रविवार, 8 जुलाई 2018

कलात्मक चेतना और कला - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - ३
( Artistic Consciousness and Art - 3 )

कला, सामाजिक मानसिकता तथा सामान्य चेतना सहित, सामाजिक चेतना के सारे स्तरों पर यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। कलाकृतियों में, रचनात्मक व्यक्तित्व की प्रतिभा, अतिकल्पना (fantasy) तथा कल्पनाशीलता मूर्त होती है। समाज का कला पर प्रभाव तथा कला का समाज पर प्रतिप्रभाव कई कारकों (factors) से निर्धारित होता है, जिनमें समाज की सामाजिक संरचना (structure), चेतना के अन्य रूप, एक प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि में प्रभावी मानसिक रुख़ (attitude), राष्ट्रीय परंपराएं, सार्वजनिक रुचियां और अंतिम, कलाकार का व्यक्तित्व तथा उसकी व्यष्टिक (individual), अद्वितीय विशेषताएं भी शामिल हैं। कला के विशेष लक्षणों को और एक विशेष युग की कलात्मक चेतना को समुचित रुप से समझना इन कारकों की अंतर्क्रिया (interaction) से ही संभव होता है।

इसी वजह से, एक तरफ़, कलात्मक चेतना तथा कला और, दूसरी तरफ़, सामाजिक सत्व (social being) के बीच कोई सीधी-सादी, सरल निर्भरता नहीं होती है। रंगचित्रण, साहित्य, नाटक आदि में कला, प्रकृति और समाज का दर्पण-सम प्रतिबिंब नहीं होती है। कलाकारों द्वारा सृजित बिंबों में कलात्मक अविष्कार, अतिकल्पना और व्यक्तिगत अनुभव भी तथा वे कठिन समस्याएं भी शामिल होती हैं, जो समाज को आंदोलित करती हैं और जिनका अभी समाधान नहीं हुआ है। कला, व्यक्ति की भावनाओं और चेतना, दोनों को प्रभावित करती हैयह उसके भावनात्मक जगत को समृद्ध बनाती है और साथ ही उसके सामने नैतिक समस्याएं खड़ी कर देती है। 

मसलन, होमर की कविताओं, यूरिपीडस, सोफोक्लस और एसख़िलस की त्रासदियों (tragedies) में, ऐरिस्टोफ़न के प्रहसनों (comedies) तथा गीतात्मक कविताओं में यूनानी कला ने लोगों के जीवन में शुभाशुभ के (अच्छाई और बुराई) के बीच, उदात्त (noble) और क्षुद्र (base), त्रासदीय और प्रहसन, शाश्वत और क्षणिक के बीच सहसंबंध के प्रश्न को पेश किया। शेक्सपियर की कला ने एक ठोस ऐतिहासिक यथार्थता को परावर्तित करते हुए, लोगों के सामने जीवन के अर्थ का (हैमलेट), अपराध की दोषमुक्ति का (मैकबेथ), शुभाशुभ और व्यक्तिगत जिम्मेदारी तथा मानवीय अकृतज्ञता (किंग लियर) के शाश्वत प्रश्न प्रस्तुत किये। सर्वान्तेस की रचनाओं ने जीवन के अर्थ के, सत्य की खोज के, उदात्तता तथा पागलपन के, रूमानी वीरत्व और दैनिक जीवन के उथलेपन के बारे में नाना प्रश्न उठाये। रूसी लेखक लेव तालस्तोय और फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचनाओं का आधुनिक संस्कृति के लिए विराट महत्व है। उन्होंने हमें मानव आत्मा की अतल गहराइयों में झांकने तथा मनुष्य की मानसिकता की क्रियाविधि को समझने में समर्थ बनाया।

प्रत्येक राष्ट्र और जनगण विश्व कला में अपना ही विशेष योगदान करता है, क्योंकि उसकी नियति (destiny), संस्कृति, उसके कलाकारों, संगीतज्ञों, लेखकों और अभिनेताओं की व्यष्टिक, व्यक्तिगत विशेषताएं अद्वितीय होती हैं। अतः बड़े-छोटे, सभी राष्ट्रों की कला का चिरस्थायी (lasting) ऐतिहासिक महत्व होता है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि जनगण के इतिहास में आकस्मिक (abrupt) परिवर्तनों की अवधियों में कलात्मक चेतना तथा कला में विशेष तूफ़ानी और चौतरफ़ा उभार आता है।

आधुनिक पूंजीवादी समाज में, और कुछ विकासमान देशों में कला और यथार्थता की समझ अंतर्विरोधी (contradictory) है क्योंकि वे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों के हितों को परावर्तित करते हैं। पूंजीवादी समाज में आधुनिक कला प्रगतिशील (progressive), प्रतिक्रियावादी (reactionary) तथा रूढ़िपंथी (conservative) प्रवृतियों का मिश्रण है। इसे एक समरूप (homogeneous) चीज के रूप में नहीं लिया जाना चाहिये। जो समाज ऐसी कला को जन्म देता है, वह निस्संदेह अंतर्विरोधी तथा विषमरूप (heterogeneous) है। इसलिए ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन का उद्देश्य आधुनिक कलात्मक चेतना तथा संपूर्ण कला का आद्योपांत (thoroughly) विश्लेषण करना और उनके सामाजिक कार्यों का पर्दाफ़ाश (expose) करना तथा उनमें निहित मूल्यों (values) और नैतिक तथा सौंदर्यात्मक रुख़ों को गहराई से समझना है। 

आधुनिक कला की जो कृतियां मानवीय व्यक्तित्व के ऊंचे गुणों को बढ़ावा देती हैं, न्याय की उपलब्धि के लिए स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तनों का आह्वान करती हैं और मानवतावादी परंपराओं और आदर्शों की घोषणा करती हैं, आम ऐतिहासिक प्रकृति के लिए अनुकूल हैं और भविष्य में वे विश्व संस्कृति की निधि (treasury) का अंग बनेंगी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 1 जुलाई 2018

कलात्मक चेतना और कला - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - २
( Artistic Consciousness and Art - 2 )

