है, उसके अनुसार इन पर थोडा-बहुत प्रकाश डालते हैं। हो सकता है यह आपके दिमाग़ में आगे की यात्रा की खलबली मचा पाए। पहले थोडा संज्ञान और चिंतन पर बात हो जाए।
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मनुष्य अपनी इन्द्रियों के द्वारा विश्व का संज्ञान करता है। अलग-अलग इन्द्रियां प्रेक्षित वस्तु का अलग-अलग तरीके से संवेदन करती है और मस्तिष्क तक उन सूचनाओं को पहुंचाती है, जो कि वस्तु के विभिन्न गुणधर्मों को परावर्तित करती हैं। ये समेकित रूप में उस वस्तु-विशेष का एक लाक्षणिक बिंब तैयार करती है जो हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाता है। स्मृति के जरिए हम बाद में भी यानि कि वस्तु की अनुपस्थिति में भी, उस बिंब का स्मरण कर सकते हैं, उसे अपने चिंतन का हिस्सा बना सकते हैं। स्मरण की यानि की प्रदत्त क्षण में निश्चित बिंब को अपनी चेतना या चिंतन का मूल विषयी बनाने की यह प्रक्रिया क्षोभकों ( उत्तेजित करने वाले कारकों ) पर निर्भर करती है। ये क्षोभक चिंतन के आंतरिक परिणाम भी हो सकते हैं और बाह्य कारकों के भी। चिंतन के दौरान पैदा हुई नयी जरूरत आंतरिक कारण होती है, और ऐन्द्रिक संवेदनों के जरिए बाह्य विश्व से आए क्षोभक हमारे मस्तिष्क को उत्तेजित कर स्मृति से कुछ निश्चित बिंबों को हमारी चेतना के दायरे में ले आते हैं।

जैसे कि जब, मान लीजिए मनुष्य को भूख महसूस होती है तो उसका चिंतन खाने की वस्तुओं और उनकी उपलब्धता पर होने लगता है, उसकी चेतना स्मृति से खाने संबंधी पूर्वसंचित बिंबों और संवेदनों को टटोलने लगती है। ऐसे में हो सकता है कि चेतना पहले एक गंध के पूर्वसंचित संवेदन पर पहुंचे, और उसके स्मरण से पैदा हुए क्षोभ के कारण उस गंध से संबंधित अन्य संवेदन और बिंब भी अचानक चेतना में उभर आएं। जैसे की पके-मीठे आम की गंध के संवेदन के स्मरण से पैदा हुआ क्षोभ एक साथ मनुष्य की चेतना में आम का बिंब, आम का स्वाद, उसके आकार का स्पर्श संवेदन, फिर जो भी पहले मिल जाए या जो स्मृति में ज्यादा प्रखर हो, आम का ठेला, बेचने वाला, जगह, बातचीत या घर का वह दृश्य जब आम खाए गये हों एक साथ मनुष्य की चेतना में उभर आते हैं। यह आंतरिक क्षोभकों की बात है, और यही सब बाह्य रूप से भी हो सकता है। अचानक कमरे में बैठे आप तक सिर्फ़ एक आम जैसी गंध पहुंचती है और आपकी चेतना में उपरोक्त प्रक्रिया लगभग ऐसे ही शुरू हो सकती है।

इससे चिंतन और स्मृति के आंतरिक संबंधों और क्षोभकों पर कुछ बात साफ़ होती है।

अब थोडा नींद को देख लें।
नींद में मस्तिष्क अपना चेतन कार्य स्थगित कर देता है। इसका मतलब है कि ऐन्द्रिक सूचनाओं का संसाधन और उन पर प्रतिक्रियाएं शनै-शनै बंद हो जाती हैं। बाह्य विश्व से इन्द्रियां सूचना तो प्राप्त करती हैं, परंतु मस्तिष्क अनुक्रिया नहीं करता। नींद का गहरा और हल्का होना इसी बात पर आंका जाता है कि सूचनाओं की कितनी तीव्रता पर प्रतिक्रिया प्राप्त होती है।

नींद में चेतन क्रियाकलाप तो स्थगित हो जाते हैं परंतु अवचेतन मस्तिष्क के मानसिक व्यापार जारी रहते हैं। अधिक गहरी नींद में इन अचेतन मानसिक क्रियाकलापों का चेतना पर कोई बोध दर्ज नहीं होता, परंतु कम गहरी या कच्ची नींद में चेतन मस्तिष्क इनके कुछ हिस्सों को स्मृति पटल पर धुंधली सी याद के रूप में दर्ज़ कर लेता है। जागने पर स्मृति पर दर्ज़ इन बेतरतीब सी यादों का बोध मनुष्य को होता है, और इन्हीं को सपने कहा जाता है।
उक्त विवेचन से अब यह समझा जा सकता है गहरी और निश्चिंत नींद सोने वाले स्थिर प्रवृति वाले मनुष्यों को सपने ज़्यादा नहीं आते हैं, परंतु कच्ची और बेचैन नींद सोने वाले अस्थिर प्रवृति वाले मनुष्य सपनों से ज़्यादा दो-चार होते रहते हैं। जाहिर है यह बेचैनी किसी परिस्थितिजनित चिंता से उभरती है, और कई तरह के डरों और असुरक्षाओं के रूप में मस्तिष्क में खलबली मचाए रखती है, इसीलिए इनके सपने भी तदअनुरूप ही डरावने और बेचैनी बढा़ने वाले ही होते हैं।

