शनिवार, 29 सितंबर 2012

प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि


एक सवाल है प्रेम पर। जैसाकि आपने कहा है और मैं सबको सही मानता हूँ लेकिन ऐसा लोग कहते हैं कि दस सुन्दर व्यक्ति हैं तब भी आपका प्रेमपात्र कोई एक ही क्यों? और अगर शरीर महत्व का है तब प्रेमपात्र से बहुत सुन्दर शरीर के लोग होग सामने होते हुए भी और अन्य सभी गुणों में भी प्रेमपात्र से आगे होते हुए भी एक ही व्यक्ति क्यों और कैसे पसन्द आ जाता है। कुछ तो समझ में आया लेकिन ये सवाल है।

इस चीज़ को आप यदि दूर से, निरपेक्षता से देखेंगे तो इसे समझने में इस तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं। जब हम चीज़ों को समझने की प्रक्रिया में होते हैं, तो हमें उस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर मिलती जुलती प्रक्रियाओं को दूरस्थ परिवेश की जगह अपने पास के, अपनी ख़ुद की ज़िंदगी, या अपनी ज़िंदगी के निकट और जुड़ी हुई चीज़ों और प्रक्रियाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

प्रेम की भावना भी, अन्य भावनाओं की तरह ही मनुष्य की जैविक और जीवनीय आवश्यकताओं और उनकी तुष्टि की संभावनाओं के आधार पर ही पैदा होती और परवान चढ़ती है।

हम देखते हैं ( और हमें अपने स्वयं के जीवन में झांकना चाहिए, अपनी ख़ुद की भावनाओं की पडताल करनी चाहिए ) कि अक्सर प्रेम दो ऐसे विपरीत लिंगियों के बीच में पनपता है, जो किसी ना किसी रूप में एक दूसरे के साथ अंतर्संबद्ध हैं, यानि कि उनके बीच ऐसे संबंध पनपने की संभावनाएं है। अक्सर वे एक दूसरे के परिचित परिवेश के होते हैं, अडौस-पडौस के, एक ही गांव के आदि, यानि कि जहां उनकी दैनिक आपसी अंतर्क्रियाएं सम्पन्न होती हों। यह स्वाभाविक परिणति है।

यानि किन्हीं भी दस को खड़े करने और उनमें से चुनने की बात नहीं है, यह स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी वरन अपने किन्हीं सौन्दर्यबोध के प्रतीकों के चलते प्रबलीकृत ( forced ) आकांक्षाएं होंगी। यह अधिकतर सक्रियता का दायरा बढ़ने और समझ बढ़ने के बाद की नियतियां है। जैसे कि स्कूल या कॉलेजों में सहपाठी विपरीत लिंगियों के बीच संभावनाएं होती हैं। वहां अक्सर आपको ऐसे लड़के या लड़कियां मिल जाएंगी जो किसी ना किसी गुण को लक्षित करके, जिसमें अधिकतर दिखता सौन्दर्य शामिल होता है, किसी को अपने प्रेम का लक्षित बना लेते हैं, एकतरफ़ा भावनाएं पाल लेते हैं। पर यदि उनके बीच संपर्क नहीं है, तो बात को आगे बढ़ने की नौबत नहीं आने पाती।

एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी, लगाव और समरसता की भावना के रूप में शुरुआती आकर्षण तभी ढल सकता है जब उनके बीच अंतर्क्रिया होती हों, एक दूसरे के गुणों और व्यवहार के बीच धीरे-धीरे सम्मान और संपात की स्थिति पैदा होती हो।

यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं। 

सुंदरता के भी अपने-अपने मानदंड बन जाते हैं, और वह उन्हीं से मिलते जुलते संरूपों को पसंद करता है। हो सकता है कि कोई ऐश्वर्या की सुंदरता के आगे, दीप्ति नवल को प्राथमिकता देता हो। किसी को मासूम मुस्कुराहट में दिलचस्पी हो सकती है, किसी को शक्ल या उसके अंगों की एक खास बनावट में, कोई घरेलू मासूमियत के भावों को वरीयता देता हो वहीं कोई सैक्सी दर्शनीयता को, किसी के मन में छरहरता ( slimness ) की संकल्पना ज़्यादा हावी हो सकती है, आदि-आदि। यानि कि उसका चुनाव इन्हीं जैसी कई चीज़ों पर निर्भर होता है, ना कि एकदम सांयोगिक और किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा के।

आप देखेंगे कि शुरुआती आकर्षण और चुनाव में शारीरिक गुणों की महती भूमिका होती है, पर असली परीक्षा तो आपसी अंतर्क्रियाओं में, यानि व्यक्तित्व के आंतरिक व्यावहारिक गुणों के परीक्षण में होती है। आपके पास ऐसे कई उदाहरण होंगे, जिनमें कुछ ही मुलाकातों में शारीरिक आकर्षण गायब हो जाता है और व्यवहार की एकरसता नहीं पैदा हो पाने के कारण अलगाव हो जाता है। ऐसा भी होता है, कि शारीरिक आकर्षण या किन्हीं विशेष गुणों पर व्यक्ति की दीवानगी के कारण, वह दूसरी चीज़ों को जबरन स्थगित करता रहे और संबंधों को आगे बढ़ाता रहे। पर ऐसे में यह भी अवश्यंभावी है कि फिर उनकी तुष्टि होते ही, मोहभंग पैदा हो सकता है, और बाकी ज़मीनी सच्चाइयां हावी होने लगती है और बहुत बाद में भी अलगाव की संभावनाएं होती है।

व्यक्ति किसी विशेष सौन्दर्य का उपासक होने के नाते, अडौस-पडौस में स्थित कई सारे विपरीत लिंगियों में से अपनी मानदंड़ों के अनुसार किसी एक का सचेतन चुनाव कर सकता है, परंतु होता यह है कि उस विपरीत लिंगी के भी इसी चुनाव के मामले में अपने मानदंड होते है जो जरूरी नहीं कि संपाती हो जाएं। तो जाहिर है कुछ शुरुआती अंतर्क्रियाओं के बाद ही शनैः शनैः जाने-अनजाने में, यह छंटनी की प्रक्रिया चलती है और किसी एक व्यक्ति के साथ बाह्य और आंतरिक गुणों के बीच एक सामंजस्य, एक सहजता स्थापित हो जाती है। और हम इसे निरपेक्ष रूप से देखते वक्त इसकी गहराई में जाने के बजाए सिर्फ़ एक रहस्यमयी, पहले से नियत संयोग के रूप में देख सकते हैं। जैसी कि प्रवृत्ति आपके सवाल में परिलक्षित हो रही है।

तो यदि आप इसी दिशा में और चिंतन-मनन करेंगे, तो शायद आप समझ पाएंगे कि किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा की उपस्थिति के असली मायने क्या हैं। शायद इसे हेतु हम पर्याप्त इशारे कर पाए हों। कोई और शंका हो तो बात आगे बढ़ाई जा सकती है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 22 सितंबर 2012

प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

आपने कहा था कि मैं अतिरिक्त सचेत होने लगता हूँ, तब असहजता आ जाती है और यह भी कहा था कि मैं अतिरिक्त ध्यान न दूँ। भला यह कैसे होगा? ध्यान कम जाय या न जाय, इसके लिए क्या करें?

ध्यान देना या नहीं देना, किसी चीज़ के प्रति सचेत होना या ना होना, उस चीज़ के प्रति आपके कन्सर्न्स, उसके प्रति आपके रवैये पर निर्भर करती है। यदि उसके साथ आपके कन्सर्न्स है, आप उसके प्रति लगाव या महत्त्वपूर्णता का रवैया रखते हैं तो आप कितनी भी कोशिशे कीजिए, आपका ध्यान उधर बरबस जाता ही रहेगा, आप उसके प्रति सचेत होते ही रहेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि चीज़ों के प्रति अपने कन्सर्न्स, अपने संबंधों को बदले बिना, उनके प्रति अपने रवैयों को बदले बिना उन पर ध्यान जाना या उनके प्रति सचेत होना ख़त्म किया नहीं जा सकता। बिना संबंधों और रवैयों को बदले किन्हीं चीज़ों से सिर्फ़ ध्यान हटाने की कोशिश करना एक आध्यात्मिक कोशिश करने की तरह है जो व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है। यह पलायन है, हल या निपटारा नहीं।

जैसे कि मान लीजिए हमें अपना मज़ाक उड़ाए जाने पर क्रोध आता है। क्रोध इसलिए आता है क्योंकि हम अपने अहम् को, अपनी इज्ज़त को, अपने आत्मसम्मान को बहुत ही अधिक महत्त्व देते हैं और किन्हीं भी परिस्थितियों में इनके साथ समझौता करने का रवैया नहीं रखते। इसलिए हम इस बात के प्रति बहुत सचेत रह सकते हैं कि इस पर कोई आंच नहीं आए। जरा भी कोई ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जिनसे हमारी इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान पर कोई खतरा महसूस होता है हम असहज होने लगते हैं, थोड़ा अधिक होने पर हम क्रोध में आ जाते हैं और अगर स्थितियां ज़्यादा बिगड़ जाएं तो हमारा व्यवहार अधिक ही उग्र हो सकता है।