तार्किक संकल्पनाओं (logical concepts) व पेचीदा सिद्धांतों के रूप में विश्व को परावर्तित (reflect) करनेवाले विज्ञान से भिन्न, कला उन कलात्मक बिंबों का मूर्त भौतिक रूप है, जो हमारे संवेद अंगों (sense organs) को प्रभावित करते हैं और निश्चित भावात्मक अनुक्रिया (emotional reaction) को उकसाते हैं। वैज्ञानिक ज्ञान की प्रणाली में दृश्य-संवेदात्मक बिंबों (visual-sensory images) का कुछ हद तक गौण स्थान है; उन्हें अध्ययनाधीन वस्तुओं के दृश्य मॉडलों, रेखाचित्रों, रूपरेखाओं तथा उनके वर्णन, आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। किंतु ज्ञान के मुख्य साधन, वे वैज्ञानिक संकल्पनाएं व निर्णय (judgments) है, जिनके ज़रिये विज्ञान के नियमों को अमूर्त रूप (abstract form) में निरूपित (formulate) किया जाता है। अलग-अलग घटनाओं को, ज्ञान के आरंभिक बिंदु के रूप में, तथा विज्ञान द्वारा खोजे व निरूपित किये हुए नियमों को संपूरित (supplement) करने की सामग्री के रूप में लिया जाता है। 

कलात्मक ज्ञान ( संज्ञान ) में, उपरोक्त के विपरीत, दृश्य-संवेदात्मक बिंबों का केंद्रीय स्थान होता है और वे किसी भी पृथक घटना की गहनतम, सर्वाधिक स्थाई विशेषताओं को, संवेद प्रत्यक्षण (perception) के लिए सीधे सुलभ (direct accessible) रूप में परावर्तित करना संभव बना देते हैं। यहां संकल्पनाओं और निर्णयों को, कलात्मक बिंबों का वर्णन तथा विश्लेषण करने के साधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। फलतः, वैज्ञानिक तथा कलात्मक ज्ञान एक दूसरे के विरोधी नहीं है और वे एक-दूसरे को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं। वे हमारे परिवेशीय जगत के, और मनुष्य की आंतरिक दुनिया, अनुभवों, मनोदशाओं (moods), रुख़ों (attitudes) तथा व्यक्तिगत विशेषताओं के बारे में ऐसे एक पूर्णतर चित्र तथा ज्ञान की ऐसी प्रणाली की रचना करते हुए एक दूसरे को संपूरित करते हैं, जिसमें एक युग व समाज के सर्वाधिक सारभूत लक्षण (essential traits) व्यक्त होते हैं। ऐसा है कला और विज्ञान का सामान्य अंतर्संबंध (general interconnection)।

एक विशेष युग की कलात्मक चेतना, मनुष्य की आंतरिक, मानसिक दुनिया को कलाकृतियों की ऐसी प्रणाली से प्रभावित करती है, जिसमें कि यह दुनिया मूर्त होती है। यह उसके ज़रिये यथार्थता (reality) की उन विशेषताओं को उद्घाटित करती है, जो सामाजिक चेतना के अन्य रूपों की पकड़ में नहीं आते। मनुष्य का आत्मिक शिक्षण उसी से होता है और उसी तरीक़े से प्रकृति व समाज के प्रति उसके निश्चित रुख़ बनते हैं। किसी भी युग तथा किन्ही भी जनगण की कला, कलात्मक चेतना में प्रभावी आदर्शों, मानकों तथा विचारों के अनुरूप जीवन व व्यक्तित्व की उन विशेषताओं तथा मनुष्य व प्रकृति की अंतर्क्रियाओं (interactions) को अद्वितीय कला बिंबों में प्रकट करती है, जो चेतना के अन्य रूपों तथा क्रियाकलाप की क़िस्मों के द्वारा परावर्तित व संचारित (communicated) नहीं होते। इसी कारण से लोक कला, अतीत के महान कलाकर्मियों की कृतियां तथा हमारे समसामयिकों का कृतित्व, संपूर्ण विश्व संस्कृति को हमारे लिए सुलभ बनाने में तथा इतिहास के दौरान मनुष्य जाति द्वारा संचित (accumulated) हर मूल्यवान चीज़ को आत्मसात (assimilate) करने में हमारी मदद करते हैं। 

अन्य युगों तथा राष्ट्रों के साहित्य से स्वयं को परिचित कराने, संगीत सुनने और कलावीथियों (art galleries) में जाने से हमें केवल अपने जनगण द्वारा संचित अनुभव का ही बोध नहीं होता, बल्कि उनके जीवन तथा आंतरिक जगत का परिचय भी प्राप्त होता है और हम स्वयं आत्मिक दृष्टि से अधिक समृद्ध तथा उदात्त (noble) बन जाते हैं और अपने दृष्टिकोण तथा विश्व की अपनी समझ को विस्तृत बनाते हैं। कला हमें मनुष्य जाति के अनुभव से परिचित कराके सांस्कृतिक मूल्यों के ‘संचयन’ को बढ़ावा देती है, हमारी भावनाओं को उदात्त बनाती है और जनगण की गहनतर पारस्परिक समझ को प्रोत्साहित करती है। इस तरह, कला, कलात्मक चेतना, सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत जीवन पर विराट भावनात्मक प्रभाव डालती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 24 जून 2018

कलात्मक चेतना और कला - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में धर्म पर चर्चा की थी, इस बार हम कलात्मक चेतना और कला को समझने की कोशिश शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



कलात्मक चेतना और कला - १
( Artistic Consciousness and Art - 1 )

कला, मानव क्रियाकलाप का एक सबसे पुराना और सर्वाधिक सार्विक (universal) रूप है। `कला' (art) पद केवल क्रिया का ही नहीं, बल्कि उसके परिणाम का, अर्थात कलाकृति का द्योतक भी है। कला क्या है? समाज के, और अलग-अलग लोगों के जीवन में कला की भूमिका (role) क्या है?

