शनिवार, 6 नवंबर 2010

मनुष्य की आवश्यकताओं का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हम जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आवश्यकताओं की क़िस्मों पर एक मनोवैज्ञानिक नज़रिये से गुजरे थे, इस बार मनुष्य की आवश्यकताओं के विकास पर एक छोटी सी चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मनुष्य की आवश्यकताओं का विकास

जीव-जंतुओं का व्यवहार सदा सीधे उनकी किसी न किसी आवश्यकता की तुष्टि की ओर उन्मुख रहता है। आवश्यकता न केवल क्रियाशीलता को जन्म देती है, बल्कि उसके रूप भी निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, आहार की आवश्यकता ( भूख ) लार टपकने, खाने की खोज, शिकार को पकड़ने, खाने, आदि के रूप में पशु की आहारिक सक्रियता को जन्म देती है।


अनुकूलित प्रतिवर्त इस सक्रियता को नये उत्तेजकों ( उदाहरणार्थ, घंटी की आवाज़ ) या नयी क्रियाओं ( उदाहरणार्थ, पैडल दबाना ) से जोड़ सकते हैं। किंतु इन सभी मामलों में पशु के व्यवहार की संरचना वही रहेगी। बाह्य उत्तेजकों में से घंटी के बजने को आहार के संकेत के तौर पर अलग कर लिया जाता है, इसी तरह पैडल का दबाना भी व्यवहार की एक ऐसी क्रिया के रूप में सामने आता है, जिसके फलस्वरूप आहार प्रकट होता है। दूसरे शब्दों में, अनुकूलित प्रतिवर्तों पर आधारित अत्यंत जटिल सक्रियता में भी पशु की आवश्यकताएं उसके मानस के परावर्ती और नियामक, दोनों तरह के कार्यों को प्रत्यक्षतः निर्धारित करती हैं। यह उसके शरीर की आवश्यकताओं पर निर्भर होता है कि उसका मानस परिवेशी विश्व में किन तत्वों को पृथक करेगा और उनके उत्तर में क्या क्रियाएं करेगा।


मनुष्य का व्यवहार एक सर्वथा भिन्न सिद्धांत पर आधारित है। खाने की कुर्सी पर बैठे और चम्मच से खाते हुए छोटे बच्चे की क्रियाएं भी पूरी तरह उसकी नैसर्गिक आवश्यकताओं की उपज नहीं होती। उदाहरण के लिए, बच्चे की भूख की शांति के लिए चम्मच क़तई जरूरी नहीं है। मगर पालन की प्रक्रिया में बच्चा ऐसी वस्तुओं को ऐसी वस्तुओं को ऐसी आवश्यकता की तुष्टि की आवश्यक शर्त मानने का आदी हो जाता है। उसके व्यवहार के रूपों का निर्धारण स्वयं आवश्यकता से नहीं, अपितु उसकी तुष्टि के समाज में स्वीकृत तरीक़ों से होने लगता है।

अतः बच्चे की क्रियाशीलता आरंभ से ही जैविकतः महत्त्वपूर्ण वस्तुओं द्वारा नहीं, अपितु मनुष्य जिन जिन तरीक़ों से उनका उपयोग करता है, उनके द्वारा, अर्थात सामाजिक व्यवहार में इन वस्तुओं के प्रकार्यों द्वारा प्रेरित की जाती है। बच्चे द्वारा इस प्रकार सीखे गये व्यवहार-संरूप वस्तुओं को मानव व्यवहार में उनके समाज द्वारा विकसित तथा मान्य प्रकार्यों के अनुसार इस्तेमाल करने के तरीक़े हैं, जैसे मेज़ पर और चम्मच से खाना, बिस्तर पर सोना, वग़ैरह।


सभी माता-पिता और शिक्षाविद्‍ भली-भांति जानते हैं कि ऐसी आदतें डाल पाना आसान नहीं है। बच्चा मेज़ या कुर्सी के नीचे घुस जाता है, चम्मच से मेज़ बजाता है, प्लेट में हाथ डालता है, टट्टी-पेशाब लगने पर उन्हें उनके लिए नियत जगहों और तरीकों से करना भूल जाता है, वग़ैरह। ऐसी ‘शरारतों’ और ‘गंदी बातों’ से लगातार लड़ना और कुछ नहीं, बल्कि बड़ों द्वारा बच्चों को संबंधित वस्तुओं के इस्तेमाल के सामाजिकतः स्वीकृत तरीक़े सिखाना और संबंधित वस्तुओं को इस्तेमाल करके अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि के मानवसुलभ रूप बताना ही है। 

बच्चे की आवश्यकताओं की तुष्टि से जुड़े मानव परिवेश के प्रभाव से वस्तुओं का जैव महत्त्व धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला जाता है और बच्चे के व्यवहार में उनका सामाजिक महत्त्व निर्णायक भूमिका अदा करने लगता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

आवश्यकताओं की क़िस्में

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में क्रियाशीलता के स्रोत के रूप में आवश्यकताओं पर चर्चा की थी, इस बार आवश्यकताओं की क़िस्मों पर एक मनोवैज्ञानिक नज़रिया देखते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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आवश्यकताओं की क़िस्में


मनुष्य की आवश्यकताओं का सामाजिक स्वरूप भी होता है और व्यक्तिगत स्वरूप भी। वास्तव में अपनी देखने में संकीर्ण व्यक्तिगत आवश्यकताओं ( उदाहरणार्थ, जैसे भोजन की आवश्यकता ) की तुष्टि के लिए भी मनुष्य सामाजिक श्रम-विभाजन के फलों को इस्तेमाल करता है ( उदाहरण के लिए, रोटी किसानों, कृषिविज्ञानियों, विभिन्न कृषि यंत्र चालकों, अनाज-गोदाम कर्मियों, बेचने वालों, चक्कीवालों, आदि के संयुक्त श्रम-प्रयासों का वास्तवीकृत परिणाम है )। इसके अतिरिक्त, मनुष्य दत्त सामाजिक परिवेश में ऐतिहासिकतः विकसित उपभोग के साधन तथा तरीक़े इस्तेमाल करता है और कुछ निश्चित शर्तों की पूर्ति चाहता है ( उदाहरण के लिए, खाना खाने से पहले खाने वाले के लिए उसे स्वीकार्य तरीक़े से पकाना जरूरी है। फिर खाना खाने के साधनों की भी जरूरत होगी और कुछ समय तथा स्वच्छता संबंधी शर्तें भी पूरी करनी होंगी )।

अतः बहुत सारी मानवीय आवश्यकताएं व्यक्ति की संकीर्ण आवश्यकताएं कम और उस समाज, उस समूह की आवश्यकताएं ज़्यादा होती हैं, जिसका वह व्यक्ति सदस्य है और जिसमें वह कार्य करता है। यहां समूह की आवश्यकताएं व्यक्ति की अपनी आवश्यकताओं का रूप ग्रहण कर लेती हैं। इसे स्पष्ट करने के लिए एक ऐसे विद्यार्थी की मिसाल लेते हैं जिसे अपने ग्रुप या कक्षा की सभा में किसी कार्य-विशेष के संदर्भ में एक रिपोर्ट पेश करने का काम सौंपा गया है। वह विद्यार्थी बड़े ध्यान और मनोयोग से रिपोर्ट तैयार करता है, किंतु इसलिए नहीं कि रिपोर्ट तैयार करने का काम उसके लिए किसी रोचक पुस्तक को पढ़ने या पसंद का खेल खेलने से ज़्यादा आकर्षक है, बल्कि सिर्फ़ इसलिए कि वह अपने समूह या कक्षा के अनुरोध को पूरा करने की, उस समूह का अंग होने के नाते अपनी जिम्मेदारी के निर्वाह की आवश्यकता महसूस करता है।

