शनिवार, 12 जून 2010

मनोविज्ञान और इसकी विषय-वस्तु

हे मानवश्रेष्ठों,

अब फिर से कुछ गंभीर हुआ जाए, हालांकि आप निश्चित ही गंभीर अध्येता हैं इसमें कोई दोराय नहीं है। इस बार से यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। चेतना की उत्पत्ति वाली श्रृंखला में मन, मस्तिष्क तथा मनुष्य और पशु  पर कुछ संक्षिप्त चर्चाएं यहां हो चुकी हैं। कभी संक्षिप्तिकरण करते हुए, कभी विस्तार देते हुए हम यहां, मनुष्य की गहन दिलचस्पी के इस विषय पर मानवजाति के अद्युनातन ज्ञान को, उसकी ऐतिहासिकता के साथ जानने और समझने का प्रयत्न करेंगे।

इस बार यहां खु़द मनोविज्ञान और उसके कार्यक्षेत्रों के संबंध में चर्चा की जा रही है। अगली बार यहां इसके विकास का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया जाएगा, और श्रृंखला चल निकलेगी।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
०००००००००००००००००००००००००००

मनोविज्ञान जिन परिघटनाओं का अध्ययन करता है, उनके विशिष्ट लक्षणों को परिभाषित करना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि इन परिघटनाओं की व्याख्या काफ़ी हद तक अनुसंधान में लगे व्यक्तियों के विश्व-दृष्टिकोण पर, नज़रिए पर निर्भर करती है।

सर्वप्रथम कठिनाई यह है कि मनोविज्ञान जिन परिघटनाओं की जांच करता है, वे मानव-मस्तिष्क द्वारा बहुत पहले ही विशेष परिघटनाओं के रूप में पहचानी और जीवन की अन्य अभिव्यक्तियों से अलग की जा चुकी हैं। वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है कि कंप्यूटर का हमारा बोध अथवा प्रत्यक्ष एक ऐसी चीज़ है, जो बहुत ही विशिष्ट है और हमारे सामने मेज़ पर रखी वास्तविक वस्तु से भिन्न है। हम बाहर खाने के लिए जाना चाहते हैं, किंतु हमारी यह इच्छा खाने के लिए वस्तुतः बाहर जाने से भिन्न चीज़ है। नये साल की पार्टी की हमारी याद और नये साल की वास्तविक पार्टी, दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं।

इस तरह लोगों ने धीरे-धीरे उनके बीच भेद करना सीखा, जिन्हें हम मानसिक परिघटनाएं ( मानसिक कार्य, गुण, प्रक्रियाएं, अवस्थाएं, आदि ) कहते हैं। लोगों की नज़रों में उनकी विशिष्टता यह थी कि वे मनुष्य के बाह्य परिवेश की बजाए अंतर्जगत से संबंध रखती हैं। उन्हें वास्तविक घटनाओं और तथ्यों से भिन्न मानसिक जीवन का अंग माना गया और ‘प्रत्यक्षों’, ‘स्मृति’, ‘चिंतन’, ‘इच्छा’, ‘संवेगों’, आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया। ये सभी मिलकर ही मन, मानस, मनुष्य का अंतर्जगत, आदि कहे जाते हैं।

दूसरों से रोज़मर्रा के संपर्क में लोगों का प्रत्यक्ष वास्ता उनके विभिन्न व्यवहार रूपों ( कार्यों, चेष्टाओं, श्रम-संक्रियाओं, आदि ) से ही पड़ता है। किंतु व्यवहारिक अन्योन्यक्रियाओं की आवश्यकताएं यह तक़ाज़ा करती हैं कि लोग, बाह्य आचरण के पीछे छिपी मानसिक प्रक्रियाओं को भी पहचानें। परिणामस्वरूप मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसके इरादों अथवा जिन कारणों से प्रेरित होकर उसने दत्त कार्य किया था, उनके संदर्भों में देखा जाने लगा और विभिन्न घटनाओं के संबंध में उसकी प्रतिक्रिया को उसके स्वभाव तथा चरित्र की विशेषताओं का परिचायक माना गया। इस प्रकार लोगों ने मानसिक प्रक्रियाओं, गुणों तथा अवस्थाओं के वैज्ञानिक विश्लेषण का विषय बनने से बहुत पहले ही, एक दूसरे के बारे में व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक ज्ञान संचित कर लिया।

उसे कई कहावतों और लोकोक्तियों में अभिव्यक्ति दी गई और लोगों के बीच अक्सर यह सुना जा सकता है कि ‘एक बार देखना सौ बार सुनने से बेहतर है’ या ‘ आदतें आदमी का दूसरा स्वभाव होती हैं’, वगैरह। मनुष्य का ज़िंदगी द्वारा सिखाया गया ज्ञान भी मानस के बारे में जानने में उसकी काफ़ी हद तक मदद करता है। उदाहरण के लिए, अनुभव से उसे मालूम होता है कि कोई पाठ यदि बार-बार पढ़ा जाए, दोहराया जाए, तो वह बेहतर याद हो जाता है।

व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव से प्राप्त मनोवैज्ञानिक सूचना को प्राक्-वैज्ञानिक मनोवैज्ञनिक ज्ञान कहा जाता है। उसका दायरा काफ़ी अधिक व्यापक हो सकता है और वह कुछ हद तक आसपास के लोगों के व्यवहार को समझने और निश्चित सीमाओं के भीतर यथार्थ का सही प्रतिबिंब पाने में सहायक हो सकता है। किंतु कुल मिलाकर यह ज्ञान क्रमबद्ध, गहन तथा निश्चयात्मक नहीं होता और इसीलिए वह लोगों के साथ ऐसे किसी शैक्षिक, चिकित्सीय, संगठनात्मक तथा अन्य मानवीय कार्यकलाप के लिए ठोस आधार नहीं बन सकता है, जिसके लिए मानव मस्तिष्क के वैज्ञानिक, अर्थात वस्तुपरक एवं प्रामाणिक ज्ञान की आवश्यकता होती है, यानि ऐसा ज्ञान कि जो किन्हीं प्रत्याशित परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार का पूर्वानुमान करने की संभावना देता है

तो मनोविज्ञान में वैज्ञानिक अध्ययन की विषय-वस्तु क्या है? सर्वप्रथम, मनुष्य के मानसिक जीवन के ठोस तथ्य, जिनके गुणात्मक और परिमाणात्मक, दोनों ही पहलुओं का वर्णन किया जा सकता है। किंतु वैज्ञानिक मनोविज्ञान अपने को किसी मनोवैज्ञानिक तथ्य का, चाहे वह कितना भी दिलचस्प क्यों ना हो, वर्णन करने तक ही सीमित नहीं रख सकता। वैज्ञानिक संज्ञान के लिए परिघटना के वर्णन से आगे जाकर उसकी व्याख्या करने, अर्थात उस परिघटना के मूल में जो नियम कार्य कर रहे हैं, उन्हें उद्‍घाटित करने की भी जरूरत होती है। इसलिए मनोविज्ञान में अध्ययन का विषय मनोवैज्ञानिक तथ्य ही नहीं, मनोवैज्ञानिक नियम भी होते हैं।

नियम अपने को जिन विशिष्ट क्रियातंत्रों के माध्यम से व्यक्त करते हैं, उन क्रियातंत्रों के बारे में जानने के लिए नियमों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। इसलिए मनोविज्ञान का कार्य मनोवैज्ञानिक तथ्यों एवं नियमों की खोजबीन के अलावा मानसिक कार्यकलाप के क्रियातंत्रों का अध्ययन करना भी है। मानसिक क्रिया के तंत्र अनिवार्यतः किन्हीं निश्चित मानसिक प्रकार्यों को पैदा करने वाले शारीरिक-शरीरक्रियात्मक प्रणालियों से जुड़े होते हैं। इसलिए मनोविज्ञान इन क्रियातंत्रों की प्रकृति और कार्य का अध्ययन शरीरक्रियाविज्ञान, जीवभौतिकी, जीवरासायनिकी, साइबरनेटिकी, आदि अन्य विज्ञानों के साथ मिलकर करता है।

इस प्रकार एक विज्ञान के नाते मनोविज्ञान मानस ( मन, मस्तिष्क ) के तथ्यों, नियमों और क्रियातंत्रों का अध्ययन करता है।

०००००००००००००००००००००००००००

तो मानवश्रेष्ठों, मनोविज्ञान के जरिए हमारे मानस और इसके क्रियाकलापों का विश्लेषण और अध्ययन, हमारे जीवन में इनके संबंध में एक व्यापक और सार्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करता है। यह हमें हमारे और दूसरों के मन को समझने, मानसिक संक्रियाओं को व्याख्यायित करने और इस प्रकार उन्हें व्यवस्थित और नियंत्रित करने में हमारी मदद करता है

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

इस बार इतना ही।

समय

शुक्रवार, 4 जून 2010

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ ख़ुराक - ४

हे मानवश्रेष्ठों,
इस बार, पिछली कुछ बार की तरह ही समय  की कुछ टिप्पणियां पेश की जा रही हैं।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। आपके दिमाग़ को इनसे कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
००००००००००००००००००००००

पुराण, इतिहास और विज्ञान: क्या है सत्य?...प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर एक टिप्पणी:
एक बहुत ही अच्छा आलेख जो कि कई मुद्दों को एक साथ छूता है और समझ को आंदोलित करता है।

गुप्त जी की इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि कल्पना हमेशा सत्य और सही होती है, तथा विज्ञान मिथक या गल्प कथाएं हमेशा वास्तविकता का यथार्थ परावर्तन करती हैं।

कल्पनाएं वास्तविकता की ज़मीन से ही पैदा होती हैं, उनका आधार वर्तमान ज्ञान और अनुभवों की श्रृंखलाओं से ही व्युत्पन्न होता है, परंतु वे जाहिरा तौर पर यथार्थ नहीं होती। वास्तविकताओ का आरोपण, अव्यवहारिक परिस्थितियों पर किया जाकर ऊल-जलूल कल्पनाएं की जा सकती हैं, की जाती रही हैं। जाहिर है, इन्हें यथार्थाधारित संभावित परिणामों की कल्पनाओं से अलग किया जाना आवश्यक होता है।

ऐसे ही विज्ञान गल्प कथाओं में भी देखा जा सकता है। वहां ऐसी कई कल्पनाओं का चित्रण मौजूद है, जिनमें कई का यथार्थ में उतर आना अभी शेष है, और कई कतई संभव ही नहीं हो सकती।

ऐसा ही हमारे अमूल्य प्राचीन धरोहरों के साथ भी है। वैदिक और पौराणिक साहित्य, जैसा कि गुप्त जी ने कहा कि अपने समय की ही उपज हैं और उनसे तात्कालिक समाज की दशा-दिशा के ऐतिहासिक संदर्भ उदघाटित हो सकते हैं, होते हैं। इन पर काल संबंधी समस्या इसलिए पैदा होती हैं कि यह श्रुति परंपरा से गुजर कर आगे बढ़े हैं, और लगातार रचे जाने की प्रक्रिया से गुजरे हैं तथा बहुत बाद में जाकर कहीं लिपिबद्ध हो पाए हैं।