अब यदि हम अपनी इस आदत या क्रोध की प्रतिक्रिया को बदलना चाहते हैं। सामान्यतः किया यह जाता है कि हम ऐसी स्थितियों से बचने की कोशिश करने लगते हैं, ऐसी स्थितियां बनती लगने पर वहां से खिसक लेना चाहते हैं, कुछ हो भी जाए और हमें क्रोध आने भी लगे तो उस क्रोध से लड़ने लगते हैं, जबरन उस स्थान पर, उन लोगों पर आ रहे क्रोध को दबाने की कोशिश करते हैं। कुछ तरीकों के अनुसार कुछ लोग गिनती गिनने लग सकते हैं, गाना गुनगुनाने लग सकते हैं। तात्कालिक रूप से इस तरह के तरीक़े कारगर से लग सकते हैं, पर वास्तव में होते नहीं। क्योंकि यहां मूल कारण वहीं हैं, उसकी प्रतिक्रियास्वरूप पैदा हुआ क्रोध भी वहीं है, सिर्फ़ उसके तात्कालिक रूप से प्रदर्शन को स्थगित किया जा रहा है, हमारी बन चुकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को दबाया, उसका दमन किया जा रहा है। इससे और भी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं, यह दबाया हुआ क्रोध और कहीं निकल सकता है।

इसके स्थायी हल वही हो सकते है जैसा कि ऊपर कहा गया था, हालांकि वह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है पर समाधान वही हैं। यानि हमें अपनी स्वभाव बन गई प्रवृत्तियों, कन्सर्न्स, हमारे रवैयों से आंतरिक लड़ाई करनी पड़ेगी। हमें समझना होगा कि इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान क्या चीज़ होते हैं, इनकी हमारे जीवन और बाकी समाज और परिवेश के साथ अंतर्संबंधों में इनकी कितनी महत्त्वपूर्णता भूमिका होती है, समझनी चाहिए। हमें तुलना करना सीखना पड़ेगा कि कब आत्मसम्मान महत्त्वपूर्ण होता है और कब बाकी चीज़ें, मतलब सामने वाला व्यक्ति, उसके साथ हमारे संबंध। हमें भी यह भी समझना होगा कि क्या वास्तव में हमारा आत्मसम्मान एक छुईमुई की तरह है जिसे किसी का भी जरा सा स्पर्श मुरझा सकता है। क्या इसे अधिक लचीला और मजबूत नहीं होना चाहिए जिस पर छोटे-मोटे मज़ाक कोई असर ना डाल पाएं। यानि हमें हमारे आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स, संबंधों को समझना और बदलना होगा।

दूसरी बात हमें ऐसे हालात में अपने प्रतिक्रियात्मक रवैयों को भी समझना होगा। हमें देखना होगा कि हमारी प्रतिक्रियाएं किस-किस तरह की अनैच्छिक स्थितियों को पैदा कर देती है, हमें, हमारे व्यक्तित्व को किस तरह सबके सामने कमजोरी या मखौल का विषय बना सकती है, कैसे हमारी प्रतिक्रियाएं हमारे सामाजिक अस्तित्व से मेल नहीं खाती और हम एक गैरजिम्मेदाराना असामाजिक व्यवहार करने लग सकते हैं। हमें हमारे रवैयों को अधिक जिम्मेदार, अधिक सामाजिक बनाना सीखना होगा। यानि इन्हें भी समझना और बदलना होगा।

जब आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स और हमारे रवैये में धीरे-धीरे ही सही उचित बदलाव किये जाएंगे तभी यह संभव हो सकेगा कि प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा होने पर भी हमें वाकई में क्रोध ही नहीं आए, उन्हें हम सहजता से लेना सीख सकें, हमारे प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण करना सीख सकें। एक बेहतर मनुष्य बन सकें।

शायद अब आप समझ सकते हैं कि आपको जिन चीज़ों से तकलीफ़ पैदा होती है, जिनके प्रति आपमें सचेतनता पैदा होती है, असहजता आती है, उन चीज़ों के प्रति अपने संबंधों और रवैयों में बदलाव ही वैसी स्थितियां पैदा कर सकता है कि आपका उन पर ध्यान ही ना जाए।

जैसे कि, जब हमने अपने आपको इस बात के प्रति भली-भांति मुतमइन कर लिया है और इसको व्यवहार में उतार लिया है कि व्यक्ति का पहनावा उसके आंतरिक व्यक्तित्व का आइना नहीं होता और बाहरी प्रस्तुति कोई मायने नहीं रखती तो आपका ध्यान लोगों के पहनावे पर जाएगा ही नहीं कि किसने किस वक़्त क्या पहना था, आपने क्या पहना था। अब आप यदि आप मानते हैं कि इससे फर्क पड़ता है, आप भी इन्हीं चीज़ों के हिसाब से व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया करते हैं तो आप कितना भी कोशिश करलें, आपका ध्यान लोगों के पहनावों पर जाता ही रहेगा। 

यदि हमको लगता है कि हमारी असफलता, हमसे हुई कोई हरकत से हमारी छवि, जिसे कि हम बहुत महानता के साथ जोड चुके हैं, पर दाग लगा सकती हैं, हमको कमजोर साबित कर सकती है, हमारा मज़ाक उड़वा सकती है, तो जाहिर है ऐसी किसी भी सार्वजनिक क्रियाकलापों में, व्यवहार में उतरते वक़्त हम असहज होंगे ही, उससे बचने की कोशिश करेंगे, उससे डरेंगे। और ऐसा तब अधिक होने की संभावना होती है जब हमें अपनी इस महान छवि के प्रति अधिक आत्मविश्वास भी ना हो।

ओह इस पर काफ़ी लंबा लिख गये हैं। बहुत इशारे हो चुके हैं, आप बात को शायद समझ पाएं।

परीक्षा में लिखते समय कुछ घबड़ाहट का अनुभव हुआ।....उस समय के बाद बार-बार यह महसूस हुआ कि घबड़ाहट और हाथ में कम्पन होता है।....जैसे मान लीजिए मैं बीस छात्रों की कक्षा में पढ़ाने जाता हूँ, तो मुझे घबड़ाहट क्यों होनी चाहिए, चाहे वह किसी तरह की हो।

किसी भी परीक्षा का मतलब हमारी, हमारे व्यक्तित्व की जांच ही होती है, और यह हम भली भांति जानते ही हैं। ऐसे ही कई लोगों के बीच प्रस्तुत होना भी अप्रत्यक्ष रूप से यही ही है। हमारे भय, हमारी दुश्चिंताएं हमारे अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं, और अनुकूल परिस्थितियों के पैदा होते ही जाने-अनजाने ही हमको प्रभावित करती ही हैं। इसलिए यह होता ही है, हो सकता ही है।

ऊपर काफ़ी कुछ कहा ही जा चुका है।

लड़कियों से भी कुछ हद तक बात करने में घबड़ाहट होती है।....जैसे मुझे कह दिया जाय किसी कक्षा में मैं पढ़ाने जाऊँ जिसमें लड़कियाँ (शायद बच्चियाँ नहीं) हों, तो शायद परेशानी होने लगे।...

लड़कियों वाले मामले में भी ऊपर वाली बात तो रहती ही है, एक और मसला जुड जाता है, विपरीत लिंगी होने का। एक उम्र के बाद, परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं के दौरान, स्त्री और पुरुष की संकल्पनाएं आकार लेने लगती हैं। समझ में उनके बीच का अलगाव बढ़ता है, साथ ही उनकी एकता के रहस्यमयी साये भी कल्पना में गहराने लगते हैं। दोनों के बीच की अंतर्संबंधता कुछ समझ में आती है, कुछ घटाघोप बनाती है। फलस्वरूप विपरीत लिंगी के साथ झिझक और असहजता बढ़ने लगती है। और भी कई चीज़ें आती है जिन्हें आप भली भांति जानते ही हैं।

कई सारी मानसिक उलझनें, जो एकांतिक कल्पनालोक का हिस्सा होती हैं, एक दूसरे का सामना होते ही उभर आती हैं, चेतनता के केन्द्रीय ढ़ांचे में हावी हो जाती हैं और व्यक्ति असहज व्यवहार को अभिशप्त हो जाता है। लगभग सभी इस प्रक्रिया से गुजरते हैं, और अधिकतर इससे पार नहीं पा पाते। आजकल की शहरी संस्कृति में सहशिक्षा तथा और भी कई अन्य घटकों के कारण यह असहजता थोड़ी कम रहती है, या यूं भी कह सकते हैं इससे पार पाने और आगे बढ़ने के अधिक अवसर उपल्ब्ध होते जाते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 15 सितंबर 2012

अपेक्षाओं में द्वंद और अंतर्विरोध

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



अपेक्षाओं में द्वंद और अंतर्विरोध

"पहले और अभी में, आपकी अपने आप से की जा रही अपेक्षाओं और ज्ञान तथा समझ की बढ़ोतरी का अंतर है। इसीलिए व्यवहार में सचेतनता बढ़ जाती है और आप कुछ ज़्यादा ही सतर्क हो उठते से लगते हैं, जिसके कि कारण इस तरह के लक्षण कभी-कभी हावी होते हैं।" यह बात कुछ स्पष्ट नहीं हुई।

हम अपनी आयु के हिसाब से परिवेश, समाज के साथ निरंतर अंतर्क्रिया ( interaction ) करते रहते हैं। हम एक व्यक्ति के नाते समाज और परिवार के विभिन्न व्यक्तियों के साथ अलग-अलग स्तरों के अंतर्संबध बनाते हैं। हम अपने लिए लोगों से कुछ अपेक्षाएं करते हैं, और साथ ही यह भी समझने लगते हैं कि इसी तरह अन्य लोग भी हमसे कुछ अपेक्षाएं करते होंगे। इन्हीं की पूर्ति के आधारों पर हम अपने मन में लोगों की छवि ( image ) बनाते हैं और उन्हें तौलते हैं। इसी तरह हम अपने आपको भी अपनी छवि और उसकी पूर्तियों के हिसाब से तौलते रहते हैं।