आवश्यकताओं में उनके मूल और विषय के अनुसार भेद किया जा सकता है। अपने मूल की दृष्टि से आवश्यकताएं नैसर्गिक और सांस्कृतिक, इन दो प्रकार की होती है।

नैसर्गिक आवश्यकताएं मनुष्य की सक्रियता की उसके तथा उसकी संतान के जीवन की रक्षा तथा निर्वाह के लिए आवश्यक परिस्थितियों पर निर्भरता की परिचायक हैं। खाना, पीना, मैथुन, निद्रा, शीत तथा अतिशय गर्मी से रक्षा, आदि नैसर्गिक आवश्यकताएं हैं और ये सभी लोगों की होती हैं। यदि कोई नैसर्गिक आवश्यकता लंबे समय तक पूरी नहीं हो पाती है, तो मनुष्य या तो मर जाएगा, या वह अपने पीछे अपनी संतान नहीं छोड़ सकेगा।

यद्यपि आज के लोगों की भी वही नैसर्गिक आवश्यकताएं, जो हमारे पशु पूर्वजों और आदिम लोगों की थीं, फिर भी उनका मनोवैज्ञानिक सारतत्व बिल्कुल भिन्न है। उनकी तुष्टि के उपाय और तरीक़े ही नहीं बदल गये हैं, बल्कि इससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि स्वयं आवश्यकताओं में तात्विक परिवर्तन आ गया है और आज का आदमी उन्हें उस रूप में महसूस नहीं करता, जिस रूप में उसके प्रागैतिहासिक पुरखे किया करते थे। मनुष्य की नैसर्गिक आवश्यकताओं का सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप होता है।

सांस्कृतिक आवश्यकताएं मनुष्य की सक्रियता की मानव संस्कृति के उत्पादों पर निर्भरता की परिचायक है। उनकी जड़े पूर्णतः मानव इतिहास में होती हैं। सांस्कृतिक आवश्यकताओं का विषय वे वस्तुएं हैं, जो किसी स्थापित संस्कृति के दायरे में किसी नैसर्गिक आवश्यकता की पूर्ति करती हैं ( जैसे पश्चिमी छुरी-कांटा, चीनी खाने की डंडियां, आदि )। सांस्कृतिक आवश्यकताओं का विषय वे वस्तुएं भी हैं, जिनकी श्रम, अन्य लोगों से सांस्कृतिक संपर्क और जटिल तथा विविध सामाजिक जीवन में जरूरत पड़ती है। विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक पद्धतियों में व्यक्ति अपनी शिक्षा और समाज में स्वीकृत प्रथाओं तथा व्यवहार-संरूपों के आत्मसातीकरण की मात्रा के अनुसार अपनी विभिन्न सांस्कृतिक आवश्यकताएं बनाता है। सांस्कृतिक आवश्यकताओं की तुष्टि ना होने से मनुष्य की मृत्यु तो नहीं होती ( जैसा कि नैसर्गिक आवश्यकताओं के सिलसिले में होता है ), पर उसका मानवत्व अवश्य बुरी तरह प्रभावित होगा।

सांस्कृतिक आवश्यकताएं एक दूसरी से सारतः अपने स्तर के अनुसार, अर्थात वे व्यक्ति से समाज की जिन अपेक्षाओं को प्रतिबिंबित करती हैं, उनके अनुसार भिन्न होती हैं। आख़िर एक युवा आदमी का मार्गदर्शन करने वाली रोचक और शिक्षाप्रद पुस्तकों की आवश्यकता और दूसरे युवक की फ़ैशनेबुल रंगों की टाई की आवश्यकता को एक ही स्तर पर तो नहीं रखा जा सकता। इन दोनों आवश्यकताओं और वे जिन सक्रियताओं का आधार बनती हैं, उनका अलग-अलग मूल्यांकन किया ही जाना चाहिए। नैतिक दृष्टि से उचित आवश्यकता वह है, जो व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उस समाज की अपेक्षाएं पूरी करती हैं और जो इस समाज में सामान्यतः मानव रुचियों, मूल्यांकनों तथा सार्विक दृष्टिकोण से मेल खाती हों।

अपने विषयों की प्रकृति के अनुसार आवश्यकताओं को भौतिक और आत्मिक में बांटा जा सकता है।

भौतिक आवश्यकताएं भौतिक संस्कृति की वस्तुओं पर मनुष्य की निर्भरता को दर्शाती हैं ( भोजन, वस्त्र, आवास, घर-गृहस्थी की चीज़ों की आवश्यकताएं ), जबकि आत्मिक आवश्यकताएं सामाजिक चेतना के उत्पादों पर उसकी निर्भरता को प्रकट करती हैं। आत्मिक आवश्यकताएं अपने को आत्मिक संस्कृति के सृजन तथा आत्मसातीकरण में व्यक्त करती हैं। मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं में दूसरे लोगों को भागीदार बनाने, पत्र-पत्रिकाएं तथा पुस्तकें पढ़ने, सिनेमा तथा नाटक देखने, संगीत सुनने, आदि की आवश्यकता महसूस करता है।

आत्मिक आवश्यकताएं भौतिक आवश्यकताओं से अभिन्नतः जुड़ी हुई हैं। आत्मिक आवश्यकताओं की तुष्टि भौतिक वस्तुओं ( पुस्तकों. पत्र-पत्रिकाओं, कागज़, रंग, आदि ) के बिना नहीं हो सकती और अपनी बारी में ये सब भौतिक आवश्यकताओं का विषय हैं।

इस तरह अपने मूल की दृष्टि से नैसर्गिक की श्रेणी में आनेवाली आवश्यकता विषय की दृष्टि से भौतिक हो सकती है और मूल की दृष्टि से सांस्कृतिक आवश्यकता विषय की दृष्टि से भौतिक या आत्मिक, कोई भी हो सकती है। इस तरह हम देखते हैं कि यह वर्गीकरण अपने दायरे में अति विविध प्रकार की आवश्यकताओं को शामिल कर लेता है तथा एक ओर, मन के विकास के इतिहास के साथ उनके संबंध को, वहीं दूसरी ओर, वे जिस विषय की ओर लक्षित हैं, उसके साथ संबंध को दर्शाता है।

मनुष्य की क्रियाशीलता को जन्म देने और उसकी दिशा का निर्धारण करने वाली आवश्यकताओं की तुष्टि से संबंधित सक्रियता के प्रणोदकों को अभिप्रेरक या अभिप्रेरणा कहा जाता है। आवश्यकताओं में मनुष्य की परिवेशी परिस्थितियों पर निर्भरता अपने को उसके व्यवहार और सक्रियता की अभिप्रेरणा के रूप में प्रकट करती है। यदि आवश्यकताएं सभी प्रकार की मानव सक्रियता का सारतत्व और प्रेरक शक्ति हैं, तो अभिप्रेरक इस सारतत्व की ठोस, विविध अभिव्यक्तियां हैं। मनोविज्ञान में अभिप्रेरक या अभिप्रेरणा को व्यवहार और सक्रियता की दिशा का निर्धारण करनेवाला कारण माना जाता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