इनसे वास्तविकता का निरूपण बेहद सावधानी भरा कार्य होना चाहिए, क्योंकि इनके जरिए हम इतिहास रच रहे होते हैं, जिसके आधार पर कि वर्तमान का समुचित यथार्थ विश्लेषण संभव हो सकता है ताकि बेहतर भविष्य की नींव रखी जा सके।

कई ऐतिहासिक अध्ययन की धाराएं यह महती कार्य कर रही हैं।
०००००००००००००००००००००००००००००००

श्रीमद्‍भगवतगीता के साथ मेरे अनुभव...प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:

‘गीता ने ऐसे बहुतेरे लोगों को आकृष्ट किया है जिनकी मनोवृत्ति एक-दूसरे से तथा अर्जुन से बिल्कुल भिन्न थी। गीता को भगवदवचन समझा जाता है और इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न अभिरुचि वालों ने ऐसे निराले ढ़ंग से की है कि लगता है, मूल वस्तु ही कुछ ऐसी है जो आंतरिक भेदों को मिटाने के बजाए, ज़्यादा शंकाएं औए खंड़ित व्यक्तित्व पैदा करती है।
वह नीति-दर्शन निश्चय ही अत्यंत संदिग्ध होता है जिसकी व्याख्या विभिन्न समाजों में विकसित हुए दिमागों ने इतने विभिन्न रूपों में की हो। उसकी मौलिक मान्यता क्या रह जाती है, अगर उसका अर्थ इतना लचीला है? फिर भी, यह पुस्तक ( गीता )कई मायनों में उपयोगी तो है ही।’

ये एक भारतीय मानवश्रेष्ठ के शुभवचन हैं। जो गीता की वस्तुगतता पर कई महत्वपूर्ण इशारे करते हैं। गीता एक ऐसा धर्मग्रंथ है जिससे मान्य ब्राह्मण कर्मकांडों का तिरस्कार किये बिना, किसी भी तरह की सामाजिक कार्रवाई के लिए प्रेरणा और औचित्य प्राप्त किया जा सकता है, यही कारण है जो इसकी प्रतिष्ठा को सर्वव्यापक बनाता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय, सभी तरह की विरोधी विचारधाराओं वाले कई महापुरूष इस एक ही किताब से यही प्रेरणा और औचित्य प्राप्त कर रहे थे।

इसमें तत्कालीन उपस्थित सभी तरह की दर्शन विचारधाराओं का संश्लेषण है, इसलिए यह विरोधाभासों से भरी हुई है। गीता की अपनी जो विलक्षण त्रुटी है, अर्थात असंगति में संगति की प्रतीति कराने का कौशल, वही उसकी उपयोगिता का हेतु भी है।

इसलिए अपनी आस्था का विषयी बनाकर, गीता से अपने किसी भी तरह के कर्म का औचित्य प्राप्त करने की अवसरवादिता सिद्ध करने का जरिया बनाने की बजाए, इसके समुचित विश्लेषण की गहराइयों मे उतरकर चीज़ों को जैसी वह हैं, समझने का जरिया बनाने की राह प्रशस्त करनी चाहिए। इसके नये भाष्य और व्याख्याओं की जरूरत है, ना कि इसके प्रचलित धार्मिक अवसरवादी आख्यानों की प्रस्तुति भर।

आपने इस आलेख में इस पर कुछ इशारे किए हैं। यदि आप वाकई में यदि गीता पर कुछ प्रस्तुत करने का मन बनाते हैं जैसी की यहां अपेक्षाएं की जा रही हैं, तो यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि आप उपरोक्त जरूरतों की पूर्ति का भरसक प्रयत्न करेंगे।
००००००००००००००००००००००००००००००००००

नास्तिकता मेरी नज़र से...प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:

एक संतुलित और सारगर्भित आलेख।

नास्तिकता पर बहस को यह एक गंभीर दिशा दे ही रहा है, पर यह वह राह भी दिखा रहा है कि किस तरह का परिवेश बचपन को दिया जाना चाहिए।

संगीता जी से यह पूछने की हिमाकत कर रहा हूं, कि वे अंधविश्वासों में यकीन क्यों नहीं करती? इस प्रश्न से ईमानदार माथापच्ची शायद उन्हें अपनी चेतना के परिष्कार का कुछ अवसर उपलब्ध करवा सके।

मनुष्य का ज्ञान और समझ जितना विकसित होती जाती है, उसी स्तर के अनुरूप वह कम स्तर की चीज़ों का तार्किक विश्लेषण करने की हिमाकत करने लगता है, और परंपराओं से प्राप्त मान्यताओं को तौलने लगता है।

जाहिर है उनका अभी तक का ज्ञान और समझ जिस तरह से कई चीज़ों से उन्हें मुक्त कर पाया है। अगर उनका संधान यहीं नहीं रुकता तो वे और भी कई चीज़ों से मुक्त होने की असीम संभावनाएं रखती हैं। अपने अनुकूलन से संघर्ष वाकई एक मुश्किल कार्य है। इस हेतु उन्हें शुभकामनाएं।

संदेह से उत्पन्न नास्तिकता को सैद्धांतिकता का एक आधार चाहिए होता है, अगर वह नहीं मिलता तो पुराना अनुकूलन फिर से हावी हो सकता है। शायद वे समझना चाहें।
०००००००००००००००००००००००००००००००००
अगर धर्म एक अच्छे इंसान होने का...प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:

लिखे तो सटीक मित्र, पर इतना आक्रामक होने की जरूरत नहीं लगती। समझदारी को विनम्रता लानी ही चाहिए, या यूं कहें कि यह लाती ही है। भाषा-प्रयोग में सावधानी बरतना हमें सीखना ही चाहिए।

आखिर यह पारिस्थितिक संयोग ही है कि हम अपने चुनावहीन परिवेश की पैदाईश हैं और समझ तथा ज्ञान के तदअनुकूल स्तर से ही आगे की राह निकालने की जुंबिशों में रहते हैं। इसलिए सापेक्षतः पीछे लग रहे अपने मानव-बांधवों के प्रति हमारे मन में उनकी लाख उठापटकों के बावज़ूद सहानुभूति का भाव रखना ही श्रेष्ठ है, ना कि मखौल बनाने का।

आपने बहुत बढ़िया बात उठाई है। अगर इस पूरे प्रपंच को बारीकी से देखा-समझा जाए तो यह आसानी से पकड़ा जा सकता है कि मनुष्य के अच्छे और बेहतर होने की संभावनाएं सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म से मुक्त होने से ही प्रशस्त हो सकती हैं। जहां उसके हर क्रियाकलाप की जिम्मेदारी ख़ुद लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, कोई पापमुक्ति नहीं होती, कोई वैकल्पिक प्रायश्चित नहीं होता। जाहिरा तौर पर यह स्थिति नई जिम्मेदारियां लेकर आती है, और हमें इसके लिए स्वयं की समझ को निरंतर परिष्कृत करते रहना चाहिए।
००००००००००००००००००००००००००००००

कृत्रिम जीवन कोशिका की प्रयोगशाला में...प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर तीन टिप्पणियां:

पहली:
आदरणीय श्याम गुप्त जी,
लगता है सबसे पहले हमें अपने भारतीय प्राच्य ज्ञान और वैदिक साहित्य का पेटेंट कराना चाहिए। हमारे यहां यह सब पहले से ही वर्णित है और पाश्चात्य शक्तियां जो आज सिर्फ़ संयोग या किसी दैवीय कृपा से विश्व की सिरमौर बनी हुई हैं, फालतू ही इनका श्रेय अपने नाम कर रही हैं।

क्या खूब बात कही है आपने, यह सिर्फ़ ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक भाग है। पता नहीं क्यों हमारा ईश्वर, उनके ईश्वर के आगे कमजोर पड़ जाता है। सही है, हमें अपने ईश्वर की सहायता के लिए आगे आना ही चाहिए।

हमें अपनी नैतिकता को सर्वोपरी रखना ही चाहिए और सदुपयोग-दुरूपयोगों पर ही अपनी उर्जा खपानी चाहिए। खोज-वोज जैसे बेकार के काम तो कुछ अवैदिक मूर्ख कर ही रहे हैं।

दूसरी:
आदरणीय,
मानवजाति की ऐतिहासिक-वैज्ञानिक समझ यह सिखाती है कि इतिहास के एक काल-विशेष के दौरान, तत्कालीन स्तर का ज्ञान, समझ और चिंतन ही ‘वर्णित’ हो सकता है, और वही ‘वर्णित’ ज्ञान ‘क्रियात्मक’ हो सकता है जो ज़िंदगी की ठोस वास्तविकता से निगमित होता है तथा इसी ठोस वास्तविकता को और बेहतर बनाने का वास्तविक माद्दा रखता है।

मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है। वास्तविक ज्ञान सिर्फ़ ज्ञान होता है और उसकी वास्तविकता ही उसे सार्वभौमिक बनाती है, एक वैश्विक सामान्य सहमति तक पहुंचाती है। इसे अपना-पराया, पूर्वी-पाश्चात्य के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। इन सीमाओं में सिर्फ़ काल्पनिकताओं, व्याख्याओं, आस्थाओं आदि को ही रखा जाना श्रेयष्कर हो सकता है।

वास्तविकता तो यह है कि हमारे इसी प्राच्य ज्ञान की भाववादी धारा ने हमारे यहां कल्पनाओं की उड़ान का वह एकतरफ़ा घटाघोप सुस्थापित किया कि तार्किकता, वास्तविकता, वैज्ञानिकता और स्वतंत्र सोच-समझ को समाज ने हमेशा के लिए स्थगित कर दिया। और कमोवेश यही स्थिति अभी तक जारी है। इसी कारण यहां वैज्ञानिक मेधाओं की पैदाईश और विकास के अवसर उपलब्ध ही नहीं है। हमारी और आपकी ऐसी लाखों सदइच्छाओं के बावज़ूद सच यही है। इन परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन ही नई राहें खोल सकता है।

रुका हुआ पानी ही सड़ता है, बहती धाराएं अपना रास्ता खोज ही लेती है। समाज अपने क्रमविकास के दौरान बेहतर को संजोता, उसे और बेहतर करता तथा बेकार को त्याजता चलता है। यही ऐतिहासिक सच्चाई है, हम जैसे भी चाहे इसे देखने और व्याख्यायित करने के लिए स्वतंत्र होते ही हैं।

आपने संवाद के लायक समझ मान बढ़ाया। शुक्रगुजार हूं।
तीसरी:
आदरणीय,

आपने समय की इस पंक्ति, ‘मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है।’, का विस्तार किया, उसे समझाया। शुक्रगुजार हूं।

