रविवार, 3 सितंबर 2017

प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास
( development of society as a natural-historical process )

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज के विकास का सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर देता है कि मानव क्रियाकलाप के दोनों पक्षों, भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), में से कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।

प्रकृति में जारी प्रक्रियाओं में से कोई भी मनुष्य के संकल्प ( will ) व उसकी चेतना पर निर्भर नहीं होती। वे सब वस्तुगत ( objective ) या प्राकृतिक होती हैं। अतः, प्रकृति की घटनाओं का विनियमन ( govern ) करनेवाले नियम वस्तुगत हैं। क्या समाज के विकास के वस्तुगत नियम, यानी ऐसे कुछ नियम हो सकते हैं, जो जनगण की चेतना पर निर्भर नहीं होते? याद रहे कि लोगों के क्रियाकलाप में दो पक्ष होते हैं - भौतिक और प्रत्ययिक। इतिहास की भौतिकवादी समझ इस प्रश्न का स्वीकारात्मक उत्तर देती है। इतिहास के अनुभव का सामान्यीकरण ( generalisation ) करते हुए यह समझ इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सामाजिक विकास के नियम उतने ही वस्तुगत ढंग से और अनिवार्यतः काम करते हैं, जितने कि प्रकृति के नियम, मात्र बुनियादी अंतर यह है कि वे लोगों के क्रियाकलाप के ज़रिये संक्रिया ( operate ) करते हैं। यही कारण है कि समाज के विकास को एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया कहा जाता है।

यह हो सकता है कि लोग इससे अवगत ( aware ) न हो कि उनके क्रियाकलाप, उनके संकल्प तथा इरादों से परे अंततः वस्तुगत सामाजिक नियमों से संचालित होते हैं। ऐसे मामलों में, वे कहते हैं कि समाज स्वतःस्फूर्त ढंग से ( spontaneously ) विकसित होता है। स्वतःस्फूर्तता का यह मतलब नहीं है कि लोग नितांत अचेतन ढंग से ( unconsciously ) काम करते हैं। सामान्य, स्वस्थ लोगों के लिए ऐसा करना बिल्कुल असंभव है। स्वतःस्फूर्त अवस्था में लोगों को केवल अपने सीधे व्यक्तिगत तथा समूहगत लक्ष्यों की जानकारी होती है और वे उन्हीं को निरूपित करते हैं तथा उन्हें हासिल करने के लिए ऐसे साधनों का चयन करते हैं, जो सामाजिक विकास के नियमों पर निर्भर नहीं होते। इस मामले में ऐसा भी हो सकता है कि उनके क्रियाकलाप के परिणाम निश्चित लक्ष्यों के अनुरूप ( correspond ) न हों। जब लोग सामाजिक विकास के वास्तविक, सच्चे नियमों के प्रति सचेत ( conscious ) हों, तो उनके क्रियाकलाप समुचित अर्थों में सचेत होते हैं। सचेत सामाजिक क्रियाकलाप की अवस्था में ही उसके परिणाम लक्ष्यों के अधिकाधिक अनुरूप होते हैं और वे उन्हें प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि इस मामले में स्वयं लक्ष्यों को वस्तुगत ऐतिहासिक नियमितताओं पर समुचित ध्यान देकर प्रस्तुत व निरूपित किया जाता है।

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास की संकल्पना ( concept ) मानव क्रियाकलाप के भौतिक पक्ष की निर्धारक भूमिका की मान्यता ( recognition ) पर आधारित है। साथ ही, यह इस तथ्य को भी ध्यान में रखती है कि इस क्रियाकलाप का आत्मिक/प्रत्ययिक पक्ष महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका निभाता है। यह भौतिक पक्ष पर सुस्पष्ट प्रभाव डाल सकता है, हालांकि यह प्रभाव स्वयं लोगों की जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से निर्धारित एवं सीमित होता है। प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के इन दो पक्षों की अंतर्क्रिया ( interaction ) तथा पारस्परिक प्रभाव को अच्छी तरह से समझने के लिए निम्नांकित महत्वपूर्ण प्रस्थापनाओं ( propositions ) को ध्यान में रखने की जरूरत है।

