शनिवार, 26 जनवरी 2013

नास्तिकता, नैतिकता और विश्वसनीयता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



नास्तिकता, नैतिकता और विश्वसनीयता

एक और सवाल है। एक जन ने कहा था कि धर्म को नहीं मानने पर ‘रिश्तों में पवित्रता’ का सवाल बचा रहता है। नास्तिक कैसे रिश्तों की पवित्रता में विश्वास करता है? यह सवाल मुझे महत्वपूर्ण लगा। इसपर कहिए कुछ।

दिमाग़ो में, सिद्धांतों में ‘रिश्तों में पवित्रता’ को भले ही कोई धर्म से जोड़ता रहे, पर व्यवहार में हम देखते हैं ‘रिश्तों में पवित्रता’ के सवाल का धर्म से दूर-दूर तक कोई व्यावहारिक नाता नहीं ठहरता है। सामाजिक व्यवहार या सक्रियता के सामाजिक और नैतिक मानदंड़, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से तय हुआ करते हैं। धर्म इनका एक अंग मात्र है और हो सकता है कि यह इन्हें तय करता हुआ सा लगे, पर वास्तविकता में यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रह पाता। धर्म अगर तय कर रहा होता तो हमारे भारत जैसे महान आध्यात्मिक और धार्मिक देश में रिश्तों के बीच कमाल की पवित्रता कायम रह रही होती। पर हम जानते हैं, ऐसा है नहीं।

धर्म कई बार वही रहता है, पर उसके अलग-अलग स्थानों और सभ्यताओं में, सामाजिक रिश्ते बनाने और निभाने में पवित्रता के नैतिक मानदंड़ बदल जाया करते हैं। पितृसत्तात्मक समाजों की नैतिक परंपराओं में जो रिश्ते अपवित्र माने जाते हैं, मातृसत्तात्मक समाजों की नैतिक परंपरा में उन्हें जायज़ रिश्तों में ढाला जाता है। आपके पास एक पुस्तक है नीतिशास्त्र, उसके ज़रिए आप इन नैतिकताओं की समस्या के बारे में अधिक जान पाएंगे। एक नास्तिक, सामाजिक नैतिकता के अधिक ऊंचे आदर्शों और मानदड़ों से संचालित हो रहा होता है, अपनी अधिक व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के साथ समाज से बाबस्ता हो रहा होता है तो वह अपने रिश्तों और उनकी पवित्रता को भी इन्हीं आदर्शों और जिम्मेदारियों के सापेक्ष ऊंचे स्तर पर रखने को मजबूर होता है। यहां व्यक्तिगत ईमानदारी का मू्ल्य अपनी मूलगामिता निभा ही रहा ही होता है। व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी के मूल्य से संपृक्त मनुष्य हर अवस्था में अधिक नैतिक रह सकता है। व्यक्तिगत तौर पर ईमानदारी और जिम्मेदारी के मूल्यों से विरत व्यक्ति धार्मिक आस्थावान हो, या नास्तिक वह अपनी नैतिकता में ढीलमपोल से ही पेश आएगा।

धार्मिक व्यक्ति के पास अपनी नैतिकता से विचलन के कई शास्त्रीय-धार्मिक उदाहरण और धार्मिक मिथकों की तार्किकताएं मिल सकती हैं जिन्हें वह अपनी ढ़ाल या जायज़ता के लिए इस्तेमाल कर सकता है, और करता ही है। जबकि एक नास्तिक, जो एक उच्चस्तरीय सामाजिक नैतिकता से भी संपृक्त हो, के पास विशुद्ध नैतिक और सामाजिक मानदंड़ो के सिवाय कुछ नहीं होता, और वे उसके सामाजिक हितों और पवित्रताओं से विचलन को निरंतर नाजायज़ ही ठहराएंगे।

‘वह अपने रिश्तों और उनकी पवित्रता को भी इन्हीं आदर्शों और जिम्मेदारियों के सापेक्ष ऊंचे स्तर पर रखने को मजबूर होता है’....यानि दमन होता हैं कहीं-न-कहीं।....जैविक व्यवहार एक यथार्थ है और इससे इतर कोई भी छद्म सिद्धांत जो जाहिर है, धर्म में खूब है, आदमी को दिखावा करने वाले, घोर दमनकर्ता बनाते हैं।...बात यह है कि ‘मजबूर होता है’ का अर्थ ऐसा ही लगा।

हमें चीज़ों को उनके द्वंद में ही समझना होगा। चीज़ें हमेशा द्वंद में ही होती हैं। व्यक्तिगतता का सामाजिकता के साथ, जैविक व्यवहार का सचेतन व्यवहार के साथ, आदि-आदि हमेशा अन्योन्य द्वंद में होते हैं। मनुष्य अपने सामाजिक दायरे में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लक्ष्य के मद्देनज़र इनमें एक सामंजस्य पैदा करता है। सामाजिक मूल्यों के सापेक्ष कुछ व्यक्तिगतताओं को छोड़ दिया जाता है, तो कुछ व्यक्तिगत आवश्यकताओं के समक्ष सामाजिकता से आंख बचा ली जाती है। कुछ जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सचेतनता को ताक पर रखा जा सकता है, और कभी सचेतन व्यवहार के लिए जैविक जरूरतों को भी कुर्बान किया जा सकता है।

जब हम बिना इनकी महत्ताओं, कमियों, इनके प्रभावों को समझे हुए जबरन इनका प्रतिरोध करते हैं, इन्हें दबाने की कोशिश करते हैं तो यह दमन है और जाहिरा तौर पर ये विचार और व्यवहार में अपने नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। परंतु जीवनीय व्यवहार और सामाजिकता तथा सामूहिकता के मूल्यों के लिए जब हम अपने व्यवहार में समुचित सांमजस्य पैदा करते हैं, पूरी समझ और विवेक से, कुछ मूल्यों के सापेक्ष बेहतर चुनाव या परित्याग करते हैं, तब यह दमन नहीं बल्कि अपने व्यवहार का सचेतन नियमन होता है और नकारात्मकताओं के विपरीत, सही व्यवहार कर पाने के अपने लक्ष्यों की पूर्ती की संतुष्टि प्रदान करता है।

हमने जब इसी मूल्य-सापेक्ष व्यवहार के लिए ‘मजबूर होता है’, वाक्यांश का प्रयोग किया तो इसका मतलब यही था कि हमारे व्यवहार की कसौटियां, हमारे द्वारा अपनाए गये जीवन मूल्य, हमें जैविक व्यवहार की सीमाओं से बाहर निकलने, अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर, सचेत रूप से मानवोचित व्यवहार करने के लिए निरंतर दबाब बनाते रहते हैं, मजबूर करते रहते हैं।

आपकी बात सामान्यतः सही है कि एक ऐसे परिदृश्य में जब व्यवस्था और परिवेश, जैविक व्यवहारों से ओतप्रोत व्यक्तिवादी मूल्यों में मनुष्यों को अनुकूलित कर रही है, तो उनके व्यवहार में केवल ‘डिग्री’ का अंतर ही रह जाता है। यानि वे आंतरिक रूप से सभ्य और सामाजिक नहीं हो पाए हैं, केवल अपने अन्य स्वार्थों की सुनिश्चितता के लिए, ऐसे दिखावों के लिए अभिशप्त हैं। ऐसे व्यक्ति गाहे-बगाहे, येन-केन प्रकारेण इस तरह की चीज़ों को व्यवहार और विचारों में प्रदर्शित करते रहते हैं और जब मौका मिलता है तो वे अधिक मारक और खतरनाक साबित हो सकते हैं।

