रविवार, 2 सितंबर 2018

मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम उसी संवाद का अगला हिस्सा प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद - २
(A dialogue on the Essence of Man and the Sense of Life -2)

यह काल्पनिक संवाद, यहां की अब तक की सामग्री को भली भांति पढ़ चुके एक पाठक (पा०) तथा एक दार्शनिक (दा०) के बीच हो रहा है, जो द्वंद्ववाद और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाता है। पिछली बार से अब और आगे।

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पा० - तो फिर ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन (historical materialistic philosophy), मनुष्य के सार (essence) तथा जीवन के अर्थ (sense) को किस तरह से समझता है?

दा० - ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन यह मानकर चलता है कि मनुष्य मुख्यतः एक सामाजिक प्राणी है। वह श्रम की प्रक्रिया के द्वारा विकसित तथा जंतु जगत से अलग हुआ। उसके कर्म, लक्ष्य, दृष्टिकोण और इरादे अंततः उस समाज के संबंधों (social relations) से और सर्वोपरि उत्पादन संबंधों (relations of production) से निर्धारित होते हैं।

पा० - यदि किसी प्रदत्त युग (given age) में लोगों का सार सामाजिक संबंधों से निर्धारित होता है, तो क्या सब लोग, कम से कम एक प्रदत्त समाज में, जुड़वां बच्चों की तरह एक समान नहीं होने चाहिए क्या? तो फिर लोग अपने व्यवहार, रुचियों, दृष्टिकोणों, जीवन के लक्ष्यों और स्वभाव में एक दूसरे से भिन्न क्यों होते हैं?

दा० - यह मत भूलिए कि यह ही सार भिन्न-भिन्न ढंग से प्रदर्शित हो सकता है, क्योंकि उसके लिए पूर्वावस्थाएं हमेशा भिन्न होती हैं। मसलन, सारे हीरों का सार एक ही है और इस बात से निर्धारित होता है उनमें कार्बन के आयन निश्चित मणिभ-जालकों (crystal lattices) में समाहित होते हैं। किंतु प्रकृति में दो पूर्णतः समरूप हीरे नहीं पाए जाते। वे अपने आकार, रंग, पारदर्शिता, आकृति, दरारों की उपस्थिति, आदि में एक दूसरे से भिन्न होते हैं चाहे यह भिन्नता कितनी ही न्यू्न क्यों ना हो। इसका कारण यह है कि वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में बने। निश्चय ही लोग इससे अरबों गुना अधिक जटिल और विविध होते हैं। मानवीय सार की अभिव्यक्ति आदमी का व्यक्तित्व (personality) है। संसार में ऐसे दो व्यक्तियों का अस्तित्व नहीं है जिनके व्यक्तित्व पूर्णतः समान हों।

पा० - लेकिन व्यक्तित्व क्या है? उसे कौन निर्धारित करता है?

दा० - यह मुख्यतः मनुष्य के सार पर, यानी ऐतिहासिक दृष्टि से परिवर्तित होते हुए सामाजिक संबंधों पर निर्भर होता है। इसलिए एक युग का या किसी एक वर्ग (class) का व्यक्तित्व (व्यक्ति), दूसरे युग या वर्ग के व्यक्तित्व (व्यक्ति) से मूलतः भिन्न होता है। काम के, अपने वर्ग, परिवार, स्कूली शिक्षा-दीक्षा के प्रति रुख़ (attitude) और शिक्षा का स्तर तथा व्यक्ति की जानकारी का दर्जा एवं उसकी क्षमताओं के विकास का स्तर, व्यक्तित्व के निर्माण को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा इस पर, व्यक्ति के मिज़ाज (temperament), अन्य लोगों के प्रति रुख़, अपना स्वमूल्यांकन (self-estimation), आदि भी उसे प्रभावित करते हैं। इसलिए, एक सामान्य सार के होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति मौलिक (original) और अद्वितीय (imitable) होता है। इसमें सामान्य, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) अभिव्यक्त होती है।

पा० - तो इससे यह निष्कर्ष निकला कि प्रत्येक विशिष्ट व्यक्ति को समझने के लिए हमें एक सामाजिक-ऐतिहासिक सत्व (social and historical being) के रूप में उसके मात्र सार की ही नहीं, बल्कि उसके जीवन के वृतांतों, उसकी शिक्षा-दीक्षा की विशिष्टताओं, जीवन से संबंधित ब्यौरों, आदि की जानकारी भी होनी चाहिए।

दा० - बिल्कुल सही।

पा० - यहां एक नया प्रश्न है। सामाजिक संबंध और मनुष्य का सार भी युग-दर-युग बदलते जाते हैं। इसके अलावा, यह सार अरबों भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में अभिव्यक्त होता है जिनके लक्ष्य तथा जीवन के प्रति रुख़ भिन्न-भिन्न होते हैं। तो क्या हम मानवता के लिए, कम से कम अपने युग की मानवजाति के लिए जीवन के एक एकल अर्थ (single sense) तथा लक्ष्य की बात कर सकते हैं?

दा० - बेशक कर सकते हैं। यह सर्वोच्च लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति तथा सकल (whole) समाज की स्वतंत्रता (freedom) की उपलब्धि है।

पा० - यह स्वतंत्रता हमें क्या देगी?

दा० - यह हमें एक समृद्ध, ओजस्वी, यानी रचनात्मक (creative) जीवन का, पूर्ण आत्मविकास (self-realisation) का अवसर देगी।

पा० - परंतु रचनात्मकता और रचनात्मक जीवन इतने महत्वपूर्ण क्यों है? और यह आत्मविकास क्या है?

दा० - जैसा कि आप जानते हैं, विकास की कोई भी प्रक्रिया नूतन (new) का उद्‍गम है। प्रकृति में नये महाद्वीपों, पर्वतों, या नदियों की रचना में करोड़ों या सैकड़ों हज़ारों वर्ष लगे। पौधों और जानवरों की नयी जातियों की रचना में हजारों या सैकड़ों वर्ष लगे। आधुनिक मनुष्य कृत्रिम नदियों और झीलों की रचना तथा भूदृश्यावलियों में परिवर्तन कुछ ही वर्षों या महीनों के अंदर कर डालता है। हमने थोड़ी ही अवधि में जीवित अंगियों की ऐसी नयी जातियों की रचना करना सीख लिया है, जिनके गुण पूर्वनियोजित होते हैं। 

रचनात्मकता, मनुष्य के हित में और उसकी भौतिक तथा बौद्धिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए नूतन की सचेत, सोद्देश्य रचना है। लोग हमेशा रचनात्मक रहे हैं, किंतु सामान्यतः यह रचनात्मकता स्वतःस्फूर्त (spontaneous) रही है। इसके अलावा, शोषक समाजों में यह कुछ ही लोगों की क़िस्मत होती थी और हमेशा मनुष्यजाति के हितार्थ नहीं होती थी। किसी अन्य की ज़रूरतों और संकल्पों (will) से संचालित करोड़ों लोगों ने ऐसे उद्देश्यों के लिए काम किया जिन्हें वे समझ नहीं पाते थे। उनकी अंतर्जात (inborn) क्षमताएं अपविकसित या एकतरफ़ा विकसित थीं। उत्पादक शक्तियों (productive forces) का स्तर, जीवन पद्धति और उत्पादन संबंधों का स्वरूप भौतिक श्रम और सामाजिक जीवन के दौरान लोगों के इरादों, क्षमताओं, आशाओं और आदर्शों को वास्तविक नहीं बनने देते थे। इसके लिए वस्तुगत दशाएं (objective conditions) सामान्यतः विद्यमान नहीं थीं।

आत्मविकास, वस्तुतः भौतिक वस्तुओं और आत्मिक मूल्यों तथा स्वयं व्यक्ति के जीवन में इंजीनियरी तथा तकनीकी विचारों, नैतिक व कलात्मक मानकों (standards) तथा न्यायोचित सामाजिक प्रणाली के आदर्शों का साकार होना है। यह रचनात्मकता से और इससे भी अधिक, रचनात्मक चेतना से अविभाज्य (inseparable) है। ऐसी रचनात्मकता केवल तभी संभव है जब वास्तविक (real), सच्ची स्वतंत्रता (genuine freedom) हो जो केवल मानव जाति के दीर्घ, जटिल विकास के द्वारा ही उपलभ्य (attainable) है।