क्रियाशीलता के स्रोत के रूप में आवश्यकताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता पर चर्चा की थी, इस बार जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में क्रियाशीलता के स्रोत के रूप में आवश्यकताओं पर एक नज़र ड़ालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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क्रियाशीलता के स्रोत के रूप में आवश्यकताएं


पिछली बार, मानस की परिवेश और अंग संरचना पर निर्भरता पर संक्षिप्त विवेचना में हमने जाना था कि मानस का उदविकास ग्राहियों और संकेतन-सक्रियता के रूपों तथा कार्यों के उत्तरोत्तर जटिलीकरण में प्रकट होता है। इस तरह मानस के उदविकास की प्रक्रिया से गुजरते हुए हम देखते हैं कि सर्वोच्च प्राणियों के मानस और मनुष्य के मानस में बहुत बड़ा अंतर है। मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों पर हम यहां पहले एक बार चर्चा कर चुके हैं। जिज्ञासु व्यक्तियों को मनोविज्ञान के संदर्भ में इस पायदान पर एक बार उस प्रविष्टि ‘मनुष्य और पशुओं के मानस में भेद’ से जरूर गुजर लेना चाहिए।

इसके साथ ही, सामाजिक संबंधों के विकास की पूर्वापेक्षा और परिणाम के रूप में श्रम-सक्रियता को समझने के लिए, उपरोक्त के बाद की प्रविष्टि ‘चेतना के आधार के रूप में श्रम’ से भी इसी पायदान पर गुजरना भी श्रेष्ठ रहेगा। यह दोनों प्रविष्टियां मनोविज्ञान के व्यापक परिप्रेक्ष्य में अभी चल रहे हमारे विषय मन और चेतना की उत्पत्ति तथा उदविकास को समझने में हमारी मदद करेंगी। मन को वस्तुगत रूप से समझ लेना, मानसिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार का काम करेगा।

अब हम आगे बढ़ते हैं और जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की ओर कदम बढ़ाते हैं।

जीवधारियों की एक सार्विक विशेषता उनकी क्रियाशीलता है, जिसके जरिए वे परिवेशी विश्व से अपने जीवनीय संबंध बनाए रखते हैं। क्रियाशीलता जीवधारियों में अंतर्निहित स्वतंत्र प्रतिक्रिया की क्षमता है। क्रियाशीलता का स्रोत जीवधारियों की आवश्यकताएं हैं, जो उसे किसी निश्चित ढ़ंग से कार्य करने को प्रेरित करती हैं। आवश्यकता अवयवी की वह अवस्था है, जो उसकी उसके अस्तित्व की ठोस परिस्थितियों पर निर्भरता को व्यक्त करती है और उसे इन परिस्थितियों के संबंध में क्रियाशील बनाती है।

मनुष्य की क्रियाशीलता अपने को आवश्यकताओं की तुष्टि की प्रक्रिया में प्रकट करती है और यह प्रक्रिया स्पष्टतः दिखाती है कि मनुष्य की क्रियाशीलता तथा पशुओं के व्यवहार में क्या अंतर है। पशु अपने व्यवहार में क्रियाशीलता इसलिए दिखाता है कि उसकी प्राकृतिक संरचना ( शरीर तथा अंगों की रचना तथा सहजवृत्तियां ) जैसे कि पहले ही निर्धारित कर देती हैं कि कौन-कौन सी वस्तुएं उसकी आवश्यकताओं का विषय बन सकती हैं, और इस तरह उसमें उन वस्तुओं को पाने की सक्रिय इच्छा पैदा करती है। जीव-जंतुओं का अपने को परिवेश के अनुकूल बनाना वास्तव में इसपर निर्भर होता है कि वे अपनी आवश्यकताओं को किस हद तक तुष्ट कर सकते हैं। किसी भी पशु की क्रियाशीलता को वह प्राकृतिक वस्तु उत्प्रेरित करती है, जो उसकी आवश्यकताओं का प्रत्यक्ष अंग है।


किंतु मनुष्य की क्रियाशीलता का तथा जो आवश्यकताएं उसका स्रोत हैं, उनका स्वरूप इससे भिन्न है। मनुष्य की आवश्यकताएं उसके पालन की प्रक्रिया में बनती हैं, अर्थात वे उसके द्वारा मानव संस्कृति के आत्मसातीकरण का परिणाम होती हैं। इस तरह प्राकृतिक वस्तु मात्र शिकार, आदि द्वारा हासिल की हुई वस्तु, यानि आहार का जैविक अर्थ रखने वाली वस्तु ही नहीं रह जाती है। श्रम के औजारों के माध्यम से मनुष्य इस वस्तु को बदल और ऐतिहासिक विकास की लंबी प्रक्रिया के फलस्वरूप बनी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढ़ाल सकता है। अतः मनुष्य द्वारा अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि वास्तव में एक सक्रिय सोद्देश्य प्रक्रिया है, जिसके जरिए मनुष्य सामाजिक विकास द्वारा निर्धारित सक्रियता के किसी निश्चित रूप को सीखता है।

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि करने के साथ-साथ उसका विकास और रूपांतरण भी करता है। आज के मनुष्य की आवश्यकताएं उसके पूर्वजों की आवश्यकताओं से भिन्न हैं। इसी तरह उसके वंशजों की आवश्यकताएं भी उसकी आवश्यकताओं से भिन्न होंगी।

जैसा कि कहा जाता है एक आदर्श व्यवस्था वह होगी जहां हर मनुष्य अपनी योग्यतानुसार काम करेगा और अपनी आवश्यकतानुसार प्रतिदान पाएगा, तो क्या इससे हम यह निष्कर्ष निकालें कि जो अपनी सभी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति का अवसर पाता है, वह स्वतः अपने में व्यक्ति के उच्च गुण विकसित कर लेगा और उसकी क्रियाशीलता स्वतः उच्च आदर्शों की ओर लक्षित होगी? ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। आवश्यकताओं की तुष्टि मनुष्य के सर्वतोमुखी विकास की शर्त तो है, पर यही एकमात्र शर्त नहीं है। इसके अलावा व्यक्तित्व-निर्माण की अन्य शर्तों, विशेषतः श्रम, के अभाव में आवश्यकताओं की सहज तुष्टि की संभावना बहुधा व्यक्ति को पतन की ओर ही ले जाती हैं।

पराश्रयी आवश्यकताएं, जिनपर श्रम का अंकुश नहीं होता, समाजविरोधी और आपराधिक व्यवहार का स्रोत बन सकती हैं और बनती भी हैं। अतएव एक बेहतर समाज की पूर्वापेक्षा यह है कि श्रम की आवश्यकता को प्रोत्साहित करना मनुष्य की शिक्षा का अनिवार्य अंग हो।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बीच संप्रेषण और उनकी ‘भाषा’ पर चर्चा की थी, इस बार विकसित होते मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता पर एक नज़र डालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता


        यदि जीवधारियों का वासस्थान सर्वत्र एक ही जैसा होता, तो सारी पृथ्वी पर शायद एक ही जाति के जीव रह रहे होते। किंतु वास्तव में जलवायु और वासीय परिस्थितियों के लिहाज़ से परिवेश बहुत ही विविध है और इसी कारण जीवजातियों में इतनी अधिक विविधता पाई जाती है। पृथ्वी पर १० लाख से अधिक क़िस्मों की जीवजातियां रहती हैं। फिर अपनी सारी विविधताओं की बावज़ूद पर्यावरणीय परिघटनाओं में वार्षिक चक्र, दिन और रात्रि का एकांतरण, तापमान में उतार-चढ़ाव, आदि चक्रीय परिवर्तन आते रहते हैं। सभी जीव अवयवियों को अपने को विद्यमान स्थितियों के अनुरूप ढ़ालना पड़ता है।

        सामान्य उत्तेजनशीलता से आरंभ होनेवाला आत्म-नियमन मनुष्य की सृजनात्मक तर्कबुद्धि में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है।

        परावर्तन की प्रणालियां जितनी ही उन्नत होंगी, जीवजाति परिवेश के प्रत्यक्ष प्रभाव से उतना ही अधिक स्वतंत्र होगी। एककोशीय अवयवी पूरी तरह और प्रत्यक्ष रूप से परिवेशीय परिस्थितियों पर निर्भर होता है। उच्चतर जीवों का व्यवहार निम्नतर जीवों से अत्यधिक भिन्न होता जाता है। बहुत से जीव देशांतरण करते हैं। स्तेपियाई कछुए औए चूहे अपने को ज़मीन में गहरे गाड़ लेते हैं, जहां तापमान उनके अस्तित्व के ज़्यादा अनुकूल होता है। ऐसा वे सहजवृत्तिवश करते हैं। अधिक गर्मी में हाथी अपने पर ठंड़ा पानी डालता है तथा घनी छांह में शरण लेता है। इसी तरह बंदर भी ऐसी जगह चुनता है, जहां गर्मी को ज़्यादा आसानी से झेला जा सकता है। वे सहजवृत्तियों के अलावा, अनुकूलित संबंधों यानि जीवनकाल में संचित अनुभवों से भी निदेशित होते हैं।

        इस तरह जीव-जंतु अपने को परिवेश पर प्रत्यक्ष निर्भरता से शनैः शनैः मुक्त करते जाते हैं। किंतु जीवधारी पर्यावरण से पूर्णतः स्वतंत्र कभी नहीं होंगे, चाहे उनके विकास का स्तर कितना ही ऊंचा ही क्यों न हो। पर्यावरण जीव अवयवियों के लिए अस्तित्व की एक आवश्यक शर्त और जीवन का एक मुख्य निर्धारक कारक है। दूसरे शब्दों में कहें, तो सभी जीवधारियों का अस्तित्व परिवेशी परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है।

        परावर्तन की पर्याप्तता मुख्य रूप से ज्ञानेन्द्रियों और तंत्रिका-तंत्र की संरचना पर निर्भर होती हैं। किसी क्षोभक या उत्तेजक के बारे में ग्राही की प्रतिक्रिया जितनी ही सही होगी, उतनी ही पर्याप्त वह प्रतिक्रिया होगी। कुछ सीमाओं के भीतर इन दोनों के बीच प्रत्यक्ष संबंध है। उदाहरण के लिए, चाक्षुष ग्राही का विकास अवयवी द्वारा अपने को सूर्य के विसरित प्रकाश के परावर्तन के अनुकूल बनाने पर निर्भर था।

        एककोशीय और सरलतम बहुकोशीय सीलेंटरेटा में प्रकाश की केवल सामान्य प्रतिक्रिया, प्रकाशानुवर्तन देखी जा सकती है। केंचुए की बाह्यत्वचा में प्रकाशसंवेदी कोशिकाएं होती हैं, ये कोशिकाएं प्रकाश और अंधकार के बीच भेद कर सकती हैं। चपटे मोलस्क में प्रकाशसंवेदी कोशिकाओं के कई समूह पाये जाते हैं, जो शरीर में धंसी हुई एक छोटी थैली पर बनी होती हैं। दर्शनेंद्रिय की ऐसी रचना की बदौलत मोलस्क प्रकाश की विद्यमानता और अभाव को दर्ज़ कर लेने के साथ-साथ यह भी जान लेता है कि प्रकाश किधर से आ रहा है। कीटों की आंखों की फलकित रचना उन्हें छोटी वस्तुओं की आकृति का पता लगाने में मदद देती है। अधिकांश कशेरुकियों की आंखों में विशेष अपवर्तन लेंस बने होते हैं, जिनकी बदौलत वस्तु की रूपरेखा स्पष्टतः देखी जा सकती है।

        ग्राहियों का विकास कुछ सीमाओं के भीतर तंत्रिका-तंत्र के एक विशेष प्ररूप के विकास से जुड़ा हुआ है। ज्ञानेंद्रियों और तंत्रिका-तंत्र के विकास का स्तर अनिवार्यतः मानसिक परावर्तन के स्तर तथा रूपों का निर्धारण करता है।

        विकास की निम्नतर अवस्था के जालनुमा तंत्रिका-तंत्रवाले जीव उद्दीपनों का उत्तर मुख्यतः अनुवर्तनों से देते हैं। उनके अस्थायी संबंध कठिनता से बनते हैं और जल्दी ही लुप्त हो जाते हैं। गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले अवयवियों के परावर्तन में गुणात्मक परिवर्तन आते हैं। अधिक उन्नत गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र से युक्त जीव जन्मजात और अर्जित, दोनों तरह के प्रतिवर्तों की मदद से बाह्य प्रभावों का परावर्तन करते हैं। किंतु इस चरण में बहुसंख्य आनुवांशिक प्रतिक्रियाएं स्पष्टतः प्रमुख भूमिका अदा करती हैं।

        नलिकादार तंत्रिका-तंत्र इससे उच्चतर क़िस्म का तंत्रिका-तंत्र है। उदविकास के दौरान कशेरुकी मेरु-रज्जु और मस्तिष्क, यानि केंन्द्रीय तंत्रिका-तंत्र का विकास कर लेते हैं। तंत्रिका-तंत्र के विकास के साथ-साथ जीवों की ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति तथा सुधार भी होता रहता है। तंत्रिका-तंत्र और ग्राही जैसे-जैसे परिष्कृत बनते जाते हैं, वैसे-वैसे मानसिक परावर्तन के रूप भी जटिलतर होते जाते हैं। उदविकास नये मानसिक प्रकार्यों को जन्म देता है और जो पहले से विद्यमान थे, उनमें सुधार करता है। ( संवेदन, प्रत्यक्ष, स्मृति और अंततः चिंतन ) तंत्रिका-तंत्र जितना ही जटिल होगा, मानस उतना ही परिष्कृत बनेगा। कशेरुकियों के उदविकास में मस्तिष्क और इसके स्थानीय प्रकार्यात्मक केंद्रों का विभेदन का विशेष महत्व है। जितने उच्च स्तर का प्राणी होगा, ये क्षेत्र उतने ही परिष्कृत होंगे।