जैविक व्यवहार की कुछ अभिव्यक्तियां यथार्थ है, पर सामाजिक व्यवहार की आवश्यकता भी एक यथार्थ ही है। जैसा कि आपने कहा इनके सापेक्ष पैदा और थोपे गये छद्म सिद्धांत व्यक्तियों को दिखावा करनेवाले घोर दमनकर्ता बनाते हैं, इसलिए इन यथार्थों के सापेक्ष वास्तविक यथार्थ सिद्धांतो का निरूपण और व्यवहार ही समुचित बदलाव रच सकता है, सामाजिक मूल्यों द्वारा शासित व्यवहार को सहज व्यक्तिगत व्यवहार में अनुकूलित कर सकता है।

आपने विश्वसनीयता की बात की है। लेकिन यह आएगी कैसे और आम जन के साथ पहले वैचारिक लड़ाई न लड़कर विश्वसनीयता की बात करें कैसे, इस पर कुछ कहेंगे तो अच्छा लगेगा और यह आवश्यक भी है, इस व्यक्ति के लिए।

जब हम किसी के साथ किसी भी तरह की अंतर्क्रिया करते हैं तो यदि हम उसकी चेतना के स्तर तक पहुंच के बात करते हैं, यानि उसकी भाषा, उसकी समझ, उसकी तार्किक क्षमताओं के दायरे में बात करते हैं तो हमारा व्यवहार हमें उसके साथ जोड़ता है। चेतना के स्तर पर भी और व्यवहार के स्तर पर भी, यही विश्वसनीयता के संबंधों की शुरुआत होती है। हमारा पारदर्शी, सहज और हर आयाम से किया गया विश्वसनीय व्यवहार भी हमारी विश्वसनीयता बढ़ाता है।

आमजन के साथ वैचारिक लड़ाई की बात करना ही बेमानी है। उसके पास सामन्यतः वैचारिक परिपक्वता ही नहीं पैदा हो पाती, तो फिर उसके साथ विचारों के स्तर की लड़ाई भला कैसे की जा सकती है। यानि कि उसके साथ लड़ाई नहीं, वरन् शनैः शनैः वैचारिक विनिमय और उसके विचारों तथा तार्किकता का उन्नयन किया जा सकता है। यह भी तभी संभव हो सकता है जबकि हम पहले उसके साथ अंतर्क्रिया में, अपने व्यवहार में उसके साथ एक अपनापा पैदा कर चुके हैं, विश्वास के संबंध बना चुके हैं, वह हमारे व्यवहार और उद्देश्यों के प्रति सशंक नहीं रहता, आदि।

कई बार जबकि सीधी अंतर्क्रिया भी संभव नहीं हो रही हों, फिर भी हमारी या हमारे समूह की सक्रियता और कार्यवाहियों की सूचनाएं आमजन के मानस में हमारी या हमारे समूह के प्रति विश्वसनीयता बढ़ा रही होती है, यदि वे वाकई इस लायक हैं तो। इसलिए हमें, हमारी कार्यवाहियों को, हमारी पद्धतियों, हमारे लक्ष्यों को, उनकी जरूरतों, उनकी आकांक्षाओं के साथ सा्मंजस्य बैठाना होगा। हमारी गतिविधियां और हमारे लक्ष्य, यदि उनकी अपेक्षाओं के साथ तालमेल खा्ते, उनके वास्तविक जीवन से ( ना कि किसी अवास्तविक खोखले उपदेशात्मक आदर्शों की तरह ) जुड़े प्रतीत होते हुए लगेंगे तो वे अपना स्वाभाविक जुड़ाव हमसे बनाएंगे, और तब हमारा व्यवहार और उनके प्रति हमारा रवैया ही उनके बीच हमारी विश्वसनीयता बढ़ाएगा।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 19 जनवरी 2013

आस्थाओं-मान्यताओं के मामले में हस्तक्षेप


हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।




आस्थाओं-मान्यताओं के मामले में हस्तक्षेप

मैं भी महसूस करता हूँ कि नास्तिक कहलाने से और सीधे सब अंधविश्वासी परम्पराओं का विरोध करने से लोग और यह व्यवस्था अस्वीकार कर देते हैं। इसका समाधान क्या है? लोग सुनने तक को तैयार नहीं होते नास्तिक और गैर-पूंजीवादी विचारों पर।

सभी लोग अपने हिसाब से खूब समझदार होते हैं, और अपने को एकदम अद्यतन और सही समझते हैं। यह भ्रम या ग़लतफ़हमी उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक भी है, वरना जीना ही मुश्किल हो जाए। वे इसकी सीमाएं भी ख़ुद से ही समझते हैं, और अपने को लगातार और अद्यतन करते रहते हैं। पर यदि कोई उनके अस्तित्व की इस जरूरी शर्त के सामने उसे ग़लत साबित करते हुए, उसे कमतर सिद्ध करते हुए, अड़ जाए, उनकी आस्थाओं और मान्यताओं के विपरीत बातों पर उनको मुतमइन करना चाहे ( इसका एक सीधा या कभी-कभी अप्रत्यक्ष मतलब यह भी होता है कि वह सामने वाले की श्रेष्ठता को भी स्वीकार करले, यानि अपने आप को उससे कमतर भी ) तो फिर वह क्या करे। समर्पण कर दे, और अपना जीना मुहाल कर ले।

सामान्यतः वह इसके बचाव की राह अपनाता है, अपने श्रेष्ठताबोध की रक्षा पर उतारू होता है, येन-केन प्रकारेण अपने को सही साबित करने की कोशिश करता है ( भले ही उसे लगने भी लगे कि शायद वह गलत है, हालांकि यह भी कम ही हो पाता है क्योंकि हर मान्यता की अपनी तार्किकता होती है ) और क्यूं ना करे यह उसके अधिकार क्षेत्र की बात है, जो उसे अच्छा या सही लगता है वह उसे माने।

अब यदि हम अपनी मान्यताओं और तार्किकताओं को ( जो कि सांयोगिक है इस हिसाब से कि हमारी परिस्थितियों ने सांयोगिक रूप से यह संभव बना दिया कि हम उस नई तार्किकता तक पहुंच पाए और हमने अपनी मान्यताओं और विचारों को तदअनुरूप बदल लिया है ) किसी पर थोपने की कोशिश करेंगे, और वह भी इस तरह से कि हमारा श्रेष्ठताबोध भी साफ़ परिलक्षित हो रहा हो, और हम अप्रत्यक्ष रूप से ही सही उसके अहम् को चोट पहुंचा रहे हो, उसे ग्लानि से भरने की कोशिश कर रहे हों, अपने को श्रेष्ठ और उसे कमतर साबित से करते से लग रहे हों तो वह अपने उपरोक्त अधिकारों का प्रयोग करेगा ही। और इसमें उसके नज़रिए से कुछ ग़लत भी नहीं होगा।

संप्रेषण और अंतर्क्रिया के इस मनोविज्ञान को समझे बिना हम किसी और की चेतना में सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर सकते। सिर्फ़ अपनी ढ़पली अपना राग अलाप सकते हैं। अपने विचारों, अपनी तार्किकताओं, अपनी मान्यताओं को सिर्फ़ फैंक सकते हैं, सामने वाले को इन विचारों पर मुतमइन नहीं कर सकते।

यानि कि यदि हम चाहते हैं कि ऐसा हो तो हमें फिर इसी के हिसाब से पद्धतियां भी अपनानी होगी। दूसरे के विचारों को सुनना, उन्हें उचित आदर देना सीखना होगा। लहज़े और भाषा में उचित नम्यता लानी होगी। विरोधी विचार रखते समय काफ़ी सावधानी बरतनी होगी, ताकि वह ऊपर वर्णित रूप लेता हुआ सा ना लगे। वह हमारी तार्किकता ( जिसे कि हम ज़्यादा बेहतर समझ रहे हैं ) को यदि आत्मसात कर पाएगा तभी यह हो सकता है उसके अंदर भी कुछ टूटे-जुड़े ( हालांकि फिर भी यह हो सकता है कि वह उस समय ही तात्कालिक रूप से स्वीकार ना करे पर उसके मनोजगत में हलचल मच चुकी होगी)।