हम लोगों के मन में अपनी बनती जा रही छवि के अनुरूप ही, अपने प्रति लोगों की अपेक्षाओं की पूर्ति के हिसाब से अपने आप से कुछ निश्चित अपेक्षाएं पालते हैं कि हमें यह करना चाहिए, यह नहीं करना चाहिए, इसे तो हमें बेहतरी से करना ही चाहिए। हमारी बेहतर छवि को हम तोड़ना नहीं चाहते

जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, समझ और हमारा ज्ञान बढ़ता जाता है, हमारे परिवेश के लोगों के साथ हमारे अंतर्संबंधों में भी परिवर्तन आते जाते हैं, उनकी अपेक्षाएं भी बढ़ती है। और इसीलिए हम भी अपने आप से अधिक अपेक्षाएं पालने लगते हैं। अपनी छवि और अपनी उपयोगिता, श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए, हम इन अपेक्षाओं और उनकी पूर्ति के प्रति सचेत ( conscious ) होते जाते हैं। अपनी सक्रियता तथा अपने व्यवहार और उसके प्रभावों के प्रति सतर्क हो जाते हैं, उन पर अतिरिक्त ध्यान देने लगते हैं। यह अतिरिक्त सतर्कता, हमारी सक्रियता में थोडी अतिरिक्त असहजता पैदा करती है। जिससे कि वैसे लक्षण उत्पन्न होने की संभावनाएं बन जाती हैं।

यह बढ़ा हुआ ज्ञान और समझ का स्तर, हमारी कई मान्यताओं को भी बदल सकता है और यह भी हो सकता है कि लोगों की हमसे अपेक्षाओं और हमारे द्वारा ख़ुद से की जारही अपेक्षाओं में भी द्वंद और अंतर्विरोध पैदा हो सकते हैं। जाहिर है यह अंतर्विरोध भी, यह द्वंद भी हमारे व्यवहार को सतर्क और असहज बनाता है। जिससे भी कि वैसे लक्षण उत्पन्न होने की संभावनाएं बन जाती हैं।

शायद बात कुछ साफ़ हो पाई हो, हमारा उन पंक्तियों को लिखने का मंतव्य यही था।

"यह भी हो सकता है कि लोगों की हमसे अपेक्षाओं और हमारे द्वारा ख़ुद से की जारही अपेक्षाओं में भी द्वंद और अंतर्विरोध पैदा हो सकते हैं। जाहिर है यह अंतर्विरोध भी, यह द्वंद भी हमारे व्यवहार को सतर्क और असहज बनाता है।" इस पर कुछ अधिक कहना होगा।

लगता तो है कि कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसकी समझ आपने अपने आत्म-विश्लेषण में दिखाई है और कहा भी है कि "ये सब क्यों कहा, आप समझ रहे होंगे। इतनी लम्बी बात बस अपेक्षाओं के अन्तर्विरोध की है।"

यानि आप अपने परिवेश के लोगों द्वारा आपसे की जा रही अपेक्षाओं और आप जो अपने आप से अपेक्षाएं करते हैं, उनके बीच अंतर्विरोधों को समझ पा रहे हैं। ये ही आपके और आपके परिवार के बीच तनाव का कारण बने हुए हैं। आप अपनी अपेक्षाओं के प्रति दृढ़ रहना चाहते हैं, और परिवार अपनी अपेक्षाओं के प्रति। दोनों दृढ़ हैं, और सचेत तथा सतर्क भी, स्पष्ट है कि ऐसी परिस्थितियों में मामला सुलझने की राह निकलनी मुश्किल हो जाती है।

अभी आपने दर्शन नहीं पढ़ा है, शनैः शनैः पढ़ेंगे और समझेंगे ही, यह अत्यावश्यक है। द्वंदवाद सिखाता है कि हर चीज़ सदैव अपने आपसी द्वंद, अंतर्विरोधों में होती है। लेकिन सिर्फ़ द्वंद, अंतर्विरोध ही होता है, उनमें से किसी एक की ही जीत होने की संभावना हो तो निश्चित है कि वह चीज़ स्थिर नहीं रह सकती, अपना ढ़ांचा नहीं बनाए नहीं रख सकती, नष्ट होने को अभिशप्त हो जाती है। तो यदि चीज़ को अपनी उत्तरजीविता सुनिश्चित रखनी हो तो इन अंतर्विरोधों और द्वंदों में एक एकता, एक साम्य स्थापित करना होगा। साथ ही यह भी कि, इन द्वंदों का, अंतर्विरोधों का होना भी जरूरी है ताकि इनके हल करने की प्रक्रिया ही विकास की संभावना को रचती है।

यानि कि अंतर्विरोधों को हल करना और उनकी एकता स्थापित करना एक सही पद्धति होनी चाहिए। हल करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, इसका मतलब इनपर अड़े रहना, पलायन करना, जबरन नकारना, इनका हल नहीं हो सकता। आपकी, और समाज तथा देश की अभी की परिस्थितियों के मद्देनज़र यही अभीष्ट है कि आपको अपनी अपेक्षाओं के अंतर्विरोधों के भी सर्वमान्य हलों की दिशा में सक्रिय होना चाहिए।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 8 सितंबर 2012

संवाद और संबोधन में समस्या

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



संवाद और संबोधन में समस्या


लोगों के सामने या भीड़ के सामने बोलने में थोड़ी घबड़ाहट, होंठ सूख जाते हैं कभी-कभी। पैरों में कम्पन और घबड़ाहट होती है(शायद थी)।....आखिर भय है तभी ऐसा है। क्यों है ऐसा? भयमुक्त होना भी एक लक्ष्य है। इस पर ध्यान दें। बताएँ ऐसा क्यों है और इसका समाधान क्या है?....मैं जितनी जल्दी प्रतिक्रिया लिखकर देता हूँ उतनी सामने नहीं देता। मैं बात करते समय तेजी से प्रतिक्रिया कम ही दे पाता हूँ। मुझे हमेशा जवाब देने के लिए थोड़ा समय चाहिए होता है।....हाँ तब जवाब देना बहुत आसान होता है जब सामनेवाला कोई ऐसी बात कहे जिसका जवाब मैं पहले से तय कर चुका हूँ यानि जानता रहता हूँ।....


होंठ सूखना, पैरों में कम्पन और घबड़ाहट ये सामान्य लक्षण हैं जो अक्सर ही व्यक्ति लोगों के सामने या भीड़ के सामने बोलने में महसूस करते हैं। खासकर शुरुआत में तो सभी ही करते हैं। दरअसल यह हमारे यहां कि सामान्य समस्या है चूंकि व्यक्ति की इस एकालापात्मक वाक् के विकास पर पर्याप्त ध्यान ही नहीं दिया जाता। यहां तक कि संवाद में भी कई लोग दिक्क़त महसूस करते हैं। संवाद की समस्या तो फिर भी उसकी व्यक्तिगत सक्रियता के चलते, उसकी आवश्यकताओं की तुष्टियों की जरूरतों के चलते काफ़ी कुछ ठीक हो जाती है, परंतु दूसरों व्यक्तियों को संबोधित करते हुए बोलना एक समस्या ही बना रहता है।

घरेलू परिवेश और विद्यालय का शुरुआती माहौल संवादमय नहीं है, इसलिए अक्सर जरूरी आत्मविश्वास पूरी तरह नहीं उभर पाता। कुछ ही निश्चित व्यक्तियों के सामने संवाद की प्रक्रिया सीमित हो जाती है। जब संवाद ही समुचित संभव नहीं है तो एकालाप यानि संबोधन आदि में, मंच आदि पर तो ऐसी हालत अवश्यंभावी है।

पर यह तो हो चुका, इसे सिर्फ़ समझने के लिए यहां रखा गया था, इसमें और भी कई घटक काम कर रहे होते हैं। खैर, अब बात आगे बढ़ने की है। इसलिए इसे अब के सापेक्ष और समझ लिया जाए।

एक वज़ह और है जिसके कारण इससे बाद में भी, यानि व्यक्तिगत परिपक्वता के बाद भी समस्या पैदा होती है। वह है विषयगत ज्ञान की कमी और भाषाई कमजोरी। परिचित मामलों में अपनी बात को ठीक तरह से भाषाई कसाव के साथ रखने में समस्या होती है, और अपने से अपरिचित मामलात सामने आते ही, विषयगत ज्ञान की कमी तथा भाषाई शव्दावली की कमी दोनों ही अखरने लगती हैं और इसी कारण संकोच व झिझक हमें चुप रहने की ओर प्रेरित करता है।

जिन विषयगत मामलों में हमारी दिलचस्पी भी होती है, थोड़ा बहुत सूचनाएं और उससे संबंधित ज्ञान भी हमने इकट्ठा किया होता है, वहां भी यदि समझ गहरी ना बन पाई हो तो हम तात्कालिक प्रतिक्रिया या संवाद करने में असहज होते हैं, हमारे दिमाग़ में कई अस्पष्ट विचार उमड़ घुमड रहे होते हैं, कई सारे विचार आ-जा रहे होते हैं। अब यदि मन में ही स्पष्ट वैचारिक स्थिरता नहीं हो तो, स्पष्ट है कि उनका संवाद में भाषाई निरूपण कैसे संभव हो सकता है। हम कुछ बोल नहीं पाते और बाद में अक्सर, जब फुर्सत में होते हैं और सोच-विचार को स्थिर कर पा रहे होते हैं, तब हमें बखूबी यह बूझ रहा होता है कि उस वक़्त यह कहा जा सकता था, उस वक़्त यह कहा जाना चाहिए था, आदि-आदि। पर इसमें चिंता की कोई बात नहीं होती, सभी इसी प्रक्रिया से गुजरते हैं, अपने विचारों को सापेक्षतः स्थिर करते हैं, और इसी तरह की कई स्थितियों से गुजर कर ही वैसी ही वैचारिक स्थिति उत्पन्न होने पर संवाद में अपनी सार्थक दखलअंदाजी दर्ज करने में सक्षम होते जाते हैं। अनुभव बढ़ता जाता है, अभ्यास होता जाता है और आत्मविश्वास तथा सटीकता बढ़ती जाती है।