लोग अपने दैनिक उत्पादक क्रियाकलाप (production activity) में अपनी भौतिक आवश्यकताओं (material wants) की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का ( भोजन मकान आदि ) ही निर्माण नहीं करते, बल्कि उन्हें जितना संभव हो, उतना ही निर्दोष (perfect) तथा सोद्देश्य (purposeful) भी बनाते हैं। वस्तुएं जितनी अच्छी और उपयुक्त हों, उन्हें बनाने के लिए उतनी ही अधिक कुशलता (skill) की ज़रूरत होती है, उत्पादन प्रक्रिया का स्वभाव जितना ज़्यादा रचनात्मक (creative) हो, उसके सर्जक (creator) से उतनी ही अधिक प्रतिभा (talent) तथा कल्पनाशीलता (inventiveness) की अपेक्षा की जाती है। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य की तर्कबुद्धि (reasoning) और संकल्प (will), उसकी विशिष्ट मानवीय शक्ति परिष्कृत हो गये। मनुष्य, प्रकृति से जितना पृथक हुआ और उसने अपने को उससे जितना ऊपर उठा लिया, उतना ही उसने अपने को और अपनी कुशलताओं, ज्ञान तथा व्यवहार के मानकों को परिष्कृत बनाया और फलत:, स्वयं को एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढाल लिया।

मनुष्य की यह सारी विशेषताएं और, सर्वोपरि, उसका सारा सामाजिक सार (social essence), उसके ज्ञान का बल, कल्पना और संस्कृति की शक्ति और साथ ही क्रियाकलाप का परिष्करण (perfection) और पारंगति (mastery) उन वस्तुओं में, संरचनाओं में, औज़ारों में और सुधरी हुई, रूपांतरित (transformed), मानवीकृत प्रकृति में मूर्त (embodied) हुए जिन्हें उसने बनाया। यह मूर्तता (embodiment) जितनी ज्यादा और पूर्ण होती है, उसके श्रम तथा उसकी रचनात्मक क्रिया की भौतिक वस्तुएं उतनी ही उत्कृष्ट और सुंदर होती हैं। इतिहासाश्रित श्रम विभाजन के ज़रिये उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन, सुंदर वस्तुओं के उत्पादन से पृथक हो गया। क्रियाकलाप के एक विशेष रूप में कला, ‘सुंदर का उत्पादन’ भौतिक उत्पादन से पृथक हो गयी। लोगों के एक ऐसे विशेष समूह का उद्भव हुआ, जिनके लिए कला व्यवसाय (profession) बन गई - कलाकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, लेखक, कवि, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा अन्य।

वर्ग समाज (class society) में, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant classes) कला के विशेष उपभोक्ता होते हैं। वे कलाकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वित्तीय सहायता देते हैं, उनका रचनात्मक श्रम ख़रीदते हैं और साथ ही उन्हें निश्चित वर्गों के उद्देश्यों की सेवा करने तथा एक विश्वदृष्टिकोण और वैचारिकी का सचेतन या अचेतन वाहक बनने को बाध्य करते हैं। परंतु यह सोचना गलत होगा की कला, यानी कलात्मक क्रियाकलाप भौतिक उत्पादन से पूर्ण तरह अलग हैं। यहां तक कि शोषक समाजों में भी कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के कृतित्व में पूर्णता के लिए प्रयत्न निहित होते हैं तथा उसमें रचनात्मक मानवीय तत्व अभिव्यक्त होते हैं। जिस सीमा तक काम में स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के तत्व होते हैं, उस सीमा तक उसमें कलात्मक गुण भी होते हैं। काम जितना स्वतंत्र और रचनात्मक होता है, वह कला के उतने ही निकट होता है।

श्रम के आधार पर विकसित होने वाले सारे मानवीय क्रियाकलाप की सब अभिव्यक्तियों में कलात्मक क्रियाकलाप के तत्व निहित होते हैं। मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक सत्व (social being), जो इस क्रियाकलाप का एक उत्पाद है, कमोबेश रचनात्मक, कलात्मक तत्वों से व्याप्त (permeated) होता है और यह भी सामाजिक चेतना के, अर्थात कलात्मक चेतना के एक विशेष रूप में परिवर्तित होता है, जो कलात्मक बिंबों की एक प्रणाली मैं हमारे गिर्द की यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। ये बिंब, व्यष्टिक और सामान्य (individual and general) को, प्रकृति और समाज की लाक्षणिक विशेषताओं, अनुगुणों (properties) और अवगुणों (peculiarities) तथा मनुष्य के आंतरिक जगत को परावर्तित करते हैं। इसके उपरांत उन्हें तदनुरूप (corresponding) भौतिक वस्तुओं व प्रक्रियाओं, संगीत की रचनाओं, चित्रों, मूर्तियों, वास्तुकला संरचनाओं, रंगमंचीय प्रस्तुतियों तथा फ़िल्मों में मूर्त रूप दिया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 17 जून 2018

सामाजिक चेतना के रूप में धर्म

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत आर्थिक चेतना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में धर्म को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना के रूप में धर्म
(Religion as a form of Social Consciousness)