        इस प्रकार मानस का उदविकास ग्राहियों और संकेतन-सक्रियता के रूपों तथा कार्यों के उत्तरोत्तर जटिलीकरण में प्रकट होता है।

        प्राणियों के शरीर, तंत्रिका-तंत्र और ज्ञानेंद्रियों के विकास के फलस्वरूप परावर्तन के रूपों में परिमाणात्मक और गुणात्मक परिवर्तन आते हैं और परिवेश के साथ जीवधारियों के उत्तरोत्तर जटिल एवं बहुविध संबंध जन्म लेते हैं। मानसिक क्रियाएं जीव के वासस्थान और जीव की बनावट की विशिष्टताओं के अनुरूप विकास करती हैं। किंतु यह सोचना गलत होगा कि यदि परिस्थितियां एक जैसी हैं, तो सभी जीवों में एक ही जैसे मुख्य ग्राही विकसित होंगे। उनमें संवेदिता का जातिगत विकास मुख्यतः इसपर निर्भर होता है कि किस प्रकार के उत्तेजन जैविक महत्त्व प्राप्त करते हैं। एक ही जैसे परिवेश में मकड़ी कंपन से निदेशित होती है, मेंढ़क मनुष्य के लिए लगभग अश्रव्य सरसराहट से, चमगादड़ पराश्रव्य ध्वनियों से और कुत्ता मुख्यतः गंधों से ( सभी तरह की गंधों से नहीं, अपितु जैव अम्लों की गंधों से, क्योंकि कुत्ते की घ्राणशक्ति फूलों, जड़ी बूटियों, आदि की गंध के मामले में इतनी अधिक तीव्र नहीं होती )।

        मानस का विकास ऋजुरैखिक ढ़ंग से नहीं होता। वह एक साथ बहुत-सी दिशाओं में होता है। एक ही तरह के परिवेश में बहुत ही भिन्न परावर्तन-स्तरोंवाले जीव पाये जाते हैं। यही बात उल्टे क्रम में भी होती ह, यानि बहुत ही भिन्न परिवेशों में एक जैसे परावर्तन-स्तरवाले जीव मिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, सामान्यतः माना जाता है कि इस दृष्टि से डोल्फ़िनों, हाथियों और भालूओं का समान रूप से ऊंचा परावर्तन स्तर है।

        परिवेश अपरिवर्तनशील नहीं है। सब कुछ की भांति परिवेश भी बदलता रहता है और उसमें रहने वाली जीवजातियां अपने को उसके अनुकूल ढ़ालती रहती हैं। मगर हो सकता है कि कुछ जातियों के लिए परिवेश इतना अधिक बदल जाए कि उसका उनकी मानसिक क्रियाओं पर गंभीर प्रभाव पड़े, जबकि अन्य जातियों की मानसिक क्रियाओं का विकास उससे नाममात्र को ही प्रभावित हो। उदाहरणार्थ, वासीय परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन से प्राचीन मानवाभ वानरों के व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आया था और अंततः यह पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति का कारण बना।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 25 सितंबर 2010

संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बौद्धिक व्यवहार पर चर्चा की थी, इस बार पशुओं के बीच संप्रेषण पर कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"


‘सामाजिक’ प्राणियों के परस्पर संबंध कभी-कभी अत्यधिक जटिल होते हैं। गुच्छिकीय तंत्रिकातंत्र वाले जीवों में भी, जो बड़े-बड़े समूह बनाकर रहते हैं, न केवल जटिल सहजवृत्तिमूलक व्यष्टिक व्यवहार मिलता है, बल्कि वे समूह के सदस्यों की "भाषा" ( यहां भाषा से अभिप्राय किसी भी संकेत-तंत्र अथवा सूचना-संप्रेषण के किसी भी माध्यम से है ) के बारे में अत्यंत परिष्कृत सहज प्रतिक्रियाएं भी दिखाते हैं।


उदाहरण के लिए, पाया गया है कि मकरंद लेकर लौटती और एक निश्चित अंदाज़ में हरकतें ( "नृत्य") करती हुई मधुमक्खी इस ढंग से सारे मधुमक्खी समुदाय को ऐसे फूलों के स्थान की सूचना देती हैं, जिनसे मकरंद मिल सकता है। चींटियों की "भाषा" भी बड़ी जटिल है। कुछ निश्चित हरकतें एक निश्चित संकेत का काम करती हैं। प्रेरक अनुक्रियाएं संयुक्त कार्य के आह्वान, भोजन की प्रार्थना, आदि की परिचायक भी हो सकती हैं।

गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र से युक्त जीवों की "भाषा" मुद्राओं, ध्वनि-संकेतों, रासायनिक ( गंध संबंधी ) सूचना और तरह-तरह के स्पर्शमूलक संकेतों से बनी होती है। समुदाय में कीटों का व्यवहार प्रेक्षक को अपनी सामान्य कार्यसाधकता और समन्वय से चकित कर देता है। फिर भी यह समन्वित कार्यसाधकता सूचना पाने वाले जीवों की रूढ़ बनी हुई प्रतिक्रियाओं की उपज है। उनकी प्रतिक्रियाएं सूचना के किसी भी तरह के विश्लेषण या संसाधन से पूर्णतः वंचित होती हैं। उनके द्वारा ग्रहण किये गये संकेत स्वतः अनुक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिसका स्वरूप उदविकास के दौरान निश्चित हुआ था।

उच्चतर जीवों ( पक्षियों, स्तनपायियों ) के समुदायों में भी कुछ निश्चित प्रकार के परस्पर-संबंध मिलते हैं। उनका हर जमघट अनिवार्यतः उसके विभिन्न सदस्यों के बीच सम्पर्क के लिए आवश्यक "भाषा" के जन्म का कारण बन जाता है।


हर समुदाय में जैविकतः स्वाभाविक असमानता पायी जाती है, यानि शक्तिशाली जीव निर्बल जीवों को दबाते हैं। जो शक्तिशाली होते हैं, उन्हें आहार का बेहतर भाग मिलता है। निर्बल जीव अन्य जातियों के जीवों के लिए आहार का काम करते हुए अपनी जाति के सर्वोत्तम जीवों की उत्तरजीविता सुनिश्चित करते हैं। दूसरी ओर, निर्बल जीवों के पास ऐसे साधन भी होते हैं, जो समुदाय के भीतर उन्हें सापेक्ष सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इन साधनों में अधीनता की विशिष्ट मुद्रा भी है, जिसके माध्यम से अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी से लड़ाई में हारा हुआ जीव अपनी पराजय-स्वीकृति की सूचना देता है।