पा० - किंतु अगर लोग स्वतंत्र हों और प्रत्येक अपने ही ढंग से जीवन को समझता हो, अपने ही लक्ष्यों, आदि का अनुसरण करता हो, तो क्या उससे अंतहीन झगड़े नहीं होंगे? एक व्यक्ति आत्मविकास के लिए संगीत रचने की इच्छा रखता हो और सुबह से शाम तक पियानो को ठकठकाता रहता हो, तो वह संगीत किसी अन्य को परेशान तथा उसके काम में दखलअंदाज़ी कर सकता है, जिसे गणितीय समस्या हल करने के लिए पूरी ख़ामोशी की जरूरत है। किंतु अगर हर कोई आत्मविकास में जुटा हो और अन्य लोगों की परवाह किए बिना उन्मुक्त रूप से कार्य करता हो, तो सारी मानव जाति को क्या उपलब्ध होगा? आख़िर समाज में अप्रिय, कष्टसाध्य तथा अरचनात्मक काम होंगे।

दा० - आप अराजकता (anarchy) और सच्ची स्वतंत्रता को गड्डमड्ड कर रहे हैं। जो भी व्यक्ति अन्य लोगों या समाज के अहित में काम करता है, वह स्वतंत्र नहीं हो सकता है। यह समझने के लिए कि मानवजाति के प्रत्येक सदस्य के रचनात्मक श्रम तथा आत्मविकास से स्वयं मानवजाति को क्या फ़ायदा होगा और उससे व्यक्ति को क्या मिलेगा, हमें इन प्रश्नों की अधिक विस्तृत समझ हासिल करनी चाहिए और इसके लिए हम ‘स्वतंत्रता और आवश्यकता’ से बात आगे शुरू करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 26 अगस्त 2018

मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका में बढ़ती पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य और समाज
मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद - १
(A dialogue on the Essence of Man and the Sense of Life -1)

यह काल्पनिक संवाद यहां की अब तक की सामग्री को भली भांति पढ़ चुके एक पाठक (पा०) तथा एक दार्शनिक (दा०) के बीच हो रहा है, जो द्वंद्ववाद और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाता है।

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पा० - यहां प्रारंभ में आपने कहा था कि दर्शन का और सर्वोपरि द्वंद्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद (dialectical and historical materialism) का ज्ञान मनुष्य के सार (essence) को, आधुनिक जगत में उसके स्थान को तथा उसके जीवन व उद्देश्य को समझने के लिए, अतः आधुनिक युग की सर्वाधिक विकट समस्या को समझने के लिए आवश्यक है।

दा० - बिल्कुल ठीक। और हमने इन समस्याओं पर वस्तुतः लगातार विचार-विमर्श किया। यहां हमने दर्शन के बुनियादी सवाल पर, चेतना (consciousness) तथा भूतद्रव्य (matter) के संबंध के सवाल पर ध्यान दिया। यह मूलतः समस्त विश्व के साथ मनुष्य के संबंध का सवाल है। हमने सामाजिक सत्व (social being) तथा सामाजिक चेतना के, लोगो के भौतिक उत्पादन तथा आत्मिक क्रियाकलाप के संबंध की जांच करते हुए अपने विचार-विमर्श को जारी रखा। हमने यहां प्रकृति के साथ मानव समाज के संबंध पर विचार किया। द्वंद्ववादके नियमों का अध्ययन करने तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के ज्ञान के सिद्धांत से परिचित होने के बाद हम अन्य अनसुलझे सवालों को समझने के लिए तैयार हुए।

पा० - तो आइये, उनसे निबटने और उन्हें हल करने की कोशिश करें। मसलन, मनुष्य का सार क्या है? उसके जीवन का अर्थ क्या है? मनुष्य किसके लिए जी रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर पाना अत्यंत कठिन है।

दा० - आपकी राय में, उनका उत्तर देना किस वजह से कठिन है?

पा० - हम जानते हैं कि दुनिया में कई अरब लोग, अनेक अनेक देशों में रहते हैं - विभिन्न जातियों (nationalities), नस्लों (race) के लोग, पुरुष और नारियां, बूढ़े और जवान, विभिन्न वर्गों (classes) और सामाजिक समूहों के लोग। उनकी शिक्षा-दीक्षा भिन्न है, चरित्र और लक्ष्य भिन्न हैं और वे जीवन को तथा उसमें अपने स्थान को भिन्न-भिन्न ढंगो से समझते हैं। इस स्थिति में क्या हम मनुष्य के, एक एकल सार (single essence) की सामान्य बात कह सकते हैं? समाज की बात तो दूर, जब हम केवल दो भिन्न आदमियों ही को लें, तो भी हम उनके, कम से कम कोटि (degree) के सामान्य लक्ष्यों के बारे में या जीवन के अर्थ के बारे में क्या बातें कर सकते हैं?

दा० - आपके प्रश्न में एक ग़लती की संभावना निहित है। आपकी राय में ये विभिन्नताएं इतनी बड़ी हैं कि आप सामाजिक समूहों और वर्गों के समान लक्ष्यों या किसी प्रकार के सामान्य जीवन के अर्थ की बात स्वीकार नहीं करते। आप यह सुझाते हैं कि मनुष्य का कोई समान सार नहीं है या ऐसा कुछ नहीं है, जो लोगों को एकता में बांध सके। यह बात ऐसी ही अतिवादी (extreme) है, जैसे यह सोचना कि सब लोग एकसमान हैं, कि वे नन्हे, अवैयक्तिक (impersonal), सामाजिक पेंच हैं। किंतु सामान्य, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की एक द्वंद्वात्मक एकता होती है। हमारा दर्शन लोगों के लिए उनके सारे लक्ष्यों या उनके प्रत्येक पृथक कर्म, आदि के लिए नुस्खे़ (prescriptions) तैयार करने का लक्ष्य नहीं रखता है। मनुष्य और समाज एक द्वंद्वात्मक एकत्व (dialectical unity) है, अतः इन प्रश्नों का उत्तर इस शर्त पर ही दिया जा सकता है कि हम लोगों के अंतर तथा समानता को, व्यक्तिगत और सामाजिक हितों के अंतर्संयोजन (interconnections) को, सामाजिक और व्यक्तिगत क्रियाकलाप की अंतर्निर्भरता को मान्यता दें। हम केवल ऐसे ही एक उपागम (approach) से यह समझ सकते हैं कि मनुष्य का सार क्या है और कि उसके जीवन का अर्थ क्या है।

पा० - तो बताइए यह सार क्या है?

दा० - दर्शन के इतिहास ने इसके कई भिन्न-भिन्न उत्तर दिये हैं। मसलन, प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का विचार था कि मनुष्य का सार यह है कि वह स्वयं में एक सूक्ष्म ब्रह्मांड (microcosm) है, यानी एक नन्हा, जीवित गतिमान जगत है, जो अपनी परिवेशीय दुनिया को, बॄहत ब्रह्मांड (macrocosm) को सूक्ष्मीकृत रूप में दोहराता है। लेकिन तब से अब तक विज्ञान के विकास ने यह दर्शाया है कि मनुष्य की जीवन क्रिया सामाजिक विकास के नियमों से संचालित है, जबकि बाह्य जगत प्रकृति के नियमों के अनुसार विकसित होता है। जीवन ने मनुष्य के सार की प्राचीन यूनानी समझ का खंडन कर दिया। मध्ययुगीन ईसाई दर्शन ने उसका सार दैवी उत्पत्ति (divine origin) में, उनके अनुसार इस तथ्य में देखा कि उसमें आत्मा (soul) का निवास है। किंतु आत्मा का सृजन हमेशा के लिए ईश्वर ने किया है, जबकि लोग नितांत भिन्न हैं। लोग वैर पालते हैं, लड़ते हैं और अत्यंत अधार्मिक कार्य करते हैं, दैव विरोधी कर्म करते हैं। इससे बड़ी बात यह है कि मनुष्य की जीवन पद्धति, रुचियां, दृष्टिकोण तथा स्वयं जीवन की समझ युग-दर-युग बदलती रहती हैं। मनुष्य के सार की ईसाई संकल्पना भी काल कसौटी में खरी नहीं उतरी। अपने विचारों की विभिन्नता के बावजूद पूंजीवादी दार्शनिक मनुष्य के सार को तथा उसके मुख्य लक्ष्य को, प्रकृति पर और अन्य लोगों पर प्रभुत्व (domination) में देखते हैं।

पा० - (बात काटते हुए) तो फिर जीवन का अर्थ और मानवता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति (supreme manifestation) क्या है?