इस तरह से अब थोडा साफ़ होता है कि सपने अवचेतन मस्तिष्क की अंतर्क्रियाओं से संबंधित होते हैं, ये तभी संभव हो पाते हैं जब किसी वज़ह से चेतन मस्तिष्क इन अवचेतन व्यापारों से उत्पन्न आंतरिक क्षोभकों के कारण इनमें हस्तक्षेप करने लगता है और इन पर अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है, जबरन इन पर चिंतन शुरू कर देता है और फिर इन सभी क्रियाकलापों को स्मृति पटल पर दर्ज़ कर लेता है।
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उपरोक्त को विस्तृत रूप में समझने की कोशिश की जा सकती है।

एक सपना लेते हैं। मानसिक प्रक्रिया से गुजरते हैं।
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थोडी कम गहरी नींद में अवचेतन मस्तिष्क की अंतर्क्रियाएं जारी हैं। स्मृति पर दर्ज़ विभिन्न सूचनाओं पर आकस्मिक रूप से इधर-उधर जाया जा रहा है, इन्हें जांचा जा रहा है, इनकी प्रोसेसिंग की जा रही है। आकस्मिक रूप से एक सूचना पर पहुंचा जाता है, यह एक रेलयात्रा का धुंधला सा दृश्य है और कुछ लोग साथ हैं। अवचेतन में जिज्ञासाएं नहीं होती, यह चेतन अनुक्रिया है। इस रेलयात्रा का यह दृश्य किन्हीं अनुकूलित वज़हों से ( रेलयात्रा से सम्बंधित उसके पूर्व के अनुभवों के जरिए) एक गहरी सांवेदनिक अनुक्रिया पैदा करता है जो कि चेतन मस्तिष्क के लिए एक आंतरिक क्षोभक की तरह कार्य करती है और चेतन मस्तिष्क अपनी सुषुप्तावस्था में भी इस क्षोभक के प्रति प्रतिक्रिया करने लगता है। वह जिज्ञासा करता है साथ में कौन है? दो चहरे तुरंत पहचान लिए जाते हैं, उनके बिंब अधिक साफ़ हैं। एक और धुंधली सी आकृति है, यह कौन है? उसे पहचानने की कोशिश शुरू होती है।

पहचानने की प्रक्रिया का मतलब है प्रदत्त छवि को, पूर्व में दर्ज़ चवियों से तुलना करके उन्हें एकाकार करके, एक निश्चित पहचान देना। तुरंत मस्तिष्क स्मृति के छवि भंडार तक भागता है। आकस्मिक रूप से पहली छवि उस मनुष्य के दादा जी की है, अब दादाजी की यह छवि आंतरिक क्षोभक बन जाती है। दादाजी से संबंधित छवियां टटोली जाती हैं, गांव के दृश्य उभरने लगते हैं, एक दृश्य स्थिर होता है, दादा जी खाट पर बैठे किसी से बात कर रहे हैं, उस किसी की पीठ है दृश्य में। दादा जी देखकर कुछ कहते हैं, क्या कहा-क्या कहा..मस्तिष्क भागता है स्मृति के ध्वनि भंडार में...पहला वाक्य मिलता है दृश्य से मिलता जुलता सा...बेटा अभी क्यूं आये हो, अगली बार आना....पर यह बैठा कौन है? दादा जी किससे बाते कर रहे हैं....फिर चहरे की तलाश...मस्तिष्क भाग रहा है....एक चहरा मिला...ये कौन है....कॉलेज का दोस्त अमित..पर ये यहां कैसे....कॉलेज तो....मस्तिष्क भाग रहा है...छवियां टटोल रहा है....कॉलेज के दृश्य उभर रहे हैं....एक दृश्य टिकता है....क्लास चल रही है, कोई पढा़ रहा है...कौन है ये?...मस्तिष्क फिर भागता है....अभी थोडी देर पहले ही दादा जी की छवि से गुजरे थे...स्मृति में नई सूचना है...मस्तिष्क तुरंत उसे ही पकड लेता है....दादा जी...पर दादा जी कॉलेज में कैसे? वो भी पढाते हुए?...दादा जी...मस्तिष्क फिर यात्रा करने लगता है...छवियां भाग रही हैं....दादा जी तो...एक दृश्य उभरता है...दादा जी को अंतिम यात्रा के लिए तैयार किया जा रहा है...गमगीन माहौल...भावनाएं के बोध उभरते हैं...लाश का चहरा नहीं दिख रहा...कौन है?...लाश है...डर है....मस्तिष्क भागमभाग में है...डर...ज्यादा तीखे डर..छवियां...एक छवि उभरती है....अरे यह तो उसका बच्चा है....यह कैसे....डर और भावनाएं घनीभूत हो उठती है...सांस फूल जाती है...बेचैनी बढने लगती है...नींद टूट जाती है....आंखें खुल जाती हैं....उफ़....