यह भी वहीं हो पाता है, सारी सावधानियां बरतते हुए भी, जहां कि सामने वाले के अंदर जिज्ञासा, वस्तुगतता और वैचारिक ईमानदारी हो। यदि वह अपनी मान्यताओं और तार्किकता के साथ आत्मपरकता के साथ जुड़ा हुआ है, उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ ले रहा है, उन्हीं पर उसका जीवन निर्भर है तो यह उम्मीद करना भी बेमानी है वह हमारी बात पर जरा भी ध्यान भी देगा। मानना-वानना तो बहुत दूर की बात है।

अभी आप अध्ययन कर रहे हैं, आप धीरे-धीरे यह समझ पाएंगे कि विचार निरपेक्ष नहीं होते। किसी के भी विचार उसकी भौतिक, सामाजिक व परिवेशगत परिस्थितियों के संकुल के उत्पाद होते हैं। सरल भाषा में हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य के विचार उसकी परिस्थितियां पैदा कर रही होती हैं। यानि हम उसके विचारों में परिवर्तन चाहते हैं, तो यह सिर्फ़ वैचारिक उपदेशों, तार्किक बहस-मुहाबिसों के भरोसे संभव ही नहीं है। उक्त नियम कहता है कि परिस्थितियों को बदल दीजिए, विचार भी बदलने लगेंगे।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी वज़ह से वैचारिक उन्नयन के लिए प्रस्तुत मनुष्य ही इन अवस्थाओं में होता है कि वह अपनी मान्यताओं और आस्थाओं के साथ वस्तुगतता के साथ जूझ सके, अपने विचारों में गंभीर परिवर्तन कर सके। सामान्यतः सामान्य मनुष्य से इसकी उम्मीद करना बेमानी है। जब उनकी वास्तविक परिवेशीय परिस्थितियां बदलती हैं तभी वे नई परिस्थितियों के अनुसार ही अपने विचार भी बदलने लगते हैं।

हमको यह भी समझना होगा कि इसी तरह धर्म, आस्तिकता, ईश्वर, आदि-आदि के विचार भी ठोस वस्तुगत ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज हैं, और इन परिस्थितियों के लोप के साथ ही शनैः शनैः इनका भी लोप हो जाएगा। हम जबरन बड़े पैमाने पर इन्हें ख़त्म नहीं कर सकते। सिर्फ़ वैचारिक रूप से इनसे लड़कर तो कभी नहीं।

इसलिए आस्थाओं को, आस्तिकताओं को बहस-मुहाबिसे का विषय बनाना कतई भी उचित नहीं है। सामन्यजन इन्हीं में डूबा हुआ है, हम इसी से शुरुआत करेंगे तो प्रारंभ में ही अपनी विश्वसनीयता खो देंगे, बीच में एक खाई पैदा कर लेंगे, संवाद से अपने आपको मरहूम कर लेंगे और कुछ और भी सार्थक करने की अवस्थाओं में नहीं होंगे। यानि हमें अपना संघर्ष, ठोस वस्तुगत परिस्थितियों में ही, इन परिस्थितियों में बदलाव के लक्ष्य पर ही केंद्रित रखना होगा। एकबारगी विश्वसनीयता और संवाद कायम हो जाए तो हम धीरे-धीरे अन्य वैचारिक ज्ञान की मुहीमों से समझ को बढ़ाने की शुरुआत कर सकते हैं। और बिना इसको मुख्य मुद्दा बनाए, व्यक्तिगत मान्यताओं का प्रश्न ही बनाए रखकर, उन्हें मानने और अपनाने की आज़ादी को वास्तविकता में ही महसूस करवा कर ही हम इस आस्था के मामले में भी धीरे-धीरे दखल दे सकते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 जनवरी 2013

मानसिकताओं की परिस्थितियों पर निर्भरता


हे मानवश्रेष्ठों,
काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।
आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।




मानसिकताओं की परिस्थितियों पर निर्भरता

"हमको यह भी समझना होगा कि इसी तरह धर्म, आस्तिकता, ईश्वर, आदि-आदि के विचार भी ठोस वस्तुगत ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज हैं, और इन परिस्थितियों के लोप के साथ ही शनैः शनैः इनका भी लोप हो जाएगा।" आपका यह वाक्य आशा और नियतिवादिता को एक साथ बयान करता सा लग रहा है। तब क्या करें और क्या करना चाहिए? इस बारे में कुछ सुझाएँ कि स्वयं के विचारों या चिन्तन में यह बात आए कि संस्कृति क्या है और हमें इन धार्मिक या कर्मकांडी व्यवहार से अधिक परेशान न हुआ जाये।

वह लोप हो जाने वाली बात सामान्य वृहत सामाजिक स्तर पर के लिए कही गई थी, और आशा के साथ-साथ सही है कि नियतिवादिता सी लग सकती है। पर यह समाज के विकास के अंतर्गत की नियमबद्धता है।

कुछ उदाहरण हम अपने आसपास इस तरह के देखते ही रहते हैं। जैसे कि एक ग्रामीण परिवेश के व्यक्ति के लिए रोजाना मंदिर जाना और दिया जलाना एक आवश्यक कार्यवाही हो सकती है जिसे बिना नागा संपन्न किया ही जाना है। परंतु यदि वही व्यक्ति किसी शहर में नौकरी करने लगता है, तो वहां की परिस्थितियां उसे दैनिक रूप से मंदिर जाने की परंपरा का लोप करने के लिए मजबूर कर देती हैं। जैसे-जैसे वह शहरी सभ्यता, व्यवहार आदि सीखने लगता है, वहां के माहौल में रमने लगता है, वैसे-वैसे उसे अपने कई ग्रामीण संस्कारों की अर्थहीनता नज़र आने लगती है, कई चीज़ें जो पहले धार्मिक और आवश्यक थीं, अब धीरे-धीरे अंधविश्वास और त्याज्यता का रूप लेने लगती हैं।

पढलिखकर कई व्यक्तियों को आपने देखा होगा जो अपनी धार्मिकता और आस्थाओं को नया रूप देने की कोशिश करते हुए पाए जाते हैं। वे धर्म की नई परिभाषाओं से अब प्रभावित होने लगते हैं, धार्मिकता की जगह एक उच्च स्तर की आध्यामिकता उन्हें अधिक भाने लगती है, अपने स्तर के ज़्यादा अनुकूल लगने लगती है और वे धार्मिक से आध्यात्मिक होने लगते हैं।

आप मानसिकताओं के निर्माण की परिस्थितियों पर निर्भरता को और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हैं, जब आप इस तथ्य को देखते हैं कि जीवन में जितनी अधिक असुरक्षा और अनिश्चितता होती है उतना ही अधिक धार्मिकता में इसका हल खोजा जाता है। जीवन में सुरक्षा और निश्चिंतता धीरे-धीरे इस लौकिकता और ईश्वर पर सीधी निर्भरता को ख़त्म करती जाती है। जैसे-जैसे शिक्षा के क्षेत्र में प्रतियोगिता बढ़ती जा रही है, और शिक्षा के बाद नौकरी की अनिश्चितता मुंह बाए खड़ी है, या वे लोग जो शेयर-मार्केट की अनिश्चितताओं में अपनी जमा-पूंजी लगा कर उलझते जा रहे हैं, वैसे-वैसे शहरों में, पढ़े-लिखे परिवारों में, किशोरों में, नौजवानों में भी ईश्वर, धर्म, मंदिरों, व्रतों, मन्नतों का प्रचलन बढ़ रहा है।