दा० - लोगों की सबसे बड़ी संख्या मेहनतकशों (working people) की है और प्रतिरोधी वर्ग समाजों (antagonistic class societies) में उनका शोषण होता है। वे कोई मुनाफ़ा (profit) नहीं कमाते और इस प्रभुत्व से कोई हितलाभ (benefits) हासिल नहीं करते हैं। इसके अलावा यह प्रभुत्व, मनुष्यों को नीचा बनाता है, उनकी हैसियत गिराता है और प्रकृति को नष्ट तथा अस्तव्यस्त करता है। इसलिए प्रभुत्व और किसी भी क़ीमत पर मुनाफ़ा कमाना अधिकांश लोगों के लिए जीवन का सार या अर्थ नहीं हो सकता है। वे केवल चंद शोषकों (exploiters) के सार तथा लक्ष्यों को निर्धारित करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 12 अगस्त 2018

समाजवाद के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता पर चर्चा की थी, इस बार हम समाजवाद के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाजवाद के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका में बढ़ती
(Growth of the Role of the Subjective Factor under socialism)

सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता (relative independence) पर विचार करते और इसके विविध रूपों की सक्रियता पर जोर देते समय हमने यह साबित किया कि वे सब सामाजिक यथार्थता (reality) के विविध पक्षों को परावर्तित (reflect) ही नहीं करते, बल्कि उस पर एक सक्रिय प्रतिप्रभाव (active reverse effect) भी डालते हैं। यह प्रभाव विभिन्न प्रकार की प्रगतिशील प्रवृतियों के विकास को बढ़ावा भी दे सकता है और साथ ही उनके वास्तवीकरण (realisation) को रोक भी सकता है। ऐतिहासिक प्रक्रिया में आत्मगत (subjective)’ मानवीय कारक की महत्वपूर्ण भूमिका दोनों ही मामलों में अभिव्यक्त होती है।

यह भूमिका किसमें निहित है? आज मानवीय कारक (human factor) इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है? समाज का विकास, एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया होते हुए भी अलग-अलग लोगों या पृथक-पृथक सामाजिक समूहों द्वारा अपने लिए तय कुछ निश्चित लक्ष्यों की समझ के साथ हमेशा संबद्ध (connected) होता है। इन उद्देश्यों की उपलब्धि और लक्ष्यों की पूर्ति और उपलब्धि, क्रियाकलाप की पद्धति के चयन तथा लिये गये निर्णय पर निर्भर हैं। यहां दो संभावनाएं विद्यमान हैं।

पहली यह है कि लोग अपने लिए अलभ्य (unattainable) लक्ष्य निश्चित करते हैं, अपने कार्यों का गलत निरूपण करते हैं, कुविचारित फ़ैसले लेते हैं और कार्य पद्धति का ऐसा तरीक़ा छांटते हैं जो प्रदत्त दशाओं, प्रदत्त समय, प्रदत्त स्थान तथा प्रदत्त समाज के लिए अनुपयुक्त (unsuitable) होता है, या इच्छित परिणामों की उपलब्धि के लिए कारगर नहीं होता है। इस प्रकार के फ़ैसले और ऐसी कार्रवाइयां सामाजिक प्रगति को रोक सकती हैं, जीवन के हालतों को बदतर बना सकती हैं और अवांछित (undesirable) तथा कभी-कभी विनाशक (disastrous) परिणामों पर पहुंचा सकती है। यह इस बात का द्योतक भी है कि सामाजिक विकास के ग़लत ढंग से अनुबोधित (understood) नियमसंगतिया तथा वस्तुगत परिस्थितियां लोगों से इस बात का `बदला' लेती हैं कि उन्हें उनकी जानकारी नहीं है, कि उन्होंने उनका अध्ययन नहीं किया और अपने क्रियाकलाप में उन्हें परावर्तित नहीं किया। देर-सवेर ये नियमसंगतिया और उनकी ग़लत समझ के परिणाम उन्हें अपने ग़लत फ़ैसलों को बदलने तथा वस्तुगत यथार्थता के अधिक अनुरूप ज़्यादा सही कार्य पद्धति को खोजने के लिए बाध्य कर देते हैं। पर जब तक ऐसा होता है तब तक ग़लत ढंग से लिये गये फ़ैसलों पर चलने तथा अलभ्य लक्ष्यों का अनुसरण करने वाले लोगों को अपनी ग़लतियों की भारी क़ीमत अदा करनी पड़ती है।

दूसरी संभावना यह है कि लोगों को वस्तुगत नियमितताओं का गहन तथा ठीक अवबोध होता है और वे सामाजिक सत्व की वास्तविक दशओं व प्रवृतियों को समझते हैं। इस कारण से वे वास्तविक, विज्ञानसम्मत लक्ष्यों तथा किये जा सकनेवाले कार्यों को प्रस्तुत करने में समर्थ होते हैं। वे सच्चे फ़ैसले लेने और कार्य के कारगर तथा विश्वसनीय साधनों को काम में लाने में समर्थ होते हैं। बेशक, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता है कि ऐसी स्थिति में सब कुछ सरल और आसान हो जाएगा तथा लक्ष्य संघर्ष के बिना ही सुलभ्य हो जाएंगे और समुचित कार्रवाई को कठिनाइयों और बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। जीवन की वस्तुगत जटिलता (complexity) और अंतर्विरोधी (contradictory) स्वभाव के कारण तथा इस कारण से कि समाज में लोगों, सामाजिक तथा व्यवसायिक समूहों की बड़ी संख्या और साथ ही अपने-अपने हितों की रक्षा करने वाले विभिन्न संगठन एक ही समय क्रियाशील हैं, इसलिए प्रमुख और समान लक्ष्यों की उपलब्धि में कठिनाइयों और बाधाओं का आना स्वाभाविक है।

परंतु पहली और दूसरी संभावना के बीच मूल अंतर यह है कि दूसरी सूरत में नियोजित (planned) लक्ष्य की तरफ़ गति अधिक तेज़ होती है और ग़लतियां कम होती हैं। ऐसी स्थिति में लोग हमेशा दूसरी ही संभावना को कार्यान्वित क्यों नहीं करते? बात यह है कि वास्तविक समाज में सामान्यतः सामाजिक चेतना, सामाजिक सत्व (social being) के मु्क़ाबले पिछड़ी हुई होती है। वास्तविकता का सही, गहरा और, उससे भी अधिक, वैज्ञानिक बोध हमेशा उपलब्ध होना दूर की बात है, क्योंकि विविध सामाजिक शक्तियां, अर्थात सामाजिक-वर्गीय अंतर्विरोध तथा संघर्ष, विभिन्न पूर्वाग्रह, वैचारिक उसूल, सामाजिक मनोदशाएं तथा भावावेग, सूचना की कमी, आदि चेतना, यानी सामाजिक विकास के आत्मगत कारकों को प्रभावित करती है। सही फ़ैसला लिया जाना तथा लक्ष्यों और वस्तुस्थिति का सच्चा बोध अक्सर नेताओं, राजनीतिक चिंतकों तथा विचारकों के व्यक्तिगत गुणों के कारण बाधित हो जाता है। जिन लोगों पर सामाजिक लक्ष्यों और वैचारिकी का निर्धारण निर्भर होता है, उनमें अगर सही निर्णय लेने में बाधक गुण हों, तो वे अक्सर समुचित लक्ष्यों तथा कार्यों की ग़लत समझ पर जा पहुंचते हैं। यही वजह है कि अंततोगत्वा वस्तुगत कारक ( विकासमान सामाजिक सत्व ) के निर्णायक होने के बावजूद कभी-कभी आत्मगत कारक ऐतिहासिक विकास में उल्लेखनीय भूमिका अदा कर सकता है

