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शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण पर चर्चा की थी, इस बार हम आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान
( application of mathematics and modern science )

एक चौकोर मैदान के क्षेत्रफल को नापने के वास्ते एक मापने के दंड का उपयोग करने के बजाय हम केवल उसकी दो समलंब भुजाएं माप सकते हैं और फिर प्राप्त अंकों को गुणा करके पल भर में सारे मैदान का क्षेत्रफल नाप सकते हैं।

विज्ञान, इंजीनियरी तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में गणित का महत्व और अनुप्रयोग इस तथ्य पर आधारित है कि हम नापजोख के विभिन्न साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा उनके अनुगुणों पर कुछ अंकों को आरोपित कर सकते हैं और उसके उपरांत वस्तुओं के साथ श्रमसाध्य क्रियाएं करने के बजाय कुछ गणितीय नियमों के अनुसार इन अंकों के साथ संक्रियाएं ( operations ) कर सकते हैं। उसके पश्चात हम प्राप्त अंकों को पुनः भौतिक वस्तुओं पर लागू कर सकते हैं और उन्हें वस्तु के अन्य अनुगुणॊं तथा विशेषताओं को जानने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। परिमाण ( quantity ) और गुण ( quality ) का द्वंद्वात्मक संयोजन इस बात में स्पष्टतः अभिव्यक्त होता है। गणित कुछ सीमाओं के अंदर वस्तुओं के परिमाणात्मक लक्षणों के ज़ारिये उनकी असीम व विविधतापूर्ण गुणात्मक विशेषताओं का वर्णन करना संभव बना देता है। चूंकि परिमाणात्मक लक्षणों का वर्णन सापेक्षतः सुस्पष्ट, सरल सूत्रों तथा समीकरणों में व्यक्त गणितीय क़ायदों से किया जा सकता है, इसलिए वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) के संज्ञान की प्रक्रिया सरलीकृत, द्रुत और सुविधापूर्ण हो जाती है।

हमारे युग में गणित ने विज्ञान की अनेक शाखाओं में पैठ बना ली है। अब वैज्ञानिकगण ऐसे अधिकाधिक जटिल अमूर्तों, अपकर्षणों ( abstractions ) का उपयोग करने लगे हैं, जिन्हें संवेद बिंबों ( sensory images ) में परिणत नहीं किया जा सकता है, इसलिए नियमों तथा सिद्धांतों को जटिल गणितीय समीकरणों के ज़रिये निरूपित करना होता है। बीसवीं सदी के मध्य से कंप्यूटरों का बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अब उनकी बदौलत अत्यंत जटिल गणनाओं को पूर्वलिखित कार्यक्रमों ( programmes ) के ज़रिये शीघ्रता से और विश्वसनीय ढंग से करना और उन समस्याओं को हल करना संभव हो गया है जो पहले व्यक्ति के लिए या तो बेहद कठिन या अत्यंत श्रमसाध्य होती थीं।

गणित, ऐसे पूर्णतः प्रमाणित प्रमेयों ( theorems ) तथा क़ायदों ( rules ) पर आधारित है, जो वस्तुगत सत्य हैं, किसी के संकल्प या इच्छाओं पर निर्भर नहीं है और इसीलिए हमारे परिवेशीय जगत के बारे में निश्चित ज्ञान हासिल करना संभव बनाता हैं। किंतु जिस प्रकार परिणाम को गुण से विच्छेदित नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार संज्ञान की गणितीय विधि को विभिन्न विज्ञानों की गुणात्मकतः भिन्न अन्य विधियों से विच्छेदित नहीं किया जा सकता है। समसामयिक वैज्ञानिक ज्ञान की सारी विधियों का एकत्व ( unity ) ही, उनके वस्तुगत सत्य की और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर उनके प्रभाव की गारंटी करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों पर चर्चा की थी, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण
( models and modelling in scientific cognition )

आधुनिक विज्ञान में प्रयुक्त एक सबसे सामान्य विधि मॉडल निर्माण ( modelling ) है। मॉडल तथा मॉडल निर्माण क्या है? शब्द "मॉडल" का मतलब है एक नमूना, प्रतिरूप या रूपांकन अथवा एक त्रिआयामीय चित्रण, किंतु यह स्वयं अपने आप में कोई स्पष्टीकरण नहीं है, क्योंकि विज्ञान में संकल्पना "मॉडल" ने एक विशेष आशय ग्रहण कर लिया है।

वस्तुएं अक्सर छानबीन के लिए समुपयुक्त नहीं होतीं। वे बहुत बड़ी या बहुत क़ीमती हो सकती हैं, बहुत जटिल या अनुपलब्ध हो सकती हैं। इस स्थिति में एक ऐसी वस्तु बनायी या खोजी जाती है जो कुछ सारभूत मामलों में दिलचस्पी की वस्तु या प्रक्रिया के समान हों, यानी स्थानापन्न ( substitute ) हों। यदि इस वस्तु का अध्ययन हो सकता हो और प्राप्त परिणामों को समुचित त्रुटि सुधारों तथा समंजनों ( adjustments ) के साथ अध्ययनाधीन वस्तु के संज्ञान के लिए प्रयुक्त या लागू किया जा सकता हो, तो इसे मॉडल कहा जायेगा। एक मॉडल की रचना या चयन, उसका अध्ययन तथा प्राप्त परिणामों को मुख्य वस्तु के संज्ञान के लिए इस्तेमाल करने को मॉडल निर्माण कहते हैं।

मानवसम वानर ( anthropoid apes ) कुछ मामलों में मनुष्य के समान होते हैं। वैज्ञानिकों ने बहुत पहले यह खोज की कि मेकाक बंदर की रीसस ( rhesus ) प्रजाति का रुधिर मनुष्य के रुधिर के समान होता है। इस रुधिर का अध्ययन करके उन्होंने विशेष अनुगुणों की खोज की जो रीसस-फ़ैक्टर कहलाता है। रुधिर की समानता को आधार बनाकर उन्होंने प्राप्त परिणामों को मानव रुधिर पर लागू किया और पता लगाया कि उसमें भी वैसे ही अनुगुण होते हैं। इस मामले में बंदर का रुधिर, मानव रुधिर का मॉडल था।

इंजीनियरी में मौलिक वस्तु या प्राक्-रूप ( prototype ) को बनाने से पहले अक्सर मॉडल का निर्माण तथा अध्ययन किया जाता है, ताकि बाद में किये जानेवाले निर्माण में कई ग़लतियों और कठिनाइयों से बचा जा सके। एक विशाल बिजलीघर के निर्माण से पहले उसका एक समानुपातिक तकनीकी मॉडल बनाया जाता है और उसे लेकर कई प्रयोग किये जाते हैं। इससे प्राप्त जानकारी को वास्तविक बिजलीघर बनाते समय ध्यान में रखा जाता है।

इन उदाहरणों में मॉडल की भूमिका नितांत भौतिक वस्तुओं द्वारा अदा की गयी है। किंतु आधुनिक विज्ञान में तथाकथित वैचारिक, प्रत्ययिक मॉडलों ( ideal models ) का व्यापक उपयोग होने लगा है। उनमें, मसलन, तथाकथित मानसिक प्रयोग शामिल हैं। एक अतिजटिल, खर्चीला प्रयोग शुरू करने से पहले एक वैज्ञानिक अपनी कल्पना में अपेक्षित औज़ारों के एक पूरे सेट की रचना करता है और उन्हें लेकर विभिन्न कार्यकलाप करता है और कभी-कभी सहायक साधनों के रूप में नक़्शों, रेखाचित्रों तथा आरेखों का उपयोग भी करता है। वह इन सारी कार्रवाइयों के बाद ही अपना असली प्रयोग करने का इरादा या तो त्याग देता है ( यदि मानसिक प्रयोग असफल हुआ है ) अथवा उसके व्यावहारिक कार्यान्वयन में जुट जाता है।

मॉडलों तथा मॉडल निर्माण की एक क़िस्म गणितीय मॉडल निर्माण है। इसमें स्थानापन्न वस्तु के रूप में भौतिक वस्तुओं या प्रक्रियाओं को लेने के बजाय गणितीय समीकरणों की एक प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इन समीकरणों में प्रेक्षणों तथा प्रयोगों से प्राप्त विविध आंकिक आधार-सामग्री को प्रतिस्थापित करके तथा उन समीकरणों को हल करके वैज्ञानिक विभिन्न प्रक्रियाओं के परिमाणात्मक अभिलक्षणों ( quantitative characteristics ) का सही-सही मूल्यांकन कर सकता है और उन कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगा सकता है, जो व्यवहार में पैदा हो सकती हैं। आधुनिक विज्ञान के सारे क्षेत्रों में, विशेषतः इंजीनियरी तथा नियंत्रण ( control ) के सिद्धांत में गणितीय मॉडलों का व्यापक प्रयोग किया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 12 सितंबर 2015

साम्यानुमान पद्धति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की पद्धतियों निगमन और आगमन के एकत्व पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की एक और पद्धति साम्यानुमान को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यानुमान पद्धति
( Analogy method )

संज्ञान में वैज्ञानिक अपाकर्षणों ( abstractions ) की भूमिका असाधारण महत्व की होती है। लेकिन संज्ञानात्मक प्रक्रिया अपाकर्षणों की विरचना ( formulation ) पर समाप्त नहीं होती, क्योंकि वे अध्ययनाधीन विषय के संपूर्ण सार ( essence ) को प्रकट नहीं कर सकते। अपाकृष्ट चिंतन ( abstract thought ) अपूर्ण, सामान्य और अद्वंद्वात्मक होता है, जबकि द्वंद्वात्मक चिंतन ( dialectical thought ) गहन रूप से वैज्ञानिक, स्पष्ट, सुसंगत, निश्चायक, यानी मूर्त ( concrete ) होता है। आगमन और निगमन के साथ ही विचार को मूर्त बनाने का एक और प्रमुख उपकरण है साम्यानुमान ( analogy )। इसका विशिष्ट लक्षण है एक विशेष ( particular ) से दूसरे विशेष की ओर विचार की गति। साम्यानुमान आगमन और निगमन के बीच एक प्रकार की मध्यवर्ती, संक्रामी ( transitional ) स्थिति में होता है।