"...‘इतिहास’ ऐसा कोई विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं है, जो स्वयं अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य को एक साधन की शक्ल में इस्तेमाल करता हो ; इतिहास, अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हुए मनुष्य के क्रियाकलाप के सिवा और कुछ नहीं है।"

"...मानवजाति अपने लिए हमेशा केवल ऐसे ही कार्यभार ( tasks ) निर्धारित करती है, जिन्हें वह संपन्न कर सकती है। कारण यह है कि मामले को ग़ौर देखने पर हम पायेंगे कि स्वयं कार्यभार केवल तभी उपस्थित होता है, जब उसे संपन्न करने के लिए जरूरी भौतिक परिस्थितियां पहले से तैयार होती हैं, या कम से कम तैयार हो रही होती हैं।"

उपरोक्त प्रस्थापनाओं से यह बात आसानी से समझ में आ जाती है कि सामाजिक चेतना तथा सामाजिक विकास के लक्ष्यों और कार्यभारों के निरूपण ( formulation ) की कितनी बड़ी भूमिका है। और साथ ही यह भी कि इन कार्यभारों का स्वभाव तथा अंतर्वस्तु ( content ), भौतिक दशाओं से तथा मानव क्रियाकलाप के साधनों से निर्धारित होती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद का विरोध करनेवाले वस्तुस्थिति को विरूपित ( distort ) करते हैं, मानव क्रियाकलाप के प्रत्ययिक, मानसिक पक्ष के महत्व का समुचित आकलन नहीं कर पाते हैं, वे या तो उसे अतिरिक्त महिमामंडित ( glorify ) करते हैं या उसके महत्व का अवआकलन ( underestimate ) करते हैं। इसके साथ ही, वे यह भी नहीं समझ पाते हैं कि इतिहास की वास्तविक अंतर्वस्तु के रूप में लोगों के सोद्देश्य क्रियाकलाप को समुचित मान्यता देने से, इस वास्तविकता के साथ कोई अंतर्विरोध या खंडन नहीं होता कि इस क्रियाकलाप का निर्धारक पक्ष ( determinant side ) भौतिक दशाएं तथा उनके क्रियान्वयन के साधन ( means of realisation ) हैं।

हम यहां पहले भूतद्रव्य ( matter ) तथा चेतना के संबंध पर विचार करते समय प्रमाणित कर चुके हैं कि भूतद्रव्य वह वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) है, जो मस्तिष्क के उत्पादों से परे ( outside ) तथा उनसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान ( independently exist ) है। इसके विपरीत चेतना ( consciousness ) मस्तिष्क के क्रियाकलाप का परिणाम है और इस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) है। इस वर्णन के साथ सादृश्य ( analogy ) के अनुसार ही हम आगे मानव क्रियाकलाप के वस्तुगत यानी भौतिक, और प्रत्ययिक यानी मानसिक पक्षों के बारे में तथा सामाजिक विकास के वस्तुगत और आत्मगत कारकों ( factors ) के बारे में भी चर्चा करेंगे। उनकी अंतर्क्रिया की बेहतर समझ हासिल करने के लिए हमें मानव क्रियाकलाप के विविध रूपों की सविस्तार जांच करनी होगी तथा उनके आधार में निहित वस्तुगत नियमों को प्रकाश में लाना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 26 अगस्त 2017

मनुष्य व उसके क्रियाकलाप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां विषय-प्रवेश करते हुए भाववादी दृष्टिकोणों की कुछ मूल प्रस्थापनाओं और उनकी सीमाओं को प्रस्तुत किया था, इस बार हम इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य व उसके क्रियाकलाप 
( man and activity )
इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधार
( preconditions for the materialist conception of history )

ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रमुख उसूल ( principles ) क्या हैं? समाज व उसके इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का क्या आशय है?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें उस प्रस्थान-बिंदु या आधारिका को निर्धारित व परिभाषित करना होगा, जहां से हम अपने विचार-विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं। मानव क्रियाकलाप के विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