समाजवादी समाज में प्रतिरोधी (antagonistic) अंतर्विरोधों पर काबू पा लिया जाता है, जिसकी वजह से सामाजिक यथार्थता की पूर्णतर तथा गहनतर समझ के लिए और लक्ष्यों तथा उनकी उपलब्धि के साधनों के वैज्ञानिक निर्धारण के लिए वस्तुगत पूर्वाधारों (objective preconditions) की रचना हो जाती है। परंतु इसका यह मतलब नहीं है कि समाजवादी समाज में लिए गए सारे फ़ैसले और सामाजिक कार्रवाइयों की सारी पद्धतियां स्वतः सही होती हैं और कि वे फ़ैसले रायों के संघर्ष, हितों के टकराव और गंभीर राजनीतिक व आत्मिक प्रयत्नों के बिना ही ले लिये जाते हैं। समाजवादी समाज में आत्मगत कारक की, और सामाजिक समस्याओं के सही समाधान में सचेत, सक्रिय रचनात्मक चिंतनशील व्यक्तियों की भूमिका में तेजी से बढ़ती होती है

समाज के जीवन को नई प्रेरणा देने तथा सामाजिक-आर्थिक विकास में निर्णायक त्वरण (acceleration) लाने के लिए समाज के फ़ौरी (immediate) लक्ष्यों तथा उसके निकट भविष्य की संभावनाओं, दोनों के अधिक गहन बोध की तथा यह समझने की जरूरत है की उन्नति में बाधक क्या है और कौन सी शक्तियां उसे बढ़ावा दे सकती हैं, आगे ले जा सकती हैं। किंतु केवल पार्टी तथा राज्य के नेताओं की इसकी जानकारी होना काफ़ी नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि परिवर्तनों की ऐतिहासिक आवश्यकता की समझ प्रत्येक व्यक्ति की चेतना तथा हृदय में पैठे, और सारी श्रम समष्टियों (work collectives), सामाजिक समूहों तथा सामाजिक संगठनों द्वारा अपनायी जाये

इन सब बातों से यह प्रकट होता है कि समाजवाद के निर्माण में मौलिक प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से रहित समाज में ऐतिहासिक प्रकृति काफ़ी हद तक आत्मगत कारक पर निर्भर होती है। इसलिए उसे सक्रिय किया जाना चाहिए। इस प्रकार, समाजवादी समाज में आत्मगत कारक की भूमिका को ऊंचा उठाने की समस्या को निरूपित करना, ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 5 अगस्त 2018

सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता के बारे में

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत व्यष्टिक और सामाजिक चेतना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता के बारे में
(On the Relative Independence of Social Consciousness)

सामाजिक चेतना में होने वाले सारे परिवर्तनों तथा स्वयं उसके विकास की प्रक्रिया का निर्धारण अंततः सामाजिक सत्व (social being) में होने वाले परिवर्तनों से होता है। परंतु यह सोचना ग़लत होगा कि यह चेतना, हमेशा सामाजिक सत्व से पीछे (lags behind) होती है। राजनीतिक चेतना, नैतिकता, कलात्मक चेतना, धर्म और दर्शन लोगों की भौतिक यथार्थता (material reality), वर्ग संघर्ष (class struggle), विभिन्न घटनाओं, शनैः शनैः होनेवाले तथा क्रांतिकारी परिवर्तनों को एक दर्पण की तरह निष्क्रिय ढंग से परावर्तित (reflect) नहीं करते, बल्कि कुछ आदर्शों (ideals), मानकों (norms), मानदंडों (standards) ,व्यवहार के क़ायदों की रचना भी करते हैं और सामाजिक जीवन के संगठन की एक अधिक वांछित (desirable), वरेण्य (preferable) छवि का विकास भी करते हैं। सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता और तथाकथित पूर्वानुमानिक परावर्तन (anticipatory reflection) की उसकी क्षमता इसी में व्यक्त होती है।

अतीत काल की साहित्यिक कृतियों, दार्शनिकों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों तथा राजनीतिक चिंतकों की रचनाओं में हमें इस आशय की अनेक दलीलें मिलती हैं कि तर्कबुद्धिसम्मत (rational) न्यायोचित समाज कैसा होना चाहिए, राजकीय प्रशासन का संगठन कैसे किया जाना चाहिए, सबसे ज़्यादा न्यायोचित क़ानून और नैतिकता के सर्वाधिक मानवीय मानक कैसे होने चाहिए। बेशक, ये सारी दलीलें न सिर्फ सार्विक (universal), बल्कि सर्वथा निश्चित वर्गीय-सामूहिक आदर्शों, न्याय और मानवता की धारणाओं को भी परावर्तित करती है। इसके साथ ही वह इतिहासतः सीमित होती हैं। परंतु अतीतकाल के चिंतकों ने भविष्य में देखने के जो प्रयत्न किए और उन्होंने सामाजिक जीवन, आदर्शों तथा मानकों के जिन बिंबो की रचना की, व्यवहार में उन्हें जिस सामाजिक सत्व से वास्ता पड़ा और जो युग की सामाजिक चेतना में परावर्तित हुआ था - उस सब ने उनकी दलीलों की सामग्री का काम दिया। इसलिए पूर्वानुमानिक परावर्तन भी अंततोगत्वा सामाजिक सत्व से निर्धारित होता है।

पूर्ववर्ती आर्थिक-सामाजिक विरचनाओं (socio-economic formations) के स्वतःस्फूर्त विकास के यु्गों में सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता अक्सर विभिन्न प्रकार के यूटोपिया (utopias) बनाने में व्यक्त होती थी। न्यायोचित, तर्कबुद्धिसम्मत, मानवीय संगठनवाले ऐसे भावी समाज से संबंधित विचारों, बिंबों तथा सैद्धांतिक परावर्तनों को यूटोपियाई कहते हैं, जिसका वस्तुगत (objective) वैज्ञानिक आधार नहीं होता। यूटोपियाओं के रचयिता अक्सर जैसे चिंतक होते थे, जो सर्वाधिक उत्पीड़ित और शोषित वर्गों के हितों तथा मनोदशाओं को व्यक्त करते थे, हालांकि वे स्वयं कभी-कभी विशेषाधिकारप्राप्त वर्गों या सामाजिक श्रेणियों के लोग होते थे। इस प्रकार के दृष्टिकोणों का यह नाम १६वीं सदी के प्रारंभ के अंग्रेज़ राजनीतिज्ञ टॉमस मूर की ‘यूटोपिया’ शीर्षक पुस्तक से पड़ा। उसमें एक ऐसे काल्पनिक समाजवादी समाज का चित्रण था जिसमें सार्विक समानता, न्याय और समृद्धि का बोलबाला था।

१८वीं और १९वीं सदियों के दौरान मेहनतकशों के शोषण बढ़ने के साथ-साथ यूटोपियाई समाजवाद का बहुत प्रसार हो गया था। मार्क्स और एंगेल्स ने समाज के समाजवादी पुनर्संगठन तथा पुनर्रचना की आवश्यकता को प्रमाणित करने तथा, मुख्यतया, पूंजीवाद की तीखी आलोचना करने के प्रयत्नों के लिए १९वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों के यूटोपियाई समाजवाद के रचयिताओं फ़ुरिये, ओवेन और सेंट-सीमोन का बहुत ऊंचा मूल्यांकन किया। इसके साथ ही मार्क्स और एंगेल्स ने इस क़िस्म के समाजवाद के अवैज्ञानिक स्वभाव पर ज़ोर भी दिया। यह कल्पना प्रधान (imaginative), अतिकाल्पनिक (fantastic), अभिलाषा जनित समाजवाद था। उस के रचयिताओं ने सुझाया कि नया समाज तीव्र वर्ग संघर्ष के ज़रिये नहीं, बल्कि नैतिक स्वपूर्णता (self-perfection), परहितकारिता (benevolent), परोपकारी क्रियाकलाप तथा प्रबोधन (enlightenment) के द्वारा निर्मित होगा। ऐसी परियोजनाओं का अवैज्ञानिक तथा यूटोपियाई स्वभाव, उन्हें वास्तविक बनाने के अलग-अलग प्रयत्नों (मसलन, रॉबर्ट ओवेन द्वारा) की घोर विफलता से प्रमाणित हो गया।

सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता, वैज्ञानिक समाजवाद (scientific socialism) के सिद्धांत की रचना में विशेष स्पष्टता से व्यक्त हुई। मार्क्स तथा एंगेल्स द्वारा रचित तथा कालांतर में लेनिन द्वारा विकसित यह सिद्धांत, पूंजीवाद के सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों का सीधा सरल परावर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक सत्व के सच्चे वैज्ञानिक पूर्वानुमानिक परावर्तन का पहला उदाहरण था। इसने समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण (revolutionary transformation), निजी स्वामित्व के उन्मूलन (abolition of private property) तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के ख़ात्मे की आवश्यकता को वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित ही नहीं किया, बल्कि ऐसे रूपांतरण के वास्तविक मार्गों तथा विधियों का संकेत भी दिया। पूर्वानुमानिक परावर्तन तथा संपूर्ण सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता की स्वयं संभावना (possibility) का मूल क्या है?

