शनिवार, 25 सितंबर 2010

संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बौद्धिक व्यवहार पर चर्चा की थी, इस बार पशुओं के बीच संप्रेषण पर कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"


‘सामाजिक’ प्राणियों के परस्पर संबंध कभी-कभी अत्यधिक जटिल होते हैं। गुच्छिकीय तंत्रिकातंत्र वाले जीवों में भी, जो बड़े-बड़े समूह बनाकर रहते हैं, न केवल जटिल सहजवृत्तिमूलक व्यष्टिक व्यवहार मिलता है, बल्कि वे समूह के सदस्यों की "भाषा" ( यहां भाषा से अभिप्राय किसी भी संकेत-तंत्र अथवा सूचना-संप्रेषण के किसी भी माध्यम से है ) के बारे में अत्यंत परिष्कृत सहज प्रतिक्रियाएं भी दिखाते हैं।


उदाहरण के लिए, पाया गया है कि मकरंद लेकर लौटती और एक निश्चित अंदाज़ में हरकतें ( "नृत्य") करती हुई मधुमक्खी इस ढंग से सारे मधुमक्खी समुदाय को ऐसे फूलों के स्थान की सूचना देती हैं, जिनसे मकरंद मिल सकता है। चींटियों की "भाषा" भी बड़ी जटिल है। कुछ निश्चित हरकतें एक निश्चित संकेत का काम करती हैं। प्रेरक अनुक्रियाएं संयुक्त कार्य के आह्वान, भोजन की प्रार्थना, आदि की परिचायक भी हो सकती हैं।

गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र से युक्त जीवों की "भाषा" मुद्राओं, ध्वनि-संकेतों, रासायनिक ( गंध संबंधी ) सूचना और तरह-तरह के स्पर्शमूलक संकेतों से बनी होती है। समुदाय में कीटों का व्यवहार प्रेक्षक को अपनी सामान्य कार्यसाधकता और समन्वय से चकित कर देता है। फिर भी यह समन्वित कार्यसाधकता सूचना पाने वाले जीवों की रूढ़ बनी हुई प्रतिक्रियाओं की उपज है। उनकी प्रतिक्रियाएं सूचना के किसी भी तरह के विश्लेषण या संसाधन से पूर्णतः वंचित होती हैं। उनके द्वारा ग्रहण किये गये संकेत स्वतः अनुक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिसका स्वरूप उदविकास के दौरान निश्चित हुआ था।

उच्चतर जीवों ( पक्षियों, स्तनपायियों ) के समुदायों में भी कुछ निश्चित प्रकार के परस्पर-संबंध मिलते हैं। उनका हर जमघट अनिवार्यतः उसके विभिन्न सदस्यों के बीच सम्पर्क के लिए आवश्यक "भाषा" के जन्म का कारण बन जाता है


हर समुदाय में जैविकतः स्वाभाविक असमानता पायी जाती है, यानि शक्तिशाली जीव निर्बल जीवों को दबाते हैं। जो शक्तिशाली होते हैं, उन्हें आहार का बेहतर भाग मिलता है। निर्बल जीव अन्य जातियों के जीवों के लिए आहार का काम करते हुए अपनी जाति के सर्वोत्तम जीवों की उत्तरजीविता सुनिश्चित करते हैं। दूसरी ओर, निर्बल जीवों के पास ऐसे साधन भी होते हैं, जो समुदाय के भीतर उन्हें सापेक्ष सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इन साधनों में अधीनता की विशिष्ट मुद्रा भी है, जिसके माध्यम से अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी से लड़ाई में हारा हुआ जीव अपनी पराजय-स्वीकृति की सूचना देता है।

हम अपने आस-पास विभिन्न पक्षियों, मुर्गे-मुर्गियों, कुत्तों आदि की ऐसी कई आक्रामक और अधीनता की मुद्राओं का प्रदर्शन देख सकते हैं। एक ऐसी स्थिति यूं देखी गई, एक युवा भेडि़ये ने, जो अपने में अदम्य शक्ति का उभार महसूस कर रहा था, झुंड़ के सरदार पर हमला कर दिया। मगर बूढ़े तपे हुए लड़ाके ने युवा दावेदार को अपने दांतों की ताकत जल्दी ही महसूस करवा दी। युवा भेड़िए ने तुरंत अधीनता-स्वीकृति की मुद्रा अपना ली, उसने अपने शरीर का सबसे नाज़ुक हिस्सा, यानि अपनी गरदन, जिसे लड़ाई के दौरान जानवर बहुत बचाकर रखता है, सरदार के सामने कर दी। बूढ़े सरदार का सारा गुस्सा तुरंत शांत हो गया, क्योंकि हारे हुए प्रतिद्वंद्वी के संकेत ने उसमें हजारों पीढ़ियों के अनुभव से उत्पन्न सहजवृत्ति को जगा दिया था। अधीनता की मुद्राएं समूहों में रहनेवाले सभी जीवों में मिलती हैं। वानरों में तो वे बड़ी ही अभिव्यक्तिपूर्ण होती हैं।