यही बात आपने अपने शब्दों में कही है। यानि आप इस प्रक्रिया के उत्तरार्ध में है और जैसा कि आपने कहा है कि शीध्र ही आप इसमें अधिक सक्षम होते जाएंगे।

अब संबोधन वाली बात पर। ऊपर वाली बात यहां पर भी लागू होती है। यानि वैचारिक स्थिरता और भाषाई निरूपण की कमजोरी। और इसके साथ कई लोगों के सामने एकालाप करने यानि मंच की कमजोरी और जुड़कर इसे बहुगुणित कर देती है। और फलस्वरूप वे लक्षण उभरते हैं। मंच का फोबिया अक्सर व्यक्तियों पर हावी रहता है। हमारे परिवेश में ऐसे अवसर कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए इनका अभ्यस्त नहीं होना स्वाभाविक सा ही है। जब हम व्यक्तिगत रूप से संवाद करने में ही तकलीफ़ महसूस करते हों, वहां अकेले, बहुत से सारे लोगों के सामने बोलना, जो अपना सारा ध्यान आप पर ही केन्द्रित करके आप पर ही टकटकी लगाए बैठे हों तो उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरपाने यानि असफ़लता की संभावना की दिखती उपस्थिति पैर कंपकपा देती है, गला सुखा देती है, आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है।

कई माहिर वक्ता भी अपने अनुभव बांटते वक़्त यह बताते हैं कि मंच पर खड़े होते ही एकबारगी वे भी इन सभी लक्षणों से गुजरते हैं, पर उनका अभ्यास उन्हें इनसे पार पाना सिखा चुका है। वे थोड़ी देर में सामान्य हो जाते हैं और धाराप्रवाह में आ जाते हैं। यानि अभ्यास, यानि इस प्रक्रिया का बार-बार किया जाना जरूरी होता है और यह तभी हो सकता है कि आप बिना परिणामों और प्रस्तुति की चिंता किए बगैर यह करते रहें। धीरे-धीरे इन लक्षणों पर नियंत्रण स्थापित होता जाएगा। और बिना प्रस्तुति की चिंता किये बगैर यह किया जाना थोड़ा अव्यावहारिक सी बात है, तो स्पष्ट है कि हमें प्रस्तुति को बेहतर बनाना होगा, ताकि शुरुआती आत्मविश्वास पैदा किया जा सके। इसके लिए हमें पहले छोटे-छोटे विषयगत एकालापों की तैयारी करनी होगी।

हम जब किसी विषय पर बोलना चाहते हैं, तो एक साथ कई सारे विचार, जिनका कि उस विषय के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध है, हमारे दिमाग़ में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। अगर हमने पहले से जितना भी संभव हो सका है, अच्छी तरह सोच-विचार कर अपनी मान्यताओं और उस विषय पर अपनी समझ को सापेक्षतः निश्चित किया हुआ होता है तो इस अस्थिरता का असर कम हो जाता है। इसलिए, बोलने से पहले तैयारी आवश्यक है। यह तैयारी कि आप अपनी बात को किन आयामों तक सीमित रखना चाहता है, ऐसे मुख्य बिंदु क्या हैं जिन्हें आप अवश्य पहुंचाना चाहते हैं, उन्हें लिखकर अपने पास रखा जा सकता है, उन बिंदुओं पर अपने विचार और समझ को नियत कीजिए कि आपको कितना कहना है, इसको समझाने के लिए आप क्या उदाहरण और दृष्टांत देने वाले हैं या देंगे उन्हें भी संदर्भित कर ले और उनके मुख्य बिंदु भी लिख लें। बस अब आपको अपनी इसी रूप रेखा के आधार पर बोलना है, और बस बोलना है।

मंच पर शुरुआत के अवश्यंभावी फोबिया के लक्षणों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ तरीका है कि पहले आप कुछ हल्की-फुल्की बाते करें, इसके लिए सामान्यतः वहां का तात्कालिक माहौल, श्रोताओं, ख़ुद और विषयगत संदर्भों पर भी कुछ चुटीली, व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की जा सकती हैं जो माहौल और आपके श्रोताओं और आपको भी सहज और एकाकार होने में मदद करती हैं। और फिर पूरी गंभीरता से शुरू हो जाएं, धीरे-धीरे बात को आगे बढ़ाएं। लहज़ा, संवेग आपकी बात को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

अगर आपसे पहले और भी वक्ता रहे हों, तो उनको ध्यान से सुना जाना चाहिए और कुछ मुख्य बिंदुओं को जिनपर सहमति दर्ज करनी हो ( इससे आपकी मिलती जुलती सामग्री को आप छोड सकते हैं, पहले वाले वक्ता का संदर्भ दे कर), और जिन पर आपको अपना प्रतिवाद दर्ज़ करना हो ( इस पर अपना अतिरिक्त प्रतिवाद रखकर अपनी सामग्री की कमी की भरपाई भी हो जाती है) , लिख लेना चाहिए। इनका अपने वक्तव्य में समावेश कीजिए।

यानि संबोधन के फोबिया से इससे लड़कर ही जीता जा सकता है, वैचारिक स्थिरता और भाषाई सुधार और विकास तथा अभ्यास के जरिए ही इसके लक्षणों के प्रभावों को कम किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 1 सितंबर 2012

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है


हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

मुझे कुछ रुखापन नहीं लगा।.....क्योंकि लेखों से दिखता है कि.....समीक्षक हैं और समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे.....एक बात चलते-चलते कि लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे? चापलूसी से, नहीं, ठीक नहीं है। यह तो राजनीति के नेताओं की तरकीब है। लोग स्वीकारते नहीं हैं क्योंकि सब का अहं प्रबल हो जाता है।

आपके नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उन मानवश्रेष्ठ के जरिए आपसे किये गए संवाद पर आपकी तात्कालिक प्रतिक्रिया जानने को मिली। आपका नाम जानने के बाद यह संभव हो गया कि अंतर्जाल के जरिए आपकी और भी कार्यवाहियों से परिचित हुआ जा सके। उनसे भी थोड़ा बहुत गुजरना हुआ। आपने कह ही दिया है इसलिए निश्चिंत रहा जा सकता है कि आप रूखेपन और प्रत्यक्षता को समझ सकते हैं, और इसे हमारी बेरूखी और ह्रदयहीनता नहीं समझेंगे। कि आप चीज़ों को समझने की प्रक्रियाओं में हैं। अतएव आपसे कुछ कठोर भी कहा जा सकता है, आप उसे अन्यथा नहीं लेंगे।

कुछ मनुष्य तुरंत प्रतिक्रियात्मक होते हैं, उतावले से। उनका दिमाग़ ऐसे अनुकूलन का अभ्यस्त होता है, जो तुरंत जवाबी प्रतिक्रिया देता है, और उसे अपनी तात्कालिकता के साथ तुरंत व्यक्त कर देता है। यह कोई ग़लत बात नहीं है, पर इससे यह परिलक्षित होता है कि उसमें धेर्य की कमी है, उसमें अच्छे श्रोता या पाठक होने की प्रवृत्ति नहीं है। वे चीज़ों के साथ अंतर्क्रिया करके उन्हें आत्मसात्कृत करने की बज़ाए उनसे सीधी लड़ाई छेड़ने को, सचेत और सतर्क हो उठते हैं।

ये ज्ञान को, चीज़ों को समझने की प्रक्रिया और पद्धति के लिए ज़्यादा अच्छे लक्षण नहीं हैं। तात्कालिक तुरंत प्रतिक्रियात्मकता, अंतर्विरोधों के साथ, उनसे सकारात्मक द्वंद और संघर्ष करके अपने को विकसित करने का ज़रिया बनाने की जगह, नकारात्मक प्रतिरोध यानि कि विरोधी से, मान्यताओं के विपरीत से जाते लगते विचारों के साथ एक सुरक्षात्मक, सतर्क व्यवहार के लिए प्रेरित करती है। और मनुष्य इस प्रक्रिया में उलझता जाता है, अपने को और रूढ़ बनाता जाता है।

हालांकि आप इसकी इन शुरुआती प्रवृत्तियों से आगे निकल चुके हैं, और बातों को समझने और सही से लगते को स्वीकारने की दिशा में काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, पर इसे और विकसित करने की आवश्यकता है।

आपको आपकी कई उलझनों और बातों पर हम विस्तार से, हालांकि क्लिष्ट सांद्रता और कई गंभीर इशारों के साथ लिख ही चुके हैं। आपको भी उनसे उसी गंभीरता के साथ गुजरना चाहिए, गुजरते रहना चाहिए। कई सूत्र वाक्य वहां कहे गये ही थे। धेर्य के साथ समझने की कोशिश की जानी चाहिए, अपने यथार्थ को समझते और उसके साथ गुनते हुए। किन्हीं बातों पर यदि आवश्यकता महसूस करते हैं तो और भी खुलकर संवाद किया जा सकता है

थोड़ा सा प्रतिवाद, आपकी वाज़िब बात को ही आगे बढ़ाते हुए :

‘समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है, किसी भी क्रिया के लिए। यानि प्रदत्त क्षण में, या तात्कालिक संदर्भों में, आपके लक्ष्य क्या हैं, एकाधिक लक्ष्य होने की अवस्थाओं में प्राथमिकता पर क्या है, यह हमारी कार्यवाहियों को तय करते हैं, या यह कहें कि करने चाहिएं। समीक्षा में या आलोचना में भी ऐसा ही होना चाहिए।