प्रकृति में सारे परिवर्तन वस्तुगत ( objective ) होते हैं। वे चिंतन ( thought ) या किसी भी प्रकार की चेतना ( consciousness ) से जुड़े हुए नहीं होते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य के क्रियाकलाप का मुख्य विशिष्ट लक्षण यह है कि उसकी प्रत्येक क्रिया में दो अंतर्संबंधित पक्ष ( interconnected aspects ) होते हैं : भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), जिसमें चिंतन भी शामिल है। नींद या रुग्ण, अचेतावस्था में किये गये कृत्यों को छोड़कर, एक स्वस्थ, सामान्य व्यक्ति की कोई भी क्रिया चेतना के किसी कृत्य के साथ जुड़ी होती है। कार्य कर सकने से पहले एक व्यक्ति अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करता है। यह लक्ष्य किसी ऐसी चीज़ के बारे में एक बिंब, संकल्पना या धारणा होता है, जिसका अस्तित्व नहीं है, किंतु जिसके लिए उसे प्रयास करना ही है। व्यक्ति का लक्ष्य कुछ वस्तुएं हासिल करना, एक मकान बनाना, आदि हो सकता है। एक श्रम समष्टि का लक्ष्य किसी उत्पादन प्रक्रिया को सुधारना, एक नया औद्योगिक समुच्चय बनाना, आदि हो सकता है। एक समाज का लक्ष्य जीवन की भौतिक दशाओं को बदलना और एक नयी समाज व्यवस्था बनाना हो सकता है।

संक्षेप में, संपूर्ण क्रियाकलाप और क्रियाकलाप का प्रत्येक घटक, दो पक्षों, भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों का एक एकत्व ( unity ) होता है। एक व्यक्ति की कोई भी भौतिक क्रिया ( चलना-फिरना, लकड़ी चीरना, खराद पर काम करना, आदि ) यह मांग करती है कि किये गये कार्यों का आशय समझा जाये, क्रियाकलाप के क़ायदों की जानकारी हो, कुछ कुशलता प्राप्त हो तथा कार्य करनेवाले को अपने लक्ष्य की जानकारी हो। इन बातों के बिना मनुष्य के क्रियाकलाप असंभव हैं। इसके विपरीत, भौतिक दैहिक क्रियाकलाप के बिना, भौतिक साधनों और औज़ारों के उपयोग के बिना, व्यक्ति का एक भी विचार, एक भी लक्ष्य कार्यान्वित नहीं हो सकता है। एक व्यक्ति के स्वयं विचार भी, किसी अन्य की समझ के लिए केवल भाषाई क्रियाकलाप से ही सुलभ हो सकते हैं, जो कि एक नितांत भौतिक क्रिया है। इस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप में भौतिक और प्रत्ययिक पक्ष घनिष्ठता से जुड़े और अविभाज्य हैं। यह एक द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) है, जिसमें प्रतिपक्षी ( opposites ) एक दूसरे को संपूरित ( supplement ) करते हैं और अंतर्गुथित ( intertwine ) होते हैं।

परंतु प्रश्न उठता है कि मानव क्रियाकलाप के भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों के संबंध में प्राथमिक और निर्धारक ( determinant ) कौन है?

जहां तक इस प्रश्न का संबंध है, अंग्रेज इतिहासकार तथा दार्शनिक कॉलिंगवुड ( १८८९-१९४३ ) ने दावा किया कि मनुष्य के क्रियाकलाप में मुख्य चीज़ उसका ‘आंतरिक पक्ष’, यानी विचार, भावनाएं, प्रेरणाएं, इरादे, लक्ष्य तथा सचेत निर्णय हैं। ‘बाह्य पक्ष’, यानी संवेद द्वारा प्रत्यक्षीकृत ( sense-perceived ) भौतिक कर्मों व क्रियाओं पर केवल उसी सीमा तक विचार करने की ज़रूरत है, जिस सीमा तक वे मानव चेतना की गहराई में पैठने में सहायता करती हैं। उनके दृष्टिकोण से, इतिहास को समझने का अर्थ लोगों के प्रयोजनों, इरादों तथा लक्ष्यों को समझना है। यह इतिहास की लाक्षणिक भाववादी संकल्पना ( idealist conception ) है। इसके आधार पर यह स्पष्ट करना असंभव है कि मिलती-जुलती ऐतिहासिक दशाओं में लोगों के बीच मिलते-जुलते लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे कैसे विकसित हो जाते हैं ; ये लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों के सदस्यों के बीच भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं ; और अंतिम, कुछ निश्चित दशाओं में लोगों के कुछ लक्ष्य तथा इरादे कार्यान्वित किये जा सकते हैं और कुछ अन्य कार्यान्वित नहीं होते और अनेपक्षित परिणामों पर और यहां तक कि उल्टे परिणामों पर क्यों पहुंचा देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपने को, अपनी जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से, केवल कल्पना में ही अलग कर सकता है।