धर्म, सामाजिक चेतना का एक रुप है जिसने मानव जाति के आत्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया है। कुछ ऐतिहासिक अवधियों में यह ऐसी चेतना का सार्विक (universal) रूप था। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह हमेशा विद्यमान था। आधुनिक विज्ञान इसका प्रारंभ आदिम-सामुदायिक समाज के उत्तरकाल को मानता है। तब परिवेशीय जगत की घटनाओं तथा मनुष्य के क्रियाकलाप को समझने और उनका स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता पैदा हो गई थी। समुचित ज्ञान के अभाव तथा आर्थिक व सामाजिक विकास के निम्न स्तर की अवस्था में लोग अपने परिवेशीय जगत का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं दे सकते थे और उन्होंने वस्तुतः स्वयं के साथ सादृश्य (analogy) के अनुसार उसका स्पष्टीकरण देना शुरू कर दिया। उन्होंने उसे अलौकिक अनुगुण (supernatural properties) प्रदान किए और उस पर रहस्यमय आत्मिक शक्तियों को आरोपित (ascribed) कर दिया। अपने सम्मुख विद्यमान प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में कमजोर और निस्सहाय होने के कारण प्राचीन मानव ने प्राकृतिक घटनाओं, यानी वर्षा, तड़ित, वज्रघोष, नदियों, जलधाराओं, वृक्षों, पत्थरों, आदि का दैवीकरण (deification) कर दिया। वह अलग-अलग वस्तुओं की पूजा करता, चापलूसी करता तथा उनकी संरक्षता (patronage) हासिल करने का प्रयत्न करता। धीरे-धीरे ऐसी धारणाएं बनीं जिन्होंने प्रकृति की घटनाओं पर मनुष्य की ही जैसी आत्मा तथा संकल्प का आरोपण कर दिया, किंतु वे मनुष्य की आत्मा व संकल्प से अधिक भयावह, रहस्यमय और अबोधगम्य (incomprehensible) थे।

वर्ग समाज (class society) में प्राकृतिक शक्तियों के साथ ही साथ, वर्गीय शोषण की इनसे भी अधिक पराई (alien), निर्मम (remorseless) शक्तियों ने मनुष्य का विरोध करना शुरू कर दिया। मनुष्य की दुर्बलता तथा निस्सहायता (helplessness) की घोषणा करते तथा उसे पवित्र बताते हुए धर्म ने इन शक्तियों के सम्मुख दीनता (humility) तथा अधीनता का आह्वान किया। इस प्रकार उसे प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) की वैचारिकी के फैलाव, दृढ़ीकरण तथा दूसरों के मन में पैठाने का काम करनेवाली चेतना के एक रूप में परिणत कर दिया गया। प्रतिरोधी वर्ग विरचनाओं (antagonistic class formations) की दशाओं में बौद्ध मत, इसाई धर्म तथा इस्लाम जैसे एकेश्वरीय धर्म व्यापक रूप से फैल गये।

धर्म का संगठनकारी रूप (organised), यानी धार्मिक पंथ को बनाए रखने, धार्मिकता को फैलाने, धर्मानुयायियों को एक सूत्र में बांधने का सामाजिक संस्थान, एक धार्मिक केन्द्र, जैसे कि चर्च, होता है। भिन्न-भिन्न ठोस दशाओं में, विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर भिन्न-भिन्न समाजों के इतिहास के दौरान धर्म और धार्मिक केन्द्रों की सामाजिक भूमिका बदली है। प्रभावी धार्मिक केंद्रों ने, कमोबेश (more or less) सीमा तक, उन वर्गों के हितों की सेवा की है, जिनके हाथों में राजकीय और आर्थिक सत्ता थी।

किंतु सामाजिक जीवन के गहन अंतर्विरोधी (contradictory) स्वभाव तथा परिवर्तनशीलता की वजह से अक्सर ऐसा हुआ कि कुछ धार्मिक धाराओं ने (तथा उनके अनुरूप धार्मिक संगठनों ने), तत्समय प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म का विरोध किया। अक्सर ऐसा हुआ कि ऐसी धाराओं ने उत्पीड़ितों या उन समूहों व वर्गों के हितों को अभिव्यक्ति दी जो सत्ता के लिए और मौजूदा सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन के लिए लड़ रहे थे, किंतु कुछ कारणों से वे स्वयं अपने हितों को और सार्वजनिक मामलों की वस्तुगत अवस्था (objective state) को वैज्ञानिक ढंग से जानने-समझने में असमर्थ थे। कुछ राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों या शोषण के विरुद्ध लड़नेवालों ने, अपने क्रांतिकारी व मुक्तिकारी आकांक्षाओं को धार्मिक रंग दे दिया और देते हैं। ऐसे मामलों में वर्ग या मुक्ति संघर्ष, और उसके अनुरूप वैचारिकी, एक उप धर्म की शक्ल में या वैकल्पिक धार्मिक केंद्र के लिए आंदोलन में प्रकट हुए और उन्होंने प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म के ख़िलाफ़ विरोध का रूप ग्रहण किया और अंतःकरण (conscience) की स्वतंत्रता के लिए लड़ना शुरू कर दिया। धर्म के वेश में राजनीतिक विरोध का प्रकट होना ऐसी घटना है, जो सभी जनगण के विकास की किसी एक अवस्था की विशेषता रही है

आधुनिक दुनिया में, विकट सामाजिक अंतर्विरोधों से भरी दुनिया में, धर्म और धार्मिक संगठन भिन्न भूमिका अदा कर सकते हैं। मार्क्सवादी विचारों के प्रवक्ता धर्म के जबरिया मूलोच्छेदन (forcible extirpation) का आह्वान नहीं करते, जैसा कि उसके विरोधी उस पर आरोप लगाते हैं, बल्कि उन सामाजिक-धार्मिक नेताओं तथा धाराओं के साथ बातचीत का आह्वान करते हैं, जो तापनाभिकीय युद्ध के ख़तरे के ख़िलाफ़ शांति के संघर्ष में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों में और निरंकुशता तथा उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा नवउपनिवेशवाद से छुटकारा पाने के संघर्ष में भाग ले रहे हैं। वे एक मुख्य अधिकार के रूप में अंतःकरण की स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। समसामयिक समाजवादी समाजों में प्रत्येक नागरिक अनीश्वरवादी हो सकता है या धर्म पर विश्वास रख सकता है धर्म के आधार पर किसी प्रकार का वैरभाव या उत्पीड़न वर्जित है और धार्मिक केंद्र राज्य से पृथक होते हैं



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 27 मई 2018

आर्थिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता पर चर्चा की थी, इस बार हम आर्थिक चेतना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



आर्थिक चेतना
( Economic Consciousness )