मुद्दा यह है कि सामाजिक सत्व, प्रदत्त क्षण पर सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाओं की समग्रता (aggregate) मात्र नहीं है। यह कोई संघनित और अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है। यह अनवरत विकास की अवस्था में होता है और इसमें विविध प्रवृतियां निरंतर पैदा होती तथा बढ़ती रहती हैं। फलतः, इसमें वस्तुगत नियमितताएं (objective patterns) होती हैं जो इन प्रवृतियों, प्रक्रियाओं और परिवर्तनों का नियमन (govern) करती हैं। इन प्रवृतियों तथा नियमितताओं को परावर्तित करके सामाजिक चेतना भविष्य में झांकने की, यानी आगे बढ़ निकलने की क्षमता अर्जित कर लेती है। इसकी सापेक्ष स्वाधीनता इसी में व्यक्त होती है। 

चूंकि सामाजिक सत्व, स्वयं अंतर्विरोधी (contradictory) होता है और विभिन्न संघर्षरत वैचारिकियों (ideologies) के अंदर भिन्न-भिन्न वर्गीय स्थितियों से परावर्तित होता है, इसलिए सामाजिक तत्व का परावर्तन भी अंतर्विरोधी सिद्ध होता है। इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना (materialist conception) की रचना तक, यह पूर्वानुमानिक परावर्तन मूल रूप से अवैज्ञानिक होता था और कुछ सत्य अनुमानों के बावजूद इस में यूटोपियाई लक्षण विद्यमान रहते थे। इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का निरूपण करनेवाले ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन की रचना से सामाजिक विकास की वस्तुगत प्रवृतियों तथा नियमसंगतियों की विशुद्ध वैज्ञानिक समझ की संभावना पहली बार प्रकट हुई।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 22 जुलाई 2018

व्यष्टिक और सामाजिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा की थी, इस बार हम व्यष्टिक और सामाजिक चेतना के संबंधो को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यष्टिक और सामाजिक चेतना
( Individual and Social Consciousness )



अभी तक हमने सामाजिक चेतना के विभिन्न रूपों की जांच की। उनका व्यष्टिक चेतना से, यानी व्यक्ति की अपनी चेतना से क्या संबंध है?

समाज व्यक्तियों की समष्टि है। महान कलाकृतियों के सर्जक (creators) अलग-अलग व्यक्ति थे ( शेक्सपियर, पुश्किन, माइकलएंजेलो, रेपिन, पिकासो, रविंद्रनाथ ठाकुर, प्रोकोफ़ियेव, ब्रुकनर, आदि )। विज्ञान की महानतम खोजें तथा विश्व का परावर्तन (reflection) करने वाले सर्वाधिक गहन सिद्धांतों के रचयिता न्यूटन, आइंस्टीन, बोर तथा विनर जैसे लोग भी व्यक्ति थे। हमें व्यष्टिक चेतना की अभिव्यक्तियां (manifestations) विश्व विज्ञान तथा कला में ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में भी दिखाई पड़ती हैं और वे सब अभिव्यक्तियां भिन्न-भिन्न होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी ही आकांक्षाएं और चिंताएं, जीवन पर अपने ही दृष्टिकोण, विभिन्न समस्याओं व कर्तव्यों, आदि की अपनी ही समझ होती है। संक्षेप में, संसार में जितने लोग हैं, उतनी ही व्यष्टिक नियतियां हैं, जीवन पर उतने ही दृष्टिकोण, लक्ष्य और व्यवहार हैं।

पहली नज़र में ऐसा प्रतीत होगा कि चेतना के व्यष्टिक प्रदर्शनों में लगभग कुछ भी सर्वनिष्ठ (common) नहीं है और कि वे प्रत्येक व्यक्ति के संकल्प (will) तथा उसके जीवन की दशाओं पर निर्भर होते हैं। जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (१८४४-१९००) ने तो यह दावा तक किया था कि सामाजिक चेतना का कोई अस्तित्व नहीं है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के चिंतन तथा चेतना का अस्तित्व है, क्योंकि उन्होंने यह तर्कणा की कि चेतना सिर के अंदर विकसित होती है और व्यक्तियों के सिर होते हैं परंतु किसी समाज का कोई सिर नहीं होता। यह एक घोर व्यक्तिवादी दृष्टिकोण था। साथ ही, उन पुराने भौतिकवादियों का ख़्याल भी ग़लत था, जिन्होंने व्यष्टिक चेतना को सीधे-सीधे व्यक्तिगत जीवन की दशाओं तथा उसकी अनावर्तनीय (unrepeatable) परिस्थितियों से निगमनित (deduced) किया। फ्रांसीसी भौतिकवादी प्रबोधक हेल्वेतियस (१७१५-१७७१) का विचार था कि व्यक्ति ठीक ऐसी ही परिस्थितियों द्वारा शिक्षित होता है; एक ही परिवार के दो बच्चों का आगे चलकर जीवन पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाने तथा उनके व्यक्तिगत स्वभावो व लक्ष्यों में अंतर होने के लिए बाल्यकालीन भ्रमण के दौरान उनके द्वारा भिन्न रास्तों का अपनाया जाना काफ़ी है।

निस्संदेह, समाज का सिर नहीं होता और जीवन की दशाएं, शिक्षा तथा लालन-पालन की विशिष्टताएं और व्यक्तिगत जीवनवृत्त (personal biography), व्यक्ति की व्यष्टिक चेतना को प्रभावित करते हैं। लेकिन इतना पूछना काफ़ी होगा कि क्या जर्मन फ़ासिस्ट हमलावरों के ख़िलाफ़ सोवियत जनों के संघर्ष को समर्पित शोस्ताकोविच की सातवीं सिंफ़नी की रचना मध्य युग में संभव थी या क्या प्राचीन काल का कोई एक कलाकार रेपिन अथवा पिकासो के जैसे रंगचित्रों का चित्रण कर सकता था, तो यह बात साफ़ हो जायेगी कि इन कृतियों की अंतर्वस्तु प्रदत्त युग, प्रदत्त जाति (nation) तथा प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि की विशेषताओं से निर्धारित होती है। इसी प्रकार, सारे अलग-अलग अंतरों के बावजूद १८वीं सदी में किसी ने भी कभी मोटरगाड़ी खरीदने की कोशिश नहीं की। लोगों के व्यवहार के यह सारे अंतर, व्यष्टिक विशेषताओं के बावजूद, एक ओर, वस्तुगत सामाजिक सत्व (objective social being) के द्वारा तथा, दूसरी ओर, इसी के आधार (basis) पर उत्पन्न तथा उसे परावर्तित (reflect) करनेवाली, सामाजिक चेतना से निर्धारित होते हैं

ऐतिहासिक भौतिकवाद (historical materialism) व्यष्टिक चेतना, लक्ष्यों, संकल्प तथा कामनाओं (desires) से इनकार नहीं करता। वह यह मानता है कि उनका गहन अध्ययन करने तथा भौतिकवादी तरीक़े से स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत है। सामाजिक चेतना, वह `सार्विक' (general) है जो प्रदत्त समाज के व्यक्तियों की चेतना में उत्पन्न होता है क्योंकि वे एक निश्चित सामाजिक सत्व की दशाओं में रहते हैं और अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों को उस के संदर्भ में तथा उसके आधार पर निरूपित (formulate) करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की व्यष्टिक चेतना कई कारकों के प्रभावांतर्गत बनती है जिनमें उसका व्यक्तिगत मिज़ाज (temperament), उसकी व्यष्टिक विशेषताएं (peculiarities), लिंग, उम्र, माली हैसियत, पारिवारिक परिस्थितियां, स्थिति, कार्य दशाएं, आदि शामिल हैं। परंतु निर्णायक प्रभाव, निश्चित सामाजिक चेतना तथा अधिरचना (superstructure) के अन्य तत्वों सहित निश्चित सामाजिक सत्व के संदर्भ में निर्मित, सामाजिक परिवेश का होता है।