सब ठीक-ठाक है...मतलब कि सपना देख रहा था....सपने की ताज़ा दर्ज़ सूचनाओं का स्मरण करता है...सामान्य होता है, और फिर सो जाता है। बेचैनी तगडी है तो काफ़ी देर तक नींद दोबारा नहीं आती।
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सुबह जाग कर यह मनुष्य श्रेष्ठ, अपने सपने को शब्द देगा, उसे सुनाएगा। भूमिका बांधेगा कि रात एक अजीब सा और भयानक सपना देखा है उसने। वह शायद पत्नी को ऐसा कुछ सुनाए:

अपन सभी ट्रैन में जा रहे थे, तुम थी, बच्चा था। देखता हूं की वहां दादा जी भी बैठे हैं। बताओ आज तो मृत्यु के बाद पहली बार दिखे हैं दादा जी। फिर पता नहीं कैसे, मैं गांव पहुंच जाता हूं। दादा जी किसी से बाते कर रहे थे, मुझे देख कर कहा कि बेटा अभी क्यों आए हो बाद में आना। वो जो साथ में था, वह मेरे कॉलेज का दोस्त अमित था। अचानक फिर, मैं कॉलेज में पहुंच जाता हूं, वहां क्लास चल रही थी और पता है अपने दादाजी पढा़ रहे थे। मैं तो चौंक गया कि दादा जी यहां कैसे, पर फिर पता नहीं क्या होता है, मुझे दिखता है कि किसी की अर्थी सजाई जा रही है, सभी रो रहे हैं, मैं भी रो रहा हूं। फिर मैं अचानक लाश का चहरा देखता हूं तो पता है वो कौन था, अपना बच्चा और मैं तो, मैं तो सन्न रह जाता हूं। फिर घबराहट में मेरी नींद खुल जाती है, देखता हूं कि सब ठीक-ठाक है, तब थोडा चैन आता है। पर यार फिर भी उसके बाद रात भर नींद नहीं आई, बेचैनी में ही करवटें बदलता रहा। बार बार अपने बच्चे का चहरा सामने आता रहा। उफ़, कितना भयानक और अजीब सपना था, है ना। पता नहीं ऐसा सपना क्यों आया।

अब इसमें कई हास्यास्पद इशारे ढूंढ़े जा सकते हैं।
इस मनुष्य की मृत्यु की संभावनाएं थी, परंतु दादा जी की आत्मा ने इसका निपटारा कर दिया और उसे पुनः जीवन दे दिया। क्योंकि दादा जी ने कहा था, "बेटा अभी क्यूं आये हो, अगली बार आना"
इस मनुष्य के बच्चे की उम्र काफ़ी लंबी है, क्योंकि शास्त्रों? में लिखा हुआ है, सपने में जिसकी मृत्यु देख ली जाती है, उसकी आयु और लंबी हो जाती है।
इस मनुष्य के दोस्त अमित की मृत्यु की पूरी संभावनाएं है, क्योंकि वह स्वर्गीय दादा जी के साथ पहले से बैठा बातें कर रहा था।

ऐसी ही कई और व्याख्याएं की जा सकती हैं, और आसपास ऐसा होते हुए अक्सर देखा जा सकता है। संसार बहुत बडा है, इन बहुत छोटे अंतराल की छवियों की चिलकन यानि सपनों के सापेक्ष मनुष्य की ज़िंदगी काफ़ी बडी है, और ऐसे में इक्का-दुक्का संयोगो का मिलना, जिसमें कि वास्तविक रूप में सपनों की घटनाओं का दोहराव प्रत्यक्ष किए जाने के दावे किए जा सकते हैं, कोई ज्यादा अनोखी बात नहीं है। वैसे मनुष्य खुद अपने अंदर टटोले तो इसका जबाव मिल सकता है, कि ऐसी भ्रामक और डरावनी परिस्थितियों में छला हुआ उसका मन कितनी तरह की बातें खुद गढ़ता है, कहानिया बनाता है, और ऐसे दावे करने की कोशिश करता है।
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तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भाव-बोधों की आपस में अदला-बदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।
जाहिर है इनसे किसी भावी नियती के इशारे पाए जाने की संभावना टटोलना बचकानापन है, परिपक्वता की कमी है। हां, इनसे किसी मनुष्य के अंतस का, उसकी चिंताओं का आभास पाया जा सकता है, वह भी सावधानीपूर्वक किए गए विश्लेषण के जरिए ही, क्योंकि इनकी आकस्मिक बेतरतीबी से इनकी तरफ़ इशारे करती तरतीबी सूचनाएं ढूंढ़ निकालना एक बेहद गंभीर और जिम्मेदारी भरा कार्य है। यहां भ्रम में फसने की पूरी संभावनाएं हैं।
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तो यह है सपनों का मनोविज्ञान। ऊपर दी गयी सपने की प्रक्रिया पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि लगभग ऐसा ही हमारा सोचने और चिंतन करने का तरीका होता है। अगर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है, तो मनुष्य ऐसे ही बेतरतीब रूप से इधर-उधर छलांगे लगाते हुए ही सोचता रहता है। सपने इससे ज्यादा अलग नहीं है।