समाज के जीवन के विशिष्ट स्वभाव तथा इतिहास को समझने के लिए, मानव क्रियाकलाप को भौतिक और प्रत्ययिक, दोनों पक्षों को एक एकत्व के रूप में, एक को दूसरे से पृथक किये बिना तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखे बग़ैर, उनके अंतर्संयोजन ( interconnections ) में देखना अनिवार्य है। इसके वास्ते इस प्रश्न का जवाब देना जरूरी है कि इस क्रियाकलाप का कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 20 अगस्त 2017

समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये - सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों - भौतिकवादी और भाववादी - में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 12 अगस्त 2017

एक नई शृंखला की शुरुआत

एक नई शृंखला की शुरुआत


हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां काफ़ी समय पहले दर्शन पर एक शृंखला प्रस्तुत कर चुके हैं। दर्शन की उस प्रारंभिक यात्रा में हमने दर्शन की संकल्पनाओं ( concepts ) तथा दर्शन और चेतना के संबंधों को समझने की कोशिश की थी। तत्पश्चात हमने यहां उसे ही आगे बढ़ाते हुए, द्वंद्ववाद ( dialectics ) पर, जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के अंतर्गत समझा जाता है, पर एक शृंखला यहां प्रस्तुत की थी। वह सामग्री यहां उपलब्ध है ही, साथ ही उस सामग्री के समेकित पीडीएफ़ डाउनलोड़ लिंक ‘दर्शन और चेतना’ तथा ‘द्वंद्ववाद-समग्र-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ भी साइड़बार में प्रदर्शित है। इच्छुक मानवश्रेष्ठ उससे पुनः गुजर सकते हैं।

अब हमारी योजना है कि दर्शन पर उस शृंखला को आगे बढ़ाया जाए और सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझने के प्रयासों के संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के ज्ञान और सिद्धांत से परिचित होने की कोशिशें शुरू की जाएं।

दर्शन का बुनियादी सवाल यह होता है कि परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या मनुष्य उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है। इस तरह इस सवाल का पहला पक्ष परिवेश के साथ उसके संबंधों से है और आम तौर पर इसे इस तरह निरूपित किया जाता है कि आसपास की वास्तविकता ( reality ) या भूतद्रव्य ( matter ) के साथ चेतना और चिंतन का संबंध क्या है?  पूर्व में हम यहां पर भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर ‘दर्शन और चेतना’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री के अंतर्गत चर्चा कर चुके हैं। किंतु मनुष्य समाज में रहता है और उसे सामाजिक विकास के नियमों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी होती है। उन्हें समझने के लिए दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन के संदर्भ में जांचना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि हमें सामाजिक अस्तित्व या सत्ता और सामाजिक चेतना के बीच संबंध का और इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि जनगण के क्रियाकलाप और समाज के इतिहास में, इनमें से प्राथमिक और निर्धारक ( primary and determining ) तत्व क्या है। इसका उत्तर हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद यानी इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना से प्राप्त होता है।

हम इस नई श्रृंखला में ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इससे संबंधित विभिन्न संकल्पनाओं/अवधारणाओं को समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सामान्य जीवन में हम इन दार्शनिक अवधारणाओं से अपरिचित होते हुए भी, जीवन से मिली सीख के अनुसार ही भौतिकवादी चिंतन और पद्धतियों का प्रयोग करते हैं, निर्णय और तदनुकूल व्यवहार भी करते हैं। परंतु यह भी सही है कि कई बार, कई जगह हम अपने वैचारिक अनुकूलनों ( conceptual conditioning ) के प्रभाव या सटीक विश्लेषण-संश्लेषण ( analysis-synthesis ) के अभाव के कारण कई परिघटनाओं ( phenomena ) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाते, सही समझ नहीं बना पाते और तदनुकूल ( accordingly ) ही हमारे निर्णय और व्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस श्रृंखला से गुजरकर हम निश्चित ही, अपनी चिंतन प्रक्रिया और व्यवहार को अधिक सटीक तथा अधिक बेहतर बनाने में अधिक सक्षम हो पाएंगे, अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार ( refinement ) कर पाएंगे।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत रहेगा ही।

शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 4 सितंबर 2016

प्रकृति और समाज-श्रॄंखला समाप्ति-पीडीएफ़ पुस्तिका

हे मानवश्रेष्ठों,

प्रकृति और समाज’ पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।



प्रकृति और समाज - श्रॄंखला समाप्ति - पीडीएफ़ पुस्तिका

जैसा कि यहां की परंपरा है, ‘प्रकृति और समाज’ पर प्रस्तुत सामग्री को पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। नीचे प्रस्तुत लिंक से इसे डाउनलोड किया जा सकता है। इसे साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेगा ही।

प्रकृति और समाज - हिंदी - डाउनलोडेबल पीडीएफ़
nature and society - in hindi - free downloadable pdf - size 313kb - 28page



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 20 अगस्त 2016

पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष की चर्चा के साथ इस श्रृंखला का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष
( ecological consciousness and ideological struggle )

प्रकृति के विकास तथा सामाजिक विकास के नियम वस्तुगत ( objective ) ढंग से संक्रिया करते हैं, किंतु उनका कार्यान्वयन सचेत ( conscious ) लोगों के क्रियाकलाप द्वारा होता है। प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), प्रकृति के विकास तथा समाज के विकास दोनों के नियमों के अनुसार, यानी सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप अर्थात पारिस्थितिक चेतना के रूप में होना जरूरी है। मनुष्य और समाज को प्रकृति के महत्व का बोध धीरे-धीरे, सदियों के दौरान होता है। किंतु पारिस्थितिक चेतना सापेक्षतः हाल ही में, चंद दशकों के दौरान बनी है। 

इसका विशेष लक्षण यह है कि यह एक प्रकार की सामूहिक सामाजिक चेतना है, जो उस वास्तविक, जटिल, अंतर्विरोधी तथा अत्यंत ख़तरनाक स्थिति को परावर्तित ( reflect ) करती है जो आधुनिक जगत में पारिस्थितिक संतुलन की गड़बड़ी, पर्यावरणीय प्रदूषण, प्राकॄतिक संसाधनों के ख़त्म होने के ख़तरे तथा वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक नतीजों के रूप में मनुष्यजाति के सामाजिक पतन की सम्भावना के परिणामस्वरूप बनी है। शुरू में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, लेखकों व कलाकारों के अलग-अलह समूहों, विभिन्न जातीय समूहों, आदि द्वारा इन परिणामों के खिलाफ़ प्रतिरोध की शक्ल में उत्पन्न पारिस्थितिक चेतना ने अब सारे देशों के सैकड़ों लाखों के दिल-दिमाग़ों में घर कर लिया है। 

इसके विकास का एक सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निष्कर्ष है कि पारिस्थितिक संतुलन की पुनर्स्थापना और प्रकृति की सुरक्षा तथा ‘पुनर्वास’ ( rehabilitation ) सार्विक ( universal ) दिलचस्पी और सार्विक मूल्य के हैं। किंतु इससे यह तथ्य अपवर्जित ( exclude ) नहीं होता कि पारिस्थितिक चेतना के दायरे के अंतर्गत तीव्र वैचारिक संघर्ष चलाया जा रहा है और उसका चलना जारी रहेगा। विकसित पूंजीवादी देशों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के उत्साही समर्थक पारिस्थितिक महाविपत्ति के ख़तरे को मान्यता देते हुए इसका दोष विकासमान देशों के जनगण पर उन मेहनतकशों पर मढ़ने की चेष्टा कर रहे हैं, जो, उनके कथनानुसार, प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। 