लोग अपने व्यावहारिक, उत्पादक, घरेलू तथा सामाजिक क्रियाकलाप में दृष्टिकोणों और उत्पादन तथा सामाजिक-राजनीतिक अनुभव का निरंतर विनिमय (exchange) करते हैं। इस विनिमय के दौरान सर्वनिष्ठ और समान दृष्टिकोणों का विकास होता है, एक प्रदत्त समूह या वर्ग के लिए, घटनाओं की समान समझ और मूल्यांकन (evaluation) का तथा समान लक्ष्यों का निरूपण होता है। उनके प्रभावांतर्गत व्यष्टिक लक्ष्य, दृष्टिकोण तथा आवश्यकताएं बनती हैं। इसलिए सामाजिक तथा व्यष्टिक चेतना एक ऐसी अनवरत (constant), जटिल (complex) अंतर्क्रिया (interaction) में होती है, जिसके ज़रिये महान चिंतकों के ही नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक व्यक्तित्व की रचनात्मक उपलब्धियां आत्मिक संस्कृति की समान निधि (treasury) में शामिल की जाती हैं। अतः सामाजिक और व्यष्टिक चेतना को एक दूसरे से पृथक करना तथा इससे भी अधिक उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना एक बहुत बड़ी अधिभूतवादी (metaphysical) ग़लती है, जो इन घटनाओं के वास्तविक संपर्कों (link) तथा अंतर्क्रिया को गड़बड़ा देती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 8 जुलाई 2018

कलात्मक चेतना और कला - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - ३
( Artistic Consciousness and Art - 3 )

कला, सामाजिक मानसिकता तथा सामान्य चेतना सहित, सामाजिक चेतना के सारे स्तरों पर यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। कलाकृतियों में, रचनात्मक व्यक्तित्व की प्रतिभा, अतिकल्पना (fantasy) तथा कल्पनाशीलता मूर्त होती है। समाज का कला पर प्रभाव तथा कला का समाज पर प्रतिप्रभाव कई कारकों (factors) से निर्धारित होता है, जिनमें समाज की सामाजिक संरचना (structure), चेतना के अन्य रूप, एक प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि में प्रभावी मानसिक रुख़ (attitude), राष्ट्रीय परंपराएं, सार्वजनिक रुचियां और अंतिम, कलाकार का व्यक्तित्व तथा उसकी व्यष्टिक (individual), अद्वितीय विशेषताएं भी शामिल हैं। कला के विशेष लक्षणों को और एक विशेष युग की कलात्मक चेतना को समुचित रुप से समझना इन कारकों की अंतर्क्रिया (interaction) से ही संभव होता है।

इसी वजह से, एक तरफ़, कलात्मक चेतना तथा कला और, दूसरी तरफ़, सामाजिक सत्व (social being) के बीच कोई सीधी-सादी, सरल निर्भरता नहीं होती है। रंगचित्रण, साहित्य, नाटक आदि में कला, प्रकृति और समाज का दर्पण-सम प्रतिबिंब नहीं होती है। कलाकारों द्वारा सृजित बिंबों में कलात्मक अविष्कार, अतिकल्पना और व्यक्तिगत अनुभव भी तथा वे कठिन समस्याएं भी शामिल होती हैं, जो समाज को आंदोलित करती हैं और जिनका अभी समाधान नहीं हुआ है। कला, व्यक्ति की भावनाओं और चेतना, दोनों को प्रभावित करती हैयह उसके भावनात्मक जगत को समृद्ध बनाती है और साथ ही उसके सामने नैतिक समस्याएं खड़ी कर देती है। 

मसलन, होमर की कविताओं, यूरिपीडस, सोफोक्लस और एसख़िलस की त्रासदियों (tragedies) में, ऐरिस्टोफ़न के प्रहसनों (comedies) तथा गीतात्मक कविताओं में यूनानी कला ने लोगों के जीवन में शुभाशुभ के (अच्छाई और बुराई) के बीच, उदात्त (noble) और क्षुद्र (base), त्रासदीय और प्रहसन, शाश्वत और क्षणिक के बीच सहसंबंध के प्रश्न को पेश किया। शेक्सपियर की कला ने एक ठोस ऐतिहासिक यथार्थता को परावर्तित करते हुए, लोगों के सामने जीवन के अर्थ का (हैमलेट), अपराध की दोषमुक्ति का (मैकबेथ), शुभाशुभ और व्यक्तिगत जिम्मेदारी तथा मानवीय अकृतज्ञता (किंग लियर) के शाश्वत प्रश्न प्रस्तुत किये। सर्वान्तेस की रचनाओं ने जीवन के अर्थ के, सत्य की खोज के, उदात्तता तथा पागलपन के, रूमानी वीरत्व और दैनिक जीवन के उथलेपन के बारे में नाना प्रश्न उठाये। रूसी लेखक लेव तालस्तोय और फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचनाओं का आधुनिक संस्कृति के लिए विराट महत्व है। उन्होंने हमें मानव आत्मा की अतल गहराइयों में झांकने तथा मनुष्य की मानसिकता की क्रियाविधि को समझने में समर्थ बनाया।

प्रत्येक राष्ट्र और जनगण विश्व कला में अपना ही विशेष योगदान करता है, क्योंकि उसकी नियति (destiny), संस्कृति, उसके कलाकारों, संगीतज्ञों, लेखकों और अभिनेताओं की व्यष्टिक, व्यक्तिगत विशेषताएं अद्वितीय होती हैं। अतः बड़े-छोटे, सभी राष्ट्रों की कला का चिरस्थायी (lasting) ऐतिहासिक महत्व होता है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि जनगण के इतिहास में आकस्मिक (abrupt) परिवर्तनों की अवधियों में कलात्मक चेतना तथा कला में विशेष तूफ़ानी और चौतरफ़ा उभार आता है।

आधुनिक पूंजीवादी समाज में, और कुछ विकासमान देशों में कला और यथार्थता की समझ अंतर्विरोधी (contradictory) है क्योंकि वे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों के हितों को परावर्तित करते हैं। पूंजीवादी समाज में आधुनिक कला प्रगतिशील (progressive), प्रतिक्रियावादी (reactionary) तथा रूढ़िपंथी (conservative) प्रवृतियों का मिश्रण है। इसे एक समरूप (homogeneous) चीज के रूप में नहीं लिया जाना चाहिये। जो समाज ऐसी कला को जन्म देता है, वह निस्संदेह अंतर्विरोधी तथा विषमरूप (heterogeneous) है। इसलिए ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन का उद्देश्य आधुनिक कलात्मक चेतना तथा संपूर्ण कला का आद्योपांत (thoroughly) विश्लेषण करना और उनके सामाजिक कार्यों का पर्दाफ़ाश (expose) करना तथा उनमें निहित मूल्यों (values) और नैतिक तथा सौंदर्यात्मक रुख़ों को गहराई से समझना है। 

आधुनिक कला की जो कृतियां मानवीय व्यक्तित्व के ऊंचे गुणों को बढ़ावा देती हैं, न्याय की उपलब्धि के लिए स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तनों का आह्वान करती हैं और मानवतावादी परंपराओं और आदर्शों की घोषणा करती हैं, आम ऐतिहासिक प्रकृति के लिए अनुकूल हैं और भविष्य में वे विश्व संस्कृति की निधि (treasury) का अंग बनेंगी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 1 जुलाई 2018

कलात्मक चेतना और कला - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - २
( Artistic Consciousness and Art - 2 )

तार्किक संकल्पनाओं (logical concepts) व पेचीदा सिद्धांतों के रूप में विश्व को परावर्तित (reflect) करनेवाले विज्ञान से भिन्न, कला उन कलात्मक बिंबों का मूर्त भौतिक रूप है, जो हमारे संवेद अंगों (sense organs) को प्रभावित करते हैं और निश्चित भावात्मक अनुक्रिया (emotional reaction) को उकसाते हैं। वैज्ञानिक ज्ञान की प्रणाली में दृश्य-संवेदात्मक बिंबों (visual-sensory images) का कुछ हद तक गौण स्थान है; उन्हें अध्ययनाधीन वस्तुओं के दृश्य मॉडलों, रेखाचित्रों, रूपरेखाओं तथा उनके वर्णन, आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। किंतु ज्ञान के मुख्य साधन, वे वैज्ञानिक संकल्पनाएं व निर्णय (judgments) है, जिनके ज़रिये विज्ञान के नियमों को अमूर्त रूप (abstract form) में निरूपित (formulate) किया जाता है। अलग-अलग घटनाओं को, ज्ञान के आरंभिक बिंदु के रूप में, तथा विज्ञान द्वारा खोजे व निरूपित किये हुए नियमों को संपूरित (supplement) करने की सामग्री के रूप में लिया जाता है। 