तो मानव श्रेष्ठों,
कल्पनाशक्ति की उडान की पूरी संभावनाएं मनुष्य के सामने हमेशा ही होती हैं। वह अपनी समझ और ज्ञान के हिसाब से सपनों का भी, कुछ भी मतलब निकालने को, मनचाही व्याख्याएं करने को, स्वतंत्र होता है। आप भी कर सकते हैं।
परंतु आप यदि उपरोक्त व्याख्या से गंभीरता से गुजरे हैं, और आपको यहां कुछ नया मिला है तो निश्चय ही इस बार आप अपने सपनों को एक अलग ही नज़रिए से देखेंगे और अपनी इस अवचेतन मानसिक अंतर्क्रियाओं के उत्सों को समझने की कोशिशें करेंगे।

कोई जिज्ञासाएं हैं तो यहां टिप्पणी कर सकते हैं, समय को मेल कर सकते हैं।

समय आपकी सेवा में हाज़िर है।

समय

रविवार, 21 जून 2009

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक

हे मानव श्रेष्ठों,
समय बडा़ व्यस्त है।

फिलहाल समय द्वारा की गई टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक दीजिए।
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"कविताएं और कवि भी" पर की गई टिप्पणी के अंश:

.....आपकी यह बात ही कि “ऋत की विराट परिकल्पना पतित होकर ईश्वर की सर्व सुलभ समझ में प्रतिष्ठित हुई और उसके आगे सम्पूर्ण समर्पण ही एक मात्र राह दिखाई गई। जन के लिए यह आवश्यक था लेकिन इससे हानि यह हुई कि संशय और प्रश्न नेपथ्य में चले गए। इसके कारण धीरे धीरे एक असहिष्णु मानस विकसित हुआ।” सभी कुछ कह देती है।

यह प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक ही तरह से विकसित हुई, और जाहिर है इसके पीछे आत्मगत या मनोगत कारणों के बजाए शुद्ध भौतिक कारणों का अस्तित्व रहा है।
आप यदि इसे व्यापकता दें तो आपकी यह अवधारणा सभी आदर्शवादी विचारधाराओं को, इस्लाम को भी अपने में समेट लेने की क़ूवत रखती है। अलग से कुछ कहने की प्रासंगिकता समय को महसूस नहीं हुई, इसलिए ही यह गरीब संशय में आ गया।

भारतीय चिंतन परंपरा में भी दोनों धाराएं यानि संशय और विश्वास, समानान्तर रूप से चले हैं ना कि एक ही विकसित होती परंपरा में। जाहिर है कि इस विरोधी विचार्धाराओं में असहिष्णुता ही हो सकती थी, और इतिहास साक्षी है कि संशय की परंपरा का परिस्थितियों के अनुकूलन के कारण बलपूर्वक दमन कर दिया गया। बृहस्पतियों, न्याय-वैशैषिकों, चार्वाकों, सुश्रुतों, योगियों, बुद्धों, धर्मकीर्तियों आदि-आदि को समूल नष्ट कर दिया गया, उनकी संशयवादी विचारधारा को या तो खत्म कर दिया गया या आदर्शवादी मुलम्में में प्रक्षिप्त।

भक्तिकाल तो बहुत बाद की चीज़ है। परंतु आपका इस पर यह कहना सही है कि इसी के बाद आम मानस में ईश्वर के आगे संपूर्ण समर्पण या ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का बोलबाला हुआ।

खैर, समय की चिंताएं ऐसे ही व्यापक परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ में थी, और जाहिर है आपकी जुंबिश में भी ये ही शुमार हैं।

आप इस पर खुद भी संशय में है, परंतु नग्न सत्यों और ज्वलंत समस्याओं के नाम पर बौद्धिक प्रगतिशीलता को तो दाव पर लगाना या स्थगित कर देना सही कदम नहीं हो सकता ना।

आप ही के शब्दों में आज संशय और ऋत की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता है, जो बस मानव मेधा की सतत प्रगतिशील और विकसित होने की प्रवृत्ति को मान दे और उसका पोषण करे। ना कि इनके खिलाफ़ संघर्ष में खुद बर्बर खिलाफती, तालिबानी,प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी तरीके अपनाने को विवश हो जाए।.....

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"कोलाहल" पर की टिप्पणी का अंश:

......समय का उद्देश्य चिंतन की दिशाओं पर कुछ अलग इशारे करने का था,....

......समय ने कहा था,‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार पुरस्कार के चक्कर में पड़ गए’।

पहली बात शायद ज्यादा साफ़ है। जब पुरस्कार होंगे, उनके जरिए धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होने के अवसर होंगे, और मानव-श्रेष्ठों के मन में धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षाएं होंगी, तो फिर पुरस्कारों को पाने के लिए मानव-श्रेष्ठ हर संभव कोशिश भी करेंगे। तिकडमें भी होंगी, बहुत कुछ होगा और होता भी है, सभी जानते ही हैं। पहले वाक्य से समय का मतलब यही था।

दूसरा वाक्य यदि इस तरह लिखा गया होता जैसा कि इसे होना चाहिए था, और जैसा कि समय का आशय था, "पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार एक और पुरस्कार की स्थापना की चर्चा के चक्कर में पड़ गए." तो शायद ज्यादा ठीक होता।