क्रमिक विकास के प्रति आपकी स्वीकरोक्ति से यह साफ़ होता है कि आप अच्छी तरह से समझते हैं, कि इस क्रम-विकास के बहुत ज़्यादा निचले पायदान वाला ज्ञान, ऊपर वाले पायदान से बेहतर और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। आगे के ज्ञान का आधार तो खैर वह होता ही है।

मतलब आप यही कहना चाहते हैं, और जो आपकी बुद्धिमता का परिचायक है, कि प्राच्यज्ञान की ए बी सी ड़ी से अपने आपको गुजारते हुए, ज्ञान के क्रमिक विकास का अध्ययन करते हुए, मनुष्य को अद्युनातन ज्ञान की उंचाईयों को छूना चाहिए। यहां कोई मतभेद नहीं है, आप वाज़िब फरमा रहे हैं।

समस्या तो अतीत को, पुरातन को, प्राच्य को श्रेष्ठतम मानते और बताते हुए, उसी की ओर लौटने की प्रवृत्तियों की वज़ह से है। अगर अतीत में सबकुछ सर्वश्रेष्ठ संपन्न हो चुका, तो फिर कल्पनाओं में उड़ने की, नया रचने की आवश्यकता ही कहां रह जाती हैं। बात यही समझने की है।

हम कितना भी कह लें, कितना भी रोकना चाह लें, प्रगति हमेशा आगे की ओर ही होती है। फिर वही बात की हमारी लाख कोशिशों और सदइच्छाओं के बावज़ूद मनुष्य समाज उनको अपनाता रहेगा जो उसके विकास के मुफ़ीद रहेगा, उन्हें छोड़ता जाएगा जो उसकी प्रगति में बाधक बनेगा।

इतिहास का विकास क्रम अपने को दोहराता है, सही कहा आपने। परंतु यह फिर उसी अवस्था को जैसे का तैसा नहीं दोहराता है, उससे श्रेष्ठता के साथ यह दोहराव होता है। इसलिए यह चक्रीय गति में नहीं वरन, ऊपर की ओर जाती सर्पिलाकार वर्तुल गति में होता है, जैसे कि आप एक स्प्रिंग को खड़ा रख दें। जहां क्षैतिज धरातल पर विकास क्रम अपने को दोहराता प्रतीत होता है, दरअसल उर्ध्व धरातल पर वह उससे ऊपर की स्थिति में होता है।

वास्तविकता का यथार्थ और वस्तुगत ज्ञान बहते हुए पानी की तरह होता है, जिसे सभ्यताएं अपने साथ लिये चलती हैं। वहीं वास्तविकता का काल्पनिक और भ्रामक निरूपण, रुके हुए पानी की तरह होता है जो चेतनाओं में कहीं परंपराओं की वज़ह से अवस्थित रह जाए परंतु व्यवहारिक ज़िंदगी उसे छोड़ नई राह पकड़ लेती है। उस उक्ति का शायद यह मतलब होना चाहिए था।

आपने ज्ञान बढ़ाया, शुक्रगुजार हूं।
००००००००००००००००००००००००००००००००००००
मनुष्य के श्रम से विलगाव के....प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:

मनुष्य द्वारा जीवन के पुनरुत्पादन और सुविधाओं हेतु आवश्यक उत्पादन करना उसकी नियति है। जाहिर है, उत्पादन होगा तो वह किसी ना किसी रूप में श्रम-प्रक्रियाओं से जुड़ा ही रहेगा। समस्या अभी के परिप्रेक्ष्य में है, और इसे इसी संदर्भ में बेहतर समझा भी जा सकता है। श्रम से विलगाव के जैविक परिणाम सामने ही हैं, और इसके सामाजिक परिणाम भी।

अभी सामाजिक आवश्यकताओं से निरपेक्ष व्यक्तिगतताएं, श्रमविहिन हो जाना ही अपना चरम लक्ष्य मानती है। इसीलिए यह श्रम से विलगाव की अवधारणा उत्पन्न होती है, परंतु यह वस्तुगत नहीं है। अधिकतर मनुष्य किसी ना किसी रूप में उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हो्ते हैं और किसी ना किसी प्रकार का श्रम कर रहे होते हैं। समाज के ऊपरी पायदान पर बौद्धिक श्रम की बढोतरी और शारीरिक श्रम की कमी होती जाती है। परंतु श्रम से विलगाव मनुष्य के हित में हो ही नहीं सकता।

इसी वज़ह से यह आसानी से देखा जा सकता है, शारीरिक श्रम से विलगित व्यक्ति विभिन्न रोगों का शिकार होते जाते हैं, मनुष्य जीवन के आनंद से भी विलग होते जाते हैं। जैसा कि आपने इशारा किया है। यही वास्तविक परिस्थितियां, वहां अपनी बारी में उन्हें सचेत करती हैं, और यह भी हम देख ही सकते है कि फिर वहां शारीरिक श्रम की वैकल्पिक विधियां खोजी जाती है, किसी ना किसी तरह से शरीर से श्रम करवाने की परिस्थितियां पैदा की जाती हैं। चूंकि यह श्रम व्यक्तिगत रूप से शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, लगभग निरुद्देशीय सा होता है अतः इसमें नीरसता खत्म करने के लिए इसके साथ कई तरह की अवधारणाएं जोड़ी जाती हैं, ताकि इसे आंनंद से भारा जा सके तथा इसे एक सोद्देश्यता प्रदान की जा सके। यानि एक कृत्रिम जीवन शैली का समानान्तर विकास हो रहा है।

मनुष्यजाति का तकनीकि विकास उसके जीवन से भारी, नीरस, कठोर और सापेक्षतः गंदी श्रम-प्रक्रियाओं को खत्म करता है, इसमें उत्तरोत्तर प्रगति शनैः शनैः उत्पादन श्रम-प्रक्रियाओं को और हल्का और कम करेगी ही। जाहिरा तौर पर अभी की खास वर्गों की ही जागीर समझी जानी वाली तथाकथित श्रम-विहीनता और व्यापक होगी और जनसामान्य की ज़िंदगी मे प्रवेश करेंगी। सभी मनुष्यों के पास पर्याप्त समय और सुविधा होंगी कि वे अपनी श्रम की आवश्यकताओं को उनकी ही तरह सृजनात्मक कर सकें, खेलों के जरिए, विभिन्न कलाओं के जरिए, व्यक्तित्वविकास की प्रक्रिया से इन्हें जोड़ सकें,  श्रम करने के लिए ही आनंद के साथ श्रम कर सकें। यानि यह कृत्रिम ना रहकर, सहज और स्वतस्फूर्त ढ़ंग से जीवन को और आनंददायक बनाएगी।

श्रम ने मनुष्य को पैदा किया है, जाहिर है मनुष्य श्रम से विलगित नहीं हो सकता। वह लाख कोशिशें कर ले, श्रम से विलगाव की परिस्थितियां उसे पुनः किसी ना किसी रूप में श्रम की ओर लौटा ही लाएंगी, और यह उसकी इच्छाओं से स्वतंत्र ही होगा।

इस पर अलग से शोध उपलब्ध हो, यह तो नहीं कहा जा सकता। परंतु मानवजाति के अनुभवों और ज्ञान के महान भंड़ार में निश्चित तौर पर इसके निष्कर्ष निकाले जाने लायक इशारे मौजूद हैं। आप अक्सर चेतनाओं में उथल-पुथल करने के अवसर निकालते रहते हैं, अच्छा लगता है।
०००००००००००००००००००००००००००००००००००००
इस बार इतना ही।
आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। अलग से मेल पर भी जिज्ञासाएं की ही जा सकती हैं।

शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 28 मई 2010

कर्म और कर्मफल - परंपरा से इतर

हे मानवश्रेष्ठों,

इस बार भी, एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, कर्म और कर्मफल के संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था, उसे दिया जा रहा है। यहां से आप कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण करने का उद्देश्य सामने है ही। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
००००००००००००००००००००००००

उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

नमस्ते जी
आपका ब्लॉग पढा आज ..कुछ समझ आया और कुछ नहीं ..कारण आज कल मूड कुछ ठीक नहीं है ..आपसे एक प्रश्न है कि आप कर्म की क्या परिभाषा देते हैं ? और जो भी कर्म हम करते हैं उसका हम पर हमारे आस पास यानी हमारे साथ रहने वालों पर क्या प्रभाव पड़ता है ? और यदि आपके साथ रहने वाला कोई बुरे कर्म करता है किसी को दुःख देता है तो उसकी सजा सिर्फ उसको मिलती है या उसके साथ रहने वाले बाकी सदस्यों को भी ? यदि यह सही है तो इसका अंत कहाँ है ..? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं ..मुझे आशा है कि आपसे मुझे इनका जवाब जरुर मिलेगा आसान भाषा में :)
धन्यवाद

००००००००००००००००००००००००००
इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, थोड़ा संपादन भी किया गया है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं।
०००००००००००००००००००००

आदरणीय,

आजकल आपका मूड़ ठीक नहीं है। पता नहीं क्यूं मुझे ऐसा लगता है आप अक्सर इस अवस्था में आते रहते हैं। अपने आप से लड़ते हैं, नये सिरे से परिस्थितियों का विश्लेषण करते हैं, नये सिरे से अपने आपको तैयार करते हैं, संघर्ष करते हैं, और सब कुछ झटक कर फिर से अपने कामों में जुट जाते हैं। फिर कोई ऐसी बात होती है, संबंधों के बीच, मान्यताओं के बीच, मूल्यों की व्यवहारिकता के बीच कि यह सब फिर से शुरु होता है, फिर से खत्म होता है। चक्र चलता रहता है।

यह सब समय की बकवास भी हो सकती है, और इसके अस्वीकरण का अधिकार आपके पास सुरक्षित है ही। आखिर यह सब, समय आपकी कुंड़ली या हाथ की रेखाएं देखकर तो बता नहीं रहा कि सच मानने की विवशता हो।

चलिए थोड़ा सा आपके प्रश्न पर बात करते हैं:

दरअसल, आपके पास ‘कर्म’ नामक संकल्पना के पारंपरिक आशय हैं और हमारी धार्मिक परंपराओं से प्राप्त इसके गूढ़ार्थ हैं। थोड़ी क्लिष्ट भाषा है, पर जानबूझ कर इसका प्रयोग किया है, हो सकता है इस शब्दावली से आपको, आज ही पढ़ी मेरी पोस्ट संकल्पनाएं और प्रवर्ग का कुछ हिस्सा याद आजाए और आप उस पोस्ट और उक्त वाक्य के बीच के अंतर्संबंधों ( co-relation ) को देख सकें।