साम्यानुमान एक प्रकार का अनुमानित ( inferred ) ज्ञान होता है, जिसमें वस्तुओं के बीच कुछ मामलों की समानताओं को अन्य मामलों मे उनकी समानता पर निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका यह मतलब है कि साम्यानुमान से पहले अध्ययनाधीन वस्तु के संबंध में प्रारंभिक संक्रियाओं ( operations ) का एक सेट पूरा हो चुकना चाहिये। ये संक्रियाएं हैं, पहली, वस्तु के अलग-अलग पक्षों, अनुगुणों, संपर्कों व संबंधों के बारे में अनुभवात्मक ज्ञान का स्वांगीकरण ( assimilation ) और उनका व्यवस्थापन; दूसरी, एक उपयुक्त तुल्यरूप ( analogue ) का ( समरूपता दर्शाने के लिए एक नमूने model का ) चुनाव, जिसके अनुगुणों का सर्वांगीण अध्ययन किया गया है तथा जिसके साथ साम्यानुमान लगाया जायेगा; और तीसरी, तुलनाधीन वस्तुओं के समान लक्षणों तथा नमूने में विद्यमान उस लक्षण के बीच आवश्यक व मौलिक संबंध का निर्धारण करना, जिसे अध्ययनाधीन वस्तु को अंतरित ( transferred ) करना है।

अनुसंधान की प्रारंभिक और सरलतम कार्य-विधि, विभिन्न वस्तुओं या घटनाओं की समान विशेषताओं को सही-सही निर्दिष्ट करना है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि पहला, जितनी अधिक समान विशेषताएं संभव हों, उन सबको निर्धारित करना और, दूसरा, इन वस्तुओं या घटनाओं की मूलभूत, अंतर्निहित विशेषताओं में समानता पर जोर देना और गौण तथा सांयोगिक विशेषताओं को पृथक करना। अध्ययनाधीन वस्तुओं, घटनाओं या प्रक्रियाओं की समानताओं तथा भेदों को जितनी ज़्यादा पूर्णता से विश्लेषित किया जाता है, साम्यानुमान के निष्कर्ष उतने ही सही, उतने ही अधिक प्रसंभाव्य ( probable ) होते हैं

अन्य अनुगुणों या पक्षों की समानताओं के आधार पर वस्तुओं या घटनाओं के कुछ अनुगुणों या पक्षों की समानता पर निकाला गया कोई भी निष्कर्ष हमेशा प्रसंभाव्य होता है। साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की प्रसंभाव्यता को बढ़ाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त यह है कि समानुरूप वस्तुओं या घटनाओं का व्यापक, सर्वांगीण और गहन अध्ययन किया जाये। अध्ययनाधीन वस्तुओं का हमारा ज्ञान जितना पूर्णतर होगा, उनकी संख्या का महत्व उतना ही कम होगा। जहां वस्तुओं का अच्छा अन्वेषण न हुआ हो, उनका सार प्रकाश में न लाया गया हो और उनके भेदों को ध्यान में न रखा गया हो, वहां साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की अच्छी प्रसंभाव्यता का कोई आधार नहीं होता।

साथ ही, यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि तुलनाधीन वस्तुएं पूर्णतः समान नहीं भी हो सकती हैं। साम्यानुमान निश्चित विशेषताओं के अनुसार केवल कुछ ही मामलों में उनकी अनुरूपता ( correspondence ) को प्रमाणित करता है। प्रत्येक तुलना अपूर्ण होती है, प्रत्येक तुलना में तुलनाधीन वस्तुओं या धारणाओं के एक या कुछ पक्षों के संदर्भ में समरूपता दिखलायी जाती है, जबकि अन्य पक्षों को अस्थायी रूप से तथा शर्त के साथ अपाकर्षित ( abstracted ) किया जाता है। चूंकि साम्यानुमान के निष्कर्ष केवल प्रसंभाव्य होते है, इसलिए यह तार्किक प्रमाण के औज़ार का काम नहीं कर सकता है। पर इसके बावजूद यह संज्ञान की एक सबसे अधिक प्रयुक्त पद्धति है।

साम्यानुमान को लागू करने के नियमों की तथा उसका कुशलता से इस्तेमाल करने की जानकारी व्यावहारिक काम में बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। समानुरूपी प्रक्रियाओं, घटनाओं तथा जीवन की स्थितियों के विश्लेषण से विभिन्न समस्याओं के लिए इष्टतम ( optimal ) समाधान खोजना और यह फ़ैसला करना संभव हो जाता है कि ठोस स्थितियों में कैसा व्यवहार किया जाये। मिलते-जुलते संसूचकों ( indicators ) के एक सेट के आधार पर एक प्रक्रिया या घटना के विकास की दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है और उसके अवांछित परिणामों से बचने तथा उसके सकारात्मक तत्वों को सुदृढ़ बनाने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के तरीक़े व साधनों का निर्धारण किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 6 सितंबर 2015

निगमन और आगमन का एकत्व

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की गमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम निगमन और आगमन के एकत्व को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निगमन और आगमन का एकत्व
( unity of deduction and induction )

बाहर से देखने पर निगमनात्मक तथा आगमनात्मक विधियां विपरीत दिशाओं में हैं, किंतु अंदर से वे वैज्ञानिक ज्ञान की सारी प्रणाली के द्रुत विकास को बढ़ावा देनेवाले एक गहन द्वंद्वात्मक एकत्व ( dialectical unity ) की रचना करती हैं। इसके साथ ही आगमनात्मक पद्धति की सीमाओं को, उनके परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान की समस्यामूलक प्रकृति को भी ध्यान में रखना चाहिये। आगमन विधि की ख़ामी यह है कि यह अध्ययनाधीन वस्तु के विकास की प्रक्रिया को ध्यान में नहीं रख सकती है, जबकि निगमन विचाराधीन वस्तु के रूपांतरण की ऐतिहासिक अवस्थाओं के अनुसार संरचित होता है। इसी तरह निगमनात्मक पद्धति की भी अपनी कमजोरियां है कि वह बुनियादी सामान्य आधारिकाओं की कुल तादाद तथा उन आधारिकाओं की सत्यता को प्रमाणित करने की अक्षमता से सीमित होता है।

संज्ञान की वास्तविक प्रक्रिया में आगमन और निगमन की एकता होती है। यह एकता इन दोनों पद्धतियों के फ़ायदों को इस्तेमाल करना संभव बना देती है, इससे एक की ख़ामी का असर दूसरी के गुण से दूर हो जाता है। आगमन, निगमन से अनिवार्यतः संपूरित ( supplemented ) होता है और उसमें निगमन के तत्व शामिल होते हैं। यह विचाराधीन वस्तुओं में एक समान लक्षणों को सही-सही दर्शाने तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि उनके बीच से मूलभूत तत्वों को अलग करता है तथा उनके पारस्परिक संयोजनों व संबंधों को प्रकट करता है, जो निगमन के कुछ तत्वों के बिना असंभव है। दूसरी तरफ़, निगमन को प्रारंभिक आधारिकाओं की सच्चाई तथा तर्क-संगति को ध्यान में रखे बिना तर्कणा की प्रणाली में परिणत नहीं किया जा सकता, जो  एक ऐसी चीज़ है, जिसे आगमन के तत्वों को शामिल करके सुनिश्चित बनाया जाता है।

आगमन और निगमन की पद्धतियों के उपयोग की आवश्यकता वहां पर होती है, जहां प्राप्त सूचना के आधार पर अनुमान लगाकर ज्ञान हासिल किया जाता है। इन पद्धतियों के उपयोग में पारंगत होने से, एक ओर तो, वास्तविकता के तथ्यों तथा घटनाओं के दैनिक व्यावहारिक कार्यों के सामान्यीकरण में दूसरी ओर, सामान्य कार्यों और प्रस्थापनाओं के आधार पर व्यावहारिक समस्याओं के ठोस समाधान पाने में मदद मिलती है।

शिक्षाशास्त्रीय आगमन व निगमन की विधियों के कुशल उपयोग से शिक्षा तथा काम में बहुत व्यावहारिक सहायता मिलती है। आगमन और निगमन का शिक्षाशास्त्रीय उपयोग अनुमानित ज्ञान हासिल करने की तदनुरूप पद्धतियों से इस बात में भिन्न है कि इसका लक्ष्य आधारिकाओं से निष्कर्ष निकालना नहीं, बल्कि ज्ञान की एक इकाई से दूसरी में जाना, विविध संकल्पनाओं ( concepts ) और प्रस्थापनाओं ( propositions ) को प्रकट करना होता है। अध्ययन की हुई सामग्री को व्यवस्थित करने में उसे आगमनात्मक ढंग से भी पेश किया जा सकता है और निगमनात्मक ढंग से भी। यदि वह सामग्री अलग-अलग तथ्यों से सामान्य प्रस्थापनाओं की ओर संक्रमण के रूप में व्यवस्थित व प्रस्तुत की गयी है, तो प्रयुक्त पद्धति आगमनात्मक है, और अगर समस्या का प्रस्तुतीकरण सामान्य प्रस्थापनाओं से प्रारंभ होता है और बाद में अलग-अलग तथ्यों की ओर संक्रमण किया गया है, तो प्रयुक्त पद्धति निगमनात्मक है।

लगभग सभी समस्याओं को आगमनात्मक और निगमनात्मक, दोनों ही तरीक़ों से पेश किया जा सकता है। पद्धति का चुनाव सामान्यतः प्रस्तुतिकरण के लक्ष्यों, स्वयं समस्या की विशिष्टताओं और उन लोगों की विशेषताओं के अनुसार किया जाता है, जिनके सामने वह समस्या पेश की जानी है। समस्या को पेश करने की एक सुप्रचलित, आसानी से समझ में आनेवाली विधि आगमन की सहायता से उपलब्ध होती है, जबकि पेश की जानेवाली प्रस्थापनाओं के परिशुद्ध प्रमाण के लिए निगमन की आवश्यकता होती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अध्ययन में इन दोनों पद्धतियों का इस्तेमाल होना चाहिये, प्रत्येक विषय में वरीयता ( preference ) उसे देनी चाहिये, जो शिक्षार्थी को समस्या की अंतर्वस्तु ( content ) को अधिक अच्छी तरह से समझने में तथा प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करने में समर्थ बनाती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 29 अगस्त 2015

संज्ञान की आगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की गमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की आगमनात्मक विधियां
( Inductive methods of cognition )

जहां निगमनात्मक ( deductive ) विधि के ज़रिये ज्ञान के सैद्धांतिक स्तर से आनुभविक स्तर की ओर जाना संभव है, वहीं आगमनात्मक ( inductive ) विधि से उल्टी दिशा में जाना संभव हो जाता है, यानी आनुभविक स्तर से सैद्धांतिक स्तर की ओर। 

