शनिवार, 14 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १
( races and nations - 1 )

जैविक और सामाजिक के संबंध की सटीक समझ हमें समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय ( राष्ट्रीय ) विशेषताओं का निर्धारण करने में मदद देती है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव से हर कोई यह जानता है कि लोग अपने विविध गुणों, चरित्र की विशेषताओं, शिक्षा के स्तर, सार्वजनिक हितों के प्रति रुख़, चमड़ी के रंग, ऊंचाई, चहरे की आकृति, भाषा, आदि में एक दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ गुण मनोवैज्ञानिक हैं, कुछ सामाजिक और कुछः अन्य जैविक हैं। जैविक में निम्नांकित शामिल हैं : रंग, क़द, शरीर की कुछ विशेषताएं, आदि। मनुष्य की उत्पत्ति ( origin ), क्रमविकास ( evolution ) तथा मनुष्य की जैविक संविरचना ( biological constitution ) का अध्ययन करनेवाला नृतत्वविज्ञान ( anthropology ) इन गुणों के अनुसार कई नस्लों ( races ) को विभेदित ( distinguish ) करता है।

नस्लें ऐसे विभिन्न मानव समुदायों ( क़बीलों, जातियों, राष्ट्रों ) के समूहन हैं जो कई समान जैविक गुणों की उपस्थिति द्वारा आपस में एक हैं। सामान्यतः तीन नस्लों को विभेदित किया जाता है : यूरोपीय ( सफ़ेद चमड़ीवाले लोग ) ; मंगोलियाई ( पीताभ चर्म तथा तिरछी आंखों वाले लोग ) ; और नीग्रों ( काली चमड़ी वाले लोग )। बेशक, ये सारी विशेषताएं सोपाधिक, यादृच्छिक तथा सापेक्ष हैं और साथ ही वे हमेशा सुस्पष्ट नहीं होती हैं। कभी-कभी मध्यवर्ती, ग़ैरबुनियादी, छोटी नस्लों की बात भी की जाती है। लोगों की नस्लीय विशेषताएं जैविक स्वभाव की होती हैं

नस्लीय विशेषताओं के विपरीत जातीय व राष्ट्रीय विशेषताएं, सामाजिक विशिष्टताओं में व्यक्त होती हैं और इतिहासानुसार विरचित जन-समुदायों ( communities of people ) के लक्षणों को चित्रित करती हैं। इन समुदायों में क़बीले ( tribes ), जातियां ( nationalities ) और राष्ट्र ( nations ) शामिल हैं। सबसे जटिल समुदाय राष्ट्र है, जो एक निश्चित युग में, पूंजीवाद में संक्रमण के युग में लंबे ऐतिहासिक विकास के फलस्वरूप बनते हैं।

एक क़बीले या जाति के सदस्य कुछ पारिवारिक रिश्तों, रक्त संबंधों और एक निश्चित समान मूल ( common origin ) के द्वारा एकीकृत ( united ) होते हैं। परंतु राष्ट्र, विभिन्न क़बीलों तथा जातियों ( कभी-कभी नज़दीकी मूल के ) के एकीकरण, ‘मेल’ ( merging ), ‘संलयन’ ( fusing ) से बनते हैं। एक राष्ट्र के लोग एक भाषा बोलते हैं। वे समान आर्थिक क्रियाकलाप, एक ही भूक्षेत्र पर अधिकार, संस्कॄति और सामाजिक मानसिकता की समरूपता तथा राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताओं से परस्पर जुड़े होते हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब विशेषताएं सामाजिक विकास के क्रम में उत्पन्न तथा रूपायित ( moulded ) होती हैं और जैविक गुण नहीं होती हैं। राष्ट्र का बनना सामाजिक, ऐतिहासिक तथा आर्थिक विकास की एक नितांत निश्चित अवस्था के साथ जुड़ा होता है।

अब हम नस्लों और राष्ट्रों के बीच के रिश्ते पर, तथा इस बात पर विचार करेंगे कि इसका प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया से और मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक के संबंध से क्या नाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

1 टिप्पणियां:

Unknown ने कहा…

नमस्ते मेरा नाम सागर बारड हैं में पुणे में स्थित एक पत्रकारिकता का स्टूडेंट हूँ.

मेंने आपका ब्लॉग पढ़ा और काफी प्रेरित हुआ हूँ.

में एक हिंदी माइक्रो ब्लॉग्गिंग साईट में सदस्य हूँ जहाँ पे आप ही के जेसे लिखने वाले लोग हैं.

तोह क्या में आपका ब्लॉग वहां पे शेयर कर सकता हूँ ?

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