समय यही कहना चाहता था कि जब आप पुरस्कारों के पीछे की तिकडमों को समझते हैं, तो फिर लेख के अंत में एक और पुरस्कार स्थापित करने की चर्चा क्यूं कर करने लगे। क्योंकि समय को लगता है, इसका भी वही हश्र होने की अधिक संभावनाएं है और इसके पीछे की सोच को समय ने पहले वाक्य में रख ही दिया था।

आपने इसके बाद के वाक्य की चर्चा नहीं की, और वही समय की समझ के अनुसार ज्यादा महत्वपूर्ण था। समय आपके और पाठकों के चिंतन में इस दिशा को भी शामिल करवाना चाह रहा था, और इसीलिए इसका जिक्र पुनः कर रहा है।

समय ने कहा था:
"लेखन के उद्देश्यों पर ही दोबारा विचार करना होगा।"

यहां समय अपना आशय स्पष्ट कर देना चाहता है।

लेखकों को यह भी विचार दोबारा से करना होगा (जो अब तक नहीं कर पाएं है, या इस पर कुछ और विचार रखते हैं) कि आखिरकार लेखन का उद्देश्य क्या है, लेखन के वास्तविक सरोकार क्या हैं? बहुत से मानव-श्रेष्ठ लेखकों ने इस पर अपने विचारों को लिख छोडा है, उनसे गुजरना चाहिए।

क्या लेखन का उद्देश्य स्वान्तसुखाय है? क्या यह केवल व्यक्तिगत मनोविलास का माध्यम है, और आत्मसंतुष्टि इसका लक्ष्य? क्या सिर्फ़ यह अहम की तुष्टी, व्यक्तिगत महत्तवाकांक्षाओं की पूर्ति, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का जरिया भर है?

या लेखन के उद्देश्यों को इनका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए? क्या इसे सामाजिक सरोकारों से नहीं जुडना चाहिए? क्या सामाजिक चेतना की बेहतरी की चिंताएं इसमें शामिल नहीं होनी चाहिएं? क्या तार्किक और वैज्ञानिक सोच को आम करने की जिम्मेदारी इसमें शामिल नहीं होनी चाहिए? क्या अपनी बेहतरी के लिए चिंतित और संघर्षरत आमजन का पक्षपोषण इसमें नहीं झलकना चाहिए? क्या लेखन की दिशा को एक ऐसे आदर्श समाज की स्थापना, जिसमें समता और भाईचारा हो, जिसमें किसी भी मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण संभव ना हो, जिसमें सभी की खुशहाली हो, हेतु प्रेरणास्रोत नहीं होना चाहिए?

और क्या लेखन के मूल में यही वास्तविक चिंताएं नहीं होनी चाहिएं?

और अगर ये चिंताए वाकई में लेखक के लेखन के मूल में हैं, तो जाहिर है, पुरस्कारों-सम्मानों का कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता। फिर लेखक, अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए अपने इन्हीं आदर्शों और उनकी प्राप्ति को ही अपनी कसौटी बनाता है।

बस, समय का उद्देश्य यही कहना था।.....

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"अनवरत" पर एक प्रतिटिप्पणी :

........मानवजाति के अभी तक के ज्ञान के अनुसार इसको ऐसे कहा जाना कि विचार मस्तिष्क का आधार पाते है, पूरा सच नहीं है। इसके कारण विचारों की एक स्वतंत्र वस्तुगतता का बोध होता है जो कि मस्तिष्क पर अवलंबित है।
इसको ऐसे कहा जाना चाहिए कि वस्तुतः विचार मस्तिष्क का प्रकार्य है, उसके क्रियाकलापों का उत्पाद है। और इसके लिए आधार सामग्री उसे ऐन्द्रिक संवेदनों के जरिए मिलती है।

जाहिर है विचार अचानक आसमान से नहीं टपकते, वे किसी भी मनुष्य की प्रकृति और समाज के साथ के अंतर्संबंधों एवं अंतर्क्रियाओं के स्तर और विकास की प्रक्रियाओं में पैदा होते हैं, आकार लेते हैं।

इसीलिए आपका यह कहना सही है कि वस्तुगत जगत के बोध का स्तर विचारों का विकास करता है, उन्हें परिवर्तित या परिवर्धित करता है।

नये विचार भी इसी प्रक्रिया से जन्म लेते हैं, वे भी किसी आधारहीन कल्पना से अचानक पैदा नहीं होते। हर नयी समस्या वैचारिक जगत में अवरोध पैदा करती है और मनुष्य अपने पूर्व के संज्ञानों के आधार पर उन्हें विश्लेषित कर उनके हल की संभावनाओं की परिकल्पनाएं करता है, जाहिर है नये विचार करता है।

रथ की संकल्पना या विचार का जन्म, पहिए की वस्तुगतता के बिना नहीं हो सकता। पक्षियों की उडानों के वस्तुगतता के बगैर वायुयान के विचार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बिना सोलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक्स के विकास के कंप्यूटर का नया विचार पैदा नहीं हो सकता था।

नये विचार, विचारों की एक सतत विकास की प्रक्रिया से ही व्युत्पन्न होते हैं, जिनके की पीछे वस्तुगत जगत के बोध और संज्ञान की अंतर्क्रियाएं होती हैं।