व्यवहार में और वैज्ञानिक प्रेक्षण तथा प्रयोग में वैज्ञानिकगण किसी घटना, प्रकृति या सामाजिक जीवन से संबंधित एकसमान तथ्यों को कमोबेश बड़ी संख्या में संचित करते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या संयोग तथा परिवर्तनों के अधीन अलग-अलग, असमन्वित ( uncoordinated ) तथ्यों से उनका संनियमन ( govern ) करने वाले वस्तुगत नियमों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? वैज्ञानिक ज्ञान की रचना करनेवाली आगमनात्मक विधि क़ायदों का, एक तरह का ऐसा समुच्चय है, जिसकी मदद से संवेदनों द्वारा किये गये प्रेक्षणों तथा अलग-अलग तथ्यों के आनुभविक ज्ञान से उनकी बुनियाद में निहित नियमों तक, उनके सार के सैद्धांतिक ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है।

आगमन ( induction ), चिंतन का पृथक-पृथक विशेष ( particular ) तथ्यों से सामान्य प्रस्थापना ( general proposition ) की ओर, कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर आना है। आगमन प्रांरभिक आधारिकाओं ( premises ) से अधिक व्यापक सामान्यीकारक निष्कर्ष निकालना संभव बनाता है। आगमनात्मक पद्धति संज्ञानात्मक प्रक्रिया की उन शुरुआती मंज़िलों में कारगर होती है, जब मनुष्य को अनुभवात्मक ज्ञान का बोध होता है, जब वह तथ्यों व आधार-सामग्री का संचय व सामान्यीकरण करता है, एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) को निरूपित करता है और उसकी सच्चाई को जांचता है। इस पद्धति का एक गुण यह है कि इसे केवल एक ही विशेष तथ्य के आधार पर भी विश्लेषण और सामान्यीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी विशेषता स्वयंसिद्ध हैं।

आगमनात्मक पद्धति के सुव्यवस्थित उपयोग से ठोस स्थितियों का विश्लेषण करने, तथ्यात्मक सामग्री का सामान्यीकरण करने, प्राक्कल्पनाओं को पेश करने तथा उनकी सच्चाई परखने की क्षमता विकसित होती है। आगमनात्मक विधि का अनुप्रयोग गणितीय सांख्यिकी तथा प्रसंभाव्यता के सिद्धांत ( theory of probability ) के वैज्ञानिक संज्ञान में व्यापक उपयोग से संबंद्ध है। प्रसंभाव्यता सिद्धांत के ज़रिये प्रयोगों, आदि की एक पूरी श्रृंखला में कुछ अनुगुणों ( properties ) के विकास की प्रसंभावना का परिमाणात्मक ( quantitative ) अनुमान लगाया जा सकता है। यदि प्रक्रिया या अनुगुण के स्थायित्व की प्रसंभाव्यता की कोटि बहुत ऊंची है, तो उनके ज्ञान को विज्ञान का नियम माना जा सकता है।

पृथक्कीकृत ( isolated ) भौतिक प्रणालियों में ऊर्जा के नियम ( क्लासिक तापगतिकी का दूसरा नियम ), प्राकृतिक वरण ( natural selection ) का डार्विनीय नियम तथा आधुनिक विज्ञान की अन्य नियमितताओं ( regularities ) तथा नियमों की खोज ऐसे ही की गयी थी। अलग-अलग आंशिक प्रेक्षणों से अधिक सामान्य सैद्धांतिक ज्ञान की तरफ़ जाना संभव बनानेवाली आगमनात्मक विधि विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 22 अगस्त 2015

संज्ञान की निगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक पद्धतियों के वर्गीकरण पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की निगमनात्मक विधियां
( Deductive methods of cognition )

किसी भी विज्ञान के नियम, प्राक्कल्पनाएं तथा सिद्धांत ज्ञान का एक विशेष स्तर होती हैं जिसे सैद्धांतिक ( theoretical ) कहा जाता है। प्रत्यक्ष प्रेक्षणों तथा प्रयोगों पर, यानी संवेद प्रत्यक्षों पर आधारित ज्ञान उसका दूसरा स्तर है, जिसे आनुभविक ( empirical ) स्तर कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान में ज्ञान के सैद्धांतिक तथा आनुभविक स्तर के बीच बड़े जटिल संबंध होते हैं। आधुनिक भौतिकी, साइबरनेटिकी, खगोलविद्या, जैविकी तथा अन्य विज्ञानों के सिद्धांत, प्राक्कल्पनाएं और नियम अत्यंत अमूर्त ( abstract ) होते हैं और उन्हें ऐसी किन्हीं दृश्य, रैखिक मॉडलों, संकल्पनाओं तथा कथनों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है जो संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत घटनाओं के तुल्य या उन पर अनुप्रयोज्य ( applicable ) हों। ज्ञान के इन रूपों को आम तौर पर गणित के समीकरणों जैसे जटिल प्रतीकात्मक रूपों तथा अमूर्त तर्किक फ़ार्मूलों में व्यक्त किया जाता है। इनको यथार्थता ( reality ) पर लागू करने तथा उनकी सत्यता को परखने के लिए ज्ञान के आनुभविक स्तर की तुलना सैद्धांतिक स्तर से करनी पड़ती है, उनका आमना-सामना करना पड़ता है। इसके लिए संज्ञान की निगमनात्मक विधि ( deductive method ) का इस्तेमाल किया जाता है।

निगमन पद्धति में चिंतन, सामान्य ( general ) से विशेष ( particular ) की ओर जाता है। इस विधि में सामान्य सिद्धांतों, आधारिकाओं ( premises ) से, कम सामान्य या विशिष्ट निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं। निगमनात्मक पद्धति सैद्धांतिक सामग्री को तार्किक क्रम तथा पूर्णता प्रदान करती है, उसे प्रमाणित व व्यवस्थित करने में मदद देती है। इस विधि में एक सिद्धांत की प्रमुख प्रारंभिक प्राक्कल्पनाओं ( hypotheses ) तथा नियमों को सुसंगत ढंग तथा सख़्ती से परिभाषित, तार्किक और गणितीय क़ायदों द्वारा रूपांतरित ( transform ) किया जाता है। इन रूपांतरणों के फलस्वरूप सूत्रों, प्रमेयों ( theorems ) या प्रस्थापनाओं ( propositions ) की एक लंबी श्रृंखला बन जाती है जो कुछ नियमितताओं को व्यक्त करती है या अध्ययनाधीन वस्तु के निश्चित अनुगुणों ( properties ) तथा संपर्कों ( connections ) का वर्णन करती है। प्रारंभिक बुनियादी नियमों और प्राक्कल्पनाओं से व्युत्पन्न ( derived ) इस ज्ञान की रचना प्रक्रिया को निगमन ( deduction ) कहते हैं और प्राप्त ज्ञान निगमनात्मक ज्ञान है।

निगमनात्मक पद्धति का एक गुण यह है कि इसकी सहायता से निकाले गये निष्कर्ष भली भांति प्रमाण्य ( demonstrable ) होते हैं और परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान सच्चा और प्रामाणिक ( authentic ) होता है। सही-सही आधारिकाओं से हम तार्किक ढंग से आवश्यक सहज परिणामों को निगमित कर सकते हैं। अगर हमारे पूर्वाधार सही हैं और हम उन पर चिंतन के नियमों को सही ढ़ंग से लागू करते है, तो हमारे निष्कर्ष वास्तविकता के साथ मेल खाते है उसके अनुरूप होते हैं

निगमनात्मक विधि से एक ऐसे क्लिष्ट और अमूर्त सिद्धांतों, जिनमें की प्रत्यक्ष अनुभूतियों का, आनुभाविक स्तर की प्रामाणिकता का अभाव होता है, की बुनियादी प्रस्थापनाओं और नियमों की एक सापेक्षतः छोटी सी संख्या से विभिन्न रूपांतरणों के ज़रिये इस तरह के निष्कर्षों तथा उपप्रमेयों की एक बहुत बड़ी संख्या हासिल करना संभव हो जाता है, जिनको की प्रत्यक्ष संवेदों की अनुभूतियों द्वारा आनुभविक स्तर पर प्रमाणित किया जा सकता है। इस तरह प्रत्यक्षीकृत भौतिक यथार्थता पर अनुप्रयोज्य सिद्धांतों तथा नियमों को एक आनुभविक, यानी संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत आशय प्रदान किया जाता है।

उदाहरण के लिए, फ़ार्मूलों में निहित चरों की तुलना कुछ उपस्करों ( instruments ) के पैमानों, विभिन्न विद्युतीय सुइयों या प्रदर्शन पटों के पाठ्यांकों या साधारण दृश्य और श्रव्य प्रेक्षणों, आदि से की जाती है। इस तरह, ज्ञान के सैद्धांतिक और आनुभविक स्तरों के बीच संबंध को और विस्तृतम अर्थ में प्रयोग, प्रेक्षण तथा व्यवहार के साथ सिद्धांत के संबंध को निगमनात्मक विधि से उद्घाटित किया जाता है। मसलन, क्वांटम यांत्रिकी के बुनियादी नियम, स्वयं यथार्थता ( reality ) पर प्रत्यक्ष अनुप्रयोज्य नहीं हैं और प्रायोगिक प्रेक्षणों के परिणामों के साथ तुल्य नहीं हैं। लेकिन गणितीय रूपांतरणों की बदौलत क्वांटम भौतिकी के बुनियादी नियमों की सत्यता को प्रदर्शित ही नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके अत्यंत व्यापक व्यावहारिक अनुप्रयोग ( application ) भी खोजे जा सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 1 अगस्त 2015

प्रयोग और प्रेक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा की थी, इस बार वैज्ञानिक संज्ञान के अन्य रूपों प्रयोग और प्रेक्षण की महत्ता को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
प्रयोग और प्रेक्षण
( experiment and observation )

जब एक खगोलविद ( astronomer ) अपनी रेडियोदूरबीन ( radio telescope ) से अंतरिक्ष की रहस्यमय गहराइयों से आनेवाली रेडियो तरंगों या एक्स-किरणों को ग्रहण करता है, तो वह एक ऐसे तारे या तारा-पुंज की खोज कर सकता है, जो सामान्य प्रकाशिक दूरबीन ( optical telescope ) के लिए अदृश्य ( invisible ) हैं। एक जैविकीविद ( biologist ) प्रयोगशाला या प्राकृतिक दशाओं में जानवरों का प्रेक्षण करके उनके व्यवहार की किसी ऐसी नियमितताओं की खोज कर सकता है, जो पहले अज्ञात थीं। प्रेक्षण ( observation ) दृश्य, श्रव्य तथा अन्य संवेदनों के द्वारा संवेदनात्मक अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया पर आधारित होता है