कलात्मक ज्ञान ( संज्ञान ) में, उपरोक्त के विपरीत, दृश्य-संवेदात्मक बिंबों का केंद्रीय स्थान होता है और वे किसी भी पृथक घटना की गहनतम, सर्वाधिक स्थाई विशेषताओं को, संवेद प्रत्यक्षण (perception) के लिए सीधे सुलभ (direct accessible) रूप में परावर्तित करना संभव बना देते हैं। यहां संकल्पनाओं और निर्णयों को, कलात्मक बिंबों का वर्णन तथा विश्लेषण करने के साधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। फलतः, वैज्ञानिक तथा कलात्मक ज्ञान एक दूसरे के विरोधी नहीं है और वे एक-दूसरे को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं। वे हमारे परिवेशीय जगत के, और मनुष्य की आंतरिक दुनिया, अनुभवों, मनोदशाओं (moods), रुख़ों (attitudes) तथा व्यक्तिगत विशेषताओं के बारे में ऐसे एक पूर्णतर चित्र तथा ज्ञान की ऐसी प्रणाली की रचना करते हुए एक दूसरे को संपूरित करते हैं, जिसमें एक युग व समाज के सर्वाधिक सारभूत लक्षण (essential traits) व्यक्त होते हैं। ऐसा है कला और विज्ञान का सामान्य अंतर्संबंध (general interconnection)।

एक विशेष युग की कलात्मक चेतना, मनुष्य की आंतरिक, मानसिक दुनिया को कलाकृतियों की ऐसी प्रणाली से प्रभावित करती है, जिसमें कि यह दुनिया मूर्त होती है। यह उसके ज़रिये यथार्थता (reality) की उन विशेषताओं को उद्घाटित करती है, जो सामाजिक चेतना के अन्य रूपों की पकड़ में नहीं आते। मनुष्य का आत्मिक शिक्षण उसी से होता है और उसी तरीक़े से प्रकृति व समाज के प्रति उसके निश्चित रुख़ बनते हैं। किसी भी युग तथा किन्ही भी जनगण की कला, कलात्मक चेतना में प्रभावी आदर्शों, मानकों तथा विचारों के अनुरूप जीवन व व्यक्तित्व की उन विशेषताओं तथा मनुष्य व प्रकृति की अंतर्क्रियाओं (interactions) को अद्वितीय कला बिंबों में प्रकट करती है, जो चेतना के अन्य रूपों तथा क्रियाकलाप की क़िस्मों के द्वारा परावर्तित व संचारित (communicated) नहीं होते। इसी कारण से लोक कला, अतीत के महान कलाकर्मियों की कृतियां तथा हमारे समसामयिकों का कृतित्व, संपूर्ण विश्व संस्कृति को हमारे लिए सुलभ बनाने में तथा इतिहास के दौरान मनुष्य जाति द्वारा संचित (accumulated) हर मूल्यवान चीज़ को आत्मसात (assimilate) करने में हमारी मदद करते हैं। 

अन्य युगों तथा राष्ट्रों के साहित्य से स्वयं को परिचित कराने, संगीत सुनने और कलावीथियों (art galleries) में जाने से हमें केवल अपने जनगण द्वारा संचित अनुभव का ही बोध नहीं होता, बल्कि उनके जीवन तथा आंतरिक जगत का परिचय भी प्राप्त होता है और हम स्वयं आत्मिक दृष्टि से अधिक समृद्ध तथा उदात्त (noble) बन जाते हैं और अपने दृष्टिकोण तथा विश्व की अपनी समझ को विस्तृत बनाते हैं। कला हमें मनुष्य जाति के अनुभव से परिचित कराके सांस्कृतिक मूल्यों के ‘संचयन’ को बढ़ावा देती है, हमारी भावनाओं को उदात्त बनाती है और जनगण की गहनतर पारस्परिक समझ को प्रोत्साहित करती है। इस तरह, कला, कलात्मक चेतना, सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत जीवन पर विराट भावनात्मक प्रभाव डालती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 24 जून 2018

कलात्मक चेतना और कला - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में धर्म पर चर्चा की थी, इस बार हम कलात्मक चेतना और कला को समझने की कोशिश शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - १
( Artistic Consciousness and Art - 1 )

कला, मानव क्रियाकलाप का एक सबसे पुराना और सर्वाधिक सार्विक (universal) रूप है। `कला' (art) पद केवल क्रिया का ही नहीं, बल्कि उसके परिणाम का, अर्थात कलाकृति का द्योतक भी है। कला क्या है? समाज के, और अलग-अलग लोगों के जीवन में कला की भूमिका (role) क्या है?

लोग अपने दैनिक उत्पादक क्रियाकलाप (production activity) में अपनी भौतिक आवश्यकताओं (material wants) की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का ( भोजन मकान आदि ) ही निर्माण नहीं करते, बल्कि उन्हें जितना संभव हो, उतना ही निर्दोष (perfect) तथा सोद्देश्य (purposeful) भी बनाते हैं। वस्तुएं जितनी अच्छी और उपयुक्त हों, उन्हें बनाने के लिए उतनी ही अधिक कुशलता (skill) की ज़रूरत होती है, उत्पादन प्रक्रिया का स्वभाव जितना ज़्यादा रचनात्मक (creative) हो, उसके सर्जक (creator) से उतनी ही अधिक प्रतिभा (talent) तथा कल्पनाशीलता (inventiveness) की अपेक्षा की जाती है। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य की तर्कबुद्धि (reasoning) और संकल्प (will), उसकी विशिष्ट मानवीय शक्ति परिष्कृत हो गये। मनुष्य, प्रकृति से जितना पृथक हुआ और उसने अपने को उससे जितना ऊपर उठा लिया, उतना ही उसने अपने को और अपनी कुशलताओं, ज्ञान तथा व्यवहार के मानकों को परिष्कृत बनाया और फलत:, स्वयं को एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढाल लिया।

मनुष्य की यह सारी विशेषताएं और, सर्वोपरि, उसका सारा सामाजिक सार (social essence), उसके ज्ञान का बल, कल्पना और संस्कृति की शक्ति और साथ ही क्रियाकलाप का परिष्करण (perfection) और पारंगति (mastery) उन वस्तुओं में, संरचनाओं में, औज़ारों में और सुधरी हुई, रूपांतरित (transformed), मानवीकृत प्रकृति में मूर्त (embodied) हुए जिन्हें उसने बनाया। यह मूर्तता (embodiment) जितनी ज्यादा और पूर्ण होती है, उसके श्रम तथा उसकी रचनात्मक क्रिया की भौतिक वस्तुएं उतनी ही उत्कृष्ट और सुंदर होती हैं। इतिहासाश्रित श्रम विभाजन के ज़रिये उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन, सुंदर वस्तुओं के उत्पादन से पृथक हो गया। क्रियाकलाप के एक विशेष रूप में कला, ‘सुंदर का उत्पादन’ भौतिक उत्पादन से पृथक हो गयी। लोगों के एक ऐसे विशेष समूह का उद्भव हुआ, जिनके लिए कला व्यवसाय (profession) बन गई - कलाकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, लेखक, कवि, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा अन्य।

वर्ग समाज (class society) में, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant classes) कला के विशेष उपभोक्ता होते हैं। वे कलाकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वित्तीय सहायता देते हैं, उनका रचनात्मक श्रम ख़रीदते हैं और साथ ही उन्हें निश्चित वर्गों के उद्देश्यों की सेवा करने तथा एक विश्वदृष्टिकोण और वैचारिकी का सचेतन या अचेतन वाहक बनने को बाध्य करते हैं। परंतु यह सोचना गलत होगा की कला, यानी कलात्मक क्रियाकलाप भौतिक उत्पादन से पूर्ण तरह अलग हैं। यहां तक कि शोषक समाजों में भी कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के कृतित्व में पूर्णता के लिए प्रयत्न निहित होते हैं तथा उसमें रचनात्मक मानवीय तत्व अभिव्यक्त होते हैं। जिस सीमा तक काम में स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के तत्व होते हैं, उस सीमा तक उसमें कलात्मक गुण भी होते हैं। काम जितना स्वतंत्र और रचनात्मक होता है, वह कला के उतने ही निकट होता है।