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तो हे मानवश्रेष्ठों,
बौद्धिक प्रगतिशीलता, लेखन के सरोकार और विचार पर आपको इनमें से कुछ बौद्धिक मसाला जरूर मिला होगा, जो कि शायद आपके विचारों को उद्वेलित कर पाए।

समय को तो मानवजाति द्वारा समेटा गया यह ज्ञान बहुत उद्वेलित करता है।

सामान्य तौर पर समय फिर हाज़िर होगा।

समय

सोमवार, 8 जून 2009

धूमिल के बहाने : कविता का शिल्प, कथ्य और सरोकार

हे मानव श्रेष्ठों,

इस बार समय के पास धूमिल जी की एक कविता और उसकी व्याख्या से संबंधित एक संवाद है। इस संवाद के जरिए कविता और उसके सरोकारों पर एक अच्छा दृष्टिकोण बनाने में मदद मिल सकती है।
दरअसल मनुष्य श्रेष्ठ श्री आदर्श राठौर ने अपने ब्लॉग पर धूमिल की एक कविता प्रस्तुत कर उसका अर्थ जानना चाहा था, जिस पर मनुष्य श्रेष्ठ श्री शशांक शुक्ला ने अपना सरलार्थ प्रस्तुत किया था। समय इस चल्ताऊ दृष्टि से थोडा आहत हुआ और उसने भी अपनी व्याख्या प्रस्तुत की।

इस पर आगे हुआ संवाद समय यहां भी रख रहा है, ताकि सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आवे। आप भी अपनी समझ की पुनःजाँच करके कुछ जोड-घटा सकते हैं।
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पहले धूमिल जी की कविता:

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए
ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
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इस पर की गई दोनो व्याख्याओं को आप ऊपर जिक्र किए गये लिंक पर पढ़ सकते हैं।

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समय की व्याख्या पर श्री शशांक की टिप्पणी थी:

समय जी ने जो विचार रखें है उसे देखकर लगता है कि काफी हद तक वो सही है लेकिन एक बात जो इस कविता में छुपी हुई है कि यदि धूमिल जी ने इस कविता को लिखते वक्त क्या सोच रहे होंगे क्योंकि अक्सर होता क्या है कि कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है समय जी ने जो गूढ़ आर्थ निकाला है उससे मैं संतुष्ठ हूं पर सही है पर क्यों धूमिल इस कविता के पहली चार पंक्तियों से अगली चार पंक्तियों के गूढ़ अर्थ से जुड़ती नज़र नही आ रही है क्योंकि शब्दों का गठन अलग हो सकता है चयन भी अलग हो सकता है पर अर्थ और भावार्थ अलग नहीं हो सकता क्यों कविता जब तक पहली चार पंक्तियों को अगली के ज़रियें नहीं समझाती तो उसे कविता नहीं कह सकते है समय जी के कविता भावार्थ से ये जुड़ाव कम ही दिखता है। कविता में जो कि बहुत ज़रुरी है वो ये कि शुरुआत से लेकर अंत तक शब्द चयन वाक्य का अर्थ अलग हो सकता है पर भावार्थ अलग नहीं हो सकता है।

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इस पर समय का कहना यह था:

आदरणीय शशांक जी,
आपने कुछ महत्वपूर्ण बिंदू उठाये हैं।

पहली जो उल्लेखनीय बात है वह कविता के शिल्प और कथ्य से संबंधित है
आप लगता है कविता के शिल्प के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।
जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता मानसिक शगल और व्यक्तिगत सरोकारों का वाइस होती है वहां आपका यह कहना सही है कि "कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है", पर जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता एक जिम्मेदारी का अहसास होती है, जिसे वे अपनी पूरी वैचारिक समझ के साथ एक परिवर्तन के हथियार की तरह प्रस्तुत करते है और अपनी संवेदनशीलता को व्याक्तिगत उंहापोहो से आगे ले जाकर उसे सामाजिक सरोकारों तक विस्तार देते हैं, उनके लिए कथ्य ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
फिर कविता ऐसे ही उभरी अस्पष्ट सी सोच या आशु भावों की शब्दों की तुरत-फुरत शिल्पगत अभिव्यक्ति मात्र नहीं रह जाती, वरन शिल्प की सीमाओं के अन्दर और यदि जरूरी है तो इन सीमाओं को तोडकर भी अपनी बात को, निश्चित सोच को पुरजोर तरीके से रखने की कोशिश करती है।
इसीलिए हम देखते हैं कि जब कविता ने यह जिम्मेदारी महसूस की, वह छंद-बंद के पुराने शिल्पगत बंधंनों से मुक्त होकर सरल अतुकांत नयी कविता के रूप में सामने आई। अब कई महान साहित्यकार इसमें भी शिल्प की जकडन उलझा कर वापस इसे स्वांतसुखाय की ओर ले जाना चाहते हैं।
यह कहने का मतलब ये कतई नहीं हैं की शिल्प से कोई मतलब ही नहीं होता कविता का। शिल्प का उचित गठन, कथ्य को प्रभावशाली और अचूक बनाता है, परंतु किसी एक का अतिरेक कविता को कमजोर करता है। कथ्य कविता के सामाजिक सरोकारों और सौद्देशीयता को मुखर करता है और शिल्प इसके प्रभाव को।