हम सामान्य जीवन में काम पर या वैज्ञानिक अनुसंधान ( research ) के समय जो सूचनाएं प्राप्त करते हैं, उनमें से बहुत सारी प्रेक्षणों पर आधारित होती हैं। लेकिन वैज्ञानिक प्रेक्षण दैनंदिन प्रेक्षणों से गुणात्मकतः ( qualitatively ) भिन्न होते हैं। मसलन, ऐसे प्रेक्षण निम्नांकित तरीक़ों से किये जाते हैं : (१) विशेष उपकरणों, औज़ारों व यंत्रों के ज़रिये ; (२) विशेष कार्यक्रम या योजनानुसार, नियमतः पहले से चयनित वस्तुओं पर किये जाते हैं ; (३) वे सख़्ती से परिभाषित लक्ष्य ( aim ) के मुताबिक़ होते हैं, यानी असंबंधित तथ्यों ( facts ) को मात्र जमा करके नहीं, बल्कि ऐसे तथ्यों के संकलन से जिनसे नयी प्राक्कल्पना प्रस्तुत करना या पूर्व प्रस्तुत प्राक्कल्पनाओं की परीक्षा करना संभव हो सके ; (४) प्रेक्षण, नियमतः ऐसी वस्तुओं व घटनाओं का किया जाता है, जो दैनिक जीवन में नहीं पायी जातीं ; और अंतिम (५) प्रेक्षण ऊंची सटीकता ( high accuracy ), सूक्ष्मता ( precision ) और विश्वसनीयता ( reliability ), आदि की आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए। परंतु इस सबके बावजूद, सबसे जटिल तथा सटीक वैज्ञानिक प्रेक्षण भी हमें घटना की गहराई तथा सार ( essence ) तक पहुंचने में सक्षम नहीं बना सकते। क्यों ?

कोई भी प्रेक्षण, चाहे वह सबसे सही उपकरणों से क्यों न किया गया हो, अध्ययनाधीन वस्तु या घटना को बदले या रूपांतरित ( transform ) किये बिना उसे उसकी प्राकृतिक अवस्था ( natural state ) में ही रहने देता है। परंतु किसी भी वस्तु के गहन आंतरिक संयोजनों ( deep inter connections ) को जानने के लिए उसे रूपांतरित करना, उसमें फेर-बदल करना और यह पता लगाना आवश्यक है कि रूपांतरण की प्रक्रिया के दौरान उसका व्यवहार कैसा होता है। इसके लिए उस वस्तु को उसकी आम कड़ियों तथा दशाओं से पृथक करना, उसे दूसरी दशाओं में रखना तथा उसके क्रियाकलाप की व्यवस्था को बदलना होता है ; उसे उसके विभिन्न भागों में विभाजित करना, अन्य वस्तुओं के साथ टकराना तथा अनपेक्षित परिस्थितियों ( unexpected circumstances ) में काम तथा संक्रिया ( operation ) करने के लिए बाध्य करना होता है। यही वैज्ञानिक प्रयोग ( scientific experiment ) की या प्रायोगिक अनुसंधान की विषयवस्तु भी है। फलतः प्रयोग, व्यवहार ( practice ) का एक विशेष वैज्ञानिक रूप ( form ) है। प्रयोग के दौरान किये जानेवाले प्रेक्षण निष्क्रिय ( passive ) नहीं, बल्कि ‘जीवंत चिंतन-मनन’ ( living contemplation ) के रूप में सक्रिय ( active ) होते हैं। चूंकि प्रयोग स्थापित नियमों और पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों यानी एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की पुष्टि या खंड़न करने और नये नियमों व सिद्धांतों को निरूपित करने के लक्ष्यों के पूर्णतः अनुरूप होता है, इसलिए यह वैज्ञानिक संज्ञान और ज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रयोगों को कई रूपों में विभाजित करने का रिवाज है : (१) अन्वेषणात्मक ( exploratory ), इसका मक़सद नयी घटनाओं, नये अनुगुणों या घटनाओं के बीच पहले से अज्ञात संपर्कों का पता लगाना है ; (२) परीक्षणात्मक ( testing or checking ), इसका लक्ष्य प्राक्कल्पना की पुष्टि या खंडन करना और उसकी सटीकता का अनुमान लगाना है ; (३) रचनात्मक ( constructive ), जिसके दौरान ऐसे नये पदार्थों, नयी संरचनाओं या नयी सामग्री की रचना की जाती है जो पहले प्रकृति में विद्यमान नहीं थी ; और (४) नियंत्रणात्मक ( control ), जिसका लक्ष्य माप उपकरणों, यंत्रों और औज़ारों की जांच तथा समंजन ( adjustment ) करना है।

प्रायोगिक क्रियाकलाप के ये सभी रूप अक्सर एक ही प्रयोग में अंतर्गुथित ( interwoven ) होते हैं। मसलन, शुक्र ग्रह तक एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला के प्रक्षेपण से सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत की कई प्रस्थापनाओं की सटीकता की पुष्टि करना ( परीक्षणात्मक प्रयोग ), ग्रह के वायुमंडल में तथा सतह पर नयी घटनाओं की खोज करना संभव हुआ ( अन्वेषणात्मक प्रयोग ) और उस सिलसिले में नितांत नये यंत्रों तथा उपस्करों का निर्माण किया गया ( रचनात्मक प्रयोग ) और संक्रियाशील उपकरणों की विश्वसनीयता का परीक्षण किया गया ( नियंत्रणात्मक प्रयोग )।

आधुनिक विज्ञान का एक विशिष्ट लक्षण यह है कि अब संज्ञान ( cognition ) की एक सामान्य वैज्ञानिक विधि के रूप में प्रयोगों का न केवल प्राकृतिक विज्ञानों तथा इंजीनियरी में, बल्कि सामाजिक जीवन में भी व्यापक अनुप्रयोग ( application ) होता है। वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की दशाओं में संज्ञान तथा वास्तविकता ( reality ) को रूपांतरित करने की प्रायोगिक विधियां उद्योग, कृषि, प्रबंध और प्रशासन के सारे क्षेत्रों में आम ( common ) हो गयी हैं। इसमें हम सामाजिक व्यवहार पर विज्ञान के प्रभाव के एक सर्वाधिक शक्तिशाली कार्यतंत्र ( mechanism ) को देखते हैं। यही इसका स्पष्टीकरण है कि प्रत्येक सचेत व्यक्ति को संज्ञान तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्रयोग की भूमिका ( role ) को समझने की जरूरत क्यों हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 जुलाई 2015

सिद्धांत और प्राक्कल्पना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना - २
( theory and hypothesis - 1 )

वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) के अन्य फ़ायदे ( advantages ) भी हैं। वे हमें जैसे व्यावहारिक क्रियाकलाप के लिए हिदायतें ( instructions ) और विश्वसनीय क़ायदे ( rules ) प्रदान करते हैं और वस्तुगत जगत ( objective world ) की घटनाओं को प्रणालीबद्ध ( systematize ) तथा वर्गीकृत ( classify ) करना संभव बनाते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों में निहित नियमों की इन संभावनाओं का कारण क्या है? बात यह है कि विज्ञान के नियम वस्तुगत यथार्थता ( reality ) के नियमों का परावर्तन ( reflection ) हैं। यथार्थता के नियमों का, चाहे उन्हें मनुष्य ने खोजा हो या न खोजा हो, स्वतंत्र ( independent ) अस्तित्व है। लेकिन हम अपने क्रियाकलाप में उन पर तभी भरोसा कर सकते हैं तथा उन्हें समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जब उनकी खोज कर ली गयी हो, वे ज्ञात हों और विज्ञान के नियमों की शक्ल में निरूपित ( formulated ) कर दिये गये हों।

एक उदाहरण से यह बात अधिक स्पष्ट हो सकती है। हम जानते हैं कि रासायनिक तत्वों ( elements ) का आवर्तता ( periodic ) नियम, विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की भौतिक संरचना के वस्तुगत, आवश्यक आंतरिक संयोजनों ( necessary inter connections ) तथा रासायनिक अनुगुणों ( chemical properties ) को परावर्तित करता है। इस नियम के आधार पर हम किसी भी रासायनिक तत्व के अनुगुणों को स्पष्ट कर सकते हैं, बशर्ते कि हमें तालिका में उसके स्थान की जानकारी हो और हम इस नियम से अभी भी अज्ञात तत्वों के अनुगुणों का पूर्वानुमान ( prediction ) लगा सकते हैं। स्वयं मेंदेयलेव ने कुछ अज्ञात तत्वों के अनुगुणों की भविष्यवाणी की थी और तत्पश्चात इसी के आधार पर कई और पूर्वानुमान लगाये गये, उनकी और कई नये तत्वों की खोज की गई। इसके अलावा, इस वैज्ञानिक सिद्धांत ने नये तत्व के संश्लेषण ( synthesis ) के प्रायोगिक कार्यों के वास्ते जैसी हिदायते भी दीं। हम समझ सकते हैं कि इस मामले में प्रयत्न और त्रुटि ( trial and error ) की उस विधि का इस्तेमाल करना और नई खोज करना असंभव होता, जिसे हज़ारों वर्ष पहले आसान सी, मामूली समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग में लाया जाता था। आधुनिक खोजें केवल गंभीर वैज्ञानिक सिद्धांत के द्वारा ही की जा सकती हैं। क्वांटम यांत्रिकी तथा सापेक्षता के विशेष सिद्धांत के बग़ैर बिजली इंजीनियरी के लिए वांछित, नियंत्रित तापनाभिकीय क्रियाएं ( controlled thermonuclear processes ) करना असंभव है। इसी प्रकार, सैद्धांतिक अणुजैविकी ( molecular biology ) के बिना जीन इंजीनियरी तथा नयी जैविक जातियों ( biological species ) की रचना असंभव है।

इस तरह, वैज्ञानिक सिद्धांत संज्ञान ( cognition ) को सुविधाजनक बनाता है और उसकी रफ़्तार को दसियों और सैकड़ों गुना बढ़ा देता है, हमारे ज्ञान को गहरा व विश्वसनीय बनाता है और हमारे सारे व्यावहारिक क्रियाकलाप की बुनियाद की भांति हमें उस पर निर्माण करने में मदद देता है। यही कारण था कि भौतिकीविद लुडविग वोल्ट्ज़मान साधिकार यह कह सके थे कि, "अच्छे सिद्धांत से ज़्यादा व्यावहारिक और कुछ नहीं है।" वैज्ञानिक सिद्धांतों तथा उनके घटक नियमों की रचना कैसे की जाती है?

