रविवार, 8 अप्रैल 2018

सामाजिक चेतना और समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखा था, इस बार हम ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना के कार्य और रूप
(functions and forms of social consciousness)
सामाजिक चेतना और समाज का विकास
(social consciousness and the development of society)

सामाजिक चेतना, केवल सामाजिक सत्व (social being) से निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि स्वयं भी समाज के जीवन पर सक्रिय प्रभाव डालती है। सामाजिक चेतना की सक्रियता भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक युगों में भिन्न-भिन्न होती है और समाज के विकास के साथ बढ़ती है। ऐसा किस कारण से होता है? बात यह है कि सामाजिक सत्व और जीवन की दशाओं में परिवर्तन सामाजिक चेतना में परिवर्तनों से भी संबद्ध होते हैं : ज्ञान का परिमाण बढ़ता है, विश्वदृष्टिकोण जटिल बनता है, विभिन्न सामाजिक समस्याओं से निबटने के लिए ज्ञान का अनुप्रयोग (applying) करने के वास्ते सूचना और कुशलताओं का विराट परिमाण संचित (accumulated) होता है और मनुष्यजाति का ऐतिहासिक अनुभव गहरा होता जाता है।

समाजवादी समाज के उद्‍भव (rise) के साथ सामाजिक चेतना की भूमिका (role) और भी बड़ी हो जाती है। समाज का नियोजित रूपांतरण (planned transformation) निष्पादित करने और उत्पादन संबंधों तथा उत्पादक शक्तियों के बीच पूर्ण अनुरूपता लाने के लिए एवं समाजवादी अधिरचना (socialistic superstructure) को निर्दोष बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की, और संपूर्ण समाजवादी समाज की चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना ज़रूरी होता है। परंतु चेतना में परिवर्तन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। वैयक्तिक (individual) और सामाजिक चेतना किंचित स्थायित्व (stability) तथा रूढ़िवादिता (conservatism) से युक्त जटिल संरचनाएं (complex structures) हैं। उनमें बदलाव होने में कभी-कभी दशक नहीं, बल्कि सदियां लग जाती हैं।

जब आमूल क्रांतिकारी पुनर्चिंतन (radical revolutionary rethinking) तथा मौजूदा स्थिति के पुनर्मूल्यन (re-evaluation) की दरकार होती है, तो इतिहास के ऐसे तीव्र मोड़ (sharp turning points) पर चेतना के अंदर नैतिक, सामाजिक व सौंदर्यात्मक मूल्यों का परिवर्तन, विशेषतः जनमानस में, विकट अंतर्विरोधों (acute contradictions) को, रूढ़िपंथी तथा क्रांतिकारी कार्यविधियों के टकराव (clash) को जन्म देता है। लोग, पेचीदा (complicated) और उभयभावी (ambiguous) सत्व हैं। उनका व्यवहार केवल तर्कबुद्धिसम्मत (rational) लक्ष्यों तथा मानकों (standards) से ही नियंत्रित नहीं होता, बल्कि विविध प्रच्छन्न आवेगों (hidden passions), कामनाओं (desires), उपदेशों, पूर्वाग्रहों से तथा ऐसी जटिल मानसिक अवस्थाओं से भी होता है जो अंतर्विरोधी भावावेगों तथा मनोदशाओं (contradictory emotions and moods) , भय व उल्लास, उत्साह व निराशा, विश्वास व अविश्वास, हतोत्साहिता (despair) व शांतचित्तता (serenity) को पैदा करते हैं।

सामाजिक चेतना में सोद्देश्य परिवर्तन लाने के लिए, कठिन सामाजिक समस्याओं के प्रति सचेत, सक्रिय रुख़ (conscious, active attitude) को तथा उन्हें समाज के हित में हल करने की कामना को पैदा करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए हमें सामाजिक चेतना के सार (essence) व संरचना का और सामाजिक चेतना के कार्यों व वैयक्तिक चेतना के साथ उसके संबंध का गहन दार्शनिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है।