हम अपने आस-पास विभिन्न पक्षियों, मुर्गे-मुर्गियों, कुत्तों आदि की ऐसी कई आक्रामक और अधीनता की मुद्राओं का प्रदर्शन देख सकते हैं। एक ऐसी स्थिति यूं देखी गई, एक युवा भेडि़ये ने, जो अपने में अदम्य शक्ति का उभार महसूस कर रहा था, झुंड़ के सरदार पर हमला कर दिया। मगर बूढ़े तपे हुए लड़ाके ने युवा दावेदार को अपने दांतों की ताकत जल्दी ही महसूस करवा दी। युवा भेड़िए ने तुरंत अधीनता-स्वीकृति की मुद्रा अपना ली, उसने अपने शरीर का सबसे नाज़ुक हिस्सा, यानि अपनी गरदन, जिसे लड़ाई के दौरान जानवर बहुत बचाकर रखता है, सरदार के सामने कर दी। बूढ़े सरदार का सारा गुस्सा तुरंत शांत हो गया, क्योंकि हारे हुए प्रतिद्वंद्वी के संकेत ने उसमें हजारों पीढ़ियों के अनुभव से उत्पन्न सहजवृत्ति को जगा दिया था। अधीनता की मुद्राएं समूहों में रहनेवाले सभी जीवों में मिलती हैं। वानरों में तो वे बड़ी ही अभिव्यक्तिपूर्ण होती हैं।

मुद्राओं और स्पर्शजन्य संपर्कों की "भाषा" के अतिरिक्त एक श्रव्य संकेतों की "भाषा" भी है। अनुसंधानकर्ताओं ने कौओं, डोल्फ़िनों और बंदरों की जटिल संकेत प्रणालियों का वर्णन किया है। जीवों द्वारा पैदा की गई ध्वनियां उनकी संवेगात्मक अवस्था को व्यक्त करती हैं। चिंपाजियों की वाचिक प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण ने दिखाया है कि वानरों के मुंह से निकली हर ध्वनि किसी निश्चित प्रतिवर्ती क्रिया से जुड़ी होती है। कई ध्वनि-समूहों को पहचाना गया है, जैसे खाते समय निकाली गई ध्वनियां, दिशा, प्रतिरक्षा और आक्रमण की सूचक ध्वनियां, काम-व्यापार से जुड़ी हुई ध्वनियां, वगैरह।



सभी जीव अपने समुदाय के अन्य सदस्यों की वाचिक प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देते हैं। ये प्रतिक्रियाएं समुदाय के सदस्यों को उनके जातिबंधुओं की अवस्था के बारे में भी सूचित करती हैं और इस तरह अंतर्सामुदायिक व्यवहार के लिए दिग्दर्शक का काम करती हैं।



उदाहरणार्थ, भूखे जीव भागकर वहां पहुंच सकते हैं, जहां से कोई चीज़ खा रहे दूसरे जीवों की तृप्तिसूचक आवाजें आ रही हैं। स्वस्थ और तृप्त जीव अपने समुदाय के अन्य जीवों की खेलकूद अथवा अभिविन्यास सूचक आवाजों पर ध्यान देते हैं और इस तरह गति अथवा अभिविन्यासात्मक व्यवहार की आवश्यकता की पूर्ति की संभावना पाते हैं। लड़ते हुए वानरों की आक्रामक आवाजें सुनते ही उनका सरदार झुंड़ में व्यवस्था बनाए रखने के लिए झगड़े के स्थल पर पहुंच जाता है। खतरे का संकेत सारे झुंड में भगदड़ मचा देता है।

किंतु पशुओं की भाषा में एक महत्त्वपूर्ण कमी है, मनुष्यों की भाषा की भांति वह अनुभव के संप्रेषण का साधन नहीं बन सकती। इसलिए चाहे हम यह मान भी ले कि किसी जीव ने आहार प्राप्त करने का कोई निराला तरीक़ा निकाला है, वह इस नई जानकारी को चाहने पर भी अपने "भाषायी" साधनों से अन्य जीवों तक नहीं पहुंचा सकता।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 18 सितंबर 2010

पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बौद्धिक व्यवहार पर चर्चा शुरू की थी, इस बार उसे ही थोड़ा और आगे बढाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - २


वानर अपने परिवेश की विभिन्न वस्तुओं के बीच मौजूद संबंधों को समझ सकते और उन्हें प्रभावित कर सकते हैं। उनकी ठीक यही क्षमता कभी-कभी उनके व्यवहार पर उल्टा असर डालती है। "तटस्थ जिज्ञासा" कभी-कभी वानर का ध्यान प्रयोग से इस हद तक हटा देती है कि वह "समस्या पेटी" में रखी लुभाने की चीज़ के बजाए किसी अखाद्य चीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाने लगता है। फिर भी जब वानरों के अनुकूलित प्रतिवर्त बन जाते हैं, तो उनमें भी इन प्रतिवर्तों की अभिव्यक्तियां उतनी ही रूढ़ होती हैं, जितनी कि अन्य उच्चतर प्राणियों में।


रफ़ाएल नामक एक चिंपाज़ी पर कुछ प्रयोग किये गए। उनमें से एक प्रयोग यह था। प्रयोगकर्ता ने एक पेटी में काफ़ी नीचे रखे गये फलों के सामने स्पिरिट का बर्नर जलाया। फलों को पाने की कई असफ़ल कोशिशों के बाद अचानक रफ़ाएल के हाथ से बर्नर के ऊपर रखी गई पानी की टंकी की टोंटी खुल गई। पानी गिरने लगा और बर्नर बुझ गया। कई बार दोहराए जाने पर यह क्रिया आदत बन गयी। अब पानी की टंकी को बर्नर से कुछ दूर रखा गया। कुछेक कोशिशों के बाद रफ़ाएल ने इस बार भी अपना लक्ष्य पा लिया, उसने पानी मुंह में भरा और जाकर बर्नर पर छिड़क दिया। अगले प्रयोग में फल को एक तख़्ते पर तालाब के बीच रखा गया। पानी की टंकी दूसरे तख़्ते पर थी। इस बार रफ़ाएल आग बुझाने के लिए एक डगमगाती पुलिया पर चलकर टंकी वाले तख़्ते के पास पहुंचा।

इस तरह हम देखते हैं कि चिंपाज़ी ने पुराने ( सीखे हुए ) व्यवहार-संरूप ( आदत ) को नयी स्थिति में अंतरित किया। बेशक यह क्रिया अनावश्यक थी, क्योंकि तख़्ते के इर्द-गिर्द तालाब में पानी पहले से ही मौजूद था, मगर जैव दृष्टि से वह सर्वथा नियमसंगत थी। डगमगाती पुलिया पर दौड़ना चिंपाज़ी के लिए शारीरिकतः कठिन नहीं था, इसलिए प्रयोग में उसके सामने रखा गया लक्ष्य उसके लिए ऐसी समस्यात्मक स्थिति नहीं बना कि जिसमें किसी बौद्धिक प्रयास की आवश्यकता होती।

प्रतिक्रिया के अधिक रूढ़ तरीक़े के नाते सहजवृत्तियां और आदतें प्राणियों को अपने दिमाग़ पर ज़्यादा जोर डालने से बचाती हैं। कई बार असफ़ल रहने पर ही प्राणी चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी उच्चतर शक्तियों - बौद्धिक योग्यताओं - से काम लेता है। किंतु सामान्य स्थितियां उनके लिए समस्याएं विरले ही पैदा करती हैं और इसलिए वे अधिक ऊंचे, बौद्धिक स्तर पर प्रतिक्रिया दिखाए जाने का तकाज़ा नहीं करती। जीव-जंतुओं के लिए बौद्धिक व्यवहार अधिकांशतः एक प्रच्छन्न संभावना बना रहता है।