प्राक्कल्पना ( hypothesis ), वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों के मूल का सबसे महत्त्वपूर्ण रूप ( form ) है। एक वैज्ञानिक प्राक्कल्पना सामान्य अटकल ( ordinary guess ) से भिन्न होती है और पूर्वापेक्षा ( presuppose ) करती है कि यह तथ्यों ( facts ), प्रेक्षणों ( observations ) व प्रयोगों ( experiments ) पर सुआधारित और पहले से ही प्राप्त, सुस्थापित वैज्ञानिक उपलब्धियों  के अनुरूप हो। प्राक्कल्पनाएं दो तरह से बन सकती हैं। प्रथम, यह ऐसे प्रेक्षणों की कमोबेश काफ़ी बड़ी संख्या के सामान्यीकरण के रूप में बनती है, जिन्हें किसी कारणवश पहले से विद्यमान सिद्धांतों के द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ऐसी प्राक्कल्पनाओं को आनुभविक ( यानी अनुभव आधारित ) सामान्यीकरण ( empirical generalization ) कहा जाता है। सागर के ज्वार-भाटे का हज़ारों बार प्रेक्षण करके वैज्ञानिकों ने बहुत समय पहले यह प्राक्कल्पना पेश की कि यह घटना चंद्रमा की स्थिति ( position ) पर निर्भर होती है। कालांतर में इस प्राक्कल्पना को सटीक गणनाओं व प्रेक्षणों से परखा गया और यह एक वैज्ञानिक नियम बन गयी। द्वितीय, एक प्राक्कल्पना किसी वैज्ञानिक की ऐसी सैद्धांतिक अटकल ( theoretical guess ) या अनुमिती ( surmise ) के रूप में प्रकट होती है, जिसमें अन्य सुस्थापित नियमों और सिद्धांतों का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है।

प्राक्कल्पनाओं की उत्पत्ति और उनमें से सर्वाधिक सत्य ( true ) तथा सटीक ( exact ) की परख तथा चयन वैज्ञानिक प्रेक्षणों और प्रयोगों के ज़रिये होता है। प्रेक्षणों और प्रयोगों से परीक्षित ( checked ) तथा परिपुष्ट ( confirmed ) प्राक्कल्पना को महज़ अटकल नहीं, बल्कि कमोबेश सत्य प्रस्थापना ( preposition ) माना जाने लगता है। वैज्ञानिक इसे विज्ञान का नियम समझने लगते हैं, यानी ऐसा वस्तुगत सत्य ( objective truth ) मानने लगते हैं जो स्वयं अध्ययन की गयी वास्तविकता के स्थायी, आवश्यक संपर्कों ( connections ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। प्राक्कल्पना का, विज्ञान के नियम में संपरिवर्तन ( conversion ) विश्व के वैज्ञानिक संज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण क़दम है। यह संपरिवर्तन व्यवहार ( practice ) के दारा संभव होता है, वैज्ञानिक प्रेक्षण और प्रयोग जिसके अनिवार्य तत्व होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 जुलाई 2015

सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार किया था, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों के अंतर्गत सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १
( theory and hypothesis - 1 )

विज्ञान ( science ) संज्ञान ( cognition ) का उच्चतम रूप है। हमारे सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इस प्रभाव का आधार उद्योग तथा सामाजिक प्रशासन में वैज्ञानिक उपलब्धियों का अनुप्रयोग ( application ) है, जिससे वैज्ञानिक-तकनीकि प्रगति होती है। वैज्ञानिक संज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और लाक्षणिक ( characteristic ) विशेषता क्या है ?

प्राचीन बेबीलोन खगोलविद ( astronomers ) तारों और ग्रहों की संस्थिति ( location ) के बारे में अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने सूरज और चंद्रमा के दर्जनों ग्रहणों ( eclipses ) का प्रेक्षण किया था। किंतु वे उनकी गति के प्रक्षेप पथों ( trajectories ) की गणना नहीं कर पाये, यानी भावी ग्रहणों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाये। कमोबेश यही स्थिति प्राचीन विश्व में हर सभ्यता में थी। यही नहीं, वे यह भी नहीं बता पाये कि आकाशीय पिंड क्यों घूमते हैं और ग्रहण क्यों होते हैं। आज बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी ही नहीं, स्कूली छात्र भी इन प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं और खगोलविद केवल अलग-अलग ग्रहों की गति की अति सटीकता से भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि सारे नक्षत्रों की गति की गणना भी कर सकते हैं और दूरस्थ तारों में जारी भौतिक प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण भी दे सकते हैं।

ऐसा क्योंकर हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) पर भरोसा करता है और ये सिद्धांत पहले से ही विद्यमान घटनाओं का स्पष्टीकरण देने तथा नयी घटनाओं का पूर्वानुमान ( prediction ) लगाने में समर्थ होते हैं। बेबीलोन के खगोलविदों के जमाने में वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं थे और वे स्वयं उनकी रचना करने में अक्षम थे। वैज्ञानिक सिद्धांत क्या होता है ?

एक विकसित वैज्ञानिक सिद्धांत, विज्ञान के अंतर्संबंधित नियमों ( interconnected laws ) की एक प्रणाली ( system ) या श्रृंखला ( chain ) होता है। नियमों को तर्कशास्त्र के नियमों तथा गणितीय रूपांतरणों ( transformations ) के ज़रिये अन्य नियमों से निगमित ( deduce ) किया जा सकता है। इन रूपांतरणों के दारा हमें अंततः प्रकृति की उन घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है जो प्रस्तुत क्षण पर अस्तित्वमान हैं या भविष्य में होंगी। वैज्ञानिक सिद्धांत का एक सरल उदाहरण है केपलर द्वारा निरूपित सूर्य के गिर्द ग्रहों के घूमने का सिद्धांत। इसमें गणित में व्यक्त तीन नियम शामिल हैं। प्रेक्षणों से प्राप्त कुछः निश्चित प्रारंभिक आधार-सामग्री होने पर एक खगोलविद को नये प्रेक्षण करने की ( जैसा कि बेबिलोनियाइयों को करने होते थे ) कोई आवश्यकता नहीं होती। वह इस आधार सामग्री को केपलर के नियमों को व्यक्त करने वाले सूत्रों में रखकर कुछ गणनाएं कर सकता है और सही-सही बता सकता है कि प्रदत्त क्षण पर अमुक-अमुक ग्रह कहां होगा।

जब न्यूटन द्वारा अन्वेषित ( discovered ) गुरुत्व के नियमों को केपलर के नियमों से जोड़ दिया जाता है, तो हमें एक नये, अधिक शक्तिशाली सिद्धांत की प्राप्ति होती है, जिसकी सहायता से हम आकाशीय पिंडों की संस्थिति का स्पष्टीकरण तथा उसकी भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि उनकी गति के कारण, आदि के बारे में भी जान सकते हैं। इसलिए, सिद्धांत भौतिक जगत की घटनाओं के कमोबेश विस्तृत क्षेत्रों को अपने में सम्मिलित ( embrace ) करते हैं, उनके बारे में अत्यंत गहन, विश्वसनीय ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे हम फ़िलहाल जटिल और थका देने वाले प्रेक्षणों का उपयोग किये बिना सारी अपेक्षित सूचना प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 11 जुलाई 2015

संज्ञान में व्यवहार की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम सत्य के ही संदर्भों में संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान में व्यवहार की भूमिका
( the role of practice in knowing )

यह समझने के बाद कि सत्य क्या है, अब यह पूछा जा सकता कि वस्तुगत सत्य ( objective truth ) को कैसे प्रमाणित किया जाता है, उसे कैसे परखा जाता है और उसे किससे निष्कर्षित ( drawn ) किया जाता है तथा सत्य और असत्य ज्ञान ( knowledge ) के बीच कैसे भेद किया जाता है। हालांकि हम यहां पहले ही इस पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं फिर भी एक बार पुनः संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का इस उदेश्य से भी समाहार कर लेते हैं।

मानव क्रियाकलाप का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूप व्यवहार ( practice ) है। यह हमारे परिवेशीय जगत, प्रकृति और समाज को रूपांतरित ( transform ) करने की ओर लक्षित, संवेदनात्मक भौतिक क्रिया ( sensual material activity ) है और संज्ञान की प्रक्रिया सहित सामाजिक व बौद्धिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों ( forms ) का आधार है। फलतः व्यवहार में केवल श्रम ( labour ) की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि समाज को रूपांतरित करने के जनगण के सारे कार्यकलाप भी शामिल हैं। हम व्यवहार को मुख्यतः इस दृष्टिकोण से तो समझते ही हैं कि यह मानव चिंतन और सामाजिक क्रियाकलाप की क्षमता के विकास तथा परिष्करण ( perfecting ) को कैसे प्रभावित करता है। व्यवहार का दूसरा पहलू ( aspect ) यह है कि संज्ञानात्मक ( cognitive ) क्रियाकलाप में व्यवहार की बुनियादी ( fundamental ) भूमिका होती है, यह व्यवहार ही है जो इस क्रियाकलाप को संभव बनाता है और सत्य ज्ञान को असत्य ज्ञान से विभेदित ( distinguish ) करता है

मनुष्य बाह्य जगत का महज़ प्रेक्षण ( observation ) या चिंतन-मनन ( contemplation ) मात्र नहीं करता, बल्कि अपनी जीवन क्रिया के, और सर्वोपरि श्रम की प्रक्रिया के दौरान उसे परिवर्तित तथा पुनर्निर्मित ( remake ) करता है। इसी प्रक्रिया में, समाज सहित भौतिक जगत के सारे अनुगुणों ( properties ) और संयोजनों ( connections ) का गहनतम ज्ञान प्राप्त होता है। अगर मनुष्य केवल चिंतन-मनन तथा निष्क्रिय प्रेक्षण तक सीमित रहता, तो यह ज्ञान मानव संज्ञान के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होता। चूंकि मनुष्य का व्यवहार सतत गतिमान, परिवर्तनशील तथा निरंतर विकासमान है, इसलिए व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्राप्त हमारा ज्ञान अधिक जटिल, सटीक ( exact ) और विकसित होता जाता है। फलतः व्यवहार ज्ञान का स्रोत ( source ) मात्र नहीं है, बल्कि उसके विकास और परिष्करण का आधार भी है