‘कर्म’ शब्द के आसान रूप ‘काम’ से हम भलीभांति परिचित होते हैं, बचपन से ही हम अच्छी तरह जानते हैं कि ज़िंदगी जीने के लिए मनुष्य को काम करना ही पडता है, काम कर कर ही वह वाकई में मनुष्य बनता है, कामों में दक्षता प्राप्त करता है, बिना काम किए कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता, काम अच्छा होता है तो मनुष्य को ख़ुद भी सुक़ून मिलता है शाबासी मिलती है, काम खराब होता है तो ख़ुद भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता, ग्लानि में रहता है और जाहिरा तौर पर लताड़ और प्रताड़ना मिलती है, अपने काम के जरिए ही मनुष्य अपनी पहचान बनाता है, इसी पहचान के जरिए अपने संबंधों को विकसित करता है, अच्छे काम हमें और हमारे से संबंधित परिवेश को खुश रखते हैं, सुकून देते हैं, वहीं बुरे कार्य हमें और हमारे संबंधों को ग्लानि में भरते हैं, अशांति का कारण बनते हैं। यह काम की वह समझ है जो जीवन हमें खुद समझा देता है।

समस्या तब पैदा होती है जब हम इसी काम की क्लिष्ट संकल्पना ‘कर्म’ से परिचित होते हैं, खासकर हमारे धर्मग्रंथों और उनकी बताई गई व्याख्याओं के जरिए जो कि सहज रूप से हमें हमारे आस-पास उपलब्ध होते हैं। जैसे कि आप कर्म की गीता आधारित अवधारणाओं के बीच उलझे हुए हैं। गीता कहती है कि कर्म मनुष्य का धर्म है उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना कर्म करते जाना चाहिए, बिना इसके परिणामों और फल की चिंता किए बगैर। मनुष्य के हाथ में सिर्फ़ कर्म है और बाकी चीज़ें विधाता के हाथ में हैं। जब उसके हाथ में कर्मों के परिणाम है ही नहीं, इसीलिए जाहिरा तौर मनुष्य को इनकी चिंता नहीं करनी चाहिए। बाकि का सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए, वह ही तय करेगा कि इन कर्मों का क्या परिणाम या फल देना है किसको देना है। आगे गीता यहां तक कहती है कि यहां असल में कुछ नहीं हो रहा, सब कुछ वही कर रहा है, सब कुछ पहले से नियत है और मनुष्य तो निमित्त मात्र है।

ज़िंदगी द्वारा दी गई व्यवहारिक समझ और धार्मिक सैद्धांतिक आदर्शों के बीच का यही विरोधाभास, थोड़ा पढ़े-लिखे समझदार से लोगों को थोड़ा बहुत परेशान करता रहता हैं। अधिकतर लोग तो ज़िंदगी की तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार कर्म करते रहते हैं, मूल्य और सिद्धांत उन्हें फ़ालतू की आदर्श की बाते लगती हैं जो संतों के ही वश की होती हैं और उनके लिए सिर्फ़ बात करने या दूसरों को उपदेश देने की चीज़ मात्र होती हैं। मंदिर या शमशान जैसी जगहों के लिए ही मनुष्य दार्शनिकता और धार्मिकता का सा लबादा ओढ़े रखता है। अपनी सामान्य ज़िंदगी वह इन मूल्यों और आदर्शों से दूर, प्रचलित व्यवहारिक ढ़ग से ही जीता है। वह अपनी समझ में इनके अलग-अलग खाने बना लेता है, जिनके बीच कोई संवाद, कोई अंतर्संबंध बनाना ना वह आवश्यक समझता है ना ही संभव और फिर इसी ढोंग और दोगलेपन के साथ अपनी ज़िंदगी गुजारता चला जाता है।

हमें इस पर सोचना चाहिए कि जब मनुष्य निमित्त मात्र है, उसके हाथ में कुछ है ही नहीं, जब सब कुछ पहले से नियत है, जब कर्म और परिणाम उसके वश से परे है तो  जाहिर है नैतिक-अनैतिक, गलत-सही, प्रभाव और परिणामों की चिंता आदि का भला मतलब भी क्या रह जाता है? आपको इस बारे में कभी और, विस्तार से बताना शायद संभव हो पाए कि गीता और उसके द्वारा प्रवर्तित नये धार्मिक सिद्धांतो की ऐतिहासिक और वास्तविक पृष्ठभूमि का सच क्या है? यह किन सामाजिक जरूरतों के चलते विकसित और पल्लवित हुए?

वापस लौटते हैं।

आप अपने इस बाद के अनुकूलित धार्मिक व्यामोह से निकलिए और कर्म की ज़िंदगी द्वारा सिखाई परिभाषा पर ध्यान दीजिए। अपने व्यक्तिगत और दूसरों के सार्विक अनुभवों पर गौर कीजिए। देखें कि असल जीवन हमें इस बारे में क्या सिखा रहा है, क्योंकि यह समस्याएं हमारे वास्तविक जीवन में पैदा होती हैं अतएव इनसे निपटने के तरीके भी वास्तविकताओं को समझने से ही निकलेंगे। तभी आप अपने इन प्रश्नों से सही मायनों में जूझ पाएंगे, और कोई इच्छित परिणाम देने वाली राह चुन पाएंगे। आपकी मेधा को अभिप्रेत करने के लिए समय यहां कुछ इशारे कर रहा है। ये कोई निश्चित प्रकार के सिद्धांत नहीं है, सिर्फ़ आपकी समझ को शुरूआती आवेग प्रदान करना ही यहां इनका प्राथमिक उद्देश्य है। यह ऐच्छिक तात्कालिक वर्गीकरण है।

प्रत्येक जीव सबसे पहले अपनी जिजीविषा हेतु आवश्यक क्रियाकलापों हेतु प्रवृत्त होता है। उसकी सारी क्रियाविधियां इसी हेतु प्रेरित होती हैं, दूसरे से अंतर्संबंधित गतिविधियां उतना ही आकार ले पाती हैं जितना कि उसकी व्यक्तिगत जिजीविषा हेतु सहायक होती हैं। ये किसी भी जीव के लिए प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण ‘कर्म’ होता हैं। मनुष्य भी एक जीव होने के नाते प्राथमिक रूप से, अवचेतन निर्देशों के जरिए इन्हीं कर्मों के लिए प्राकृतिक स्वाभाविक प्रवृत्ति रखता है। और इसको ध्यान में रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

परंतु मनुष्य एक चेतना संपन्न, सामाजिक प्राणी है। अपनी सीमित क्षमताओं के कारण वह प्रकृति से सामूहिक रूप से, सामाजिक रूप से ही संघर्ष करना सीखकर आज की अवस्थाओं तक पहुंचा है। उसकी ऐतिहासिक समझ यह अच्छी तरह से जानती है कि सामाजिकता के बगैर उसका अस्तित्व संभव ही नहीं है। वह अकेला पहले तो ‘कर्म’ करने लायक ही नहीं हो सकता, दूसरा उसके जीवनयापन के लिए लिए जाने सारे कर्म आपस में एक दूसरे मनुष्यों के साथ बहुत ही गहराई से अंतर्गुंथित हैं।

जीवनयापन हेतु आवश्यक सामग्री और संसाधनों का उत्पादन और निर्माण उसके अकेले के कर्म के जरिए संभव ही नहीं हैं। इस तरह वह अपने हिस्से के कर्म, और उसके परिणामों के जरिए पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का तान-बाना बुनता है। एक समाज में सभी इसी ‘कर्म’ के बंटवारे के जरिए आपस में जुडे रहते हैं, चाहे वे इसे समझ पाते हो या नहीं, एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, एक दूसरे के संबंधों को प्रेरित और विकसित करते हैं। इसी की वज़ह से एक दूसरे के बीच नकारात्मकता भी पैदा होती है, संबंध टूटते, नये संबंध बनते हैं। यह कर्म का सामाजिक पक्ष है, और द्वितीयक रूप है।

जीवनयापन हेतु जरूरी क्रियाकलापों से बचे समय में मनुष्य को आनंद भी चाहिए होता है, अपने सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान की आवश्यकता भी महसूस होती है। वह अपने अस्तित्व के जरिए सामाजिक श्रेष्ठता पाने की, व्यक्तिगत तौर पर अपने होने को महसूस करने और सामाजिक रूप से अपने जीवन की आवश्यकता साबित कर पाने की आकांक्षाओं से भी ओत-प्रोत होता है। अपने आपको सामाजिक उपयोगिता का आवश्यक अंग बनाने की, सामाजिक श्रेष्ठता पाने की, व्यक्तिगत अहं की तुष्टि की इन जुंबिशों  के चलते किए जाने वाले कर्मों को तृतीयक सामाजिक-सांस्कृतिक रूप की श्रेणी मॆं रखा जा सकता है

वह जैविक जरूरतों के आधार पर बने प्राथमिक और द्वितीयक कर्म संबंधों के अनुसार स्थापित व्यक्तिगत संबंधों में भावनात्मक आधार भी ढूंढ़ता है, भावनात्मक और व्यक्तिगत अपेक्षाएं पालता है, और इनके सुचारू व्यवस्थापन के लिए जिजीविषा से इतर कई तरह के क्रियाकलाप करने की प्रेरणा पाता है। इन्हें कर्म का चतुर्थ और सामाजिकता से ओत-प्रोत व्यक्तिक भावनात्मक रूप कहा जा सकता है

जाहिर है अब अलग से यह कहने की आवश्यकता नहीं रह गई है कि हम कर्मों के जरिए ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अपने कर्म और उस कर्म के पीछे के वास्तविक कारण के अनुसार ही हमारे साथ रहने वालों को प्रभावित करते हैं। साथ रहने वाले सब, जब आपस में अंतर्संबंधित हैं, तो एक दूसरे के कर्मों से सभी आपस में एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। जब तक ये कर्म एक दूसरे के व्यक्तिगत हितों से नहीं टकराते हैं, सामूहिक हितों से जुड़े रहते हैं, तब तक कोई समस्या नहीं महसूस नहीं होती। परंतु जब साथ रहने वालों के कुछ कर्म आपसी हितों और मान्यताओं से टकराने लगते हैं, जब ये सुपरिभाषित और सामूहिकता के साथ व्यवस्थित रूप से प्रचालित नहीं होते हैं, तो ये आपसी कड़वाहटों का, मनमुटावों का कारण बनते हैं और जीवन में, व्यक्तिगत चेतनाओं में अशांति का कारण बनते हैं

जब एक साथ रहने वाला समूह आपस में इस तरह से अंतर्गुंथित है तो उनके कर्मों का असर भी व्यक्तिगत नहीं रह जाता, उसके परिणाम सभी को तद्‍अनुरूप प्रभावित करते हैं, अब इसे कभी सज़ा के तौर पर भी लिया जा सकता है और कभी इनाम के तौर पर भी। कुछ के तात्कालिक असर भी दिख जाते हैं, और कुछ के असर बहुत देर के बाद सामने आते हैं। समय का इस तरह से यहां कंप्यूटर पर बैठ कर टाईप करते रहना समय के परिवार के सामूहिक हितों के अनुरूप नहीं है, यह समय का तृतीयक रूप का कर्म है। जाहिरा तौर पर यह परिवार में टकराव का विषय बन सकता है। अब यह समय की समझ और प्रयासों पर निर्भर है कि समय किस तरह अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक जरूरतों के बीच सामंजस्य बिठाता है और इसे व्यक्तिगत अहं और श्रेष्ठताओं का विषय नहीं बनने देता है। यह आप आसानी से समझ सकते हैं।