अब क्या करें और क्या करना चाहिए वाली बात पर, हमने वहां ही यह भी लिखा था, ‘हमें अपना संघर्ष, ठोस वस्तुगत परिस्थितियों में ही, इन परिस्थितियों में बदलाव के लक्ष्य पर ही केंद्रित रखना होगा।’ यानि कि लोगों के जीवन की वास्तविक भौतिक समस्याओं से संबंधित जिन बड़े सवालों को लेकर हम ज़मीन पर उतरते हैं, उन्हीं को मुख्य लक्ष्य बना कर हमें संगठन और कार्यवाहियां तय करनी चाहिए।

जहां तक अपने चश्में से देखने और उसके अनुसार किए जाने वाले व्यवहार को अपनी आदर्शी सनक बना लेने की बात है, सभी के पास भी अपने-अपने चश्में होते ही हैं, और यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा चश्मा ही नया है, बदला हुआ है, सामान्य से अलग है, प्रचलन से अलग है ( हमारे पास भी पहले लगभग औरों जैसा ही था )। काल के किसी विशेष क्षण में, समाज के जिस हिस्से में हम सक्रिय होते हैं उसका सामान्य जीवन-परिचालन उसके परिवेश, परिस्थितियों, उसकी सामाजिक चेतना के सामान्य स्वरूप से तय हो रहा होता है। इस परिवेश, इन परिस्थितियों और इस सामान्य सामाजिक चेतना के अपने आयाम, अपनी संस्कृति, अपने विचार, अपनी आस्थाएं, अपनी मान्यताएं आदि-आदि होते हैं। समाज इन्हीं के अनुसार गतिशील रहता है।

अब यदि कोई इनसे इतर कोई आयाम, मान्यताएं आदि लेकर हाजिर होता है या इन्हीं में से उभरता है और समाज की इस गतिशीलता में सार्थक हस्तक्षेप करना चाहता है तो इसकी सीमाओं के अंतर्गत ही यह संभव हो सकता है। यानि कि उसकी क्रियाशीलता और पद्धतियों को उसकी मान्यताओं के आयाम नहीं बल्कि उपलब्ध समाज की यही सीमाएं तय करेंगी। तभी सार्थकता हासिल की जा सकती है।

उनके साथ रहते हुए, उनके सुख-दुख में शामिल रहते हुए, अपनी समझदारी और मान्यताओं के साथ उनके क्रियाकलापों में शामिल रहते हुए ही एक साझेदारी पैदा की जा सकती है। यदि सामान्य आस्थाओं और मान्यताओं को नकारा, उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा तो हम अपने को अलगा ही रहे होंगे। यदि थोड़ा-बहुत सम्मिलित रहते हुए हम अपनी बात और मान्यताओं को बिना अहम और श्रेष्ठताबोध का प्रश्न बनाए उनके बीच रखते रहें तो हो सकता है वे भी आपकी बातों को सुने, कभी-कभार गुनें और अपने अनुभवों के साथ उनका सांमजस्य बैठाने का प्रयत्न करें।

सामन्यतः यह देखा गया है कि अधिकतर सभी ही अपनी स्थिति के अनुसार अपनी आस्थाओं और परंपराओं पर संदेह या शक की गुंजाइश बनाए रखते हैं, ठोस जीवन उनकी निस्सारता को उनके भी सामने भी रख ही रहा होता है, पर इसे आदतन, ऐसा ही होता आया है, यही हमारा धर्म है, यही हमारी संस्कृति है, इसमें क्या हर्ज है, हो सकता है इनके पीछे भी कोई वाज़िब बात रही होगी आदि के तर्कों के साथ इन्हें अपनाता और दोहराता चला आता है। साथ ही हमें यह भी समझना चाहिए कि यदि कोई परंपरा जीवित चली आ रही है तो इसका मतलब है कि उसके बने रहने के भौतिक आधार अभी भी बने हुए हैं। इसलिए उन्हें प्राथमिक सवाल नहीं बनाना चाहिए।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 5 जनवरी 2013

प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

"आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बेचैनी से भरे हुए हैं। "  मैं आपसे सच कह रहा हूँ कि इन चीजों को मैं अधिक महसूस नहीं करता। अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ। लेकिन आखिर बेचैनी क्यों है? और प्रतिक्रियात्मक होने की बात पर कभी इतना ध्यान नहीं दिया है। आपने दिलाया है, इसके लिए शुक्रिया। लेकिन मैं आपका विश्लेषण जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसा कैसे बन गया?

हमें लगता है, प्रतिक्रियात्मकता का मतलब यह होता है कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार आदि के साथ मुखातिब होते समय, उसके साथ अंतर्क्रिया करने के बजाए उससे सामना होते ही, बिना ज़्यादा माथापच्ची किए, उस पर तुरंत अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया, या उस वक़्त जितना भी बूझ पाया जा रहा होता है उसी के हिसाब से, अपनी सहमति या असहमति की तात्कालिक प्रतिक्रिया को अभिव्यक्त करने को उद्यत हो उठना। प्रतिक्रियात्मकता का मुख्य लक्षण सिर्फ़ प्रतिक्रिया करने के लिए प्रतिक्रिया करना जैसा ही कुछ है। गति का तृतीय नियम, हर क्रिया की, उसी के परिमाण के बराबर विपरीत दिशा में एक समान प्रतिक्रिया होती है। जैसी क्रिया, उसी के विरोध में वैसी ही प्रतिक्रिया। यही प्रतिक्रियात्मकता का मूल है।

निष्कर्षात्मक बेचैनी से हमारा अभिप्राय यह था कि आप कुछ करने के लिए ( जो भी आप अपने लिए अपनी सक्रियता का लक्ष्य रखते हैं ) इतने उद्यत हैं और उसमें तुरंत जुट जाना चाहते हैं और इसलिए उसकी सैद्धांतिकी या वैचारिक आधारों पर अधिक और अतिरिक्त माथापच्ची करने का आपके पास समय नहीं है, इसलिए आप उनकी समस्या पैदा होते ही यह चाहने लगते हैं कि तुरत उनका समाधान निकले, तुरत कोई निश्चयात्मक निष्कर्ष निकले, नहीं निकल रहा हो तो तात्कालिक कोई निष्कर्ष मान लिया जाए और आगे बढ़ा जाए। यही जल्दबाज़ी, यही कुछ करने के लिए तुरंत मैदान में उतरने की तड़प आपको सैद्धांतिक और वैचारिक मामलों पर निष्कर्षात्मक बैचैनी से भर देती है शायद। यही बात पहुंचाना हमारा लक्ष्य था।

अब देखिए, हम काफ़ी समय निकालकर और लगाकर आपके लिए कुछ वाज़िब और गूढ़ लिखने की कोशिश करते हैं और आप उसे पढ़ते ही तुरत उस पर प्रतिक्रिया देकर/लिखकर मुक्त हो लेते हैं। गेंद फिर हमारे पाले में पहुंच जाती है कि लीजिए संभालिए और निबटिए।

हमारी जुंबिश पर आपके तात्कालिक निष्कर्षों और प्रतिक्रियात्मकता की बानगी एक बार दोबारा देखिए। - ( पहले हँसी आई - इस वाक्य में कुछ नया नहीं था - कुछ लगा और इस पर सोचूंगा - यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे - अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ - तो इसे मैं अच्छा मानता हूँ या कहें कि खुद को विजयी मानने लगता हूँ - लेकिन क्या शिक्षा इतनी जल्दी प्रभाव में या आदत में आ जाएगी - ऐसा लगता है कि आप नाराज हो गये - उनका जिक्र करने का मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि वे बड़े महत्व के हैं - तकनीकी वाली बात का उल्लेख किसी बड़े महत्व के नजरिये से नहीं किया था - बुद्ध या बौद्ध की स्थिति वास्तव में कुछ अलग है - भगतसिंह! महासत्य है - यह बात स्पष्ट हो रही है कि एक जैसा इतिहास रहा है मानव का - वैसे भाषा का मुद्दा भी बहुत सही नहीं लगता - पता कर के बताऊंगा बाद में - जो कहा वही है कि भाषा का असर कम्प्यूटर पर पड़ता है - ऐसा नहीं कि वैदिक गणित साफ बेकार है - इन मामलों में गुणाकर मुळे को अधिकृत और वैज्ञानिक मानता हूँ - स्वदेशी मैंने वैसे स्वीकार नहीं किया है, जैसा शायद आप बताना चाह रहे हैं -)