पिछली प्रविष्टियों में हम भली-भांति देख समझ चुके हैं कि वस्तुगत जगत के संवेदनात्मक बिंबों ( sense images ) की रचना ख़ुद ही, काफ़ी हद तक, मनुष्य के व्यावहारिक क्रियाकलाप पर और सारी संस्कृति पर निर्भर होती है। इस तरह व्यवहार, संज्ञान की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है और संवेदनात्मक ( sensory ) और अनुभवात्मक ( empirical ) ज्ञान के बनने के स्तरों पर प्रभाव डालने लगता है। संकल्पनाओं ( concepts ) और निर्णयों ( judgments ) की रचना पर तो इसका प्रभाव और भी स्पष्ट हो जाता है। हर मानसिक ( mental ) या बौद्धिक ( intellectual ) क्रिया, भौतिक वस्तुओं के साथ किये जानेवाले क्रियाकलाप यानी व्यवहार के प्रभावांतर्गत ही रूपायित ( shaped ) और विकसित होती है। जब संकल्पनाएं ( अपकर्षण abstraction ) तथा उनमें निहित कथनों ( statements ) की रचना प्रक्रिया पूरी हो जाती है और हमें यह फ़ैसला करना होता है कि कौनसे कथन सत्य हैं और कौनसा असत्य, तो हम फिर व्यवहार का सहारा लेते हैं, जो इस बार हमारे ज्ञान की सत्यता को परखने के साधन, यानी सत्य की कसौटी ( criterion of truth ) के रूप में काम करता है।

व्यवहार, क्रियाकलाप का विशिष्ट मानवीय ( human ) रूप है। जानवरों के सबसे ज़्यादा जटिल क्रियाकलाप भी व्यवहार नहीं माने जा सकते, क्योंकि व्यवहार का मूलाधार श्रम है। यही वजह है कि जानवरों को केवल सतही वस्तु-उन्मुख संयोजनों ( object-oriented connections ) की समझ ही उपलब्ध है, जबकि गहन संयोजनों, यानी वस्तुगत नियमों की समझ उन्हें उपलब्ध नहीं है। हम जानते हैं कि चींटियों का क्रियाकलाप अत्यंत जटिल होता है। ख़ास तौर पर वे अन्य कीटों ( एफ़िड़ों aphides ) की प्रतिरक्षा करती हैं और पालती भी हैं। इन कीटों को कभी-कभी ‘चींटियों की गाय’ भी कहा जाता है। वे इन्हें खिलाती-पिलाती हैं और इनके द्वारा स्रावित ( excreted ) पोषक मधु का उपयोग करती हैं। किंतु करोड़ों वर्षों की इस ‘बिरादरी’ ( community ) में, जिसे जैवसहचारिता ( biocenosis ) कहते हैं, चींटियों ने एफ़िड़ों की एक भी अधिक उत्पादक क़िस्म का विकास नहीं किया।

वहीं मनुष्यों को, जिन्होंने खेतीबाड़ी तथा पशुपालन का काम कुछ ही हज़ार साल पहले शुरू किया था, अपने सक्रिय व्यावहारिक क्रियाकलाप, प्रयत्न एवं त्रुटि ( trial and error ) की विधियों और अनेक बार पुनरावर्तित प्रयोगों ( repeated experiments ) के ज़रिये इस बात पर यक़ीन हो गया कि घरेलू जानवरों और पौधों को प्रभावित किया जा सकता है। उन्होंने फ़सलें उगाने तथा मवेशी पालने के क़ायदों की खोज ( discover ) तथा उनक निरूपण ( formulation ) किया और इस तरह से नितांत नयी नस्लों व क़िस्मों का विकास किया, जो प्राकृतिक जीवन में विद्यमान नहीं हैं। इस प्रकार, कृषि के क्षेत्र में व्यवहार से नये वस्तुगत सत्यों की खोज, उनकी पुष्टि तथा उपयोग हुआ।

ठोस पिंडों तथा तरलों ( मसलन, पानी ) की विशेषताओं को चाहे कितनी ही बार क्यों न देखा गया हो, उनके निष्क्रिय प्रेक्षण से यह कहना संभव नहीं हो सकता था कि पानी में डुबायी हुई वस्तु के भार में क्या परिवर्तन होते हैं। पानी में सोद्देश्य डुबाये हुए या संयोगवश डूबे हुए पिंडों के साथ व्यावहारिक क्रियाकलाप में कई बार वास्ता पड़ने पर काफ़ी समय बाद लोगों ने यह खोज की कि पानी में डूबी वस्तु का भार ठीक उतना ही कम हो जाता है, जितने पनी को वे विस्थापित ( displaced ) करती हैं ( आर्कमिड़ीज़ का नियम )। बाद में इस खोज को जहाज़ निर्माण के व्यवहार में भारी सफलता के साथ इस्तेमाल किया गया।

इस प्रकार, यह एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि व्यवहार, प्रकृति और समाज के बारे में ज्ञान का स्रोत, ज्ञान के विकास का आधार और प्राप्त ज्ञान की सत्यता की कसौटी होता है



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 23 मई 2015

सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )
what is truth - 5 ( dialectics of truth )

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य ( relative truth ) हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।

पूछा जा सकता है कि इन या उन वस्तुओं के बारे में पूर्ण और सर्वांगीण ( exhaustive ) जानकारी पा लेने के बाद क्या यह प्रक्रिया ख़त्म हो सकती है? यदि हम यह याद रखें कि भौतिक विश्व की बात तो दूर, उसके अलग-अलग खण्ड तक असंख्य गुणों, संबंधों और संपर्कों की समग्रता ( totality ) हैं, तो स्पष्ट हो जायेगा कि किसी भी परिघटना ( phenomena ) का पूर्ण, अंतिम और सर्वांगीण ज्ञान नहीं पाया जा सकता है। यह इसलिए भी संभव नहीं है कि परिवेशी परिघटनाएं स्वयं भी बढ़ती और बदलती रहती हैं और इस प्रक्रिया में उनमें नये गुण, नयी विशेषताएं और नये संबंध प्रकट होते रहते हैं। हम जीव अवयवियों को लें, जो अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करनेवाली अरबों कोशिकाओं से बने होते हैं, या आर्थिक प्रणालियों को , जिनकी परिधि में हज़ारों उद्यम, करोड़ों कामगार, तरह-तरह के माल बनानेवाले लाखों तरह के यंत्र और उपकरण आते हैं, वे सब इतने जटिल ( complex ) हैं कि ऐसी किसी भी परिघटना या वस्तु के बारे में पूर्ण और निःशेष ( thorough ) ज्ञान प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।

पूर्ण, निःशेष ज्ञान, जिसे निरपेक्ष सत्य कहते हैं, तभी पाया जा सकता है, जब परिघटना अत्यंत सामान्य हो और उसमें अपेक्षाकृत थोड़े ही तत्व तथा संबंध हों। ऐसी परिघटनाएं कभी-कभी, उदाहरण के लिए, गणित में मिलती हैं, किंतु यहां भी किसी जानकारी को निरपेक्ष सत्य घोषित कर सकने के लिए अत्यधिक अमूर्तन ( abstraction ) और परिसीमन ( limitation ) की ज़रूरत पड़ती है।

शंकाएं उठायी जा सकती हैं : क्या निःशेष सत्य की अलभ्यता ( unattainability ) को स्वीकार करने का अर्थ उसकी वस्तुगतता का निषेध ( negation ) नहीं है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि विश्व की संज्ञेयता से इंकार करनेवाले अज्ञेयवादी ( agnostic ) सही थे? ऐसी शंकाओं को युक्तिसंगत ( rational ) शायद ही कहा जा सकता है। यदि संज्ञान को द्वंद्वात्मक ( dialectical ) ढंग से समझा जाये और यह माना जाये कि बाह्य विश्व विषयक हमारा ज्ञान, अनिवार्यतः परिणति पर पहुंचने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरन्तर बढ़नेवाली प्रक्रिया है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि विश्व संज्ञेय ( knowable ) है और वह भी इस अर्थ में नहीं कि हम एक ही बार में और सदा के लिए उसका संज्ञान कर सकते हैं, बल्कि इस अर्थ में कि हम ज्ञात सापेक्ष सत्यों को व्यावहारिक कार्यकलाप की सहायता से जांचते और सुधारते हुए निरन्तर बढ़ाते और व्यापक बनाते जा सकते हैं।

यह दावा करना ग़लत है कि सत्य के तीन प्रकार है, अर्थात वस्तुगत, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य। वास्तव में, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) के ही विभिन्न स्तर या रूप ( forms ) हैं। हमारा ज्ञान हमेशा सापेक्ष होता है, क्योंकि यह समाज, प्रविधि ( technique ), विज्ञान की अवस्था, आदि के विकास के स्तर पर निर्भर होता है। हमारे ज्ञान का स्तर जितना ऊंचा होता है, हम निरपेक्ष सत्य के उतने ही निकट होते हैं।

फलतः ज्ञान के क्रमविकास का नियम सापेक्ष से निरपेक्ष की ओर उसकी प्रगति ( progress ) का ही नियम है। किंतु यह प्रक्रिया अंतहीन हो सकती है, क्योंकि हम ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर अपने परिवेशीय जगत में नये पहलुओं ( aspects ) तथा अनुगुणों ( properties ) की खोज करते हैं और उसके बारे में पूर्णतर तथा अधिक सटीक ज्ञान की रचना करते हैं। सत्य के एक सापेक्ष रूप से दूसरे सापेक्ष रूप में प्रविष्ट होने की यह सतत ( continuous ) प्रक्रिया, संज्ञान की प्रक्रिया में द्वंद्ववाद ( dialectics ) की सबसे महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। इस तरह, प्रत्येक सापेक्ष सत्य में निरपेक्ष सत्य का एक अंश होता है। इसके विपरीत, निरपेक्ष सत्य, सापेक्ष सत्यों के एक असीम अनुक्रम ( succession ) की सीमा है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 16 मई 2015

सत्य क्या है - ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )
what is truth - 4 ( relative and absolute truth )

ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर हमारा ज्ञान, सीमित और सापेक्ष ( relative ) होता है। इस सापेक्ष ज्ञान को आगे चलकर अधिक विशिष्ट ( specific ) तथा अधिक सही बनाया जा सकता है। प्राचीन चिंतक अक्सर घटनाओं या प्रक्रियाओं के मात्र बाहरी पक्ष का प्रेक्षण करते हुए उनकी जटिल आंतरिक संरचना के बारे में अतीव काल्पनिक अटकलें लगा दिया करते थे, परंतु फिर भी उनका ज्ञान, विज्ञान के लिए आगे बढ़ने का प्राथमिक आधार ही था। जब व्यवहार और विज्ञान, दोनों ही आगे बढ़ते हैं, तो लोग धीरे-धीरे सत्य को जानने लगते हैं। मसलन, देमोक्रितस ने महज अटकल लगायी थी कि दुनिया परमणुओं से बनी है, किंतु भौतिकीविद नील्स बोर ने परमाणु की संरचना की वस्तुतः खोज की थी।

हम कह सकते हैं कि मानव संज्ञान के विकास के हर चरण में वस्तुगत सत्य ( objective truth ) भी एक सीढ़ी ऊपर उठा और हमारे ज्ञान में से आत्मगत ( subjective ) तत्वों को निष्कासित करता गया। वस्तुगत सत्य के विकास की ये सीढ़ियां सापेक्ष सत्य ( या वस्तुगत सत्य के सापेक्ष रूप ) कहलाती हैं। एक प्रस्थापना के रूप में कहें तो, वस्तुगत सत्य की अभिव्यक्ति के रूप को, जो ठोस ऐतिहासिक दशाओं पर निर्भर होता है और ज्ञान के प्रदत्त स्तर पर प्राप्त उसकी सटीकता, परिशुद्धता और पूर्णता की कोटि को दर्शाता है, सापेक्ष सत्य ( relative truth ) कहते हैं

अतः निरंतर विकास करते और जटिल बनते व्यावहारिक कार्यकलाप के प्रभावस्वरूप, वस्तुगत सत्य भी निरंतर विकास करता जाता है और अपने किसी भी रूप में वह अंतिम और पूर्ण नहीं माना जा सकता। वास्तव में, वह इस या उस वस्तु से संबंधित सापेक्ष सत्यों का सिलसिला ही है, और वह भी ऐसे सापेक्ष सत्यों का कि उनमें से हर एक अपने पूर्ववर्ती का व्यापकीकरण और गहनीकरण होता है। इस प्रक्रिया को संज्ञान का द्वंद्व कहा जाता है। इस तरह, विज्ञान सहित मानव ज्ञान का सारा विकास कुछ सापेक्ष सत्यों का ऐसे सापेक्ष सत्यों के द्वारा अनवरत अनुक्रमण ( constant succession ) है, जो वस्तुगत सत्य को अधिक पूर्णता और सटीकता ( exactness ) से व्यक्त करते हैं। संज्ञान की प्रक्रिया, वस्तुगत सत्य की अधिक पूर्ण और अधिक सटीक जानकारी है।

किसी घटना के सर्वथा पूर्ण, सटीक, सर्वतोमुखी ( all-round ), सांगोपांग ( comprehensive ), सर्वांगपूर्ण ( exhaustive ) ज्ञान को निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) कहते हैं। अक्सर पूछा जाता है कि क्या हम निरपेक्ष सत्य को प्राप्त तथा उसका निरूपण ( formulate ) कर सकते हैं ? अज्ञेयवादी ( agnostic ) कहते हैं कि नहीं। प्रमाण के रूप में वे इस तथ्य का हवाला देते हैं कि हमारा सरोकार केवल सापेक्ष सत्यों से है और, वे आगे दलील देते हैं, आगे चलकर यह पता चलता है कि प्रत्येक सापेक्ष सत्य सटीक और पूर्ण नहीं है, जैसा कि सौर मंडल के उदाहरण में। फलतः, पूर्ण, सांगोपांग ज्ञान अलभ्य ( unattainable ) है। अधिभूतवादी ( metaphysicians ) यह सोचते हैं कि निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और हमारे क्रियाकलाप के किसी भी क्षण पर सदा के लिए जाना और व्यक्त किया जा सकता है।

अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ, बहुत सरल मामलों में निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मसलन, क्या यह कथन कि ‘दिल्ली भारत की राजधानी है’ निरपेक्ष सत्य नहीं है ? परंतु क्या यह कथन दिल्ली की आबादी, उसके क्षेत्रफल और इमारतों की संख्या के बारे में सर्वांगपूर्ण ज्ञान देता है, अथवा क्या यह बताता है कि यह भारत की राजधानी कब बना, आदि ? यहां तक कि निश्चित तारीख़ के लिए दिये जानेवाले आंकड़े एक या दो वर्ष में सदोष हो जायेंगे। इस भांति हम देखते हैं कि पहली नज़र में जो बात निरपेक्ष सत्य मालूम पड़ती है, वह वास्तव में सापेक्ष सत्य होती है, क्योंकि उसमें दिल्ली के बारे में सर्वांगपूर्ण तथा सर्वदा के लिए सत्य ज्ञान नहीं होता है।

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 10 मई 2015

सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं वस्तुगत सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )
what is truth - 3 ( objective truth )

आधुनिक विज्ञान जो जानकारियां हासिल कर चुका है, उनमें से अधिसंख्य ऐसी हैं कि उनका स्वरूप न केवल अध्ययन की जानेवाली वस्तु ( object ) पर, अपितु उन औज़ारों, यंत्रों और उपकरणों पर भी निर्भर होता है, जिनके माध्यम से अनुसंधानकर्ता और वस्तु के बीच अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) होती है। संज्ञान ( cognition ) के इन सभी साधनों का यथार्थ अस्तित्व ( real existence ) है, किंतु उसकी रचना लोगों के द्वारा की जाती है और इसलिए कुछ हद तक वे आत्मगत कारक ( subjective factors ) पर निर्भर होते हैं। दूसरे शब्दों में, जिन संकल्पनाओं ( concepts ), कथनों ( statements ) और अनुमानों ( inference ) के द्वारा हम हम बाह्य जगत के, और स्वयं अपने बारे में ज्ञान को व्यक्त करते हैं, वे इस जगत का ही परावर्तन ( reflection ) नहीं, बल्कि हमारे क्रियाकलाप ( activity ) का उत्पाद ( product ) भी हैं।

फलतः, ज्ञान में कुछ ऐसी चीज़ है, जो उस पर काम करनेवाले व्यक्ति पर निर्भर होती है, यानी संज्ञान के विषयी ( subject ) पर। विज्ञान का लक्ष्य यही है कि हमारे ज्ञान में उन तत्वों का अनुपात निरंतर बढ़ता जाये, जो अध्ययनाधीन वस्तुओं की नियमसंगतियों, गुणों और संबधों को प्रतिबिंबित करते हैं और जो किसी व्यक्ति या मानवजाति पर निर्भर नहीं होते। अतएव कहा जा सकता है कि जहां तक हमारा ज्ञान वस्तुगत जगत ( objective world ) को परावर्तित करता है, उसमें एक ऐसी अंतर्वस्तु ( content ) भी होती है, जो न तो मनुष्य पर निर्भर है, न ही सारी मानवजाति पर और फलतः केवल वस्तुगत जगत पर ही निर्भर होती है। हमारे विचारों और ज्ञान की इस अंतर्वस्तु को, जो न तो एक अलग व्यक्ति पर निर्भर होती है, न ही सारी मानवजाति पर, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) कहते हैं

यह कथन कि सामान्य दाब पर, १०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक गर्म करने पर पानी भाप में परिणत हो जाता है, एक वस्तुगत सत्य है। हालंकि यह तथ्य कि हम इस तापमान को फ़ारेनहाइट या रियोमूर थर्मामीटर से, या सेल्सियस से नापते हैं, मनुष्य पर निर्भर करता है, किंतु इस विशिष्ट तापमान पर स्वयं पानी का उबलना और भाप में तब्दील होना न मनुष्य पर निर्भर है न मानवजाति पर।

सत्य ज्ञान, स्वयं वस्तुगत जगत की भांति ही द्वंद्ववाद ( dialectics ) के नियमों के अनुसार विकसित होता है। मध्ययुग में लोग यह समझते थे कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। वह बात सत्य थी या असत्य ? मनुष्य आकाशीय पिंडों की गति को एक ही ‘प्रेक्षण स्थल’, यानी पृथ्वी से देखता था ; इस तथ्य ने उसे इस असत्य निष्कर्ष पर पहुंचाया कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। इसमें संज्ञान के विषयी पर हमारे ज्ञान की निर्भरता को देखा जा सकता है, किंतु इस कथन में एक ऐसी अंतर्वस्तु थी, जो मनुष्य या मानवजाति पर निर्भर नहीं थी, वह यह तथ्य कि सौर मंडल के आकाशीय पिंड घूमते तो हैं। उस तथ्य में वस्तुगत सत्य का बीज था।

कोपेर्निकस के सिद्धांत ने इस बात की पुष्टि की कि सूर्य हमारे ग्रहमंडल का केन्द्र है और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह एककेंद्रिक वृत्तों में उसके गिर्द चक्कर काटते हैं। इस सिद्धांत में वस्तुगत अंतर्वस्तु का अंश, पूर्ववर्ती दॄष्टिकोणों की तुलना में बहुत अधिक था, लेकिन वस्तुगत यथार्थता के पूर्णतः अनुरूप क़तई नहीं था, क्योंकि इसके लिए आवश्यक खगोलीय प्रेक्षणों का अभाव था। अपने गुरू टाइको ब्राहे के प्रेक्षणों पर भरोसा करते हुए केपलर ने यह साबित किया कि ग्रह सूर्य के चारों तरफ़ वृत्तों में नहीं, बल्कि दीर्घ वृत्तों ( ellipses ) में चक्कर काटते हैं। यह पहले से कहीं अधिक सत्य ज्ञान था। आधुनिक खगोलविद्या ( astronomy ) में ग्रहों के प्रक्षेप पथों तथा घूर्णन के नियमों की गणना और भी अधिक सटीकता से की गयी है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुगत सत्य इतिहासानुसार विकसित होता है। हर नयी खोज के बाद यह पूर्णतर होता जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 2 मई 2015

सत्य क्या है - २ ( सत्य की निर्भरता )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - २ ( सत्य की निर्भरता )
what is truth - 2 ( dependence of truth )

सत्य का प्रश्न एक वैज्ञानिक द्वारा अपनाये जानेवाले सामान्य दार्शनिक दृष्टिकोण से, दर्शन के मूल प्रश्न का उत्तर देने के उसके तरीक़े से घनिष्ठता के साथ जुड़ा है। सत्य के मामले में विज्ञान और धर्म की परस्पर विरोधी प्रकृति अत्यंत स्पष्टता से प्रकट होती है। विज्ञान के लिए सत्य की खोज एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण काम है, जबकि धर्म आस्था की ओर रुख करता है और कभी-कभी आस्था को खुलेआम सत्य के मुक़ाबले में खड़ा कर देता है।

प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) और अज्ञेयवाद ( agnosticism ) की सारी की सारी क़िस्में, सत्य को मानने से इनकार नहीं करती, किंतु वे इसकी व्याख्या आत्मगत ( subjective ) ढंग से करती हैं, क्योंकि वे इसे, परिवेशीय वास्तविक जगत के अस्तित्व की मान्यता के साथ, तथा सही-सही ढंग से उसका संज्ञान कर सकने व अपनी चेतना में उसे परावर्तित करने की मनुष्य की क्षमता के साथ, नहीं जोड़ती हैं। कुछ प्रत्ययवादी सत्य को लोगों के बीच संपन्न एक समझौते का परिणाम मानते हैं। कभी-कभी जो उपयोगी होता है उसी को सत्य घोषित कर दिया जाता है, परंतु जो उपयोगी है, वह सब सत्य नहीं होता है।

केवल द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) ही ने, जिसने संज्ञान के सिद्धांत में क्रांति कर दी थी, सत्य का, उसके आधारों और उसकी कसौटियों ( criterion ) का, एक मूलतः नया सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत क्या है?