यही अंत हो सकता है। चीज़ों को उनकी वास्तविकताओं के अनुसार समझना, वास्तविक और व्यवहारिक रूप से आपस में सामंजस्य बैठाना, पहले ख़ुद अपने आप से पारदर्शी होना, फिर अपने व्यक्तित्व को दूसरों के सामने पारदर्शी बनाना, अपने आप से और दूसरों के साथ ईमानदारी से पेश आना। अपनी व्यक्तिगतता को सामूहिक हितों के सापेक्ष सीमित करना, सामूहिक हितों में ही अपनी व्यक्तिगतता की अभिव्यक्ति को पैबस्त करना सीखना। और इस सबको प्रभावी रूप से कर पाने के लिए, अपनी ज्ञान और समझ को निरंतर बढ़ाने और परिष्कृत करने के लिए, मानवजाति के वास्तविक, यथार्थ और वैज्ञानिक अद्यतन ज्ञान का अध्ययन और व्यवहारीकरण

शायद यही अंत होना चाहिए। अगर हो सके।
००००००००००००००००००००

उन मानवश्रेष्ठ का संपादित जवाब:

सादर नमस्ते समय जी ..मैं नहीं जानता आपका नाम क्या है ? पर मेरे लिए आप समय ही हो जो मेरे प्रश्नों के उत्तर देते हैं और मेरे अन्दर चलने वाले द्वंद को एक दिशा दिखाते हैं ..आप के हाथ में मेरी कोई कुंडली नहीं.. कोई हाथ की  रेखा नहीं है ..पर आपने जो इस पोस्ट के आरम्भ में कहा वह एक दम से सच है ....( . )....कर्म समझने की परिभाषा यहीं से शुरू हुई सही मायने में ...गीता तो पढ़ी मैंने कई बार पर आज आपके बताये अर्थ से लगता है उसको समझने में कहीं चुक गया ...गीता हर बार नए अर्थ देती है ..यह तो लगता था पर फिर भी सामान्य इंसान हूँ न ....जब झूठ साथ वाला बोल रहा हो या वह ज़िन्दगी वह जी रहा हो तो उसका असर बाकी सदस्यों पर पड़ना लाजमी है यह आज आपकी पोस्ट से जाना ..( . ).. आपने जो मुझे मेल किया है वह मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक अच्छा मार्गदर्शक साबित हो सकता है ..मेरा अनुरोध हैं आपसे कि आप इसको पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर पोस्ट करें ..( . )...आगे भी आपका स्नेह मुझे यूँ ही मिलता रहेगा तहे दिल से धन्यवाद

०००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

मंगलवार, 18 मई 2010

सपनों के बहाने कुछ प्रवृतियों पर बातचीत

हे मानवश्रेष्ठों,

फिलहाल भारी-भरकम स्थगित। चलिए कुछ हल्का-फुल्का कुछ किया जाए, पर इसका क्या किया जा सकता है कि यहां से भी आप काफ़ी गंभीर इशारे पा सकते हैं। अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।

बहुत पहले सपनों के मनोविज्ञान पर दो आलेख प्रस्तुत किये थे, ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ और ‘कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं’। प्रसंग पुराना है पर आप जानते ही हैं बात कभी पुरानी नहीं होती। विचार हमेशा पहली बार मुख़ातिब हो रहे और आत्मसात नहीं कर पाये मानवश्रेष्ठों के लिए नया ही रहता है। तो फिलहाल मुद्दा यह है कि उसी आलेख के बाद एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, उन्हीं संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था। यहां उसे व्यक्तिगत संदर्भों के बिना सार्वजनिक किया जाना इसलिए जरूरी लग रहा है कि कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण किया जा सके। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
०००००००००००००००००००००

उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

सपने इस तरह का सच क्यों बता जाते हैं ?
नमस्ते जी ,आपके ब्लाग पर ...आप लिखते ही हैं कि मेल पर भी आपसे चर्चा की जा सकती है ..मैंने आपके ब्लाग पर दोनों लेख भी पढ़े हैं ...कमेंट्स पढ़े है ...कुछ समझ में आया कुछ नहीं ..पर मेरा अनुभव यह है कि जब जब बुरा सपना देखा है वह सच हुआ है ...

( इसके बाद उन मानवश्रेष्ठ ने अपने कुछ सपनों का जिक्र किया, जिनके सच हो जाने के कारण वे अचंभित और प्रश्नाकुल थे। वे व्यक्तिगतता का आधार रखते थे, अतएव उन्हें यहां प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है )

क्या यह सच होता है ..? मैंने इसको कभी सीरियस क्यों नही लिया ? नही जानता ..पर क्या सच में कोई मुझे संकेत कर जाता है इन बुरे सपनों से ..हम अकसर इन्हे नज़रंदाज़ क्यों कर देते हैं ? बहुत से सवाल है दिल में .और अब भी कोई सपना बुरा आए तो डर जाता हूँ ..अब यह मानता हूँ कि  कोई शक्ति हमारे अन्दर की ही हमे सूचना जरुर देती है पर शायद    हम उस को पहचान नही पाते ....पर यह सपने आते हैं .इस मेल में सिर्फ अपने आने वाले सपनो का जिक्र किया है ..आगे भी कुछ प्रश्न है जो अगली मेल में जारी रहेंगे....
शुक्रिया

०००००००००००००००००००००
इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, अतएव कहीं-कहीं लय टूटती सी नज़र आ सकती है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं। सपनों के मनोविज्ञान संबंधी दिलचस्पी हो ( जिसका कि जिक्र यहां स्पष्ट नहीं है) के लिए आप शुरूआत में दिये गये आलेख-लिंक पर जा सकते हैं।
०००००००००००००००००००००


आदरणीय,
आप इस पर बेहद गंभीर हैं, और अपनी गुत्थियों पर असमंजस में।
यह इस लंबे खत से पता चलता है। समय अभी तय नहीं कर पा रहा है, कि वह किस हद तक आपसे संवादरत हो सकता है, और कितना अनौपचारिक। चलिए कुछ कोशिश तो की ही जा सकती है।

सपनों की उलझनों ने समय को भी काफ़ी परेशान किया था, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से आप अपने बचपन में और अभी भी इनसे बावस्ता हैं। ज़िंदगी से जुडे और भी कई पहलू थे जिनपर प्रचलित दृष्टिकोण समय को नाकाफ़ी लगता था जाहिर है समय ने काफ़ी जिज्ञासाएं की है और दर्शन और विज्ञान का एक सर्वकालिक छात्र है,  बहुतेरे विषयों पर दुनिया भर के अनेक लेखकों की सैकड़ों पुस्तकों से समय का गुजरना हुआ है जिनमें मनोविज्ञान विषय भी शामिल रहा है। यह अपने मुंह मियां-मिट्ठू बनना इसलिए हो रहा है ताकि समय आपको यह बता सके कि समय का दृष्टिकोण वहां और यहां भी पूरी गंभीरता लिए हुए है, ताकि आपको यह लग सके कि चलताऊ ढंग से यूं ही कुछ भी नहीं लिख दिया गया है, ताकि आपसे भी यह उम्मीद कर सकूं कि आप समझें कि गुत्थियों को सुलझाने के लिए सतही प्रयास हमेशा नाकाफ़ी होते हैं

साथ ही इसलिए भी कि, वस्तुगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों वाली पुस्तकों में भी ऐसी गुत्थियों पर कोई सीधी-सीधी बात नहीं होती, या यूं कह लीजिए कि जरूरी नहीं कि आपकी समस्या उसी समरूपता में वहां उपलब्ध हो। वहां इनके ऊपर, मनोजगत के व्यापारों पर पूरा सटीक विश्लेषण उपलब्ध है परंतु इनकी रौशनाई में अपनी उलझनों से प्राप्त इशारों से खु़द ही जूझना पडता है। अब मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान ने मानसिक प्रक्रियाओं की कार्यप्रणालियों की काफ़ी सुसंगत समझ विकसित कर ली है जिसके जरिए अधिकतर गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है। वहां भी एक समझ है, एक दृष्टिकोण है, एक पद्धति है और कुछ इशारे हैं जिनके आधार पर मनुष्य अपने एकांतिक विशेष मानसिक व्यापारों को समझने की कोशिश कर सकता है। जाहिर है पर यह कोशिश तो स्वयं को ही करनी होगी, क्योंकि हमारी पसंद का पका-पकाया हलुवा कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

अब होता यह है कि यह एक लंबा रास्ता है, पहले तो एक असली वैज्ञानिक वस्तुगत दृष्टिकोण पैदा करना वह भी अपने भाववादी संस्कारों से लडाई के साथ, फिर उसके हिसाब से दुनिया की हर चीज़ से पुनः माथापच्ची करना और उस पर टांग खीचता परिवेश। और समय भी तो चाहिए ही। साधारणतया मानसिक प्रवृति हमेशा एक लघुप्रतिरोध की राह खोजना चाहती है, ताकि तात्कालिक रूप से, शीघ्रता से एक आत्मसंतुष्टि मिले, दिमागी़ तनाव कम हो और दैनन्दिनी क्रियाकलापों में आसानी से जुट जाया जा सके। इसलिए अधिकतर हम बिना किसी गंभीर अध्ययन के अपनी सीमित समझ के मुताबिक अटकलबाज़ी करते हैं, और तुरत किसी कामचलाऊ निष्कर्ष पर पहुंच कर दिमाग़ को अपनी दूसरी, सापेक्षतः जरूरी, इच्छित सरगोशियों में लगा देते हैं।

यही कारण है कि ईश्वर, भाग्य, नियति, अलौकिकता, अध्यात्म आदि-आदि के तुरंत तसल्ली देने वाले क्रिया-व्यापार समाज में हमेशा जोरों पर रहते हैं। यहां हर गुत्थी के सरल, स्थापित से, पूर्व तैयार, एक साधारण सी तार्किकता की श्रृंखला में व्यवस्थित से हल हमेशा तैयार हैं। इसके साथ ही ये हमारे संस्कारों में होते हैं, पूर्वपरिचित होते हैं, अधिकतर परिवेश की सहमति भी साथ होती है अतएव इनके साथ तादात्मय बैठा लेना हमारे लिए ज्यादा सहज होता है

ऐसा ही आपके साथ हो रहा है। सांयोगिक संवृत्तियां आपको इस तरह सोचने पर विवश कर रहीं है, और साथ ही आपकी जिज्ञासु समझ थोडा-बहुत संदेह भी पैदा कर रही है। आप अंतर्द्वंद में हैं।