श्रम के आधार पर विकसित होने वाले सारे मानवीय क्रियाकलाप की सब अभिव्यक्तियों में कलात्मक क्रियाकलाप के तत्व निहित होते हैं। मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक सत्व (social being), जो इस क्रियाकलाप का एक उत्पाद है, कमोबेश रचनात्मक, कलात्मक तत्वों से व्याप्त (permeated) होता है और यह भी सामाजिक चेतना के, अर्थात कलात्मक चेतना के एक विशेष रूप में परिवर्तित होता है, जो कलात्मक बिंबों की एक प्रणाली मैं हमारे गिर्द की यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। ये बिंब, व्यष्टिक और सामान्य (individual and general) को, प्रकृति और समाज की लाक्षणिक विशेषताओं, अनुगुणों (properties) और अवगुणों (peculiarities) तथा मनुष्य के आंतरिक जगत को परावर्तित करते हैं। इसके उपरांत उन्हें तदनुरूप (corresponding) भौतिक वस्तुओं व प्रक्रियाओं, संगीत की रचनाओं, चित्रों, मूर्तियों, वास्तुकला संरचनाओं, रंगमंचीय प्रस्तुतियों तथा फ़िल्मों में मूर्त रूप दिया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 17 जून 2018

सामाजिक चेतना के रूप में धर्म

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत आर्थिक चेतना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में धर्म को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना के रूप में धर्म
(Religion as a form of Social Consciousness)



धर्म, सामाजिक चेतना का एक रुप है जिसने मानव जाति के आत्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया है। कुछ ऐतिहासिक अवधियों में यह ऐसी चेतना का सार्विक (universal) रूप था। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह हमेशा विद्यमान था। आधुनिक विज्ञान इसका प्रारंभ आदिम-सामुदायिक समाज के उत्तरकाल को मानता है। तब परिवेशीय जगत की घटनाओं तथा मनुष्य के क्रियाकलाप को समझने और उनका स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता पैदा हो गई थी। समुचित ज्ञान के अभाव तथा आर्थिक व सामाजिक विकास के निम्न स्तर की अवस्था में लोग अपने परिवेशीय जगत का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं दे सकते थे और उन्होंने वस्तुतः स्वयं के साथ सादृश्य (analogy) के अनुसार उसका स्पष्टीकरण देना शुरू कर दिया। उन्होंने उसे अलौकिक अनुगुण (supernatural properties) प्रदान किए और उस पर रहस्यमय आत्मिक शक्तियों को आरोपित (ascribed) कर दिया। अपने सम्मुख विद्यमान प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में कमजोर और निस्सहाय होने के कारण प्राचीन मानव ने प्राकृतिक घटनाओं, यानी वर्षा, तड़ित, वज्रघोष, नदियों, जलधाराओं, वृक्षों, पत्थरों, आदि का दैवीकरण (deification) कर दिया। वह अलग-अलग वस्तुओं की पूजा करता, चापलूसी करता तथा उनकी संरक्षता (patronage) हासिल करने का प्रयत्न करता। धीरे-धीरे ऐसी धारणाएं बनीं जिन्होंने प्रकृति की घटनाओं पर मनुष्य की ही जैसी आत्मा तथा संकल्प का आरोपण कर दिया, किंतु वे मनुष्य की आत्मा व संकल्प से अधिक भयावह, रहस्यमय और अबोधगम्य (incomprehensible) थे।

वर्ग समाज (class society) में प्राकृतिक शक्तियों के साथ ही साथ, वर्गीय शोषण की इनसे भी अधिक पराई (alien), निर्मम (remorseless) शक्तियों ने मनुष्य का विरोध करना शुरू कर दिया। मनुष्य की दुर्बलता तथा निस्सहायता (helplessness) की घोषणा करते तथा उसे पवित्र बताते हुए धर्म ने इन शक्तियों के सम्मुख दीनता (humility) तथा अधीनता का आह्वान किया। इस प्रकार उसे प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) की वैचारिकी के फैलाव, दृढ़ीकरण तथा दूसरों के मन में पैठाने का काम करनेवाली चेतना के एक रूप में परिणत कर दिया गया। प्रतिरोधी वर्ग विरचनाओं (antagonistic class formations) की दशाओं में बौद्ध मत, इसाई धर्म तथा इस्लाम जैसे एकेश्वरीय धर्म व्यापक रूप से फैल गये।

धर्म का संगठनकारी रूप (organised), यानी धार्मिक पंथ को बनाए रखने, धार्मिकता को फैलाने, धर्मानुयायियों को एक सूत्र में बांधने का सामाजिक संस्थान, एक धार्मिक केन्द्र, जैसे कि चर्च, होता है। भिन्न-भिन्न ठोस दशाओं में, विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर भिन्न-भिन्न समाजों के इतिहास के दौरान धर्म और धार्मिक केन्द्रों की सामाजिक भूमिका बदली है। प्रभावी धार्मिक केंद्रों ने, कमोबेश (more or less) सीमा तक, उन वर्गों के हितों की सेवा की है, जिनके हाथों में राजकीय और आर्थिक सत्ता थी।

किंतु सामाजिक जीवन के गहन अंतर्विरोधी (contradictory) स्वभाव तथा परिवर्तनशीलता की वजह से अक्सर ऐसा हुआ कि कुछ धार्मिक धाराओं ने (तथा उनके अनुरूप धार्मिक संगठनों ने), तत्समय प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म का विरोध किया। अक्सर ऐसा हुआ कि ऐसी धाराओं ने उत्पीड़ितों या उन समूहों व वर्गों के हितों को अभिव्यक्ति दी जो सत्ता के लिए और मौजूदा सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन के लिए लड़ रहे थे, किंतु कुछ कारणों से वे स्वयं अपने हितों को और सार्वजनिक मामलों की वस्तुगत अवस्था (objective state) को वैज्ञानिक ढंग से जानने-समझने में असमर्थ थे। कुछ राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों या शोषण के विरुद्ध लड़नेवालों ने, अपने क्रांतिकारी व मुक्तिकारी आकांक्षाओं को धार्मिक रंग दे दिया और देते हैं। ऐसे मामलों में वर्ग या मुक्ति संघर्ष, और उसके अनुरूप वैचारिकी, एक उप धर्म की शक्ल में या वैकल्पिक धार्मिक केंद्र के लिए आंदोलन में प्रकट हुए और उन्होंने प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म के ख़िलाफ़ विरोध का रूप ग्रहण किया और अंतःकरण (conscience) की स्वतंत्रता के लिए लड़ना शुरू कर दिया। धर्म के वेश में राजनीतिक विरोध का प्रकट होना ऐसी घटना है, जो सभी जनगण के विकास की किसी एक अवस्था की विशेषता रही है

आधुनिक दुनिया में, विकट सामाजिक अंतर्विरोधों से भरी दुनिया में, धर्म और धार्मिक संगठन भिन्न भूमिका अदा कर सकते हैं। मार्क्सवादी विचारों के प्रवक्ता धर्म के जबरिया मूलोच्छेदन (forcible extirpation) का आह्वान नहीं करते, जैसा कि उसके विरोधी उस पर आरोप लगाते हैं, बल्कि उन सामाजिक-धार्मिक नेताओं तथा धाराओं के साथ बातचीत का आह्वान करते हैं, जो तापनाभिकीय युद्ध के ख़तरे के ख़िलाफ़ शांति के संघर्ष में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों में और निरंकुशता तथा उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा नवउपनिवेशवाद से छुटकारा पाने के संघर्ष में भाग ले रहे हैं। वे एक मुख्य अधिकार के रूप में अंतःकरण की स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। समसामयिक समाजवादी समाजों में प्रत्येक नागरिक अनीश्वरवादी हो सकता है या धर्म पर विश्वास रख सकता है धर्म के आधार पर किसी प्रकार का वैरभाव या उत्पीड़न वर्जित है और धार्मिक केंद्र राज्य से पृथक होते हैं



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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