आपने यह बिल्कुल सही पकडा है कि धूमिल जी की उक्त कविता में पंक्तियों के बीच जुडाव और निरंतरता की कमी खलती है। परंतु धूमिल जी का कविता शिल्प शब्दों की मितव्ययता पर टिका है, वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए प्रतीकों और अभिव्यंजनाओं में अपने कथ्य को प्रस्तुत करते हैं और पाठक से एक गंभीर संवाद कायम करना चाहते हैं, जिसमें पाठक की चेतना को संस्कारित करने का, उसके मस्तिष्क का सचेत परिष्कार करने का उद्देश्य शामिल होता है।
जिन मनुष्य श्रेष्ठों का उद्देश्य यही होता है, वे इन कविताओं से गुजरकर इन्हें अपने व्यक्तित्व और समझ के विकास का जरिया बना सकते हैं, और जो मनुष्य सिर्फ़ मनोरंजन का एकान्तिक आनंद भोगने के लिए इन पर सरसरी नज़र डालते हैं उनके लिए ये कविताएं एक अबूझ पहेली बनकर रह जाती हैं या वे चलताऊ ढंग से इनकी तुरत-फुरत मनचाही व्याख्या कर अपनी तात्कालिक संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं।

और उक्त कविता के संदर्भ में एक और अंतिम बात। ऐसा कतई नहीं है कि यहां जुडाव और निरंतरता सिरे से ही गायब हो।

यह गरीब इस कविता से पहले नहीं गुजरा है, और ना ही इसके मूल पाठ के बारे में कुछ पता है कि यही पूरी कविता है या कुछ छूट गया है, फिर भी दोबारा देखने से जो लगा वो यह है कि पहली तीन पंक्तियों में वे शब्द और कविता की बात करते हैं, अगली दो पंक्तियों में कविता के सरोकारों के रूप में आदमी को केन्द्र में रखे जाने की बात करते हैं, फिर आगे की चार पंक्तियों में कौनसे आदमी को केन्द्र में रखा जाना है, किस आदमी का आपको पक्ष लेना है उनका जो मार रहे हैं या उनका जो मारे जा रहे हैं, आपकी संवेदनशीलता किस चीज़ पर द्रवित हो रही है। जाहिरा तौर पर यहां धूमिल आपके मन में मिट्टी और खून के रंग की चर्चा कर उसकी सिर्फ़ आवाज़ से तुलना कर हमें प्रेरित कर रहे हैं कि हम शोषितों के पक्ष को अपनी संवेदना से जोडें।
उसके आगे की चार पंक्तियों में धूमिल जी अब साफ़-साफ़ इशारा करते हैं आपकी आगे के क्रियाकलाप और व्यवहारों की दिशा क्या होनी चाहिए, अगर आप वाकई में उन लोगों का पक्ष चुनना चाह रहे हैं जो दमित और शोषित हैं तो आपको अपनी समझ और क्रियाशीलता का उत्स उन्हीं के बीच से खोजना होगा, वहीं आपको सही राह मिल पाएगी क्योंकि उनसे अलगाव के साथ, आपके पक्षपोषण की ईमानदारी कायम रहने के बाबजूद आपके वैचारिक और क्रियात्मक भटकाव की पूरी संभावनाएं हैं।

अरे वाह। दोबारा पढ़ने पर तो यह गरीब भी खुद अभिभूत हो उठा है कि इन आठ-दस पंक्तियों में तो साहित्य, उसके सरोकारों और क्रियाशीलता की सही दशा-दिशा का पूरा दर्शन छिपा हुआ था।

आदर्श जी और शशांक जी का अब मैं वाकई तहे-दिल से शुक्रिया करना चाहता हूं जिनकी कि जुंबिशों की वजह से इस खाकसार को अपनी चेतना के परिष्कार का अवसर मिला और वह अपनी समझ में काफ़ी-कुछ जोड पाया।

एक बार फिर शुक्रिया !!
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तो हे मानव श्रेष्ठों,
आप भी यहां पर इस संवाद को आगे बढा़ सकते हैं, कुछ जोड़ घटा सकते हैं।

अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर सकते हैं।

शुक्रवार, 5 जून 2009

सौन्दर्यबोध और व्यवहार

हे मानव श्रेष्ठों,

समय के पास, पहले की एक और जिज्ञासा है, देखिए..
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"पाषाण युग में गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए जाते थे, उपलब्ध संसाधनों के तालमेल से संगीत भी गाया-बजाया जाता था, ग्रामीण लोग आज भी घरों के आगे मांडने बनाते हैं, लोकगीतों की धुन आज भी आकर्षित करती है। ऐसे में इलीट वर्ग के फ़्यूजन संगीत और महंगी तस्वीरों को अपने संग्रह का हिस्सा बनाने की होड़ और प्रकृति से परे इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन को क्या ‘सौन्दर्यबोध’ कहा जा सकता है?"
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कुलमिलाकर यह जिज्ञासा सौन्दर्यबोध के निरूपण और तुलना के संदर्भ में है।
चलिए बात शुरू करते हैं...
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उपरोक्त जिज्ञासा में पूर्वोक्त तथ्य सामूहिक श्रम-जीवन के सौन्दर्यबोध की सहज और सरल अभिव्यक्तियां हैं, वहीं पश्चोक्त तथ्य सौन्दर्यबोध के विकास की व्यक्तिवादी और अहमवादी दिशा का द्योतक है। इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन में भी दोनों तरह की प्रवृतियां मौजूद हैं।