पहले एक बात बताता हूं। हमारी दादी जी इस तरह से ही सपनों के सच वाले मामले में और टैलीपैथी जैसे मामलों में गांव में और परिवेश में बहुत लोकप्रिय थीं। वे अक्सर कुछ पुराने संकेतों के जरिए भविष्यवाणियां भी करके चौंकाया करती थी। जैसे आज कोई आयेगा, आज वहां मत जाओ, आज यूं होगा, आदि-आदि। घर में ही साक्षात उदाहरण मौजूद था, इसीलिए हमारे लिए यह अंतर्द्वंद काफ़ी भारी था। उनके आप जैसे ही कई किस्से हम सुना करते थे। दादा जी एक किस्सा तो इतना सटीक सुनाया करते थे कि आश्चर्य से मन मसोस कर रह जाता था, जैसे कि तब होता है कि हम जानते हैं कि जादू दिखाने वाला कोई ट्रिक लगाकर भ्रम पैदा कर रहा है और फिर भी हम उस ट्रिक का अंदाज़ा नहीं लगा पाते और यह सोचते रह जाते हैं कि आखिर यह संभव कैसे हो पाया होगा

यह जबरदस्त चुनौती होती है और यहीं, हमारे दृष्टिकोण, हमें दो अलग राहों पर ले जाने की संभावनाएं रखते हैं। यदि हम किसी भी तरह की अलौकिकता में, चमत्कारों में, जरा सा भी यकी़न रखते हैं तो हम इस जादू को भी उन्हीं से जोडकर शांति पा सकते हैं, इसे भी उसी अलौकिकता का एक उदाहरण मानकर श्रृद्धानवत हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि हम जगत की वस्तुगतता के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं तो हम यह यक़ीन तो रखते हैं कि यह भी किसी भ्रमात्मक ट्रिक का ही मामला है पर हमारे पास इसका कोई जबाब नहीं होता और एक संदेह, एक उलझन लेकर वहां से उठते हैं। पहला रास्ता सुरक्षित रास्ता है, जिस पर और भी बहुतेरे राही होते हैं, वहीं दूसरा रास्ता हमें और भी अकेला कर देता है तथा एक अनवरत बैचैनी छोड जाता है

पहले तो हमें यह सब रहस्यमयी लगता था, धीरे-धीरे इन भविष्यवाणियों के पीछे के प्राचीन संकेतों की भाषा हम भी समझने लगे और फिर सच होने के अवसरों और आवृतियों को जांचने लगे। तब जाकर इनकी सांयोगिकताओं के प्रतिशत हमें समझ में आने लगे। परंतु हमारी माताजी उनमें अभी भी एक अलौकिक शक्ति का आभास पाती हैं और उन पर कोई तर्क काम नहीं करते। आस्थाएं, तर्क से संतुष्ट नहीं होती।

तो आदरणीय, यह आप पर है कि इन सांयोगिकताओं में किसी नियति की संभावनाएं टटोलते हैं और इनके पीछे किसी अलौकिक शक्ति के भावी इशारे ढूढ़ते हैं या फिर सपनों की वैज्ञानिक वस्तुगतता को समझ कर इनके सच के रूप में घट जाने को एक संयोग के रूप में देखते हैं। यह आप ही भली भांति जानते हैं कि इन सांयोगिकताओं के कितने रूप आपके सामने सच के हिस्से में आये, कितनों का आपने नोटिस लिया, और जो सच नहीं होते उनका नोटिस आप लेते हैं या नहीं।

समय ने अपने लेख में कई बातों को काफ़ी विस्तार से समझाने की कोशिश की थी। टिप्पणियों के जबाब में की गयी टिप्पणियों में और भी कई इशारे किये थे। कुछ फ़र्जी सपनों का जिक्र भी किया था जो कि हमेशा सच होने ही होते हैं।

यह आपने लिखा ही है कि कुछ सपने तो हूबहू घटते देखें हैं आपने, और कुछ हूबहू नहीं थे। दोनों ही मामलों में सारी व्याख्याएं घटनाएं घट जाने के बाद की हैं और उनके आपसी अंतर्संबंध भी आपने बाद में ही खोजे हैं। इसके अलावा यह भी ध्यान देने की बात है, इन सब सपनों को आप उम्र और समझ के इस दौर में पुनः नये सिरे से व्याख्यायित कर रहे हैं, ऐसे में हमारे पूर्वाग्रह अनुकूल परिस्थितियां ही चुनते हैं, कई नई अनुकूल बातें भी गढ़ ली जाती हैं। इस पर भी सोचा जाना चाहिए कि यह अधिकतर हमारे बुरे सपनों के साथ ही क्यों होता है?

हमारी चिंताएं वास्तविक परिस्थितियों के कारण ही उपजती है। जैसे की बच्चा जब झूले पर बैठा हो तो हमें उसके डूब कर मर जाने की चिंता सता ही नहीं सकती, हमें इस वक्त उसके गिर जाने की चिंता ही हो सकती हैं। यानि कि हर घटना के साथ हमारी स्मृति में उससे संबंधित चिंताओं के भावों की स्मृति भी बनती है और बाद में उस घटना का स्मरण उन चिंताओं से भी हमें पुनः रूबरू कराता है। यही सपनों में भी होता है, छवियों के साथ जुडी हुई चिंताएं भी हमें सालती हैं और यदि हमारी प्रवृति इन पर पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पाले हुए होती है तो चिंतन में भी और सपनों में भी हम उसी के अनुसार मानसिक प्रक्रियाएं करते हैं।

काफ़ी कुछ इशारे किए हैं समय ने।

आप यदि गंभीर है सत्य के अन्वेषण हेतु तो आपको अपने मन की गहराइयों को टटोलना चाहिए, अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं की वास्तविक पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करनी चाहिए, इसी से आपकों अपनी मानसिक प्रक्रियाओं और सपनों के रहस्यों की परतें खोलने में मदद मिल सकती है। जहां आपकी समझ, गुत्थियों के विश्लेषण और यथार्थ तथा वस्तुगत हल प्राप्त करने में अपनी सीमाएं महसूस करे, तो इसे उस विषय संबंधी अधिकृत तथा सिद्ध स्रोतों से और अधिक अध्ययन-मनन करने का इशारा समझना चाहिए। जब तक आप संतुष्ट नहीं महसूस करते, उस पर अपनी अंतिम मान्यताओं और निष्कर्षों को स्थगित रखना चाहिए।

यदि आप अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं के साथ संतुष्ट है, और अलौकिक शक्तियों के इशारों पर वास्तव में यक़ीन करते हैं तो फिर काहे इस समझ-वमझ के पचडे में पडते हैं? इसका आनंद लीजिए और ऐसे लोग जाहिर है कम ही होते हैं तो इसका जिक्र करके अपने अंदर भी अलौकिक शक्ति होने का भ्रम पालिए, लोगों के बीच चमत्कारी समझे जाने का मज़ा लीजिए और खुद भी अलौकिक होने के अहसास का गर्व महसूसिए। मिल रहा है, तो ज़िंदगी का मज़ा लूटिए।

यदि समय से कुछ और मदद चाहिए तो संवाद बनाए रखें। समय हमेशा हाज़िर है।
कुछ अनुचित और कठोर कह दिया गया हो तो मुआफ़ी की गुंजाईश बनाए रखें। मुझे मेरी सीमाएं बता दें।

००००००००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

शनिवार, 1 मई 2010

चेतना श्रृंखला का समाहार और दर्शन का संश्लेषक कार्य

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में देखने की कोशिश की थी, और विचार किया था कि क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?  इस बार यहां चेतना पर शुरू हुई इस श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत किया जा रहा है तथा दर्शन के संश्लेषक कार्य पर चर्चा की जा रही है। इस समाहार में अभी तक की पोस्टों के सभी लिंक हैं।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।
००००००००००००००००००००००००००

चेतना श्रृंखला का समाहार : दर्शन का संश्लेषक कार्य

हमारी यह श्रृंखला चेतना की बातचीत से शुरू हुई थी, जिसे दर्शन के परिप्रेक्ष्य में ही बेहतर जाना जा सकता है। दर्शन के समेकन के जरिए हम विश्व को एक समष्टि के रूप में समझना सीखते हैं और अपना एक नज़रिया एक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। दर्शन का बुनियादी सवाल हमारे सामने यह चुनौती रखता है कि चेतना और भूतद्रव्य में प्राथमिक और निर्धारक कौन हैं। इसके जवाब के अनुसार ही दर्शन की दो मूल प्रवृतियों भौतिकवाद और प्रत्ययवाद से हमारा सामना होता है। हम दर्शन की अध्ययनविधियों द्वंदवाद और अधिभूतवाद से परिचित हुए, और हमने संकल्पनाओं और प्रवर्गों के बारे में जाना। फिर हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को समझने के लिए भूतद्रव्य की संकल्पना से विस्तार से गुजरे। इससे संबंधित दृष्टिकोणों और उनके विकास की प्रक्रिया को समझते हुए, हमने इसके एक मूलभूत गुण परावर्तन को जाना समझा।

अजैव जगत में परावर्तन को समझते हुए हमने उसके जटिलतर होते जाने की विकास प्रक्रिया को जानने की कोशिश की, और जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों से परिचित हुए। फिर जीवन के क्रमविकास के दौरान परावर्तन की प्रक्रिया के साधनों के रूप में तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति तक की यात्रा हमने तय की। यह यात्रा आगे बढ़ी और हमने परावर्तन के सक्रिय और निष्क्रिय रूपों को समझने की कोशिश की। फिर हमने परावर्तन के उच्चतम जटिल रूप में मानसिक क्रियाकलापों और इसी की संदर्भ में मन, चिंतन और चेतना के बीच बारीक फ़र्कों को समझने की कोशिश की।

यह सफ़र आगे बढा और हमने मानसिक क्रियाकलापों के भौतिक अंग के रूप में मस्तिष्क पर एक संक्षिप्त नज़र ड़ाली, तथा जैव जगत में पशुओं और मनुष्य के मानस में मुख्य भेदों को जाना। अंतत्वोगत्वा हम मनुष्य की चेतना के मुख्य आधारों के रूप में श्रम की चर्चा तक पहुंचे तथा भाषा और चिंतन के अंतर्संबंधों को कुछ विस्तार से जाना। इस तरह हमने भूतद्रव्य के क्रमिक विकास के परिणाम स्वरूप चेतना की उत्पत्ति को अद्यतन स्तर पर समझने की कोशिश की और भूतद्रव्य और चेतना के बीच की प्रतिपक्षता और सापेक्षता को ह्र्दयंगम किया। इसी कड़ी में हमने मशीनों और उनके चेतना संपन्न हो सकने की संभावनाओं पर भी गौर किया और जाना कि चेतना किस तरह से सिर्फ़ मनुष्य का लाक्षणिक गुण हो सकती है।