जब यह लक्ष्य प्राथमिकता पर है कि सार्वजनिक रूप से विचार का खंड़न या मंड़न, दत्त परिस्थितियों में ज़्यादा आवश्यक हो गया है तो आपका कहा शत-प्रतिशत सही है। अब संभावित प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखना आवश्यक नहीं है।

पर यदि लक्ष्य आलोचना के साथ-साथ, समीक्षित विचार या उससे संबंधित व्यक्ति में, नकारात्मकता को उभारे बिना, उसे अपनी प्रस्तुति पर पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करवाना हो, यानि उसके विकास की संभावनाओं को ज़िंदा रखना हो, तो स्वाभाविकतः समीक्षा को, उसकी भाषा को, आवश्यक रूप से संयत और संवाद के लिए प्रेरित करने वाली होना चाहिए।

और यदि लक्ष्य वैयक्तिक रूप से उसकी व्यक्तिगत चेतना में, समझ में सचमुच ही सकारात्मक हस्तक्षेप करना हो तो फिर हमारी क्रियाविधियां, भाषा, संवाद का स्तर, उसके ज्ञान और समझ के स्तर के अनुरूप ही रखना होगा, वरना बीच का अंतराल हमारे लक्ष्य को असंभव बना देगा। एक बार संवाद सेतु खत्म, तो हस्तक्षेप की सभी संभावनाएं ख़त्म।

और यह भी होता है कि, हमारा लक्ष्य इनमें से कु्छ भी ना हो, हम सिर्फ़ अपने को केन्द्र में रखकर, अपने हितों और संभावनाओं के पल्लवन के लाभार्थ यह कार्य कर रहे हों, अपने आपको स्थापित करने का लक्ष्य ही सिर्फ़ हमारे दिमाग़ में हो, तो फिर हम किसी भी तरह से, तर्क-कुतर्क करने को स्वतंत्र होते हैं। आप देख ही रहे होंगे, आजकल यही ज़्यादा हो रहा है।

आपकी एक और बात ‘लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे?’ पर भी उपरोक्त में ही कुछ इशारे हो गये हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 25 अगस्त 2012

व्यक्तिगत प्रयासों से क्रांति नहीं हुआ करती

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत करने की योजना है। इस बार उनसे सीधी बातचीत शुरू होने से पहले, एक अन्य मानवश्रेष्ठ से हुआ संवाद जिसमें कि उस युवा मानवश्रेष्ठ के बारे में संवाद स्थापित हुआ था, प्रस्तुत किया जा रहा है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



व्यक्तिगत प्रयासों से क्रांति नहीं हुआ करती


हमारे एक छोटे भाई हैं...जिनसे अभी हाल ही में संपर्क हुआ है...एकदम युवा है...भगतसिंह से एकाध साल कम...उर्जा, जज्बे और इस उम्र के रूमान से भरपूर...शायद यही उनकी समस्या भी है...उनके साथ हुई बातचीत के कुछ मुख्य बिंदु आपको संप्रेषित कर रहे हैं...आप कुछ कहें...मार्गदर्शन कर सकते हैं...कुछ सैद्धांतिक पाठ...जैसा कि हमेशा हमें मिलता रहता है...( इस टिप्पणी के साथ उस युवा मानवश्रेष्ठ के मेल-संवाद संलग्न थे )

दिलचस्प। इस तरह के नामुराद अब कम ही दिखाई देते हैं।

यह व्यक्तित्व, अपरिपक्व युवा ही लग रहा है। हालांकि परिपक्वता का सामान्यतयाः उम्र से कोई संबंध नहीं होता, और खासकर अभी के समय में तो कतई नहीं। परिस्थिगत exposure किसी को भी सापेक्षतः अधिक परिपक्व बना सकते हैं। कई लोग तो पूरी उम्र काट कर निबट लेते हैं, और सामान्य परिपक्वता तक भी नहीं पहुंच पाते। पारिवारिक पृष्ठभूमि में उपलब्ध उर्वरता के साथ जिन्हें अद्यतन ज्ञान की उपलब्ता मिल जाती है, वे अपनी उम्र के सापेक्ष ज्यादा मानसिक विकास कर पाते हैं। परिवेश की जटिलता तो अपनी जगह है ही। इस तरह से देखा जाए तो इस युवा मित्र की अपरिपक्वता सापेक्षतः कई प्रोढ़ परिपक्वताओं पर भारी है।

पर फिर भी यह आदर्शवादी रूझान, ठोस पारिस्थितिक वास्तविकताओं के विश्लेषण की सटीकता से अभी महरूम लग रहा है और बचकाना सैद्धांतिकता में उलझा हुआ लग रहा है। सैद्धांतिकता में शुरुआती आधार तो महसूस हो रहा है, क्योंकि उसने ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के जो पसंदगी के नाम लिए हैं, वे सब सामाजिक परिवर्तनों की आकांक्षा के मामले में तो एक हैं, परंतु उनकी वैचारिकी के अंतर्विरोधों को उसकी विश्लेषण क्षमता अलगा नहीं पा रही लगती हैं। उसकी चेतना आदमीयत के मूलभूत आधारों तक तो पहुंच गई है, अब उसे आगे सही दिशा में परवान चढ़ना है, वरना यह अतिरिक्त उत्साह उसकी संभावनाओं को नष्ट भी कर सकता है।

भगतसिंह की परंपरा से उसकी उर्जा जुड़ती दिखाई देती है, अतएव क्या यह ठीक नहीं होगा कि उसे दुनिया को समझने के लिए अभी और सैद्धांतिक, दार्शनिक अध्ययन करना चाहिए, तभी वह वैज्ञानिक नज़रिया विकसित होगा जो दुनिया को समझने की ठोस पूर्वापेक्षाएं विकसित करता है। दुनिया को बदलने की सिर्फ़ आकांक्षा ही पर्याप्त नहीं होती, इस तरह से इतिहास में कई संभावनाएं बिना किसी सार्थकता के बुलबुले की तरह उछलकर नष्ट होती ही रही हैं। इसलिए यह भी समझना पड़ेगा कि बदलाव की प्रक्रिया क्या होती हैं, कैसे परवान चढ़ती हैं और उनमें एक व्यक्ति के नाते किसी की भी भूमिका क्या हो सकती है।

उसे राजनीति और विभिन्न वादों को समझना होगा, उनके अंतर्विरोधों और उनकी ऐतिहासिक भूमिकाओं को समझना होगा, तब जाकर कहीं उनमें से चुनाव का सवाल खड़ा होगा। यह समझना होगा कि कोई भी वाद या राजनैतिक सोच ऐसे ही आसमान से नहीं टपक पड़ते, या व्यक्तिगत चेतनाओं में उतर नहीं आते। वे समाज के ऐतिहासिक क्रम-विकास की अवस्थाओं में तात्कालीन परिस्थितियों की निश्चित अभिव्यक्ति होते हैं। विकास की अवस्थाओं में गतिरोध उत्पन्न होने पर समाज की प्रगतिशील शक्तियों और प्रतिगामी या यथास्थितिवादी शक्तियों के आपसी अंतर्द्वंद और संघर्ष नई संभावनाएं, नये वाद, नई राजनैतिक सोच पैदा करता रहता है। जाहिर है किसी एक वाद और राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के तहत मनुष्य तभी तक चल सकता है, जब तक कि वह सामाजिक विकास की अग्रगामी अवस्थाओं को तुष्ट करता रह सकता है। विकास की एक निश्चित सी अवस्था में पहुंचने के बाद उत्पादन और सामाजिक विकास के साथ यह प्रयुक्त प्रणाली परिस्थितियां बदलने के कारण लयबद्ध नहीं रह पाती, नई सामाजिक अवस्थाओं और प्रणालीगत आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम नहीं रह जाती और जाहिरा तौर पर ढ़ांचागत आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता पैदा होती है, इसीलिए अवश्यंभावी तौर पर प्रणालियां बदल दी जाती हैं। इसी तरह नये सामाजिक और राजनैतिक ढ़ांचे अस्तित्व में आते हैं। इतिहास यही हमें सिखाता है।

यह बात इसलिए कही गई है कि व्यवस्थागत बदलाव की भी अपनी नियमसंगतियां होती है, कुछ परिस्थितिगत पूर्वापेक्षाएं होती हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई भी, कभी भी, कहीं भी अपनी सुविधानुसार या अपने संयोगों के अनुसार आंदोलन का झंड़ा उठाए और क्रांति करने निकल पड़े। इससे यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यह हतोत्साहित या निराश करने वाली बात है, या यह कि फिर क्या खाली बैठे रहा जाए और निष्क्रिय रूप से परिस्थितियों का इंतज़ार किया जाए। यह समझना ही होगा कि यह अगर पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ किया जा रहा है तो सिर्फ़ अतिउत्साह और क्रांतिकारी रूमान में अपने आपको बेवज़ह, निरर्थक बलिदान करने की राह है, जिससे कि अक्सर उनके हश्र के उदाहरणों से परिवर्तनकारी धाराओं में गतिरोध ही पैदा होते हैं।

