रविवार, 14 जनवरी 2018

सामाजिक क्रांति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत देखा था कि सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या होती है, इस बार हम सामाजिक क्रांति पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक क्रांति
(social revolution)

सामाजिक-आर्थिक विरचनाएं (formations) सामाजिक विकास के दौरान कार्यशील ही नहीं रहतीं, बल्कि एक के स्थान पर दूसरी क्रमिक रूप से आती रहती हैं और, यही नहीं, उनका यह क्रम निश्चित, वस्तुगत और नियम-संचालित होता है। एक विरचना से दूसरी में संक्रमण (transition) को सामाजिक क्रांति कहते हैं। इसका निर्धारण करनेवाली नियमितता (pattern) क्या है और वह किस पर निर्भर होती हैं ?

एक सामाजिक-आर्थिक विरचना से दूसरी में परिवर्तन का निर्धारण एक प्रभावी उत्पादन पद्धति (mode of production) का, दूसरी उत्पादन पद्धति के द्वारा प्रतिस्थापन (replacement) से होता है। पांच प्रमुख उत्पादन पद्धतियों के अनुरूप पांच प्रमुख सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं को विभेदित किया जाता है : आदिम-सामुदायिक, दासप्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और कम्युनिस्ट।


विभिन्न देशों में और विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में एक विरचना से दूसरी में संक्रमण भिन्न-भिन्न ढंग से हो सकता है। कभी-कभी यह दशकों, यहां तक कि शताब्दियों तक जारी रहता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि सामाजिक क्रांति इस बात से निर्धारित नहीं होती कि यह शांतिपूर्ण तरीक़े से होती है या शस्त्रास्त्रों के ज़रिये, दीर्घकालिक होती है या अल्पकालिक, बल्कि इस तथ्य से होती है कि उसके दौरान उत्पादन पद्धति में और सर्वोपरि आर्थिक आधार में परिवर्तन होता है या नहीं। जैसा कि मार्क्स ने दर्शाया, आधारों के इस परिवर्तन को वैज्ञानिक सटीकता से साबित किया जा सकता है। सामाजिक क्रांति के दौरान सामाजिक अधिरचना की सारी अवस्थाओं में जटिल तथा अत्यंत कठिन परिवर्तन होता है और समाज की वर्ग संरचना (class structure) आमूलतः बदल जाती है। इसलिए वर्ग विरचनाओं में यह परिवर्तन कटु वर्ग संघर्ष (class struggle) के साथ होता है।

एक विरचना से दूसरी में संक्रमण के दौरान सामाजिक चेतना के विविध रूपों की अंतर्वस्तु (content) भी बदल जाती है। कला, धर्म, नीति-आचार तथा दर्शन स्वयं नये सामाजिक सत्व (social being) को, लोगों के बीच नये संबंधों और राज्य सत्ता तथा पार्टियों की नयी प्रणाली को परावर्तित (reflect) करने लगते हैं। पूर्ववर्ती सामाजिक-आर्थिक विरचना के अंदर शांतिपूर्ण विकास की अवधि की तुलना में क्रांतियों के दौरान उत्पादन पद्धति और सामाजिक संबंधों में परिवर्तन दसियों-सैकड़ों गुना तेजी से होते हैं और समाज के जीवन में कहीं अधिक गहराई तक पैठते हैं। 

पारंपरिक संबंध, क्रियाकलाप की पद्धतियां और चिंतन के तरीक़े छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और समाज की मानसिकता और वैचारिकी बदल जाती है; संक्षेप में, सामाजिक शक्तियों के कटु और प्रबल संघर्ष में सारे का सारा भूतपूर्व जीवन मूल रूप से नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है और उसके फलस्वरूप नयी विरचना का रास्ता साफ़ हो जाता है। पुराने जीवन का यह उच्छेदन नयी विरचना के विकास का एक महत्वपूर्ण पूर्वाधार है। इसलिए सामाजिक क्रांतियां वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता (objective historical necessity) हैं। अगली, उच्चतर, इतिहासानुसार अधिक विकसित विरचना में संक्रमण एक सामाजिक क्रांति के बिना असंभव है



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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