सामाजिक चेतना, विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में स्वयं को भिन्न-भिन्न ढंग से विकसित और व्यक्त करती है। मानव इतिहास पर नज़र डालने पर हमें धार्मिक मतों, राजनीतिक व कलात्मक क्रियाकलाप के रूपों की, क़ानूनी तथा नैतिक मानदंडों तथा मानकों की विराट विविधता (immense variety) दिखायी पड़ती है। प्रत्ययवादी/भाववादी (idealists) उनका हवाला देते हुए यह दावा करते हैं कि जनगण की सामाजिक चेतना और बौद्धिक क्रियाकलाप किन्हीं सामान्य नियमों और नियमसंगतियों (general laws and regularities) से संचालित नहीं होते और वस्तुगत अध्ययन (objective study) के अधीन नहीं रखे जा सकते। वे ज़ोर देते हैं कि सामाजिक सत्व के विकास तथा सामाजिक चेतना की अभिव्यक्तियों की विविधता के बीच कोई संबंध तथा वस्तुगत आश्रितता (objective dependence) नहीं है।

किंतु इससे संबंधित उनकी दलीलें वास्तविकता से मेल नहीं खाती और इसीलिए आलोचना के सम्मुख नहीं टिक पातीं। सामान्य/सार्विक, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) हमें इस मामले में भी प्रत्ययवाद/भाववाद का खंडन करने में मदद देती है। यह दर्शाती है कि सामाजिक चेतना की ठोस अभिव्यक्तियों ( concrete manifestations) की सारी विविधता के बावजूद उसके प्रमुख रूपों (forms) को पृथक किया जा सकता है और समाज के जीवन में उनकी भूमिका तथा कार्यों को समझा जा सकता है। सामाजिक चेतना के सबसे सामान्य (सार्विक) और महत्वपूर्ण रूप निम्नांकित हैं : राजनीतिक, नैतिक, क़ानूनी, कलात्मक, धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक। हम यहां दार्शनिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना को छोड़कर बाक़ी सब पर विचार करेंगे। सामाजिक चेतना की संरचना तथा उसके कार्यों व विविध रूपों की समुचित समझ के लिए हमें वैचारिकी (ideology) तथा सामाजिक मनोविज्ञान (social psychology) के साथ उनके संबंधों को स्पष्ट करना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

2 टिप्पणियां:

Neetu Singhal ने कहा…

विशिष्ट कार्य करने वाले अथवा विशिष्ट स्वभाव वाले मानव वर्ग के समूहों को ही कदाचित समाज व् किसी विशेष धार्मिक मत के अनुयायियों को संप्रदाय या समुदाय कहा जाता है | वास्तव में हमने समाजों अथवा सम्प्रदायों के विघटन को ही सामाजिक अथवा सांप्रदायिक चेतना समझ लिया है | वर्तमान में भारत ही नहीं अपितु अन्य राष्ट्रों के कर्णधार भी लगभग सा'हित्य-शुन्य' (illiterate)हैं इसलिए वह सदैव संप्रदाय व समाज की खिचड़ी पकाते हुवे लक्षित होते हैं | सामाजिक व्यवस्था पर आधारित राष्ट्रों का अस्तित्व चिरस्थायी रहा है साम्प्रादायिक राष्ट्रों की आयु केवल एक सहस्त्र वर्ष की ही है, समाज व् सम्प्रदाय हीन राष्ट्र अभी-अभी अभ्युदित हुवे हैं, इनका अस्तित्व कबतक रहता है यह देखने वाली बात है.....

Amendra Kumar ने कहा…

समय जी!
भारत में पूंजीवादी विकास ने किस हद तक सामंती मूल्य मान्यताओं को तोड़ा है तथा जनवादी मूल्य मान्यताओं को स्थापित किया है? ठोस एवं विशिष्ट उदाहरणों से स्पष्ट करने का कष्ट करें.

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