मानव समाज की उत्पत्ति के समय से ही लोग भौतिक उत्पादन (material production) तथा आर्थिक क्रियाकलाप से संबंधित ज्ञान का संचयन (accumulation), विकास तथा परिष्करण (perfecting) करते आ रहे हैं। यह ज्ञान, भौतिक संपदा (wealth) का उत्पादन तथा वितरण करने की प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण पहलू को परावर्तित करता है और उत्पादन तथा आर्थिक क्रियाकलाप के संगठन व प्रबंध में लागू किया जाता है, सामाजिक चेतना का एक विशेष रूप, यानी आर्थिक चेतना है। वर्ग समाज (class society) में यह चेतना एक सुस्पष्ट वर्गीय स्वरूप (class character) को व्यक्त करती है और वैचारिक संघर्ष तथा क़ानूनी, राजनीतिक और नैतिक चेतना के साथ अविच्छेद्य (inextricably) रूप से जुड़ी होती है।

प्राचीन काल के महानतम चिंतक अरस्तु का विचार था कि दास मात्र बोलने वाले औजार हैं। श्रम, स्वतंत्र लोगों की नहीं, दासों की नियति है। अरस्तु आर्थिक क्रियाकलाप के महत्व को भली भांति समझते थे और उन्होंने मुद्रा के कार्य, आदि पर विचार किया था। पूंजीवाद के युग में आर्थिक चेतना विशेष तेज़ी से विकसित होने लगी थी। राजनीतिक अर्थशास्त्र - आर्थिक क्रियाकलाप, उत्पादन तथा प्रबंध के विज्ञान - के संस्थापकों, एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो तथा अन्य ने मूल्य के श्रम सिद्धांत का विकास किया, जिसका मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन ने ऊंचा मूल्यांकन किया था। लेनिन ने बताया कि इन अर्थशास्त्रियों के दृष्टिकोण, आलोचनात्मक अध्ययन के बाद मार्क्सवाद का एक स्रोत बन गये। परंतु प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में अर्थशास्त्र पर जो विचार बने वे नियमतः प्रभुत्वशाली वर्गों (dominant classes) के दृष्टिकोण से बने थे। उनमें निजी स्वामित्व (private property) की भूमिका को अतिरंजित (exaggerated) किया गया और उसे किसी भी समाज का शाश्वत (eternal), आवश्यक और पवित्र आधार माना गया। पूंजीवादी समाज में, पूंजीवादी आर्थिक चेतना मेहनतकशों को शोषण के अंतर्गत लाने और उनकी वर्ग चेतना को अस्त-व्यस्त करने का एक सरल उपकरण है। पूंजीवादी आर्थिक चेतना, निजी स्वामित्व तथा संपत्ति के व्यक्तिगत उपार्जन (acquisition) को सारे आर्थिक क्रियाकलाप का आधार मानती है, चाहे उनके कारण प्रकृति का विनाश हो जाये और मेहनतकशों पर मुसीबत के पहाड़ टूट पड़ें।

समाजवादी समाज में आर्थिक चेतना का स्वरूप नितांत भिन्न होता है। सामाजिक चेतना के अन्य रूपों की ही तरह यह भी सामाजिक सत्व (social being) तथा उसमें होने वाले परिवर्तनों को परावर्तित (reflect) करती है। इसके अलावा, समाजवादी आर्थिक चेतना मुख्य रूप से समाजवादी अर्थव्यवस्था और उसके संगठन व प्रबंध के रूपों के विकास के प्रतिमानों (patterns) का एक परावर्तन तथा बोध है। क्योंकि मनुष्य, मेहनतकश लोग समाज की मुख्य उत्पादक शक्ति हैं, इसलिए उनकी आर्थिक चेतना का चौतरफ़ा विकास सारी उत्पादक शक्तियों के विकास में एक सबल कारक है।

समसामयिक समाजवादी समाजों की अर्थव्यवस्था की संरचना अत्यंत जटिल है। समाज के वास्ते अधिकांश उत्पादों का उत्पादन करने वाले राजकीय उद्यमों (enterprises) के अलावा सहकारी उद्यम और व्यक्तिगत स्वरोज़गार का अस्तित्व भी है। इनके अतिरिक्त देशी तथा विदेशी फर्मों द्वारा स्थापित मिश्रित उद्यम भी हैं। आर्थिक समीचीनता कि सबसे महत्वपूर्ण कसौटी उद्यम की लाभप्रदता, शीघ्रता से पुनर्गठित (reorganise) होने, विज्ञान व तकनीकि की नवीनतम उपलब्धियों को काम में लाने और श्रम की उत्पादकता को लगातार बढ़ाने तथा संसाधनों की बचत करने वाली ऐसी आधुनिकतम विज्ञान-सघन टेक्नोलॉजी का समावेश करने की उसकी क्षमता है, जिससे ऐसे उत्पादों व वस्तुओं का उत्पादन करना संभव हो जाता है, जो सर्वाधिक विविधतापूर्ण आवश्यकताओं और मांगों को संतुष्ट करना संभव बनाती है। आर्थिक कार्य, अलग-अलग उद्यमों, फ़र्मों, एसोशियेशनों और पूरे उद्योगों के प्रबंध तथा विकास के कामों का निर्णय, चंद व्यापारियों व प्रबंधकों की बजाय सारे मेहनतकशों द्वारा किया जाता है और समाजवादी जनवाद के आधार पर निबटाया जाता है। यहां प्रत्येक की प्रभावशालिता तथा महत्व, शेयरों के स्वामित्व से नहीं, बल्कि उसके अमुभव, ज्ञान तथा श्रम क्रियाकलाप में उसके योगदान से निर्धारित होते हैं।

दार्शनिक दृष्टिकोण से समाज के जीवन में, विशेषतः समाजवाद के अंतर्गत, आर्थिक चेतना तथा उसकी भूमिका की जांच इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि किसी अन्य के मुक़ाबले इसी में सामाजिक सत्व, समाज के आर्थिक आधार तथा उत्पादक शक्तियों पर सामाजिक चेतना के सक्रिय प्रभाव को अधिक अच्छी तरह से देखा जा सकता है। आर्थिक चेतना, वस्तुगत (objective) आर्थिक नियमों तथा सामाजिक-आर्थिक विकास की राह पर उत्पन्न होने वाले अंतर्विरोधों (contradictions) तथा कठिनाइयों को जितनी अधिक पूर्णता तथा यथार्थता (reality) और गहराई से परावर्तित करती है, यह प्रभाव उतना ही ज्यादा स्पष्ट और कारगर होता है तथा उनसे निबटने के साधन और अर्थव्यवस्था के सर्वाधिक द्रुत (rapid) व सामंजस्यपूर्ण (harmonious) विकास के तरीक़े खोजने में मदद देता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 20 मई 2018

सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत क़ानूनी चेतना और क़ानून पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता
(Morality as a form of Social Consciousness)

सामाजिक चेतना का एक और रूप ‘नैतिकता’ (morality) है जो क़ानून (law) तथा क़ानूनी चेतना (legal consciousness) के साथ घनिष्ठता के साथ जुड़ी है। नैतिकता क्या है ?