मनुष्य अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान, विभिन्न सौन्दर्यात्मक गुणों, मुख्य रूप से सुंदर और कुरूप का भावनात्मक मूल्यांकन करने की योग्यता विकसित करता है। यह योग्यता उसके सृजनात्मक कार्यों में प्रकट होती है और उसके आनंद की प्रेरणा स्रोत होती है। उत्तम सौन्दर्याभिरूचियों का अर्थ है वास्तविक सौन्दर्य से आनंद प्राप्त करने की योग्यता, अपने कार्य में, दैनंदिन जीवन, आचरण, कला में सौन्दर्य का सृजन करने की अपेक्षा। निकृष्ट सौन्दर्याभिरूचियां यथार्थ के प्रति मनुष्य के सौन्दर्यात्मक दृष्टिकोण को विकृत करती हैं, वास्तविक सौन्दर्य के प्रति उदासीन बनाती हैं और कभी-कभी परिणाम यहां तक पहुंचता है कि मनुष्य कुरूप वस्तुओं और प्रवृतियों से भी आनंद प्राप्त करता है।
सौन्दर्यबोध सुंदर के चयन और निरूपण से संबंधित मात्र नहीं होता, वरन् सुंदर का असुंदर से भेद और फिर असुंदर को सुंदर बनाने के सचेत क्रियाकलापों से भी संबंधित है। यह सिर्फ़ विश्व के वस्तुगत रूप का मामला ही नहीं, वरन् विचारों की सुंदरता का मामला भी है। यह सौन्दर्य के निरूपण के साथ-साथ असौन्दर्य के साथ संघर्ष और उसके खात्में की प्रक्रिया पर निर्भर है।
विचारों के मामले में शिव और अशिव यानि सुंदर और असुंदर के निर्धारण की कसौटी क्या हो, यह मनुष्य की वर्गपक्षधरता और सौन्दर्याभिरूचियों पर निर्भर करता है। परंतु यदि सामाजिक नज़रिए से देखा जाए तो मोटे तौर पर यह कसौटी निर्धारित की जा सकती है जो विचार अंतत्वोगत्वा संपूर्ण मानव समाज या अधिकतर हिस्से के हितों के अनुरूप हो तो वह शिव है, सुंदर है जबकि जो विचार व्यक्तिगत हितों और प्रभुत्व प्राप्त समूहों के हितों के अनुरूप हो वह अशिव है, असुंदर है।
अब होता यह है कि प्रभुत्व/सत्ता प्राप्त समूह, चूंकि सारे साधन उनकी पहुंच और प्रभाव में होते हैं, ऐसे विचारों और विचारधाराओं का प्रचार और पक्षपोषण करता है जो उनके हितों के अनुरूप हों या ख़िलाफ़ नहीं जाते हों। अंतत्वोगत्वा समाज में और प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छाएं रखने वालों में इन्हीं विचारों का बोलबाला हो जाता है, और सभी क्षेत्रों की सृजनात्मकता और रचनात्मकता इसी प्रभुत्व प्राप्ति के आकांक्षा के साथ गर्भनालबद्ध हो जाती हैं।
उपरोक्त जिज्ञासा को, इसकी पश्चोक्त विकृतियों को इसी नज़रिए के साथ विश्लेषित करना चाहिए।

दरअसल किसी भी क्रिया को बेहतर तरीके से करने की प्रवृति मनुष्य के सौन्दर्यबोध पर निर्भर करती है। एक समुचित और उच्चतर सौन्दर्यबोध का विकास और निर्माण मनुष्य के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया या व्यवहार को सचेत नियंत्रित और निर्देशित करता है।
सौन्दर्यबोध यानि सुंदरता का अहसास, सौन्दर्य के आदर्श प्रतिमानों की समझ, हर वस्तु, क्रिया या विचारों का उन प्रतिमानों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण, सुंदर और असुंदर के बीच तार्किक विभेद स्थापित कर सकने की योग्यता और साथ ही मनुष्य की संवेदनाओं का सौन्दर्य के हित और हेतु परिष्कार।
सौन्दर्यबोध मनुष्यों को हर क्रिया को बेहतर रूप से करने, आदर्श रूप में करने के लिए सचेत प्रेरित करता है, मनुष्यों के विचारों को बेहतरी की ओर अग्रसर करता है। स्वयं को और बेहतर, पर्यावरण और दुनियां को और बेहतर बनाने में मनुष्य की दिशा तय करता है।
जाहिर है एक उत्तम सौन्दर्यबोध का निर्माण और विकास, सिर्फ़ एक निश्चित क्रियाकलाप तक अपने आपको सीमित नहीं रख सकता, यह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में अपनी श्रेष्ठता के साथ सक्रिय रहने की क्षमता प्रदान करता है।
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आज इतना ही...
अगली बार कुछ और नयी जिज्ञासाएं.......

समय

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