अब आपकी भाषा और उसमें अहम् की बानगी देखिए। - ( इस वाक्य ने मुझे कुछ मजबूर किया है - यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे - भाग्य की बात सुनते ही मुझे क्रोध आ जाता है - मैं इससे खुश नहीं कि - मैं स्पष्ट मानता हूँ कि - मैंने उन्हें शब्दों में रखा है - मैं मानता हूँ कि धर्मपाल - मेरा उद्देश्य यह नहीं था - मैं खंडन करना चाहता हूँ कि वेदों में - अगर मुझे कुछ गलत लगे या अवैज्ञानिक लगे - उस व्याख्या को मैं स्वीकारता हूँ - व्यवस्था को मैं इस आदर्श के लक्ष्य में एक पड़ाव मानता हूँ - यह मेरा बिलकुल मानना नहीं है - मैं हर तरह के निजीकरण के खिलाफ़ हूँ - मेरा चले तो सारे पूंजीपतियों - उसे मैं स्वीकारता हूँ और स्वयं - व्यवस्था मुझे सही लगती है - विकल्प मुझे गलत नहीं लगता - मैंने अपनी किताब में कई जगह - बातों ने मुझे कहीं परेशान किया तो - मैंने पहले भी कहा है कि मैं जब यह - मैं इस बारे में इतना ही कहूंगा कि मैं महीनों से देख रहा था कि - मैं अपनी जिज्ञासा रखता ही नहीं कहीं )

क्या वाकई ऐसा नहीं लगता कि लाल किले की प्राचीर से एक महान नेता बोल रहा है। या कि ये वाक्यांश गांधी, जवाहर, जेपी, लोहिया आदि के लेखों/भाषणों से लिए गए हैं। क्या यह आपका अतिआत्मविश्वास नहीं है कि आप जिन अवधारणाओं को अभी ठीक से समझते भी नहीं उन पर इतनी गज़ब की प्रतिक्रिया देने का साहस रखते हैं।

जब हम वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहे होते हैं या कि बहस-मुहाबिसे में अपना पक्ष भी रख रहे होते हैं तो हमारी भाषा काफ़ी संयत होनी चाहिए। वह निष्कर्षात्मक और आत्मपरक नहीं के बराबर दिखनी चाहिए। तभी सार्थक संवाद संभव हो सकता है। वरना वह सिर्फ़ एक बयान मात्र रह जाता है, हमारी व्यक्तिगत उद्‍घोषणा मात्र। इस तरह हम सही विचार या बात को भी कमजोर कर रहे होते हैं।

इस बार आपकी भाषा में कुछ अच्छे प्रयोग भी मिले, उनकी बानगी भी देख लीजिए, जिससे उनका प्रयोग करना आप बढ़ा सकें, और आपको यह भी ना लगे कि हम तो सिर्फ़ आपकी खिंचाई ही करते रहते हैं। - ( यह वाक्य तो वाकई गम्भीर है। कुछ लगा और इस पर सोचूंगा - मुझे ऐसा लगता है - यह बात ऐसे ही कह दी - मैं भी महसूस करता हूँ कि - अब यह बात स्पष्ट हो रही है कि - हमें अपना कलंकित इतिहास - मैं स्वयं बहुत नहीं जानता लेकिन - भी तो सोचा जा सकता है - अलावा हम क्या विकल्प दे सकते हैं - हम वापस मन और स्वयं से - अब हम इन बहस जैसी )

मैं और मेरा के झमेले से उत्तम पुरुष में लिखकर मुक्त हुआ जा सकता है?..... दुबारा माफ़ी मांगता है यह व्यक्ति। उत्तम पुरुष में बात करना कैसा रहेगा? अब से लिखना भी क्या इसी में करें?

हां यह तो है ही, परंतु शनैः शनैः इसको समझ का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। इसका प्रयोग हमें निरंतर इस हेतु सचेत करता रहेगा। परंतु यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हर जगह और असहज प्रयोग व्यंग्य या मज़ाक सा भी लग सकता है, अतः सचेत होकर करें।

जब कोई विचार रखा जा रहा है, तो मैं के स्थान पर हम का प्रयोग विनम्रता लाता है। यदि विरोधी विचार रखना हो तो शुरुआत इस तरह से की जा सकती है कि हमें लगता है, हमें महसूस होता है, हमने कहीं पढ़ा था, आदि। नितांत व्यक्तिगत रवैया रखना हो तो, मैं या मुझे का प्रयोग भी किया जा सकता है, यथा मैं सोचता हूं, मुझे लगता है, आदि ( जैसा कि आप करते भी हैं )। जब आप अपनी कमजोरी, अपनी कमतरी का उल्लेख कर रहे हैं तो वहां मैं, मुझे ( हमें तो है ही ) कहना ही आपको कमियों के लिए स्वयं उत्तरदायित्व लेना प्रदर्शित कर सकता है। आदि-आदि। इसे आपके सामने विस्तार से रखने की जरूरत नहीं है, आप जानते हैं।

मैं इससे खुश नहीं कि मेरे सवालों को बहस समझा गया कहीं-कहीं। मैं स्पष्ट मानता हूँ कि बातों पर सवाल उठे और मैंने उन्हें शब्दों में रखा है। उसमें मेरी सोच शामिल होगी ही।

बात यह नहीं है कि हमें सही समझा गया या नहीं, हमारा स्पष्ट मानना क्या है, हमारे शब्दों और सोच को समझा गया या नहीं। हमें यह समझना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि हमें ही इसके लिए सचेत होना पड़ेगा कि अपनी बात या विचार को रखते समय हमारे द्वारा प्रयुक्त भाषा हमारे मंतव्यों को ठीक तरह से परावर्तित कर पा रही है या नहीं? हमारे द्वारा काम में ली गई भाषाई शब्दावली और उसकी प्रस्तुति हमारे इच्छित को ठीक तरह से संप्रेषित कर पा रही है या नहीं ? और इसके लिए हमें थोड़ा संयत होकर, सोच समझकर लिखना/कहना/बोलना सीखना होगा। कुछ कहने से पहले अपनी बात को तौलना होगा। अपने लिखे को कई-कई बार पढ़ना और संशोधित करना सीखना होगा। और यह तात्कालिक प्रतिक्रियात्मकता के साथ नहीं हो सकता। यही बात हम आप तक पहुंचाना चाह रहे हैं।

'अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है।'...यह वाक्य मुझे अप्रत्यक्ष रूप से अयोग्य शिष्य और अहंकारी साबित करता है...