ना वैचारिक, भौतिक तैयारी के युद्ध में उतरजाना बेमानी है, और यह अधिक हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है, जबकि ऐसे हालात हो कि कहीं प्रत्यक्ष युद्ध ही नहीं चलता दिखाई दे रहा हो। भारत में, जहां कि गरीबों, दलितों, महनतकशों, किसानों की हालत चिंताजनक है, फिर भी प्रतिरोधी आंदोलनों और क्षमताओ की प्रभावी धारा अभी नहीं बन पा रही है। उनकी हालत खराब है, अशिक्षा है, भाग्य, भगवान और धर्म की बेड़िया हैं, क्षेत्र और जातिवादी अभिव्यक्तियां हैं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है, आदि-आदि। नेतृत्वकारी मध्यमवर्गी शक्तियां, उदारवाद के फलों का हिस्सा हड़पने और हड़प सकने के सपनों में उलझी है। उसकी अभी की व्यावहारिक परेशानियों के मद्देनज़र वह सिर्फ़ कुछ सुधारवादी आंदोलनों में अपने आपको सिर्फ़ अभिव्यक्त करके खुश है। अभी यही हो रहा है कि सभी तरह के बदलाव के अभियान, परिस्थितिगत बदलावों की आवश्यकताओं के मद्देनज़र सही भूमिका तलाशने की जगह, खु़द परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित हो जा रहे है, और परिवर्तनकारी धार को कुंद कर ले रहे है।

इस युवा में काफी दृढ़ता है। व्यक्तित्व में दृढ़ता अत्यन्त जरूरी अवयव है। इससे बगैर अपने आपको, अपने मंतव्यों के हितार्थ साधना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। लेकिन दूसरों की चेतना में सार्थक हलचल और मनोनुकूल सकारात्मकता पैदा करने के महती उद्देश्य से थोड़ी सी नम्यता की भी आवश्यकता होती है। अपने मनोनुकूल लोगों का समूह बन जाना अत्यंत ही आसान कार्य है। हम ज़्यादा कठिन कार्य चुन सकें, किसी अपरिपक्व चेतना में सार्थक हस्तक्षेप कर सकें, अपने आपको अनजानों में विस्तार दे सकें। ऐसा लगे कि हमारे, और हमारे स्वस्थ विचारों के होने का कोई असली मतलब सिद्ध हुआ, ज़िंदगी सिमट कर ना रह गई। यही वे कामनाएं हैं, जिन्हें अपने परिवेश में साकार होते देख पाने का स्वप्न हमारी चेतना में होने चाहिएं।

ये युवा मित्र अभी जैसा कि आपने कहा रूमान में हैं। इसके मनोविज्ञान को हमें समझना चाहिए। मनुष्य, वास्तविकताओं से इसलिए भागता है, क्योंकि ये निश्चित ही सुखद नहीं है। जिनके लिए ये सुखद हैं, वे इन्हें कायम रखना चाहते हैं। वे वस्तुस्थिति को सापेक्षतः ज्यादा बेहतर समझते हैं, इसीलिए भ्रमजालों में फंस सकने और फंसे रहने की परिस्थितियां बनाए रखने में काफ़ी उर्जा का व्यय करते हैं। जिन थोड़े से विद्रोही व्यक्तित्वों को ये उचित नहीं जान पड़ती वे इन्हें तुरंत बदलने के रूमान की तरफ़ सहज आकर्षित होते हैं।

मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से सोचें, तो इन वास्तविकताओं में ही रहना और भोगना, उसकी पारिस्थितिक मजबूरी है, पूरा सेट-अप है, इससे वह नहीं भाग सकता। यानि भौतिक स्तर पर जिजीविषा हेतु जूझने और खपने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, यह वस्तुगत सत्य, जीवन ख़ुद सिखा देता है। अब जीवन की वास्तविकताओं से पलायन संभव नहीं है, ये सुखद भी नहीं है, जूझना और खपना जहां नियति है, व्यक्तिगत स्तर पर अपने अस्तित्व के अनुभव और उसके आनंद के अवसर नहीं हैं, अपना होना और उसको बेहतर बनाने और उसके जरिए अपनी बौद्धिक और सामाजिक उपयोगिता साबित कर सकने और सुकून पाने की संभावनाए बड़ी लचर हैं। वह कहां से व्यक्तिगत सुकून लाए? कहां अपनी सामाजिक उपयोगिता तलाशे?

जाहिर है इसीलिए हम कई व्यक्तियों को अपने जीवन से इतर, कुछ ऐसे ही क्रियाकलापों में, सामाजिक गतिविधियों में, सुधार की संभावनाओं में और कुछैकों को आमूलचूल परिवर्तनकारी आकांक्षाओं में अपना अस्तित्व तलाशते पाते हैं। पर हमें समझना होगा कि जो इन क्रियाकलापों और मनोव्यवहार को समझते हैं, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता महसूस करते हैं उनके लिए निराशा का माहौल तो है ही, इसमें तो कोई शक ही नहीं है, पर यदि निराशा ज्यादा हावी हो रही है, तो इसमें भी शक नहीं कि उनकी वैचारिक स्थिति और समझ पूरी तरह वस्तुगत नहीं हो पाई है, वे अतिआशावादी हैं, वे अपने को इस भाववादी विचार से नहीं उबार पाये हैं कि विचार मात्र से चीज़ों को बदला जा सकता है। परिस्थितियां नियामक और प्राथमिक होती हैं, और इनसे उत्पन्न विचार इनके नियमन की कोशिश करते हैं। यह द्वंद चलता रहता है। जाहिर है कि जीवन परिस्थितियों में बदलाव लाए बिना, वैचारिक उन्नयन की आशा अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है।

प्रकृति के अपने विकास के नियम हैं, इसी तरह समाज के विकास के भी अपने नियम हैं। क्रांतियां पहले भी यह होती रही हैं, और आगे भी अवश्यंभावी है। समाज का ढ़ांचा जब उसके विकास को अवरुद्ध करने लगता है, तो समाज स्वयं पुराने ढ़ांचे को तोडकर नये ढ़ांचे का निर्माण करता है जो कि विकास की परिस्थितियों के लिए ज़्यादा मुफ़ीद होता है। इसी को क्रांति कहते हैं। आदिम सामुदायिक समाज से सामंती समाज में, और फिर सामंती समाज से लोकतांत्रिक पूंजीवादी समाज में संक्रमण इसी तरह हुआ है। यह किसी व्यक्ति या विचार पर निर्भर नहीं होती, यह समाज के विकास की परिस्थितियों पर निर्भर होती है, बल्कि व्यक्ति या विचार भी समाज की इन्हीं ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज होते हैं

इसलिए हमारे युवा मित्र को समझना होगा कि वे सिर्फ़ सोच-विचार कर, भावनाओं के आधार पर, किसी सही और सार्थक आंदोलन को जन्म नहीं दिया जा सकता, बिना परिस्थितियों तथा इनके बदलाव की वास्तविक आवश्यकताओं और इसके लिए परिवर्तनकारी शक्तियों के संगठित संघर्षों की श्रृंखलाओं के, अपने व्यक्तिगत प्रयासों से क्रांति नहीं कर सकते, भारत को बदल नहीं सकते। इस रूमान से बाहर आना ही होगा, और बदलाव की प्रक्रिया का समुचित अंग बनना होगा। 

इसलिए यह भी समझना होगा कि फिर हस्तक्षेपों की भूमिका क्या हो सकती है। इन हालातों में जाहिर है कि एक लंबी लड़ाई, लंबे संघर्षों की राह अवश्यंभावी है। इसलिए अपने आपको उसी के अनुरूप तैयार करना होगा। अपने आपको, अपने विचारों को, अपनी उर्जा और पक्षधरता को, बचाए रखना और बनाए रखना महती आवश्यकता है, वरना येन-केन प्रकारेण व्यवस्था सभी को अनुकूलित कर ही लेती है, बहाने हज़ार मिल ही जाते हैं।

तो पहले इस युवा मित्र को खुद को ज़िंदा रखने के आधार तलाशने चाहिए, ऐसे आधार जिनसे अपनी वैचारिकी को बनाए रखा जा सके, अपने आपको और अधिक परिपक्व बनाया जाना चाहिए, अपनी दार्शनिक और राजनैतिक समझ और सोच को पुख़्ता और निष्कर्षात्मक करना चाहिए, एक दिशा और पक्षधरता तय करनी चाहिए, अपने परिवेश के संघर्षों की आग को पहचानना और उनमें भागीदारी करना शुरू करना चाहिए, परिस्थितिगत भूमिकाएं चुननी चाहिए और उनका निर्वाह करना चाहिए, पूरी जिम्मेदारी और समझदारी के साथ।

अपने आपको समाज से विलगाना, जैसा कि युवा मित्र ने अपने परिवार और समाज संबंधी जिक्र किये हैं, व्यक्तिवादिता की तरफ़ ले जाते हैं। समाज से अलग और पृथक किसी व्यक्ति का अस्तित्व नहीं हो सकता। वे जिस भी राह पर चलेंगे, वहां-वहां एक नया परिवार, एक नया समाज अपने चारों तरफ़ बुनते चलेंगे। और उनकी अपेक्षाएं, आवश्यकताएं, अंतर्निर्भरताएं ऐसे कई अनेकों बंधन बनाती चलेंगी। कहां-कहां से भागते रहेंगे, बंधनों से बचकर। ये बंधन नहीं, मनुष्य की जैविक उपस्थिति के अंतर्संबंधित आयाम हैं। इनको, इन्हीं के साथ, अपने उद्देश्यों के लिए चैनलाइज़ करना सीखना होगा।

अब आप जानें, आप ये विचार उन तक किस तरह पहुंचाते हैं। यह रूढ़ और रूखें है, आप ठीक तरह से उनसे संवाद कीजिए। आप उन्हें हमारा मेल दे सकते हैं, जहां यदि वे चाहे तो संवाद स्थापित कर सकते हैं। ताकि यदि कुछ विस्तार से, या बिंदु विशेष पर बात करनी हो तो की जा सके।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 4 अगस्त 2012

मन, व्यवहार और रसायन

हे मानवश्रेष्ठों,

कुछ समय पहले हमारे प्रिय एक विशिष्ट मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, मन, व्यवहार तथा रसायन और समलैंगिकता के संदर्भ में एक संवाद स्थापित हुआ था। इस बार वही संवाद यहां भी प्रस्तुत किया जा रहा है।

वह कथन फिर से रख देते हैं कि आप भी इससे कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



मन, व्यवहार और रसायन

बहुत दिनों पहले मैं अपने एक चिकित्सक मित्र से बात कर रहा था. हमारी बात मनोविज्ञान पर चली और हमने फ्रायड, एडलर, युंग, मास्लो आदि पर बात की. मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसने इन विचारकों के कार्यों को गंभीरता से नहीं लिया और कहीं-कहीं उनसे अनभिज्ञता भी दिखाई.