किसी भी व्यक्ति से पूछिये कि क्या झूठ बोलना, चोरी करना, कमज़ोर को सताना, ठगना या बड़े अधिकारियों की चापलूसी करना अच्छी बात है? उससे पूछिये कि क्या ग़द्दारी करना, दूसरे लोगों की कमाई खाना अच्छी बात है और कि क्या पाखंड, धृष्टता, लोभ तथा लोलुपता उचित है? व्यवहार, कर्म तथा चरित्र की इन विशेषताओं को अधिकांश लोग नकारात्मक, हानिकर तथा अत्यंत अवांछित (undesirable) मानते हैं। दूसरी तरफ़, उद्यमशीलता तथा अध्यवसाय (diligence), ईमानदारी, परोपकारिता, नम्रता, उदारता, मैत्रीपूर्णता, कर्तव्य के प्रति निष्ठा, देशभक्ति, समान उद्देश्य में दिलचस्पी, आदि को सकारात्मक कर्म तथा सद्‍गुण समझा जाता है। इस प्रकार के मूल्यांकन नैतिक माने जाते हैं और किसी भी समाज में, लोगों की हर समष्टि (collective) में विद्यमान नैतिक मूल्यों तथा व्यवहार के क़ायदों (rules) की प्रणाली के अंग हैं और इनकी उत्पत्ति मूलतः मानव समाज की रचना के दौरान हुई।

फलतः नैतिकता, लोगों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में एक दूसरे के, अपनी श्रम समष्टि के, वर्ग, राज्य और संपूर्ण समाज के प्रति उनके व्यवहार के क़ायदों, मानकों, मूल्यों और आदर्शों की एक प्रणाली है। क़ानून तथा क़ानूनी चेतना और नैतिकता के बीच क्या अंतर है? सबसे पहला अंतर तो यह है कि क़ानून, राज्य द्वारा निरूपित (formulate) तथा लागू किया जाता है, जबकि नैतिकता के मानक जनमत के प्राधिकार (authority of public opinion) पर आधारित होते हैं। क़ानून निश्चित ऐतिहासिक दशाओं में बनता है, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के संकल्प (will) को व्यक्त करता है। इसके विपरीत, विगत, वर्तमान तथा भावी, कोई भी समाज नैतिकता के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकता है, क्योंकि लोग किन्हीं भी हालतों में विभिन्न कर्म करते हैं, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से व्यवहार करते हैं, अन्य लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करते हैं और उन्हें स्वयं अपने व्यवहार का मूल्यांकन तथा उसका समर्थन करवाना होता है। किंतु इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि नैतिकता और उसकी मुख्य प्रस्थापनाएं शाश्वत (eternal) और अपरिवर्तनीय (immutable) हैं। नैतिकता के उसूल (principle), क़ायदे और मानदंड (norms) लोगों के सामाजिक सत्व (social being) द्वारा निर्धारित होते हैं और उसके साथ-साथ बदलते हैं

इस प्रकार के उसूलों, जैसे ‘हत्या मत कर’ और ‘चोरी मत कर’ का उद्‍गम ऐतिहासिक है। सामूहिकतावादी आदिम समाज में, जहां निजी स्वामित्व (private property) नहीं था, चोरी करना असंभव था और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात निरर्थक थी। कुछ जातियों में एक शत्रु की या अपने ही क़बीले के सदस्य की या सहधर्मी की ही हत्या करना ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में क़बीले के मुखिया की भी आनुष्ठानिक (ritual) हत्या करना बहुत समय तक नैतिकता के मानकों के विरुद्ध नहीं था। किंतु वर्गीय तथा ऐतिहासिक अंतरों के ( जिन्हें विभिन्न युगों और जातियों की प्रणाली में स्पष्टतः देखा जा सकता है, जैसे मध्ययुगीन कुलीनों की नैतिकता द्वारा व्यापार की भर्त्सना अथवा अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ कठोर बर्ताव को उचित ठहराना ) बावजूद सामान्य मानवीय नैतिक मूल्यों, मानदंडों और उपदेशों (precepts) का अस्तित्व भी है, जो विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) तथा विभिन्न जातियों (nations) और समाज के वर्गों के लिए उचित हैं।

हमारे युग में ऐसे मूल्य हैं - व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा (dignity), व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability), स्वास्थ्य रक्षा, भावात्मक जगत और बच्चों की सुरक्षा, विश्व शांति का संरक्षण और नाभिकीय महाविनाश से मानवजाति का उच्छेदन (extinction) न होने देना। समान मानवीय हितों तथा स्थायी नैतिक मूल्यों का अस्तित्व ही वह चीज़ है, जो महत्वपूर्ण मानवीय लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए लोगों के सहयोग के आधार की रचना करती है। नैतिकता के वर्गीय स्वभाव (class nature) को मान्यता देने से, सामान्य मानवीय मूल्यों और हितों का अस्तित्व खारिज (rule out) नहीं होता है।