यह इसलिए कहा गया था कि आप संवाद के साथ-साथ अपनी सापेक्ष स्वतंत्रता को भी सचेत रूप से महसूस कर सकें और किसी भी तरह के लिहाज़ और दबाब से अपने चिंतन को मुक्त रख सकें। आपको कोई बाध्यता नहीं महसूस हो।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

कुछ भी मौलिक नहीं होता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कुछ भी मौलिक नहीं होता
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

'कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। ' यह कुछ समझ आता है।

इसकी पृष्ठभूमि में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मौलिकता की अवधारणा को अधिकतर वैयक्तिकता के साथ जोडकर देखा जाता है, परंतु यह पूरा सच नहीं हैं। कुछ भी मौलिक नहीं होता, ऐसा भी कहा जाता है।

सभी भौतिक और वैचारिक अवस्थाएं एक क्रमिक विकास में होती हैं। यानि मानवजाति अपने अनुभव और ज्ञान को संचित करते हुए, उसे आगे की पीढ़ी को अंतरित करते हुए, उसका क्रमिक विकास करती हुई यहां तक पहुंची है, और यही अभी भी जारी है। यानि कि हर स्तर का ज्ञान, अपने पूर्व के ज्ञान पर ही अवलंबित होता है। हर नया विचार या खोज, मानवजाति की पूर्व के अनुभवों के इसी संचय पर निर्भर करती है।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी ज्ञान, विचार या खोज के पीछे पूरी मानवजाति के ज्ञान की थाति अपना काम कर रही होती है, अपना योगदान कर रही होती है, उस खोज की पूर्वपीठिका तैयार करती है। कोई भी व्यक्ति शून्य से शुरू करके, मानवजाति के संचित ज्ञान से अपने को अद्यतन किए बगैर कुछ नहीं कर सकता। यानि क्या वैयक्तिकता का दावा ( यहां आप पेटेंट बगैरा को रख सकते हैं, वैयक्तिक अश्लील रॉयल्टीज़ को रख सकते हैं ) बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?

नितांत नवीन और मौलिक कार्यों के व्यक्तिगत प्रयासों के लिए थोड़ा-बहुत वैयक्तिक श्रेय दिया जा सकता है, ज्ञान की इसी क्रमबद्धता में उनके पड़ाव को उनसे जोड़कर देखा जा सकता है, उनकी सांयोगिक ऐतिहासिकता को दर्ज़ किया जा सकता है। परंतु संपूर्ण मानवसमाज के क्रमिक रूप से संचित ज्ञान और अनुभवों के आधारों पर परवान चढ़ सके इस वैयक्तिक अवदान के लिए उन्हें असामाजिक और अश्लीलता के स्तर तक पहुंचे, किन्हीं विशेष फायदों के लिए लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।

परंतु अभी यही हो रहा है, बाज़ारवाद ऐसे वैयक्तिक अवदानों को अपने हित में प्रोत्साहित करता है, उन्हें एक भरपूर हिस्सा देता है, और उन्हें और खोजों को अपने मुनाफ़ों की सेवा में लगाए रखता है। चारों तरफ़ लूट मची है, और उस लूट में अपनी हिस्सेदारी के लिए अफरातफरी भी। पूरे मानवसमाज के क्रमिक प्रयासों से निर्मित उसकी इस दुनिया को कुछ मानवसमूह अपने हितार्थ जमकर दोहन करने में लगे हैं।

'यानि क्या वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?' यह सवाल...

अगर इस प्रश्न का जवाब दें तो शायद यह हो, ‘ हां, वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब होना चाहिए।’ यही मंतव्य था।

यह अश्लील रॉयल्टी क्या है, समझ नहीं आया।

वैयक्तिक पेटेंट या व्यक्तिगत श्रेयों के लिए, उस का व्यवसायिक प्रयोग करके उसके ज़रिए अकूत मुनाफ़ा कमाने वाले व्यक्ति, समूह अथवा कार्पोरेट्स काफ़ी बड़ी मात्रा में रॉयल्टी के रूप में मुनाफ़े का हिस्सा पहुंचाते हैं, या वह ख़ुद इसे मोटी रकमें लेकर बेचते हैं।

इसे अश्लील, इन श्रेयों के पीछे के सामाजिक अवदानों के सापेक्ष कहा गया है जिसको पिछली बार विस्तार देने की कोशिश की गई थी। यानि जिसके पीछे पूरी मानवजाति, समाज का अवदान हो, उसे भुलाकर, या कहे नकार कर अपने लिए वैयक्तिक रूप से अय्याशी के महल खड़े कए लेना हमें तो अश्लील ही लगता है, खासकर इन हालात में जबकि मानव-समाज का बहुल हिस्सा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से भी महरूम है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। इस बार संवादों के बीच का एक दोस्ताना लानत-मलामती पत्र प्रस्तुत किया जा रहा है। संवादों के अंश आगे जारी रहेंगे।

आप भी इससे कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

आज थोड़ा आप पर आपकी बातों पर संदर्भ से हट कर कुछ कहने का इरादा है। आपको बुरा लग सकता है, पर यही फिलहाल हमारा लक्ष्य है, ताकि अच्छा लगने की शुरुआत हो सके। बुरा लगना, पहला कदम है चिंतन को नवीन दिशा देने के लिए।

लगता है, हमारी बातचीत की दिशा, जैसा कि हम लक्षित करके शुरू हुए थे, थोड़ी अलग हो गई है। हमारा मकसद आपसी संवाद के जरिए, आपकी जिज्ञासाओं और सैद्धांतिक उलझनों पर कुछ इशारे करना था, ताकि आप अपनी सक्रियता के लक्ष्य इस वैयक्तिक और वैचारिक विकास हेतु प्रवृत्त कर सकें। पर अभी ऐसा लग रहा है कि संवाद बहस का रूप ले रहा है। निरर्थक बहसों, सहमति या असहमति के पायदानों पर पहुंचना या पहुंचाना हमारा मंतव्य नहीं रहा है। आपको सोचने और पुनर्विचार करने का अवसर पैदा करना लक्ष्य है, उसी हेतु हम कुछ गंभीर इशारे आपकी ओर उछालते रहते हैं, और उम्मीद करते हैं कि वे आपकी चिंतन प्रक्रिया में कुछ हलचल कर सकें।

आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बैचैनी से भरे हुए हैं। अहम् और श्रेष्ठता बोध से भरे हुए। यह आपकी यहां की बातचीत के अलावा भी नेट पर यत्र-तत्र देखे गए बहस-मुहाबिसों के संदर्भ में भी कहा जा रहा है। आपकी बातों में मैं, मेरा इतना होता है कि, वह भी इतना दंभ और अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ कि हमें बैचैनी होने लगती है। सही होना ही महत्त्वपूर्ण है, वह भी अपने नज़रिए और मान्यताओं के हिसाब से नहीं, वरन् वृहत्तर मानवजाति के हितों के सापेक्षतः। सही साबित होना, गलत साबित करना या सही दिखना कोई मायने नहीं रखता। ये तात्कालिक सीमाओं में होने वाले वैयक्तिक मामले हैं, जिनके तात्कालिक परिणाम उस वक़्त की आपकी अपनी सीमाओं पर निर्भर होते हैं। जो जितना झख मारने की स्थिति में होता है, उतना ही वह टिका रहता है और टिके रहने को ही अपनी वैयक्तिक जीत समझने को अभिशप्त होता है।

विचार और बात पृष्ठभूमि में चली जाती है, और वैयक्तिकता हावी हो जाती है। श्रेष्ठताबोध हावी हो जाता है। वैसे भी, छोटे से समय के सतही वाद-विवाद से कभी भी किसी की मानसिकता नहीं बदली जा सकती, और यह बहस का रूप लिये हो तो कतई भी नहीं। इसलिए हमें गलतफहमियां नहीं पालनी चाहिए कि हम कुछ बहसों से, कुछ तथ्यों से, मनमर्जी व्याख्याओं और तर्कों से किसी के व्यक्तित्व और विचारों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। थोड़ा बहुत असर की भी संभावनाएं भी वहीं रहती हैं जहां कि यह संवाद और आपसी विश्वास के साथ हुई ठंड़ी बातचीत में के दौरान हुआ हो।