इनके विपरीत ‘ग्रीन्स’ ( Greens ) के विचारक सारी पारिस्थितिक विपदाओं का दोष बड़े पैमाने के उद्योग, आधुनिक तकनीक और सारी वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को और साथ ही किसी भी क़ीमत पर ( यहां तक कि प्रकृति के विनाश की क़ीमत पर भी ) इसे आगे बढ़ाने में स्वार्थपूर्ण दिलचस्पी रखनेवाली इजारेदार पूंजी ( monopoly capital ) पर रखते हैं। इस आधार पर बनी तथा विकसित सामाजिक-दार्शनिक प्रवृत्ति को विज्ञान-विरोधवाद ( anti-scientism ) और तकनीक-विरोधवाद ( anti-technicism ) कहते हैं। इसके नेतागणों में आधुनिक समाज की सारी आपदाओं का स्रोत को विज्ञान और इंजीनियरी के विकास में देखने का रुझान ( trend ) है। इन कारकों ( factors ) की भूमिका की अतिरंजना ( exaggeration ) स्वतः ही उद्योग के अमानवीयकरण तथा प्रकृति के विनाश की ओर ले जाती है। 

वे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के अस्वीकरण ( rejection ) में, पूर्व-औद्योगिक, पारंपरिक उत्पादन, वैकल्पिक तकनीकों ( जिनसे उनका तात्पर्य दस्तकारी, आदिम लकड़ी के हलों से खेती, आदि से है ) की ओर वापसी में देखते हैं। किंतु तथ्यतः ये रूमानी आह्वान उनके पीछे छुपे निश्चित वैचारिक उसूलों को परावर्तित करते हैं। मनुष्यजाति के सारे दुर्भाग्यों के स्रोत को विज्ञान व तकनीक में देखते हुए इस प्रवृत्ति के प्रतिपादक वस्तुतः इस मुख्य बात को जाने-अनजाने पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक परिणाम स्वयं विज्ञान तथा तकनीक पर निर्भर नहीं करते, बल्कि उन्हें इस्तेमाल करने, उनका अनुप्रयोग करने के तरीक़ों पर, उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होते हैं, जिसके अंतर्गत उन्हें काम में लाया जाता है

पारिस्थितिक चेतना में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक यह समझ है कि प्रकृति केवल आर्थिक संसाधनों की एक प्रणाली, मनुष्यजाति के जीवित रहने का केवल एक पूर्वाधार ही नहीं, बल्कि सौंदर्यबोधात्मक ( aesthetic ) तथा नैतिक शिक्षा का, समाज के मानवीकरण का एक सबल कारक भी है।

पर्यावरण की रक्षार्थ कारगर, युक्तिसंगत, सुआधारित ( well-grounded ) उपायों के विकास के लिए वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती - इससे संज्ञान की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी। बल्कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को, निजी हितों के बजाय समाज के हितों को सर्वोपरि रखने वाली एक इस तरह की सामाजिक प्रणाली ( social system ) में ढालने की जरूरत है जिसमें वह पारिस्थितिक संतुलन के साथ आंगिक रूप से ( organically ) संयुक्त हो और पर्यावरण की अखंडता ( integrity ) था उसका साकल्य ( wholeness ) बरकरार रहे। विज्ञान के अनुप्रयोग तथा नयी तकनीकों के उपयोग के नकारात्मक परिणामों को, स्वयं विज्ञान तथा तकनीक से ही दूर किया जा सकता है। परंतु ऐसा करने के लिए, उनके कार्यान्वयन तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) के लिए यह ज़रूरी है कि समाज सबसे पहले महत्तर ( greater ) सामाजिक न्याय की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो।

समसामयिक पारिस्थितिक चेतना के विश्लेषण से पता चलता है कि यह स्वयं वैचारिकी का एक विकल्प ( alternative ) या उसका प्रतिपक्षी ( opposite ) नहीं है, क्योंकि पारिस्थितिक चेतना के अंदर एक वैचारिक संघर्ष भी जारी है। केवल ऐसी ही पारिस्थितिक चेतना सामाजिक समस्याओं के रिश्ते की सुस्पष्ट समझ दे सकती है तथा सामाजिक न्याय ( social justice ) के पुनर्निर्माण की ओर ले जा सकती है ; अतंतः केवल यही मनुष्यजाति के एक सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, प्रकृति और समाज की सांमजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया की उपलब्धि करा सकती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 13 अगस्त 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - ३
( scientific and technological progress and its consequences - 3 )