एक और वैज्ञानिक ने परीस नाम के एक चिंपाज़ी पर कुछ प्रयोग किये थे। परीस को जब अंदर कोई खाने की चीज़ रखी हुई नली दी जाती थी, तो वह नली के भीतर से उस चीज़ को बाहर निकालने के लिए कोई उपयुक्त औजार चुन लेता था। वह वस्तुओं में आकृति, लंबाई, घनत्व,  और मोटाई की अनुसार भेद करना जानता था। यदि कोई उपयुक्त वस्तु नहीं मिलती थी, तो वह पास पड़ी टहनी से डंड़ी तोड़कर, या किसी चौड़ी तख़्ती से छिल्ली निकालकर या मुड़े हुए तार को सीध करके उससे काम चला लेता था। दूसरे शब्दों में, वह "औजार" बनाता था।



किंतु उच्चतर वानरों की "औजार-निर्माण" सक्रियता का महत्त्व बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंका जाना चाहिए। अनेक प्रयोगों के दौरान चिंपाज़ी अपना लक्ष्य पाने के लिए दो डंडियों को आपस में जोड़ने में असमर्थ पाये गये हैं। ऐसा स्वाभाविक भी है, क्योंकि दांतों से छिल्लियां निकालना या ड़ंडियों को तोड़ना प्राकृतिक परिस्थितियों में एक सर्वथा सामान्य बात है। जबकि ड़ंडियों को जोड़ना एक ऐसा काम है, जिसमें कई प्रयत्नों और पूर्वाधारों की जरूरत होती है। कभी-कभार वानर दो छोटी ड़ंडियों को जोड़कर एक बड़ी डंडी, यानि "औजार" बनाने में समर्थ सिद्ध हुए हैं, मगर वे न तो इन निर्मित औजारों को सुरक्षित रखते हैं और न उन्हें पहले से बनाते हैं। "औजार" वानर के प्रत्यक्ष कार्य के दौरान प्रकट होता है और फिर तुरंत विलुप्त हो जाता है। अतः मनुष्य की श्रम-सक्रियता और वानरों के संबंधित क्रिया-कलाप के बीच समानता की बात केवल आलंकारिक अर्थ में ही की जा सकती है।

इस संबंध में खाने की चीज़वाली पेटी की साथ किये गये हुए प्रयोग दिलचस्प हैं। वानर पेटी पर बने तिकोने छेद से उस चीज़ को देख सकता था। एक तिकोनी अनुप्रस्थ काटवाली डंडी इस छेद में डाल कर और अंदर बने लीवर को दबाकर पेटी को खोला जा सकता था। प्रयोगकर्ता ने बंदर को यह कार्य कई बार करके दिखाया। वानर के सामने गोल, चौकोर, तिकोनी, आदि कई तरह की डंडियां पड़ी थीं। उसने पहले जो भी डंडी हाथ में आई, उसे छेद में डालने का प्रयत्न किया। फिर उसने दूसरी डंडियों को हाथ से टटोला, सूंघा, जांचा और एक-एक करके छेद में डाला। आख़िरकार उपयुक्त डंडी मिल ही गई।



इस तरह हम देखते हैं कि अभिविन्यासात्मक हस्तक्रिया के दौरान वानरों के बौद्धिक कार्य ठोस व्यवहारिक चिंतन का रूप धारण कर लेते हैं। उच्चतर वानरों के व्यवहार की एक चारित्रिक विशेषता अनुकरण है।


उदाहरण के लिए, वानर झाड़ू लगा सकता है, कपड़ा गीला कर सकता, निचोड़ सकता और पोंछा लगा सकता है। ऐसे अनुकरणात्मक कार्य बड़े आदिम ढंग के होते हैं। वानर सामान्यतः क्रिया की नक़ल करते हैं, न कि उसके परिणाम की। इसलिए जब वह फ़र्श "बुहारता" है, तो वह आम तौर पर फ़र्श को साफ़ किये बिना धूल को मात्र एक जगह से दूसरी जगह फैंकता है ( वैसे विशेष प्रशिक्षण के बाद फ़र्श साफ़ करने का लक्ष्य भी पाया जा सकता है )। वानरों में बौद्धिक अनुकरण की क्षमता के कोई अकाट्य प्रमाण नहीं पाये गये हैं।

इस तरह परावर्तन के रूपों ( अनुवर्तन, सहजवृत्तियां, आदतें और बौद्धिक क्रियाएं ) के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं है। पशुजगत में विकास की एक अटूट, अविच्छिन्न रेखा है, उदाहरणार्थ, सहजवृत्तियां बदलकर आदतें बन जाती हैं और आदतें सहजवृत्तियों में परिणत हो जाती हैं।

फिर भी हम पाते हैं कि अपनी ठोस अभिव्यक्तियों में विकास की प्रक्रिया का स्वरूप छलांगनुमा है और नैरंतर्य में भी विराम है। कतिपय जीवजातियों में सहजवृत्तियों का प्राधान्य मिलता है और कतिपय जीवजातियों में उनके अपने अनुभव के आधार पर बने साहचर्यों का बोलबाला पाया जाता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 4 सितंबर 2010

पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां जीवों द्वारा उपार्जित व्यवहार पर चर्चा की थी इस बार पशुओं के बौद्धिक व्यवहार के कुछ रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - १

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, सहजवृत्ति पर आधारित व्यवहार-संरूपों के साथ-साथ उच्चतर जीव अन्य प्रकार के व्यवहार भी दिखाते हैं, जो अलग-अलग जीवों में अलग-अलग होते हैं। ये व्यवहार-संरूप हैं आदतें और बौद्धिक क्रियाएं। यहां हम पशुओं के बौद्धिक व्यवहार संरूपों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे, क्योंकि यह एक सामान्य दिलचस्पी का विषय है और अपने दैनंदिनी जीवन में हम कई भ्रामक मान्यताओं के साथ होते हैं।

बौद्धिक व्यवहार अलग-अलग वस्तुओं के बीच मौजूद जटिल संबंधों के परावर्तन पर आधारित होता हैं। इसे निम्न प्रयोग से देखा जा सकता है।

दो खोखली नलियोंवाला एक उपकरण लिया गया। फिर एक कौए के सामने उनमें से एक नली में डोरी से बंधा हुआ गोश्त का टुकड़ा डाला गया। कौए ने टुकड़े को ऊपरी नली में घुसते, नलियों के बीच की ख़ाली जगह से गुजरते और फिर निचली नली में ग़ायब होते देखा। वह तुरंत उड़कर निचली नली के दूसरे किनारे पर चला गया और वहां गोश्त के टुकड़े के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा ( दूसरे हिंस्र पक्षियों, कुत्तों और बिल्लियों ने भी ऐसा ही किया )।

यह मिसाल दिखाती है कि उच्चतर जीव वस्तुओं के बीच संबंध को पहचानने और दत्त स्थिति के परिणाम का पूर्वानुमान करने, यानि इसका पता लगाने में समर्थ हैं कि कोई चलती हुई वस्तु कहां प्रकट हो्गी। यह बौद्धिक व्यवहार का ही एक रूप है।