हम किसी भी तरह के श्रेष्ठताबोध को पसंद नहीं करते, इसलिए नहीं कि यह हमारी पसंद-नापसंद का मामला है, वरन् इसलिए कि यह मनुष्यता के लिए बेहतर नहीं है। श्रेष्ठताबोध, किसी की कमतरी पर टिका हुआ होता है। यह मनुष्य-मनुष्य के बीच में गैरबराबरी, अलगाव, नफ़रत का वायस है, इसीलिए अननुकरणीय है, त्याज्य है। इसलिए धार्मिक, नस्लीय, वैयक्तिक, भाषीय, राष्ट्रीय आदि श्रेष्ठताबोधों के चश्में आधारित विचारधाराएं, मानसिकताएं हमें प्रभावित नहीं करती। किसी भी आत्मपरक लक्ष्य और रूप से व्याख्यायित की गई तथ्यात्मकता बेहतर नहीं है।

हमने आपके सामने कई गंभीर चीज़ें भी रखी, क्लिष्ट संकल्पनाएं भी। और उम्मीद की आप शायद उनसे गुजर कर थोड़ा आंदोलित होंगे, समझ नहीं आने पर उन्हीं के आसपास अपनी जिज्ञासाएं पेश करेंगे। पर ऐसा नहीं हो पा रहा है, आप सिर्फ़ तात्कालिक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं, अपनी मान्यताओं के साथ उन पर कोई गंभीर आलोड़न-विलोड़न नहीं करते। आप सिर्फ़ उन्हें अपने चश्में से देखते हैं, तुरंत ही सहमत या असहमत होते हैं और अपनी मान्यताओं की खिलाफ़त सूंघते ही तुरंत बहस-मुहाबिसे के लिए उद्यत हो जाते हैं।

आपने अपने जरा से अनुभवों और जरा से अध्ययन से प्राप्त छुटपुट, भावुक, सतही और सामान्य से विचारों को, इतना मौलिक, इतना क्रांतिकारी, इतना जरूरी समझ लिया है कि आप इस श्रेष्ठताबोध के घटाघोप से बाहर आना ही नहीं चाहते। आपको जिस तरह यह अनोखा और नवीन सा लग रहा है, उतना ही यह एक सामान्य परिघटना है। सभी ऐसे आवेगों से गुजरते हैं, सभी को ऐसा लगता है कि उसके अनुभव, उत्पन्न विचार नितांत मौलिक और अनोखे हैं। परंतु जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते जाते हैं, पता चलता जाता है कि ये एक सामान्य परिघटना ही थे, सभी ऐसे ही आवेगों से गुजरते हैं, सभी ऐसा ही समझते भी हैं। दुनिया बहुत बड़ी है मित्र। हम जब तक किसी भी क्षेत्र में अपने से पहले रचे गए, बुने गए, कहे गए, समझे गए, स्थापित को जान और समझ नहीं लेते, आत्मसात् नहीं कर लेते, तब तक कुछ नया रच ही नहीं सकते। कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में तो लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। अगर आपने समझना चाहा तो, वरना अपने श्रेष्ठताबोध के घेरे में अधिकतर सभी ही जीते ही रहते हैं, अपना पूरा जीवन निकाल देते हैं।

जो कौम ऐसी श्रेष्ठताबोधों से निकलने को राजी ही नहीं होती, निकलना ही नहीं चाहती वह कुछ भी नया और वास्तविक श्रेष्ठ रच ही नहीं सकती। यही हमारी टिपिकल सामान्य भारतीय मानसिकता है। धार्मिकता और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लबालब, सामंती प्रवृत्तियों से लबरैज, अपने ही बुने-चुने श्रेष्ठताबोधों से भरी-उफनी हुई। यही कारण रहा है, और है कि प्राचीन समय को छोड़कर अभी तक ना तो कुछ नया रच पाये हैं, ना कुछ नया कर पाये हैं। हमारे पास एक भी मौलिक वैज्ञानिक नहीं है, ढंग का टेक्नोक्रेट नहीं है। इसलिए इससे मुक्ति पाना, और दिलाना हमारा अभीष्ट होना चाहिए। ना कि इसी मानसिकता को तुष्ट करता कोई नया सा घटाघोप।

यह बहस करने के लिए, आपके विचार जानने के लिए, आपकी राय, आपकी सहमति या असहमति प्राप्त करने के लिए लिखा दस्तावेज़ नहीं है। अगर आपको इसमें कुछ ठीक लगे तो इसे छोड़कर आगे बढ़ना, गलत लगे तो भी छोड़ कर आगे बढ़ना। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि यह आपके सापेक्ष सही ही हो, बस यह है और आवेग में लिख दिया गया है। कुछ आपके सापेक्ष सही हो तो बेहतर करने की चेष्टा, कुछ नहीं हो तो उसको दिल सा ना लगाने की प्रवृत्ति, हमें विकसित करनी चाहिए।

हम आपमें इसे समझ पाने और अन्यथा नहीं लेने की क्षमता महसूस करते हैं, आपमें संभावनाएं देखते हैं, इसीलिए यह जरूरी समझ रहे हैं और लिख पा रहे हैं। आगे भी जब भी जरूरी लगा, कुछ ऐसा-वैसा लिखते रहेंगे। उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही आप आपकी शान में की गई इन गुस्ताखियों को आया-गया करते रहेंगे।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

हिप्नोटिज़्म और होम्योपैथी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



हिप्नोटिज़्म और होम्योपैथी

पहले जानना चाहता हूँ कि ये हिप्नोटिज्म क्या है और इसके लाभ क्या हैं? मुझे तो ये कुछ अजब और चमत्कारी किस्म का लगता है क्योंकि कोवूर सहित तर्कशील सोसाइटी हरियाणा और पंजाब के लोगों की किताबों में बहुत से मानसिक रोगों खासकर भूत आदि का वर्णन मिलता है जिन्हें वे हिप्नोटिज्म से ठीक करते हैं। ये कैसे सम्भव है? क्या इसका लाभ इतना है कि व्यक्ति अपने पर और  कुछ समस्याओं में दूसरों की सहायता कर सकता है? अगर हाँ तो कैसे? क्या इसे सीखना होता है और कैसे होगा ये? बार-बार पढ़ने से इसके बारे में सवाल करने की इच्छा हुई इसलिए पूछा।

हमें इसके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। पर यह तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर जाना ही जा सकता है कि प्राकृतिक नियमों से परे के चमत्कारों के दावे खोखले होते हैं। सम्मोहन ( हिप्नोटिज़्म ) की अवधारणा, जैसा कि चमत्कारी रूप में इसे प्रचारित किया जाता है, सभव नहीं है। हां, दिमाग़ की कार्यपद्धतियों की अपनी सीमाएं हैं और इसे जानकर दिमाग़ को बखूबी भ्रमित किया जा सकता है। इसी का फायदा उठाकर इससे हो सकता है कुछ सकारात्मक क्रियाएं भी संपन्न की जा सकती हैं। पर यह भ्रम ऐसा भी नहीं होता, जैसा कि समझा जाता है या बताया जाता है कि कोई व्यक्ति कुछ रहस्यमयी हरकतें करके किसी दूसरे की चेतना पर अपना संपूर्ण नियंत्रण स्थापित करले कि वह उसके निर्देशानुसार कार्य करने को मजबूर हो जाए।

सम्मोहन इसके शाब्दिक अर्थ में ही अधिक उचित जान पड़ता है। यानि कि किसी व्यक्ति को, दूसरे व्यक्ति के गुण, उसकी सुंदरता, उसका व्यक्तित्व, उसका ज्ञान इतना प्रभावित करले कि यह कहा जा सके कि उसने मुझे मोह लिया है, मोहित कर लिया है।

अविकसित, अपरिपक्व चेतनाओं को, किसी विशेष लक्ष्यों या सिद्धांतों के लिए, उसके विश्वासों से, उसकी आस्थाओं से, उसके अज्ञान का फ़ायदा उठाते हुए अनुकूलित कर लेना भी सम्मोहन की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसी तरह के सम्मोहित करने वाले प्रभावों और कार्यवाहियों से ही अंधराष्ट्रवादी, धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद जैसी मानवविरोधी कार्यवाहियों के लिए किसी को उकसाया या तैयार किया जा सकता है। शायद यही सम्मोहन है।