वर्ग समाज में नैतिक उसूलों का एक वर्गीय-समूहगत स्वरूप होता है। वर्ग की और सर्वोपरि शोषक वर्ग की स्थितियों की पेचीदगी (complexity) तथा आंतरिक अंतर्विरोधात्मकता (contradictoriness) के कारण प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में नैतिकता भी आंतरिक रूप से अंतर्विरोधात्मक (contradictory) होती है। मसलन, ये उसूल कि ‘हत्या मत कर’, ‘आंख के बदले आंख’ और ‘दांत के बदले दांत’ एक दूसरे का ही खंडन ही नहीं करते, बल्कि धर्म-शास्त्रों के प्राधिकार द्वारा दोषमुक्त ठहराये जाते भी है। नैतिकता की यह अंतर्विरोधात्मक प्रकृति अक्सर ऐसी कार्रवाइयों व कर्मों को उचित ठहराने में समर्थ बना देती है, जो प्रदत्त स्थिति में किसी के हितों के सर्वाधिक अनुरूप हों। प्रभुताशाली, शासक वर्गों की नैतिक चेतना की सबसे लाक्षणिक विशेषता है नैतिक उसूलों, मानकों तथा मतों और वास्तविक, असली व्यवहार के बीच अंतर्विरोधों तथा गहरे विचलन (divergence) का होना। उदाहरण के लिए, पूंजीवादी नैतिकता शब्दों में अध्यवसाय, कठोर कार्य और व्यापारिक ईमानदारी को सर्वोच्च सद्‍गुण घोषित तो करती है, किंतु इस तथ्य के साथ अनायास समझौता कर लेती है कि पूंजीपति वर्ग का अधिकांश, भ्रष्टाचार, स्टॉक-एक्सचेंज की बेईमानियों में आकंठ डूबा है और अन्य लोगों के श्रम पर जीवित है।

इसके विपरीत, समाजवादी नैतिकता के मुख्य लक्षण हैं नैतिक उसूलों तथा नैतिक व्यवहार के बीच एकता और आंतरिक सहमति। यह नैतिकता मूल रूप से, मेहनतकशों के नैतिक उसूलों तथा व्यावहारिक मानकों की प्रणाली के रूप में उत्पन्न होने की वजह से समाजवादी समाज में सार्विकता (universality) का रूप ग्रहण करती है। निष्ठापूर्ण कार्य, ईमानदारी, परोपकारिता, पारस्परिक सम्मान, अपनी औक़ात का अहसास, मानवाधिकारों के लिए सम्मान, अंतर्राष्ट्रीयतावाद, सामूहिकता, व्यक्ति की क्षमताओं तथा प्रतिभाओं का आदर और पाखंड व ढोंगीपन का अस्वीकार, इसके सर्वोच्च सद्‍गुण तथा उसूल हैं। ऐसे उसूलों की घोषणा करना आसान है, किंतु उन्हें कार्यान्वित करना एक पेचीदा और अंतर्विरोधात्मक मामला है। इसलिए, समाजवादी समाज का एक मुख्य कार्य एक ओर, ऐसे नैतिक मानदंडो को कार्यान्वित करने के वास्तविक पूर्वाधारों का, यानी वस्तुगत दशाओं (objective conditions) का निर्माण व अंतर्विरोधों का समाधान करना और दूसरी ओर, प्रत्येक व्यक्ति को स्व-अनुशासन की तथा वास्तविक कर्मों व नैतिक उसूलों के बीच विचलन के प्रति असहिष्णुता (intolerance) की भावना में दीक्षित करना।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 13 मई 2018

क़ानूनी चेतना और क़ानून

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत राजनीतिक चेतना और राजनीति पर चर्चा की थी, इस बार हम क़ानूनी चेतना और क़ानून को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



क़ानूनी चेतना और क़ानून
( Legal Consciousness and Law )

क़ानूनी चेतना और क़ानून, समाज के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लोग सामाजिक मामलों में कुछ क़ायदों (rules) और व्यवहार के मानकों (norms) का पालन करते हैं, ये क़ायदे इतिहासाश्रित होते हैं और समाज के विकास के साथ परिवर्तित होते हैं। वर्गों (classes) के उद्‍भव के साथ मानकों और क़ायदों की एक विशेष प्रणाली ( साथ ही उन्हें तोड़ने पर दंड देने की प्रणाली भी ) बनी, जो प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के लिए उपयोगी थी और जिसे राज्य (state) द्वारा अपनाया तथा स्वीकार किया गया था। ये मानक और क़ायदे ही क़ानून (law) हैं। फलतः क़ानून हमेशा अस्तित्व में नहीं था। यह केवल वर्ग समाज में बना और राज्य के क्रियाकलाप, राजनीति तथा राजनीतिक संघर्ष के साथ घनिष्ठता से जुड़ा था और जुड़ा है।

क़ानून, ऐसी विधियों (statutes, legislation) की राज्य द्वारा स्वीकृत प्रणाली है जो प्रदत्त (given) समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों के संकल्प (will) को व्यक्त करती है। राज्यत्व (statehood) के विकास के साथ ही साथ ऐसे विशेष निकाय (bodies) या एजेंसियां बनी, जो क़ानूनों का प्रारूप (draft) बनातीं तथा उन्हें जारी करतीं ( विधि निकाय legislative bodies ), उनके अनुपालन पर नज़र रखतीं ( दंडाधिकारी ), क़ानूनों के उल्लंघनों के लिए दंड देतीं ( अदालतें, सार्वजनिक व्यवस्था निकाय ) और क़ानून द्वारा स्वीकृत सार्वजनिक व्यवस्था (public order) को बनाये रखतीं। ये सारे संस्थान (institutions) और उनसे संबंधित क़ानूनी क्रियाकलाप तथा स्वयं क़ानून, सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप में परावर्तित (reflect) तथा अनुबोधित (comprehended) होते हैं, जिसे क़ानूनी चेतना कहा जाता है। यह क़ानूनी चेतना, ‘न्याय’ (justice), ‘वैधता’ (legality), ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘अपराध’, तथा ‘दंड’ जैसी संकल्पनाओं (concepts) और विभिन्न क़ानूनी दृष्टिकोणों तथा सिद्धांतों को विकसित करती है, जिनके द्वारा, प्रदत्त समाज में प्रचलित न्याय, वैधता, व्यवस्था, आदि की धारणाओं (notions) के अनुसार, क़ानूनी मानकों तथा क़ानूनों को प्रमाणित किया जाता है।