मुद्राओं और स्पर्शजन्य संपर्कों की "भाषा" के अतिरिक्त एक श्रव्य संकेतों की "भाषा" भी है। अनुसंधानकर्ताओं ने कौओं, डोल्फ़िनों और बंदरों की जटिल संकेत प्रणालियों का वर्णन किया है। जीवों द्वारा पैदा की गई ध्वनियां उनकी संवेगात्मक अवस्था को व्यक्त करती हैं। चिंपाजियों की वाचिक प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण ने दिखाया है कि वानरों के मुंह से निकली हर ध्वनि किसी निश्चित प्रतिवर्ती क्रिया से जुड़ी होती है। कई ध्वनि-समूहों को पहचाना गया है, जैसे खाते समय निकाली गई ध्वनियां, दिशा, प्रतिरक्षा और आक्रमण की सूचक ध्वनियां, काम-व्यापार से जुड़ी हुई ध्वनियां, वगैरह।



सभी जीव अपने समुदाय के अन्य सदस्यों की वाचिक प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देते हैं। ये प्रतिक्रियाएं समुदाय के सदस्यों को उनके जातिबंधुओं की अवस्था के बारे में भी सूचित करती हैं और इस तरह अंतर्सामुदायिक व्यवहार के लिए दिग्दर्शक का काम करती हैं।



उदाहरणार्थ, भूखे जीव भागकर वहां पहुंच सकते हैं, जहां से कोई चीज़ खा रहे दूसरे जीवों की तृप्तिसूचक आवाजें आ रही हैं। स्वस्थ और तृप्त जीव अपने समुदाय के अन्य जीवों की खेलकूद अथवा अभिविन्यास सूचक आवाजों पर ध्यान देते हैं और इस तरह गति अथवा अभिविन्यासात्मक व्यवहार की आवश्यकता की पूर्ति की संभावना पाते हैं। लड़ते हुए वानरों की आक्रामक आवाजें सुनते ही उनका सरदार झुंड़ में व्यवस्था बनाए रखने के लिए झगड़े के स्थल पर पहुंच जाता है। खतरे का संकेत सारे झुंड में भगदड़ मचा देता है।

किंतु पशुओं की भाषा में एक महत्त्वपूर्ण कमी है, मनुष्यों की भाषा की भांति वह अनुभव के संप्रेषण का साधन नहीं बन सकती। इसलिए चाहे हम यह मान भी ले कि किसी जीव ने आहार प्राप्त करने का कोई निराला तरीक़ा निकाला है, वह इस नई जानकारी को चाहने पर भी अपने "भाषायी" साधनों से अन्य जीवों तक नहीं पहुंचा सकता।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

9 टिप्पणियां:

vinay ने कहा…

बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक लेख ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर पोस्ट है!

Girijesh Rao ने कहा…

उपस्थित सर!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

हम भी हाजिर हुए।

shyam1950 ने कहा…

"वह इस नई जानकारी को चाहने पर भी अपने "भाषायी" साधनों से अन्य जीवों तक नहीं पहुंचा सकता।" आदमी ही कहाँ अन्य जीवों तक अपनी बात पहुंचा सकता है ?
बाकि आपका यह लेख सच में हिंदी ब्लोगिंग में जिम्मेदार लोगों की उपस्थिति का एहसास करा रहा है

MANOJ KUMAR ने कहा…

धन्यवाद्

निर्झर'नीर ने कहा…

humne bhi sari post padhi hai ,
shukria

Rahul Tripathi ने कहा…

behad gambheer, atee gyanvardhak. bahut achhe. badhai

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

आदरणीय समय जी,
अजीब हाल है! मुझे तो फिर से शुरू करना होगा। क्योंकि ये कोई कहानी या उपन्यास तो है नहीं कि एक बार में पढ़-समझ लिया जाय। इसलिए अब आत्मसात करते हुए ही आगे बढ़ेंगे। जब तक पिछला पाठ न आ जाय, आगे नहीं बढ़ेंगे। …

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