किसी मानसिक अपरिपक्व और अस्थिर व्यक्ति को, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के जरिए जिस तरह से विकसित और स्थिर करने की कोशिश की जाती है, यह भी एक तरह का सम्मोहन ही है। अपने से अधिक जानकार से लगते, चमत्कारी से लगते व्यक्ति के सामने, या अपनी समस्याओं से मुक्ति की संभावनाओं के चमत्कारों के मद्देनज़र, अक्सर सापेक्षतः अपरिपक्व व्यक्तियों को मानसिक और यदि यह असर अधिक गहरा गया हो तो शारीरिक समर्पण करते हुए देखा जा सकता है। धार्मिक और योगी बाबाओं के यहां जुटती और मरती भीड़ में क्या यही सम्मोहन का मनोविज्ञान नहीं काम करता है।

आगे आप ख़ुद दिमाग़ लड़ाएं, इस पर और जानें।

एक जिज्ञासा है, लेकिन विषय से बाहर। होमियोपैथी को अवैज्ञानिक और झूठा कहा जाता है। इसका सत्य क्या है?…प्रतीक्षारत आपके दिशा-निर्देश के लिए।

फिलहाल के विषय से बाहर की जिज्ञासा को अभी छोड़ ही दिया जाए तो ठीक रहेगा। यह तो कहा ही जा सकता है कि चीज़ों को समझने के लिए उनकी ऐतिहासिकता को ध्यान में रखा जाना अत्यावश्यक होता है। यानि उनके कालखण्ड़ और उस काल की सामान्य अभिलाक्षणिकताओं के साथ ही उनका विश्लेषण और संश्लेषण किया जाना चाहिए।

अब आप खु़द इसे समझने की कोशिश कर सकते हैं कि होम्योपैथी पद्धति का काल क्या था, उस वक़्त मनुष्य के ज्ञान और समझ की अवस्थाएं क्या थीं, विज्ञान के विकास का आलम क्या था। यानि कि किसी काल खण्ड़ की उपलब्धियों में उतनी ही वैज्ञानिकता हो सकती है जितना कि उस वक़्त के विज्ञान का स्तर था। लगता है यह इशारा काफ़ी है।

जहां तक उन उपलब्धियों से समस्याओं के निस्तारण की बात है, तो जिन सामान्य समस्याओं का बखूबी निस्तारण उनसे उस कालखण्ड़ में किया जा सकता था, यदि उस जैसी ही सामान्य समस्याएं आधुनिक कालखण्ड़ में भी हैं तो उनका निस्तारण अभी भी उन्हीं के ज़रिए भी किया ही जा सकता है। व्यावहारिक प्रभाव और संतुष्टि का स्तर उनकी आगे की उपयोगिता या प्रांसगिकता को तय कर ही देगा। कहने या मानने के लिए भले ही कुछ भी हो, परंतु वास्तविक दैनंदिनी जीवन-व्यवहार में तो निश्चित ही इसका असर दिखेगा।

होमियोपैथी या अन्य चिकित्सा विधियों में ऐसी दवाएँ क्यों हैं जो असहज लक्षणों को दूर करने में सहायक बताई जाती हैं। खासकर होमियोपैथी में ऐसी दवाएँ बताई जा रही हैं। उन्हें हम क्या समझें। जैसे वह भीड़ वाली असहजता के लिए भी वहाँ उपाय बताए जाते हैं। ऐसी दवाएँ कारगर नहीं होतीं? माजरा समझ नहीं आता। कुछ बताइए।

होमियोपैथी पर शायद हम पहले भी कुछ कह चुके हैं। ये पद्धतियां भी अपने तात्कालिक ज्ञान और सीमाओं के अंतर्गत मनुष्य की व्याधियों से पार पाने की कोशिश कर रही थीं, और अपनी तात्कालिकता में उन्होंने कई सामान्य चीज़ों के लिए कारगर समाधान प्रस्तुत भी किए। व्याधियां यदि वैसी ही हैं तो उसी तरह के समाधान ये अभी भी प्रस्तुत करेंगी ही, इसमें हर्ज़ क्या है। यदि नहीं कर पाती हैं तो मनुष्य वैकल्पिक रास्ते भी तलाशता ही है।

असहज लक्षणो के लिए, चूंकि ये वास्तविकताओं की सही पहचान करवा पाने में असक्षम होते हैं, अधिकतर मानसिक अपरिपक्वताओं से संबंधित होते हैं, रहस्यमयी से हो उठते हैं, अक्सर इनके मानसिक सलाहिक उपचारों से समाधान की कोशिशे की जानी चाहिए। कई चीज़ें समय के साथ, मानसिक परिपक्वताओं और समझ के साथ, परिस्थितियों से निपटारे के साथ स्वतः समाप्त हो जाती है, पर इस दौर के लिए मानसिकतः अपरिपक्व मनुष्य को एक मानसिक सहारे की जरूरत होती है। ऐसी ही परिस्थितियों में इस तरह की कई दवाएं कारगर साबित होती दिखती हैं, कारगर रहती हैं। जो शरीर में वास्तव में कुछ कर रही होती हैं वे भी, और अन्य कई तरह के टोटके भी, मसलन पूजापाठ, पत्थर-नगीने, धागे-तावीज़, झाड़-फूंक आदि भी, कारगर महसूस किए जाते हैं।

अब यदि कोई व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में असहजता महसूस करता है, और उनके बीच सक्रियता की हिम्मत नहीं जुटा पाता, उनके बीच किसी रहस्यमयी कारणों की उपस्थिति महसूस करता है, तो ऐसे में उपरोक्त सभी उसे एक हिम्मत देते हैं, मानसिक आधार देते हैं, उसे यह आभास देते हैं कि उसने उनसे निपटने का एक उपाय कर लिया है इसलिए उनका भय समाप्त हो जाता है, और वह उन परिस्थितियों में अधिक सहजता के साथ सक्रिय होता है और अपने भयों और असहजता पर वास्तविक रूप से काबू पा लेता है, और इसका श्रेय वह उन्हीं टोटकों को दे दिया करता है।

सामान्यतः मनुष्य समझ में आती सामान्य व्याधियों के लिए उपलब्ध इंतज़ामों पर ही भरोसा करता है, पर जब कुछ असहज और असामान्य सा घटाघोप महसूस करता है तभी वह अपनी असहज समस्याओं के लिए इसी तरह के किसी असहज समाधानों की तरफ़ मुड़ता है और इनका प्रयोग करने में कुछ हर्ज़ नहीं समझता।

होमियोपैथी और अन्य प्राचीन पद्धतियां जो कि तात्कालिक सीमित रूप के विज्ञान आधारित ही है, ( जहां तथा जिन मामलों ये कई तरह के भाववादी प्रक्षेपणों और व्याख्याओं से जुडी हुई हैं, उन्हें छोड दिया जाए ) कई सामान्य मामलों में, और कई तरह के मानसिक असहजताओं के मामले में कारगर रहती ही हैं। खासकर उन लोगों के लिए तो यह एक वास्तविकता ही है जो इनमें मानसिक गहराइयों से विश्वास भी करते हैं। जो समझते हैं कि इसके पीछे की वास्तविकताएं क्या है, वे तो अपने आप ही अपनी मानसिक उलझनों से लड ही लेते हैं, उन्हें किसी तरह के काल्पनिक सहारे की क्या आवश्यकता हैं और इन पद्धतियों का प्रयोग कई तरह की सामान्य व्याधियों में कर भी लिया करते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय
Related Posts with Thumbnails