उच्चतर पशुओं में प्राइमेट ( मानवाभ वानर ) विशेष स्थान रखते हैं। अधिकांश स्तनपायियों के विपरीत वे न केवल आहारयोग्य वस्तुओं में, अपितु स्पष्टतः निरर्थक वस्तुओं में भी दिलचस्पी दिखाते हैं। मनोविज्ञान में "सतत ( अथवा तटस्थ ) जिज्ञासा" और "अन्वेषणात्मक आवेग" के नाम से ज्ञात यह रूचि वानरों की लाक्षणिक तीव्र दृष्टि के साथ मिलकर उनकी प्रत्यक्षण की क्षमता तथा जानकारी-संचय की योग्यता को बहुत बढ़ा देती है और आदतों तथा व्यवहार के परिष्कृत रूपों के विकास की संभावनाओं के मामले में उन्हें अन्य प्राणियों से बहुत अधिक उन्नत बना देती है।

वानरों की बुद्धि की विशेषता उनके द्वारा हल की जानेवाली समस्याओं की जटिलता ही नहीं, अपितु उनकी सक्रियता की लक्ष्योन्मुखी होना भी है। वानर किसी वस्तु को तोड़ने के लिए घंटों प्रयत्न करते रह सकते हैं, दर्शक का ध्यान आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की चालें चल सकते हैं और रेंगते हुए कीड़े को देखते रह सकते हैं। उनके व्यवहार की इन विशिष्टताओं का कारण उनके अस्तित्व का रूप है। प्राकृतिक परिस्थितियों में वानर को आहार की खोज में अपने परिवेश की लगातार "छानबीन" करनी पड़ती है। जंगली चिंपांज़ी के भोजन में कोई इक्यासी "व्यंजन" होते हैं। उनमें से आधे फल, एक चौथाई पत्ते और शेष बीज, फूल, डंडियां और छाल होते हैं। अपने आहार में वे कीड़ों, छिपकलियों, छोटे चूहों और कभी-कभी अधिक बड़े जंतुओं को भी शामिल कर लेते हैं। यह दिखाता है कि उनके अन्वेषणमूलक व्यवहार और वस्तुओं के प्रति जिज्ञासा की गहरी जैविक जड़े हैं। वानर जो फल खाते हैं, उनके न केवल आकार और रंगों को वे पहचान जाते हैं, बल्कि स्वाद के मामले में भी उनके अनुकूलित प्रतिवर्त काफ़ी विकसित हैं। आहार की खोज करते हुए वानर से खाद्य के योग्य और अयोग्य, यानि विषैली वस्तुओं में अंतर करने में कोई ग़लती नहीं होती।


आहार की क़िस्मों अथवा परिस्थितियों के संबंध में वानर की प्रतिक्रियाएं सहजवृत्ति पर आधारित नहीं होती। वानरों के परिष्कृत व्यवहार का, जो अन्य जीवों के व्यवहार से कहीं ज़्यादा जटिल है, कारण उनके अग्रांगों की मनुष्य के हाथों से समानता भी है। हाथ की बदौलत वानर, अपनी परिवेशी वस्तुओं से बहुर सारे अस्थायी पेचीदे संबंध ( साहचर्य ) विकसित करता है, जो अन्य प्राणियों के लिए अज्ञात हैं। कुछ परिस्थितियों में उसका व्यवहार स्पष्टतः सहजवृत्तिमूलक होता है। अन्य कशेरुकियों की भांति वानरों में भी सहज प्रतिक्रियाएं किसी सामान्य उद्दीपन द्वारा पैदा की जा सकती हैं। शोधों ने यह दिखाया है कि नवजात वानर, कृत्रिम माताओं से वास्तविक लगाव तभी दिखाते हैं, जब कुछ निश्चित क्षोभक मौजूद हों।

प्रयोग यूं किया गया। दो नवजात मकाक वानरों को लगभग वास्तविक माता के ही आकार की कृत्रिम माताओं के साथ एक पिंजड़े में रखा गया। एक माता धातु के ढ़ाचे की थी और दूसरी माता लकड़ी के कुंदे की, जिस पर ऊपर से बाल चिपकाये हुए थे। जिस बच्चे को बालोंवाली माता मिली, वह ज़्यादातर समय उससे चिपका या उसपर चढ़ता रहता था। ज्यों ही कोई ख़तरा पैदा होता, बच्चा तुरंत उससे जा चिपकता। जिस बच्चे को धातु के ढ़ांचेवाली मां मिली थी, वह बड़ा दुखी था। अध्ययनों ने दिखाया है कि वानर-शिशु दूध पिलानेवाली लोहें के तारों से बनी मां की बजाए, दूध न पिलानेवाली चीथड़ों की बनी माता को ज़्यादा पसंद करते थे। चीथड़ों की बनी माता बच्चों को एक तरह का सुक़ून और विश्वास व सुरक्षा की भावना देती थी।

किंतु व्यस्क उच्चतर वानरों का सहज व्यवहार निम्नतर प्राणियों के सहज व्यवहार से बहुत भिन्न होता है। उच्चतर वानरों, उदाहरणार्थ, चिंपाज़ियों में व्यवहार का आनुवंशिक रूप पाया जाता है, जैसे बसेरा बनाना। प्राकृतिक परिस्थितियों में वे रोज़ाना पेड़ो की टहनियों से बसेरा बनाते हैं। प्रेक्षणों ने दिखाया है कि बसेरा बनाने से पहले वनर निर्माण सामग्री की व्यवहारिक जांच कर लेते हैं।

अनुसंधानों के दौरान वानरों की निर्माण-सक्रियता की चूहों की घर बनाने की आदतों से तुलना की गई। यदि उन्हें उपलब्ध सामग्री कठोरता के मामले अलग-अलग तरह की होती थी, यानि उन्हें, उदाहरण के लिए, टहनियों और कागज़ से घर बनाना होता था, तो चिंपाज़ी भी और चूहे भी लगभग एक ही ढंग से घर बनाते थे। ज़्यादा कड़ी सामग्री से ढ़ांचा और ज़्यादा मुलायम सामग्री से दीवारें तथा फ़र्श। यदि चिंपाज़ी को भी और चूहे को भी केवल मुलायम सामग्री दी जाती थी, तो दोनों उससे घर बनाना शुरू कर देते थे। किंतु यदि उन्हें घर बना लेने के बाद कड़ी सामग्री और दी जाती थी, तो उनकी प्रतिक्रियाओं में गुणात्मक अंतर तुरंत प्रकट हो जाता था। कड़ी सामग्री पाने पर चिंपाज़ी तुरंत घ्र को फिर से बनाने लग जाता था। हाथ की एक ही हरक़त से वह मुलायम सामग्री के ढ़ांचे को हटा देता था और पहले कड़ी सामग्री से ढ़ांचा बनाता था और फिर मुलायम सामग्री को दीवारें तथा फ़र्श बनाने के लिए इस्तेमाल करता था। किंतु ऐसी ही स्थिति में चूहे की प्रतिक्रिया यह होती थी कि वह कड़ी सामग्री को मुलायम सामग्री के ऊपर रख भर देता था।

इस तरह वानरों की बसेरा बनाने की सक्रियता बुनियादी तौर पर सहजवृत्ति पर आधारित है, किंतु उसमें बाह्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम पशुओं में बौद्धिक व्यवहार पर ही अपनी चर्चा आगे बढ़ाएंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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