पता नहीं कि चिकित्सक मनोवैज्ञानिक क्षेत्र से संबंधित थे या नहीं। अगर वे सामान्य चिकित्सक थे तो यह अधिक आश्चर्य की बात नहीं है। शिक्षा इतनी औपचारिक तथा विशिष्ट बना दी गई है कि अगर कोई ख़ुद ना चाहे तो बने-बनाए पाठयक्रम में सिमट कर रह जाता है। हमारे ही घरों के बच्चे गलाकाट प्रतियोगिताओं की संकरी गलियों से, आम कैरियरिस्टिक मानसिकताओं से उच्च शिक्षाओं में कदम रखते हैं और अपने आपको उसी हेतु केंद्रित रखते हैं। बाकी सब फालतू समझा जाता है। अतएव सामान्य चिकित्सकों के पास अपने क्षेत्र की, एक निश्चित प्रतिरूप की विशिष्ट जानकारी भले ही हो, अन्य सामान्यीकृत ज्ञान से वे अक्सर अपने परिवेश की तरह ही अछूते रहते हैं।

अगर वे मनोचिकित्सा से संबंधित हैं फिर थोड़ा बहुत आशचर्य की बात जरूर है। थोड़ा बहुत इसलिए कि वे भी उपरोक्त प्रक्रिया से ही गुजरकर इस मुकाम पर पहुंचे हैं, और आश्चर्य इसलिए कि अगर उन्होंने मनोविज्ञान पढ़ी है, तो अभी की पढ़ाई जा रही अकादमिक मनोविज्ञान, आपके द्वारा जिक्र किए महानुभावों के विशलेषणों पर ही अधिक आधारित है। हां यह जरूर है कि वहां इनका समग्र कार्य ना होकर उनके संदर्भ और आधार हुआ करते हैं। सभी को जल्दी है, तुरंत पैसा कमाने की मशीनों में तब्दील हो जाने की, अतएव अपने विषय से भी संबंधित सामग्री की गहराई और संदर्भित महानुभावों के समग्र काम से गुजरना सामन्यतः प्रचलन में नहीं है।


उसमें मुझे केवल यही बताया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान रासायनिक थ्योरी पर आधारित है. इसका अर्थ यह है कि मानसिक अवस्थाओं और विकारों को रासायनिक क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर समझा जाता है, यथा, सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे न्यूरो ट्रांसमीटरों के अल्प या अधिक स्त्राव से यह समझा/समझाया जाता है कि किसी व्यक्ति विशेष के व्यवहार और मानसिक दशाओं में कैसे परिवर्तन आते हैं या आ सकते हैं.यह सब समझने में मुझे कुछ दिक्कतें हैं. क्या मैं यह मानूं कि किसी कारणवश उद्भूत निराशा के कारण किसी व्यक्ति के मष्तिष्क में कोई रसायन कम या अधिक बनने लगा और वह अवसादग्रस्त हो गया? यदि यह मान लें तो क्या यह भी मानना पड़ेगा कि किसी फीजियोलौजिकल प्रभाव में मष्तिष्क में किसी रसायन के अल्प/अधिक स्त्राव से मनुष्य अकारण ही अवसादग्रस्त भी हो सकता है या प्रमादग्रस्त भी? यहाँ कार्य-कारण का सिद्धांत कैसे काम करेगा? क्या निराशा से रासायनिक गतिविधि प्रभावित होती है या रासायनिक गतिविधि की गड़बड़ी होने से निराशा छाती है?

यह प्रवृति आधुनिक समय में अधिक हावी हो गई है। विज्ञान के उन्नत होने के साथ विभिन्न मानसिक अवस्थाओं से संबंधित, मस्तिष्क की जैवरसायनिक प्रक्रियाओं के अध्ययन और विश्लेषण की प्रक्रियाएं भी अधिक विस्तृत हुईं। और जाहिरा तौर पर उनके परिणामों तथा निष्कर्षॊं के मनोवैज्ञानिक व्याख्याओं में सम्मिलित करने का भी दौर शुरू हुआ।

वैज्ञानिक तथ्य अपनी जगह होते हैं और उनकी व्याख्याओं में, व्याख्या करने वाले महानुभावों तथा समूहों की अपनी हितबद्धताएं, पक्षधरताएं भी अपनी भूमिका अदा करती हैं। आज की हावी शक्तियों और विचारधाराओं ने, जैसा कि आप समझ ही रहे हैं, अपनी हितबद्ध व्याख्याओं में मूल कार्यकारण संबंधों को ही उलट दिया है।

मानसिक अवस्थाएं, प्रतिक्रियाएं मनुष्य की सक्रियता के लंबे अनुकूलन पर निर्भर किया करती हैं और यही मूल में हैं। उसका यह अनुकूलन, किसी वस्तु के प्रति किस तरह की प्रतिक्रिया करता है यह उसके पुराने अनुभवों की लंबी श्रृंखला के फलस्वरूप पैदा होता है। उसे आगे विश्लेषित करने में, इसके कारण होने वाले शरीरक्रियात्मक, जैव-रसायनिक प्रक्रियाओं की गहराई में जाया जा सकता है, यह अलग बात है। सक्रियता से जैव-रसायनिक प्रक्रियाएं शुरू होती हैं, परंतु जैव-रसायनिक परिवर्तनों को पैदा करके मनुष्य की सक्रियता को बड़े स्तर पर सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

किसी व्यक्ति के हमको अच्छा लगने पर ( और यह व्यक्ति को अच्छा मानने के हमारे मापदंड़ों, हमारे अनुभवों के अनुकूलनों पर निर्भर करता है ) न्यूरोट्रांसमीटर्स का एक्टिव होना, उसके प्रति हमारे आकर्षण में व्यक्त हो सकता है। परंतु इसका उल्टा होना, यानि न्यूरोट्रांसमीटर्स को एक्टिव करके किसी के लिए भी वैसा ही आकर्षण पैदा कर पाना, हमें भी आपकी ही तरह संभव नहीं लगता। इसके लिए वस्तुगत मनोविज्ञान में एक ‘समष्टि से अंशों की ओर’ का कार्य सिद्धांत प्रयोग में लिया जाता है। इसके अनुसार बाह्य प्रभावों की छापों का साकारीकरण ‘ऊपर से’, यानि मनुष्य की सक्रियता द्वारा होता है, शरीर-अंग-कोशिका दिशा में होता है, न कि इसके विपरीत दिशा में। किसी भी तरह के औषधीय उत्प्रेरक इस बुनियादी तथ्य को नहीं बदल सकते। शरीर के रासायनिक क्रियातंत्र आनुषंगिक तथा व्युत्पाद होते हैं, जिनके लिए किसी विशिष्ट सक्रियता की पूर्वापेक्षा आवश्यक होती है। अभी तक हमारी जानकारी में यही है, और उचित लगता है।

विशिष्ट भावनाओं को किन्हीं विशिष्ट जैव-रसायनों के साथ संबंधित किया जा सकता है, और यह होता भी है। इन्हीं जैव-रसायनों के प्रभाव से हमारी प्रतिक्रियात्मकता भी संबंधित की जा सकती है। कोई विशिष्ट मानसिक स्थिति, किसी जैव-रसायन के स्राव का कारण हो सकती है और उस जैव-रसायन के प्रभाव से हमारी प्रतिक्रिया निश्चित भी। इससे यह भी हो सकता है किसी जैव-रसायन के प्रभाव से मनुष्य किसी विशेष मानसिक स्थिति में अपने को महसूस करे। अतएव यह कहा जा सकता है कि किसी मनोदशा से शरीर की रासायनिक गतिविधि प्रभावित होती है, और रसायनिक गतिविधि की गड़बड़ी से मस्तिष्क किसी विशेष मनोदशाओं में आ सकता है। पर ये मानसिक स्थिति विशेष में लाने या निकालने का तात्कालिक मामला ही हो सकता है। किसी मनोदशा विशेष से स्रावित हुए रसायनों, जो कि शरीर की अन्य क्रियाविधियों को भी ( मसलन रक्तचाप, धड़कनें, आवेश, श्वास आदि ) प्रभावित कर सकते हैं, के प्रभावों को नियंत्रित करने का मामला हो सकता है। असामान्य मनोविकारों, स्थिर मानसिक विचलनों के प्रभावों से निपटने का मामला हो सकता है, परंतु सामान्य मानसिक अपरिपक्वताओं से, जो कि मनुष्य की सक्रियता और अनुकूलन की वज़हों से है, तो सक्रियता और अनुकूलन को प्रभावित करके ही निपटा जा सकता है, रसायनों का प्रयोग तात्कालिक राहत देकर इन लंबी और श्रमसाध्य प्रक्रियाओं से बचने का ही रास्ता उपल्ब्ध करवाता है।

आप जिस बात को मूल में रखकर इस पर संशय कर रहे हैं वह एकदम जायज है। हम भी इसी तरह के संशयों में रहा करते हैं।

मनोविज्ञान पर एक पोस्ट से लिया गया यह अंश भी देखिए:

"यहां डील-डौल और कतिपय मानसिक विशेषताओं के बीच संबंध इसलिए है कि उनका एक ही आधार है : रक्त की रासायनिक संरचना और अंतःस्रावी तंत्र की ग्रंथियों द्वारा निस्सारित हार्मोन। १९४० के दशक में अमरीकी वैज्ञानिक वाल्टर शेल्डन ने भी यही मत प्रकट किया कि मनुष्य की वैयक्तिक मानसिक विशेषताएं हार्मोनी तंत्र द्वारा नियंत्रित शारीरिक ढांचे से, यानी शरीर के विभिन्न ऊतकों के परस्परसंबंध से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है।

यह नहीं कहा जा सकता कि ये मत सर्वथा निराधार हैं। किंतु वे समस्या के एक ही पहलू की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं और वह भी मुख्य पहलू नहीं है। सभी मानसिक परिघटनाएं सीधे मानस के आधारभूत अंग, मस्तिष्क के गुणधर्मों की उपज होती हैं और यही मुख्य बात है। यद्यपि शरीर के तरलों अथवा रसों के महत्त्व का प्राचीन विचार हार्मोनी कारकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका से संबद्ध बाद के विचारों से मेल खाता है, फिर भी स्वभाव के प्राकृतिक आधार के बारे में आजकल किए जा रहे अनुसंधान इस बुनियादी तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकते कि व्यवहार की गतिकी ( dynamics ) को प्रभावित करनेवाले सभी आंतरिक ( और बाह्य ) कारक अपना कार्य अनिवार्यतः मस्तिष्क के माध्यम से करते हैं। आधुनिक विज्ञान स्वभाव के व्यक्तिपरक भेदों का कारण मस्तिष्क ( प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था और अवप्रांतस्था केंद्रों ) की प्रकार्यात्मक ( functional ) विशेषताओं में, उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों में देखता है।"

इसी तरह अन्यत्र की गई टिप्पणी का यह अंश भी, कुछ और मदद मिल सकती है:

"मानवव्यवहार को मात्र कुछ रसायनों तक सीमित कर देने से, इन्हें वैज्ञानिक रूप से, प्रगतिशील मूल्यों के रूप में स्थापित कर देने से, जाहिरा तौर पर इन रसायनों से संबंधित एक गैरजरूरी बाज़ार खड़ा किया जा सकता है और मुनाफ़ो का ढ़ेर लगाया जा सकता है।

दूसरा ऐसा स्थापित करने से मानवीय व्यवहार की सामाजिक अंतर्निर्भरता के बज़ाए व्यक्तिवादी आत्मकेन्द्रिता को आधार मिलता है, क्योंकि यह भ्रम स्थापित किया जाता है कि इन्हें कुछ रसायनों के जरिए पैदा और नियंत्रित किया जा सकता है। जाहिरा तौर पर ऐसे आत्मकेन्द्रित व्यक्तिवादी सोच के मनुष्य आज की व्यवस्था के इच्छित हैं जो मनुष्य की सोच और दृष्टिकोणों तक को गुलाम मानसिकता में बदल डालने की कोशिशों में हैं। ....वैज्ञानिक सूचनाओं को, ऐतिहासिक और क्रम-विकास के संदर्भों में परखे बिना सही समझ विकसित नहीं की जा सकती, या कि इन्हें सही समाजिक सोद्देश्यता प्रदान नहीं की जा सकती।

इन हारमोनों के खेल को हम लगभग पूरी जैवीय प्रकृति में (फिलहाल मानव को छोड दें) अस्तित्वमान देखते हैं और इन्हीं की वज़ह से उत्प्रेरित सहजवृत्तियों से सक्रिय कई जीवों को समयआधारित प्रजनन संबंधों की प्रक्रिया में संलग्न देखते हैं। जाहिर है इसी वज़ह से यह विचार और शोध की आवश्यकताएं पैदा हुईं कि इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में मनुष्यों के व्यवहार को भी समझा जाना चाहिए।

मनुष्य भी इसी जैव प्रकृति का अंग है तो नियमसंगति यहां भी मिलनी चाहिए, और इसी के अवशेषों को जाहिर है उक्त खोजों के अंतर्गत संपन्न कर लिया गया लगता है।मानव प्रकृति की सहजवृत्तियों के खिलाफ़ अपने सोद्देश्य क्रियाकलापों के जरिए हुए क्रमविकास के कारण ही अस्तित्व में आ पाया है। मनुष्य अपनी इस चेतना के जरिए ही यानि सचेतन क्रियाकलापों के जरिए ही, अन्य जैवीय प्रकृति की सहजवृत्तियों से अपने आपको अलग करता है।

जाहिर है अब मनुष्य कई सहजवृत्तियों के हारमोनों संबंधी उत्प्रेरकता की आदतों से आगे निकल आया है और कई नई तरह की सचेत क्रियाकलापों के लिए अनुकूलित हो गया है।"

००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
इसके अतिरिक्त मुझे समलैंगिकता को समझने में भी समस्या है. मैं इसे अवांछित चारित्रिक विचलन (perversion) मानता हूँ जबकि मनोविज्ञान इसे स्वाभाविक व्यावहार मानने पर तुला हुआ है.

समलैंगिकता पर काफ़ी पहले ब्लॉग पर लिखा था कुछ, वह भी देख लिया जाए। थोड़ा बहुत वहां से समझने में मदद मिल सकती है। लिंक यह है:

जैसा कि आप जानते ही हैं, कई सारे पहलू हुआ करते हैं चीज़ों के। परिघटनाओं के पीछे कई घटक काम कर रहे होते हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष।  इसलिए कई असामान्य सी चीज़ों की तह में जाना थोड़ा मुश्किल होता जाता है।

आप इसकी असामान्यता की वज़ह से इसे अवांछित चारित्रिक विचलन कह रहे हैं, वहीं मनोविज्ञान की एक धारा ( क्योंकि यह वास्तविकता में अपनी उपस्थिति रखता है और कई लोगों के स्वभाव का सा ही अंग बन जाता है ) इसे स्वाभाविक व्यवहार मनवाने पर तुला हुआ है। हालांकि इसके पीछे कई दूसरे कारण, मसलन साधनसंपन्नों की कई व्यक्तिवादी, भोगवादी, पाशविक प्रवृत्तियों को जस्टीफाई करना भी होता है।

कई बार बचपन के कई अनुभवों के कारण जिसमें कि साथ के किशोरों या वयस्कों के द्वारा किए गये यौन-व्यवहारों की स्मृतियां शामिल होती हैं, यौनिकता के जोर मारने पर, और जबकि सामान्य अवसर उपलब्ध नहीं हुआ करते हैं, किशोर अवस्था में यह एक सामान्य सी प्रक्रिया हो जाती है जो कुछ किशोर इधर-उधर के मौके पर प्रयोग में ले लिया करते हैं। इसके साथ सामान्य सी यौन-जिज्ञासाओं की तुष्टि की आवश्यकता जुड़ी होती है। कई बार यह गाफ़िल बच्चों के साथ संपन्न होती है, कई बार हमउम्रों के साथ करने की हिमाकत भी कर ली जाती है। हमउम्रों के साथ, क्योंकि वे अधिक गाफ़िल नहीं हुआ करते, कुछ मामलों में ये सचेतन रूप से भी संपन्न होने लगती हैं, और उस जोड़े विशेष के लिए असहज नहीं रह जाया करती। सामान्यतः अधिकतर किशोर इससे मुक्त हो लिया करते हैं, कुछैकों में यह बाकी रह जाती है, लंबी खिंचती है और उनके लिए ये समलैंगिक संबंध अधिक सहज लगने लगते हैं। बाद में, यह हो सकता है कि वे इसके पक्ष में खुलकर खड़े होने की हिम्मत जुटा लें, इसके पक्ष में तर्क-कुतर्कों का झमेला बुन लें, विपक्ष खड़ा हो तो खुलकर पक्ष बना लें, एक संप्रदाय बन जाए। यह भी एक पहलू है।

हार्मोनिक विकारों की संभावनाओं का जिक्र उक्त लिंकित पोस्ट में किया ही जा चुका है। एक और पहलू देखिए। पुरुषसत्तात्मक समाज में, पुरुषत्व का, मर्दानगी का आभामंड़ल बचाए रखना पुरुष के लिए इतना आवश्यक हो जाता है कि वह यौनिक क्रिया में परफोरमेन्स के डर से, नामर्द साबित हो जाने के डर से इतना आक्रांत रहता है कि सभी तरह के एकांतिक यौन आनंद के मामले, जहां परफोरमेन्स की अनिवार्यता नहीं जुडी हो, अपनाने को इच्छुक रहता है। हस्तमैथुन, समलैंगिकता, पशुगमन, बच्चों-किशोरों के साथ छुटपुट क्रियाएं, कई अन्य तरह की यौन तृप्तिकारक क्रियाएं, जहां सिर्फ़ आनंद के साथ सिर्फ़ एकांतिक स्खलन से मुक्त हो लिया जाए, मर्दानगी भी कायम रह जाए, लिप्त रहने को उत्सुक रहता है। यह मनोविज्ञान कई सारे असामान्य यौन-व्यवहारों को समझा सकता है।

अब इससे आप जूझिए कि इसे कहां रखना चाहेंगे। :-)

००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००

हो सकता है ये कुछ इशारे आपके लिए काम के साबित हों, और कुछ नया जोड़ने का सामर्थ्य रखते हों। नहीं तो भी कोई बात नहीं, संवाद ही अपने आप में कई गुत्थियां सुलझाने में मदद किया करता है। बनाए रखें।

आपने संवाद हेतु प्रस्तुत हो मान बढ़ाया, हम शुक्रगुजार हैं।
शुक्रिया।

समय
Related Posts with Thumbnails