क़ानूनी चेतना, क़ानून तथा क़ानूनी संस्थान, तदनुरूप (corresponding) सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) की अधिरचना (superstructure) के अंग हैं और उनके आधार को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

प्रभुत्वशाली वर्ग के विचारकों ने क़ानून को हमेशा एक ऐसी चीज़ के रूप में पेश करने का प्रयत्न किया है, जो मानो शाश्वत (eternal) और स्थायी (stable) हो। उनमें से कुछ ने, यह दावा किया कि यह मनुष्य के अपरिवर्तनीय सार (immutable essence) को व्यक्त करता है। अन्य ने दैवी मूल (divine origin) तथा पवित्र ग्रंथों के प्राधिकार (authority) को अपनी दलीलों का आधार बनाया, जबकि कुछ अन्य ने क़ानून को जन-इच्छा की एक ऐसी अभिव्यक्ति के रूप में देखा, जो हमेशा अपरिवर्तनीय तथा स्थिर है। क्या यह सत्य है ?

सबसे पहले इस बात की ओर ध्यान दिलाया जाना चाहिए कि ये दृष्टिकोण वस्तुगत यथार्थता (objective reality) और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। मसलन, हम जानते हैं कि बहुत-से जनगण, जिनका ऐतिहासिक विकास रुक गया था, वर्ग विभाजन (class division) से बचते थे। उनके यहां कोई राजकीय प्राधिकारी नहीं थे और फलतः कोई क़ानून नहीं था। अपने दैनिक जीवन में वे नैतिकता, रीति-रिवाज तथा परंपरा के मानकों के अनुसार चलते थे। हम यह भी जानते हैं कि नयाय, वैधता, आदि की घारणाएं युग प्रति युग बदलती रही हैं। दास-प्रथावाले समाज में दासों की ख़रीद-फ़रोख़्त न्यायोचित और वैध कर्म माना जाता था। आधुनिक समाज में मनुष्यों की ख़रीद-फ़रोख़्त क़ानून और न्याय का घोर उल्लंघन माना जायेगा। सामंती समाज में क़ानून का स्वभाव लोगों की श्रेणीगत हैसियत से संबंधित था। एक भूदास, स्वतंत्र किसान या शहरी की हत्या के लिए जो दंड दिया जाता, वह कुलीन वंश के व्यक्ति की हत्या के लिए दंड से बहुत कम होता था। एक ही श्रेणी के अपराध के लिए, अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग-अलग दंड विधान थे। इस तरह सामंती क़ानून, राजाओं और कुलीनों-भद्रजनों के प्राधिकार की रक्षा करता था। फलतः प्रत्येक एतिहासिक युग में क़ानूनी चेतना और क़ानून एक निश्चित सामाजिक सत्व (social being) के आधार पर उपजते और उसे परावर्तित करते थे और इसी कारण से उस पर एक सक्रिय प्रतिपुष्टिकारी (active feedback) प्रभाव डाल सकते थे।

पूंजीवादी व्यवस्था में क़ानून की एक लाक्षणिक विशेषता इसकी औपचारिकता (formality) है, जो इस तथ्य में निहित है कि यह क़ानून के सामने सारे नागरिकों की समानता, सभा, प्रदर्शन तथा निवास परिवर्तन की स्वतंत्रता, व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability) तथा अधिकांश जनता को मताधिकार देने, आदि की घोषणा तो करता है किंतु उनकी किसी भी तरह से गारंटी नहीं करता और घोषित ‘अधिकारों’ तथा ‘स्वतंत्रताओं’ के उपयोग की भी गारंटी नहीं देता है। अमीर और ग़रीबों में विभाजित समाज में, जहां अधिकतर आबादी बेरोज़गार और बेघर हैं, वहां वास्तविक समानता कैसे हो सकती है? यही कारण है कि पूंजीवादी क़ानून संकीर्ण और औपचारिक हैं। किंतु पूंजीवादी लोकतंत्र में इस सीमित क़ानून को भी मज़दूरों के हित में और उनके अपने ही क़ानूनी राजनीतिक तथा ट्रेड-यूनियन संगठनों के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसीलिए, जब वर्ग-संघर्ष (class struggle) तीक्ष्ण होता है और एक क्रांतिकारी स्थिति परिपक्व होती है, पूंजीवादी वर्ग एक फासीवादी (fascist) प्रकार की सैन्य-पुलिस तानाशाही स्थापित करने का प्रयास करता है, और इस तरह वह स्वयं ही पूंजीवादी-लोकतांत्रिक क़ानूनों तथा क़ानूनी चेतना को अस्वीकार कर देता है, स्थगित कर देता है। ऐसी परिस्थितियों में, लोकतांत्रिक अधिकारों (democratic rights) के लिए लड़ाई, श्रमिक वर्ग और सभी श्रमजीवी जनता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य बन जाता है

समाजवादी समाज के उद्‍भव के साथ क़ानून और क़ानूनी चेतना में मूलभूत परिवर्तन होते हैं। क़ानून निर्माण कार्य, मुख्यतः समाजवादी संपदा की रक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, व्यक्ति के अधिकारों और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता की रक्षा से संबंधित होता है। किंतु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि नयी क़ानूनी व्यवस्था द्वारा घोषित लक्ष्यों की उपलब्धि अपने आप हो जायेगी। समाजवादी सामाजिक संबंधों का निर्माण एक लंबी, जटिल और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी (dialectically contradictory) प्रक्रिया है। अतः नैतिक व क़ानूनी उसूलों (principles) की संबद्धता (coherence) और व्यावहारिक अविभाज्यता (practical inseparability) की समझ, नूतन चिंतन की एक प्रमुख उपलब्धि और उसकी दार्शनिक गहराई तथा परिपक्वता (maturity) का प्रमाण हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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