इस श्रृंखला के अंतर्गत हमने जिन संकल्पनाओं (concepts) और प्रवर्गों (categories) को समझने की कोशिश की है, उनका विधितंत्रीय (methodological) महत्व बहुत अधिक है। वे दर्शाते हैं कि हमारे संज्ञानात्मक (cognitive) क्रियाकलाप की सामान्य दिशा क्या है। किसी भी गंभीर अध्येता और सक्रिय सचेत व्यक्तित्व के लिए, बाह्य विश्व का अध्ययन करते समय यह जरूरी है कि वह विश्व को संयोगिक घटनाओं के बेतरतीब ढ़ेर की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी अविभक्त और अंतर्संबंधित भौतिक प्रक्रिया के रूप में जांचे-परखे, जो वस्तुगत रूप से विद्यमान है और अपने ही नियमों के अनुसार विकसित होता है।

यह विश्व, ना केवल साकल्य के रूप में (as a whole) एक विराट भौतिक प्रणाली है, बल्कि इसके अलग-अलग हिस्से भी विशेष प्रणालियां हैं, जिनमें आवश्यक, अंतर्निहित, स्थायी संयोजन (connections) होते हैं और जिनकी अपनी ही संरचनाएं और तत्व होते हैं। इसीलिए विश्व को प्रत्ययवादी ( भाववादी, Idealistic) दृष्टिकोण से जाना और समझा नहीं जा सकता है, क्योंकि वह हमारे परिवेश की घटनाओं के वस्तुगत (Objective) स्वभाव से इंकार करता है, क्योंकि वह परिवर्तन और विकास के सार्विक स्वभाव से इंकार करता है, क्योंकि वह इस बात को समझे बिना कि चिंतन और चेतना स्वयं भौतिक विश्व के जटिल विकास का उत्पाद हैं, वह सारी परिवेशी घटनाओं में चेतना की अभिव्यक्ति और नियमितताओं को देखता है।

प्रत्ययवाद हमारी तर्कबुद्धि को गति और विकास के वस्तुगत नियमों के अध्ययन की ओर नहीं ले जा सकता है जो कि आधुनिक विज्ञान का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। जो लोग परिवर्तन, गति तथा विकास के सार्विक, सामान्य स्वभाव को नहीं देख पाते, वे व्यावहारिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं के अपने विश्लेषण और निर्णयों में गलती करेंगे। तेज़ी से बदलती हुई आधुनिक दुनिया में सामाजिक प्रणालियों और संरचनाओं के वस्तुगत नियमों का ज्ञान, समुचित तथा सफ़ल क्रियाकलापों और हस्तक्षेपों की अनिवार्य शर्त है।

इस श्रृंखला में प्रस्तुत द्वंदात्मक भौतिकवाद के प्रवर्ग और संकल्पनाएं, मनुष्य का एक विश्वदृष्टिकोण विकसित करने और विश्व को समझने के विधितंत्रीय कार्यों के अलावा एक और महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इनके द्वारा सर्वाधिक विविधतापूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान को विश्व के एकल चित्र में संश्लेषित तथा संयुक्तिकृत किया जाता है, जिससे भूतद्रव्य ( matter ) की गति के सारे रूपों ( सरलतम व यांत्रिक गति से लेकर जटिलतम तक ) को एक ही साकल्य की शक्ल में जांचा जा सकता है। अजैव वस्तुएं तथा जीवित प्राणी, परावर्तन के निम्नतम रूप तथा उसका उच्चतम रूप चेतना, जीवन की उत्पत्ति की प्रक्रिया, सामाजिक क्रियाकलाप के रूप में श्रम, चिंतन के भौतिक वाहक के रूप में भाषा - ये सभी एक एकल विश्वदृष्टिकोण में एकीकृत तथा संश्लेषित, एक ही तस्वीर में अंकित सिद्ध होते हैं।

भौतिकी, रसायन, जैविकी, खगोलविद्या, इतिहास, साइबरनेटिकी तथा अन्य विज्ञान अपनी समस्याओं को अपनी ही विधि से हल करते हैं और अध्ययनाधीन वस्तुओं के बारे में अपनी ही विशेष व्यापक संकल्पनाओं और धारणाओं का विकास करते हैं। किंतु इनमें से एक भी, इन सभी विज्ञानों के परिणामों को विश्व की एकल तस्वीर के अंदर संश्लेषित और एकीकृत करने का कार्य नहीं करता है। दर्शन इन सभी अलग-अलग विज्ञानों के प्रमुख बुनियादी निष्कर्षों को संश्लेषित करता है और उनके आधारों पर विश्व को एक साकल्य के रूप में समझने की राह प्रशस्त करता है। यह हमें बदलती हुई दुनियां में अलग-अलग विज्ञानों के स्थान तथा उनके अंतर्संबंधों को तथा आगे के विकास को सही ढ़ंग से समझने में समर्थ बनाता है। इस तरह, दर्शन ज्ञान के संश्लेषण का कार्य भी निष्पादित ( perform ) करता है

मानवश्रेष्ठों, चेतना की संकल्पना और इसके भूतद्रव्य के साथ अंतर्संबंधों को जाने बगैर तथा भूतद्रव्य के जटिल विकास के फलस्वरूप चेतना की उत्पत्ति को समझे बगैर, हम अपने परिवेश की अंतर्गुथित परिघटनाओं और जटिल सामाजिक अंतर्संबंधों के सटीक विश्लेषण की योग्यता हासिल नहीं कर सकते। हमारा प्रत्ययवादी ( भाववादी, Idealistic) मानसिक अनुकूलन और अध्ययन की अधिभूतवादी ( metaphysical ) विधि के कारण हमें घटनाओं में किसी अलौकिक चेतना की उपस्थिति और रहस्यमयता नज़र आती है। और ऐसे में जबकि आज वैज्ञानिक से लगते उपागमों और शब्दावलियों के सहारे प्रत्ययवादी दर्शन की सिद्धी तथा पुष्टि के अनगिनत, संगठित और बहुप्रचारित प्रयासों का जो अंबार लगाया जा रहा है, मनुष्य जाति के भावी सामूहिक विकास के लिए दर्शन की सुसंगत समझ तथा एक समुचित वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और भी जरूरी हो गया है।

००००००००००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
आगे दिमाग़ को कष्ट देने के लिए हम कोई और राह ढूंढ निकालेंगे। दर्शन और मनोविज्ञान की और कई संकल्पनाओं और प्रवर्गों पर यथासंभव चर्चा करते रहेंगे। देखते हैं समय के हाथ क्या लगता है।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा की थी। इस बार जैसा कि पिछली बार कहा था, हम देखेंगे कि चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में हम कहां पाते हैं। क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।
००००००००००००००००००००००००००

क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

वर्तमान में विज्ञान के क्षेत्र में साइबरनेटिकी, सूचना सिद्धांत, कृत्रिम बुद्धि का सिद्धांत, आदि का विकास द्रुत इलैक्ट्रोनिक कंप्यूटरों के निर्माण से जुड़ा हुआ है। इनका विशिष्ट लक्षण यह है कि अन्य यंत्रों से भिन्न इन्हें मनुष्य के दैहिक श्रम के बजाए मानसिक श्रम को हल्का करने के लिए बनाया गया। आधुनिक कंप्यूटर अपने पूर्वर्तियों से हजारों गुना श्रेष्ठ हैं, और एक सेकंड़ में करोड़ो संक्रियाएं कर सकते हैं। सुपर कंप्यूटर भी हैं, जो बेहद अल्प समयावधि में ऐसी अत्यंत जटिल तार्किक तथा संगणकीय संक्रियाएं कर सकते हैं जिनमें सूचना का विराट परिणाम निहित होता है।

सूचना सिद्धांत और कृत्रिम बुद्धि सिद्धांत कंप्यूटरों के लिए ऐसे जटिल प्रोग्रामों के विकास में मदद कर रहे हैं, जिन्हें विशिष्ट कृत्रिम गणितीय भाषाओं में लिखा जाता है और जो एक समस्या का समाधान करते समय कंप्यूटर द्वारा की जाने वाली संक्रियाओं के सेट और अनुक्रम का निर्धारण करने वाले हजारों नियमों के समुच्चय होते हैं। आधुनिक कंप्यूटर उत्पादन प्रक्रिया की एक बड़ी संख्या तथा बेहद जटिल गणनाओं को पूर्णतः स्वचालित करने में समर्थ होते हैं। अपने प्रोग्राम स्वयं बना सकने वाले ऐसे कंप्यूटर हैं, जो उनमें प्रविष्ट कराये गये प्रोग्रामों के आधार पर उनसे बेहतर प्रोग्राम बाणा लेते हैं, वे प्रोग्रामरों द्वारा की हुई ग़लतियां सुधारते हैं और अन्य स्वचालित इलैक्ट्रोनिक यंत्रों की रचना भी कर सकते हैं। इस समय संसार में लाखों इलैक्ट्रोनिक स्वचालित यंत्र तथा रोबोट काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में निरंतर कार्य चल रहा है, नये और अधिक जटिल प्रोग्राम बन रहे हैं और अधिक सटीक व द्रुततर कंप्यूटर तथा संचालन यंत्र बन रहे हैं।

इस सिलसिले में अक्सर यह प्रश्न उठते हैं कि क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकते हैं? क्या एक इलैक्ट्रोनिक मशीन में चेतना और चिंतन का अस्तित्व हो सकता है? क्या वे मनुष्य की तर्कबुद्धि तथा अक़्ल को प्रतिस्थापित कर सकती हैं? क्या वे चिंतनशील सत्व के रूप में मनुष्य को ही तो विस्थापित नहीं कर देंगे? इन प्रश्नों की केवल दार्शनिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संगतता भी है। कृत्रिम बुद्धि के सिद्धांत के क्षेत्र में खोजबीन, जटिल कार्यों को संपन्न करने में समर्थ विशेषज्ञ प्रणालियों की रचना और स्वचालित रोबोटों के निर्माण में बहुत तरक़्क़ी हो जाने के बावज़ूद, कम से कम निकट भविष्य में, इस तरह की आशंका के लिए कोई आधार नहीं हैं।

चलिए हम इस समस्या पर चिंतन और चेतना के स्वभाव के विश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं। मनुष्य के मानसिक क्रियाकलाप में उसके उच्चतम रूप, निश्चित नियमों के अनुसार होने वाला तार्किक चिंतन ही शामिल नहीं है, बल्कि यथार्थता के परावर्तन के अनेक भावनात्मक रूप ( जैसे सुख, क्रोध, भय, संतोष, प्रेम, मैत्री, शत्रुता, भूख, तुष्टि, आदि ) और विविध प्रकार की अचेतन मानसिक प्रक्रियाएं भी शामिल हैं।