संज्ञान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें आत्मगत चिंतनात्मक कार्य और क्रियाविधियां, वस्तुगत ( objective ) तथा व्यावहारिक कार्यों तथा कार्यकलाप के रूपों के साथ घनिष्ठता से अंतर्संबंधित ( interconnected ) होती हैं। इस प्रक्रिया की उपज के रूप में प्राप्त ज्ञान ( knowledge ) पर, इन दोनों परस्परसंबंधित पहलुओं ( aspects ) की छाप होती है। इसलिए यह पता करना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हमारे ज्ञान में क्या वस्तुगत कारकों पर निर्भर है और क्या आत्मगत कारकों पर। विज्ञान के इतिहास पर दृष्टिपात करके हम जान सकते हैं कि, मसलन चन्द्रमा के बारे में, हमारा ज्ञान कैसे विकसित हुआ है।

यदि हम आरंभिक, अति प्राचीन काल से चले आ रहे ज्ञान का गहन विश्लेषण करें, तो पायेंगे कि उनमें मानों दो स्तर हैं। इस ज्ञान में से कुछ तो मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों ( sense organs ) की विशेषताओं, प्रेक्षक ( observer ) की स्थिति, प्रेक्षण करने की उसकी योग्यता, मेहनत तथा ध्यान की मात्रा, आदि पर निर्भर होता है। मगर इसी ज्ञान का एक दूसरा स्तर भी है, जो न तो अलग व्यक्ति पर और न सारी मानवजाति पर ही निर्भर होता है। हम जो चन्द्रमा की विभिन्न ऋतुओं में और महिने के विभिन्न दिनों मे कभी प्रकाशमान चक्र और कभी हंसिये जैसा देखते हैं, वह आंशिकतः प्रेक्षक की स्थिति और आंशिकतः स्वयं चन्द्रमा और सूर्य की स्थिति से निर्धारित होता है। किंतु जहां तक चन्द्रमा के पृथ्वी के गिर्द घूमने या उसकी मिट्टी की रासायनिक संरचना का संबंध है, तो वे प्रेक्षक की स्थिति पर निर्भर नहीं होते।

ज्यों-ज्यों हमारे प्रेक्षण साधन परिष्कृत ( refined ) होते हैं और प्रकाशीय दूरदर्शियों का स्थान रेडियो दूरदर्शी, रेडार, लेज़र यंत्र और अंतरिक्षीय प्रयोगशालाएं लेती हैं, त्यों-त्यों चन्द्रमा के बारे में हमारा ज्ञान अधिकाधिक बहुविध बनता जाता है। इसके साथ ही हमारे ज्ञान में उस स्तर और उस जानकारी का अनुपात भी बढ़ता जाता है, जो व्यक्तियों और मानवजाति पर निर्भर नहीं होता, बल्कि जिसका निर्धारण वस्तुगत कारकों द्वारा किया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

सत्य क्या है - १ ( सत्य की संकल्पना )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - १ ( सत्य की संकल्पना )
what is truth - 1 ( concept of the truth )

संज्ञान की प्रक्रिया में हम विलगित संकल्पनाओं ( isolated concepts ) का नहीं, बल्कि अंतर्संबंधित ( interconnected ) संकल्पनाओं का उपयोग करते हैं। कथनों ( statements ) तथा अनुमानों ( inferences ) के ज़रिये यह अंतर्संबंध कायम किया जाता है। उनके द्वारा हम अपने इर्दगिर्द दुनिया में अनुगुणों ( properties ), संबंधों या अंतर्क्रियाओं के बारे में किसी चीज़ की अभिपुष्टि ( assert ) या अस्वीकरण ( deny ) करते हैं।

अलग-अलग संकल्पनाएं ‘घर’, ‘संस्थिति’, ‘पहाड़ी’ इस बात की बहुत कम जानकारी देते हैं कि हमारा घर कहां हैं। इसके विपरीत, यह पद कि ‘घर पहाड़ी पर है’ हमें आवश्यक सूचना देता है। एक अनुमान या निष्कर्ष ( conclusion ), कथनों की एक श्रृंखला है जो ऐसे निर्मित होती है कि उनमें से एक कथन, तर्कणा के नियमों के अनुसार, दूसरे कथन का अनुगामी ( follower ) होता है। मसलन, आवश्यक पता ज्ञात होने पर हम निम्नांकित अनुमान की रचना कर सकते हैं : ‘यदि हमारी जरूरत का घर पहाड़ी पर है, तो हमें पहाड़ी पर चढ़ना पड़ेगा।’

लेकिन जिन कथनों तथा अनुमानों से कोई एक व्यक्ति बाह्य जगत के बारे में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान सूचना को निरुपित ( formulate ) करता है, वे भी इस जगत को सही ढंग से भी परावर्तित ( reflect ) कर सकते हैं और ग़लत ढंग से भी। बाह्य जगत को सही ढंग से तथा ग़लत ढंग से परावर्तित करनेवाले कथनों के बीच भेद करने के लिए हम विशेष संकल्पनाओं का उपयोग करते हैं - ‘सत्य’ ( truth ) और ‘असत्य’ ( falsehood )। संज्ञान का लक्ष्य, सत्य की उपलब्धि है और उसके आधार पर मानवजाति के सम्मुख मौज़ूद नयी समस्याओं को हल करना है

‘सत्य’ क्या है? यह बहुत जटिल प्रश्न है और संज्ञान के सिद्धांत का एक केन्द्रीय प्रश्न है। प्रत्ययवादी/भाववादी ( idealistic ) तथा भौतिकवादी ( materialistic ) दर्शन इसका भिन्न-भिन्न ढंग से उत्तर देते हैं।

सत्य की संकल्पना अनेकार्थक है और बहुधा विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त की जाती है। अपने दार्शिनिक अर्थ में यह शब्द, ज्ञान की अंतर्वस्तु तथा बाह्य जगत के बीच एक निश्चित संबंध ( connection ) को व्यक्त करता है। ‘सत्य’ शब्द चिंतन में वास्तविकता ( reality ) के शुद्ध, प्रामाणिक ( authentic ) परावर्तन को द्योतित करता है। सत्यता स्वयं वस्तुओं का अपना अनुगुण नहीं है, बल्कि मनुष्य के मन में उनका प्रामाणिक परावर्तन हैमार्क्स के विचार में सत्य का ज्ञान वस्तुओं, घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को उस रूप में समझना है, जिस रूप में वे वास्तव में विद्यमान हैं।

प्राचीन दार्शनिक सत्य को सही ज्ञान के साथ जोड़ते थे, जो यथार्थता ( reality ) के अनुरूप ( corresponding ) होता था। इसका विलोम था भ्रम या मिथ्या ज्ञान, जो यथार्थता को विरूपित ( deform ) करता है। अरस्तु ऐसे ज्ञान को सत्य मानते थे, जिसमें बाह्य जगत से संबंधित निर्णय सही हैं। बाद में अनेक दार्शनिक इस बात पर सहमत हुए कि सत्य, यथार्थता के साथ चिंतन की अनुरूपता, और जो हम जानते हैं उसके साथ ज्ञान की अनुरूपता है। किंतु यह निरुपण प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दोनों ही करते हैं, जबकि दर्शन के बुनियादी प्रश्न का भिन्न-भिन्न उत्तर देते हुए वे चिंतन तथा यथार्थता की अनुरूपता को भिन्न-भिन्न ढंग से समझते और व्याख्यायित करते हैं।

मसलन, वस्तुगत प्रत्ययवादी ( objective idealist ) अफ़लातून सत्य को शाश्वत ( eternal ), अपरिवर्तनीय प्रत्ययों ( ideas ) के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता समझते थे। उनके दृष्टिकोण से भौतिक विश्व का ज्ञान सत्य नहीं हो सकता है, क्योंकि भौतिक विश्व अस्थिर और परिवर्तनशील है, और सत्य किसी शाश्वत तथा अपरिवर्तनशील चीज़ से ही संबंधित हो सकता है। वहीं, एक और वस्तुगत प्रत्ययवादी हेगेल सत्य को परम आत्मा ( absolute spirit ) के, निरपेक्ष प्रत्यय ( absolute idea ) के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता मानते थे। उनकी राय में, मानव ज्ञान का लक्ष्य निरपेक्ष प्रत्यय के साथ पूर्ण संगतता ( coincidence ) है और सत्य इसी संगतता में निहित है।

मार्क्स से पहले के अधिकांश भौतिकवादी यह समझते थे कि सत्य, वस्तुगत भौतिक जगत के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता है। लेकिन मुख्य कठिनाई ठीक इसी की वजह से पैदा हुई, यानी इस बात से कि इस अनुरूपता को कैसे परखा जाये, कैसे प्रमाणित ( establish ) किया जाये ? यदि इसका साधन, माप या कसौटी, संवेदन ( sensation ) हैं, तो कठिनाइयां और भी ज़्यादा होतीं क्योंकि संवेदन स्वयं भ्रामक ( deceptive ) हो सकता है। यदि सत्य की कसौटी स्वयं मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) में निहित है, तो वह देर-सवेर प्रत्ययवाद पर पहुंचा देती है ( देखें - ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता )।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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