(५) जैविकी ( biology ) के, विशेषतः जैव तकनीकी, आनुवंशिकी तथा जीन इंजीनियरिंग के विकास से अब जीवित अंगियों की आनुवंशिकता ( heredity ) को नियंत्रित करना संभव हो गया है। निकट भविष्य में जीन इंजीनियरिंग के उपयोग से लोग फ़सलों और पशुओं की उत्पादकता में तीव्र वृद्धि करने में कामयाब हो जायेंगे। इस क्षेत्र की उपलब्धियों से कई बीमारियों का उन्मूलन या रोकथाम करने, स्वास्थ्य में आम सुधार करने तथा जीवन को दीर्घ बनाने की दशाओं का निर्माण हो रहा है।

परंतु पूंजीवादी व्यवस्था में यह लाखों-करोड़ो लोगों को दीर्घकालिक भूख तथा कुपोषण से नहीं बचाता, क्योंकि खाद्य उत्पदन का मुख्य लक्ष्य मनुष्य का कल्याण नहीं, मुनाफ़ा कमाना है। इसके अलावा साम्राज्यवादी, इन जीन इंजीनियरिंग तथा अन्य जैविक विज्ञानों की उपलब्धियों को जैविक, रोगाणु युद्ध की तैयारी के लिए बेज़ा इस्तेमाल कर रहे हैं, मनुष्यजाति के सामने नये ख़तरे पैदा कर रहे हैं। अतः जैविकी का और अधिक सफल विकास, बहुसंख्या के हित में समाज द्वारा उसके नियंत्रण और प्रबंध को आवश्यक बना रहा है।

(६) वैज्ञानिक कृषि तकनीक आधुनिक समाज में अतिमहत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। बात यह है कि लोगों ने अनेक सहस्त्राब्दियों के दौरान कृषि तथा पशुपालन के क्षेत्र में विराट अनुभव अर्जित कर लिया है, जिससे उन्हें आवश्यक खाद्य प्राप्त होता रहा। किंतु अब तथाकथित जनसंख्या विस्फोट के कारण कई देशों में विशेषतः उपनिवेशवाद से मुक्त मुल्कों में परंपरागत ढंग से उत्पादित खाद्य रिज़र्व काफ़ी नहीं है।

आधुनिक विज्ञान ने कृषि के गहनीकरण के कई कारगर तरीक़ों का विकास किया है। उनमें शामिल हैं कारगर उर्वरकों, नवीनतम कृषि यंत्रों व इलेक्ट्रोनिकी का उपयोग, जल निकासी व सिंचाई की जटिल व्यवस्था करना तथा उच्च उत्पादकता वाले मवेशियों और पोल्ट्री तथा नये क़िस्म की फ़सलों का विकास करना। किंतु भिन्न-भिन्न सामाजिक प्रणालियों में इनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं। मसलन, यूरोप और अमरीका के कुछ देश केवल अपनी ही आबादी के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी पर्याप्त खाद्य का उत्पादन कर रहे हैं, परंतु वे खाद्य को अक्सर राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं; जो देश उनकी राजनीतिक नीति का अनुसरण करते हैं वे उन्हें ही अनुकूल और मनचाही शर्तों पर खाद्य की पूर्ति करते हैं। 

इससे निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है : आधुनिक वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के परिणामों का स्वभाव स्वयं यंत्रों व तकनीक पर या पृथक वैज्ञानिक नतीजों पर निर्भर नहीं होता। यह उनके अनुप्रयोग की परिस्थितियों तथा उसके उद्देश्य पर निर्भर होता है। इस विश्लेषण का दार्शनिक अर्थ यह है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का या प्रकृति के साथ समाज का संबंध, निश्चित सामाजिक दशाओं द्वारा व्यवहित और संनियमित ( governed ) होता है। यदि हम इस संबंध को प्रकृति में गड़बड़ी न करनेवाला और साथ ही मानवजाति के विकासार्थ अनुकूल दशाओं को सुनिश्चित बनानेवाला सांमजस्यपूर्ण और रचनात्मक संबंध बनाना चाहते हैं, यो सबसे पहले और सर्वोपरि समुचित सामाजिक दशाओं का निर्माण करना जरूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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