इसी तरह मनुष्य की रचनात्मकता ( creativity ) विशेष दिलचस्पी की चीज़ है। यह एक ऐसी घटना ( phenomenon ) है, जो पहले से निर्धारित क़ायदों से संनियमित ( governed ) नहीं होती। इसके विपरीत इस रचना प्रक्रिया में ही, इसके दौरान ही नये क़ायदे बनाए जाते हैं, गुणात्मकतः नये विचारों तथा सक्रियता के उसूलों को विकसित किया जाता है। यदि ऐसा न होता, तो लोग पशुओं की तरह आनुवंशिकता से उन तक संप्रेषित क्रियाकलाप के अंतर्जात ( innate ) प्रकारों के एक ही समुच्च्य को लगातार करते रहते। रचनात्मकता मनुष्य की मानसिक, चित्तवृतिक ( psychic ) विशेषता ही है, जो पर्यावरण को गुणात्मकतः परिवर्तित करने की, कोई सर्वथा नई चीज़ रचने की उसकी क्षमता में व्यक्त होती है और जो उसे अन्य सारे जीवित प्राणियों से मूलतः विशिष्ट बना देती है

यहां एक ऐसी सुस्पष्ट सीमा रेखा है, जो सर्वोत्तम कंप्यूटरों तथा किसी भी सामान्य व्यक्ति की संभावनाओं को विभाजित करती है। कंप्यूटर स्वयं चिंतन नहीं कर सकता है, वह पूर्ण परिपथों और इलैक्ट्रोनिक यांत्रिक विधियों के ज़रिए सिर्फ़ उन क़ायदों का पालन करता है, जो मनुष्य द्वारा उसमें ड़ाले गये प्रोग्रामों में शामिल होते हैं। कंप्यूटर संक्रियाओं की गति के मामले में और अपनी स्मृति ( स्मृति की युक्तियां ), अपनी अनथकता में और अनेक वर्षों तक काम करने की क्षमता, आदि में मनुष्य से बेहतर होता है। किंतु, जैसा कि हम जानते हैं, रचना प्रक्रिया को पूर्णतः क़ायदों के मातहत नहीं रखा जा सकता है और उनके जरिए वर्णित नहीं किया जा सकता है. इसलिए उसका प्रोग्रामन करके उसे कंप्यूटर के ‘हवाले’ नहीं किया जा सकता है। जाहिर है कि विज्ञान, इंजीनियरी तथा कला को रचना के बिना विकसित नहीं किया जा सकता है : इसी तरह, वास्तविक चिंतन भी उसके बिना असंभव है

कोई भी कंप्यूटर, नियत क़ायदों के मुताबिक संगीत बनाने वाला कंप्यूटर भी, ए. आर. रहमान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। बोधगम्य पाठ तैयार करने के लिए प्रोग्रामित कंप्यूटर प्रेमचंद की कृति ‘गोदान’ नहीं लिख सकता है। कुल मिला कर लाबलुब्बोआब यह कि एक कंप्यूटर सामान्यतः ऐसी कोई समस्या नहीं सुलझा सकता है, जो उसमे प्रविष्ट कराये गए प्रोग्राम में शामिल नहीं हो।

विक्टर ह्यूगो के पंद्रहवीं सदी के अंत की घटनाओं का वर्णन करने वाले एक उपन्यास ‘नोत्रे देम’ का एक पात्र एक पांडुलिपी तथा एक छपी हुई पुस्तक की तुलना करते हुए यह आशंका व्यक्त करता है कि छापे की मशीन ( जिसका अविष्कार हुआ ही था ) के कारण लोग लिखना भूल जाएंगे और साक्षरता लुप्त हो जाएगी। आज हम जानते हैं कि यह आशंका और भविष्यवाणी सत्य साबित नहीं हुई। पढ़ना-लिखना जानने लोगों की संख्या संसार भर में लगातार बढ़ रही है, शिक्षा का सामान्य स्तर बढ़ रहा है और ऐसा छापे की मशीन के कारण ही हो रहा है।

‘चिंतनशील’ कंम्प्यूटरों के बारे में भी इससे मिलती जुलती कोई बात कही जा सकती है। कुछ कलनीय तार्किक संक्रियाओं को निष्पादित करके रोबोट व कंम्प्यूटर लोगों को दैनंदिन, उबाऊ तथा भारी काम से छुटकारा दिलाते हैं। जिस प्रकार पुस्तक प्रकाशन से सार्वभौमिक साक्षरता में वृद्धि हुई, उसी प्रकार से कंम्प्यूटरों का फैलाव मानव चिंतन के और अधिक विकास को बढ़ावा दे रहा है। एक सही और सामाजिक प्रतिबद्धता से सम्पन्न व्यवस्था में इसके सदुपयोग के द्वारा लोगों की शिक्षा और संस्कृति में और उनकी रचनात्मक क्षमताओं के विकास में छलांगनुमा प्रगति ही होगी।

कंप्यूटर के द्वारा मानवजाति को अपने मानसिक क्रियाकलाप को विकसित और परिष्कृत बनाने की दिशा में तथा जनगण की विशाल बहुसंख्या के हित में विश्व को समझने तथा तर्कसम्मत ढ़ंग से इसे बदलने की दिशा में एक और कदम बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसलिए कंम्प्यूटरों के और विशेषतः सूक्ष्म इलैक्ट्रोनिकी के विकास में मानव चिंतन के प्रतिद्वंद्वी के ख़तरे को नहीं, बल्कि उसके और अधिक विकास तथा सुधार के आधारों को देखना चाहिए।

०००००००००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
अगली बार हम चेतना संबंधी इस श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के एक रूप में भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा की थी। इस बार हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा करेंगे। चेतना पर शुरू हुई यह श्रृंखला धीरे-धीरे अपने अंत की ओर बढ़ रही है।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।

०००००००००००००००००००००००००००

भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव
( the Relative character of the Opposition of Matter and Consciousness )


अब तक का श्रृंखलित विवेचन, दर्शन के बुनियादी सवाल के जवाब के मद्देनज़र चेतना की उत्पत्ति और भूतद्रव्य के साथ उसके संबंधों की विस्तृत पड़ताल कर रहा था। हमने यह जाना कि भूतद्रव्य के विपरीत चेतना शाश्वत नहीं है। यह भूतद्रव्य के विकास का एक उत्पाद है। यह भी कि चेतना भूतद्रव्य के एक विशेष अनुगुण, अर्थात परावर्तन ( reflection ), का उच्चतम और सर्वाधिक जटिल रूप है।

भूतद्रव्य चेतना के बिना विद्यमान हो सकता है और क्रमिक विकास के दौरान चेतना से पहले मौजूद था, किंतु चेतना भूतद्रव्य के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकती है। इस अर्थ में यह द्वितीयक तथा व्युत्पन्न है, और इसी में भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता निहित है। हमारे गिर्द वस्तुएं भौतिक हैं, जबकि चेतना ( जो हमारे मस्तिष्कों में उत्पन्न होती है ) प्रत्ययिक ( ideal ) है, इसमें भी इनकी प्रतिपक्षता व्यक्त होती है। परंतु यह प्रतिपक्षता स्वयं में निरपेक्ष ( absolute ) नहीं, वरन सापेक्ष ( relative ) होती है। यह प्रतिपक्षता दर्शन के बुनियादी सवाल के संदर्भ में ही सार्थक है, यानि जब हमें यह जानने में दिलचस्पी होती है कि इनमें से कौन प्राथमिक है, चेतना भूतद्रव्य से कैसे संबधित है और क्या यह हमारे परिवेशीय जगत को जान सकती है।

मान लीजिए के हम अपने आसपास की वस्तुओं पर विचार कर रहे हैं, उन्हें जांच रहे हैं और उनका अध्ययन कर रहे हैं। चूंकि वे हमसे परे हैं और हमारे चेतना पर निर्भर नहीं हैं और हम अपने संवेद अंगों के जरिए उनके बारे में सूचना प्राप्त करते हैं, इसलिए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि ये सब भूतद्रव्य ( matter ) हैं, यानि वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) हैं। इन वस्तुओं के बिंब, उनकी संकल्पनाएं और हमारे ज्ञान को व्यक्त करने वाले निर्णय और कथन हमारे मस्तिष्क में हैं, हमारी चेतना के अंग हैं और उस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) हैं। इसलिए कुछ दशाओं में आत्मगतता, वस्तुतः हमारी चेतना में वस्तुगत यथार्थता का परावर्तन है। और इसी अर्थ में, चेतना, वस्तुगत यथार्थता के रूप में भूतद्रव्य के प्रतिपक्ष में है।

अब आगे यह मान लीजिए कि अपनी दिलचस्पी की भौतिक वस्तुओं के हमारे अध्ययन के दौरान कोई अन्य व्यक्ति हमारा निरिक्षण कर रहा है, हमें जांच रहा है और हमारे क्रियाकलाफ पर विचार कर रहा है। इस व्यक्ति और उसकी चेतना के लिए हम स्वयं और हमारे मस्तिष्क व उनके क्रियाकलाप उतने ही भौतिक हैं, जितने कि हमारे परिवेशीय जगत की अन्य वस्तुएं। फलतः वह हमें और हमारे मस्तिष्कों के क्रियाकलाप के उत्पादों को वस्तुगत यथार्थता मान सकता है, ऐसी चीज़ समझ सकता है, जो उसकी चेतना से परे तथा उसके मानसिक क्रियाकलाप के बाहर है। अतएव, हमारे क्रियाकलाप के संदर्भ में हमारा चिंतन और मन एक तरफ़ तो हमारे मस्तिष्क के परावर्तन के रूप में काम करते हैं और दूसरी तरफ़ , एक अन्य प्रेक्षक के लिए उसी समय वह उसकी चेतना से परे की वस्तुगत यथार्थता के रूप में भी हो सकते हैं। इसी तरह अपनी बारी में, हम भी इस प्रेक्षक की चेतना तथा मानसिक क्रिया को, ठीक वैसे ही, वस्तुगत यथार्थता मान सकते हैं।

इस तरह, हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं और इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।

हमने यह भी देखा कि यह प्रतिपक्षता सापेक्ष होती है, और चिंतन तथा मानसिक क्रियाकलाप की संकल्प तथा अनुभूतियों जैसी अन्य अभिव्यक्तियों के वैज्ञानिक अध्ययन के वक्त इस प्रतिपक्षता को अतिरंजित करना भारी भूल होगी। चूंकि मन, मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप में, काम में, भाषा संबंधी क्रियाकलाप आदि में प्रकट होता है, इसलिए भूतद्रव्य और चेतना की, दैहिक और मानसिक की प्रतिपक्षता तथा एक का दूसरे से पूर्ण बिलगाव, चेतना तथा अन्य मानसिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन में ही बाधक होगा। भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष होता है। दर्शन के बुनियादी सवाल से निपटने के बाद इन्हें इसी अंतर्द्वंद में देखना चाहिए।
०००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
अगली बार हम चर्चा को आगे एक रूचिकर मोड़ देंगे और इस पर चर्चा करेंगे कि क्या कंप्यूटर भी सोच विचार कर सकते हैं। उसके बाद श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय
Related Posts with Thumbnails