शनिवार, 19 दिसंबर 2009

सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने जीवन के क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणाओं पर नज़र ड़ाली थी। इस बार हम यथार्थता के सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन में अंतर को समझने की कोशिश करेंगे। चेतना की उत्पत्ति के मद्देनज़र इनसे गुजरना एक पूर्वाधार का काम करेगा।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन

क्या तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क की उत्पत्ति का यह मतलब है कि उच्चतर जानवरों में चिंतन क्षमता तथा तर्कबुद्धि होती है और वे सचेत व्यवहार कर सकते हैं?

सरलतम एककोशिकीय अंगियों में यथार्थता ( reality ) का परावर्तन (Reflection, a reflex action, an action in return) अत्यंत आदिम रूप में होता है। यदि एक एककोशिकीय अंगी, अमीबा युक्त एक पात्र में अम्ल के सांद्रण ( concentration ) को बढ़ा दिया जाए, तो अमीबा उस तरफ़ को चला जाएगा, जहां अम्ल का सांद्रण कम है। यदि वह संयोगवश भोजन से टकरा जाता है, तो उसे अपने शरीर के किसी भी भाग से गड़प जाता है। इस तरह अमीबा अपने व्यवहार और गति के लिए कोई निश्चित दिशा और लक्ष्य तय नहीं करता।

उत्तेजनशीलता ( Excitability ) के आधार पर यथार्थता के प्रति मात्र निष्क्रिय अनुकूलन ही संभव हो सकता है। निष्क्रिय अनुकूलन का अर्थ है कि एक जीवित अंगी अपने अस्तित्व के लिए केवल पर्यावरण मे उपलब्ध अनुकूल दशाओं को ही चुनता है, किंतु उनकी रचना करना तो दूर, उन्हें खोजता तक नहीं है। पौधों सहित सभी बहुकोशिकीय अंगियों में भी उत्तेजनशीलता होती है। खिड़की पर रखा जिरेनियम का पौधा प्रकाशित पक्ष से अप्रकाशित पक्ष को हार्मोनों की गति के जरिए अपनी पत्तियों को उस दिशा की ओर मोड़ लेता है, जहां से उसकी जीवन क्रिया के लिए आवश्यक अधिक सौर प्रकाश उस पर पड़ता है। यह भी एक तरह का चयनात्मक ( Selective ), फिर भी निष्क्रिय अनुकूलन है, क्योंकि जिरेनियम न तो प्रकाश की खोज में जाता है और न ही प्रकाश की कमी होने पर उसकी रचना करता है।

जब तंत्रिकातंत्र अधिक जटिल हो गया और मस्तिष्क की उत्पत्ति हो गई, तो धीरे-धीरे निष्क्रिय से सक्रिय अनुकूलन में संक्रमण होने लगा। उच्चतर जानवरों में ( पक्षियों और ख़ास तौर से स्तनपायियों में ) सक्रिय अनुकूलन अपने निवास के लिए अनुकूल दशाओं की खोज से संबंधित होता है और व्यवहार के जटिल रूपों के विकास की ओर ले जाता है।

उच्चतम स्तनपायियों में व्यवहार के और भी अधिक जटिल रूप पाये जाते हैं। मसलन, कई शिकारी जानवर अपने क्षेत्र की हदबंदी कर देते हैं और दूसरों को उसके अंदर शिकार नहीं करने देते। एक अनुसंधानकर्ता ने अपने प्रेक्षण के दौरान देखा कि एक भूखी मादा भेडिया एक जंगली हंस का ध्यान आकृष्ट करने तथा झील के तट पर पानी से कुछ दूर उसे अपनी तरफ़ खींचने के लिए घास में उलट-पलट कर, तथा अगल-बगल करवटें लेकर नाचते हुए एक ‘शौकिया नृत्य प्रदर्शन’ कर रही है, उसने हंस को पानी से बाहर काफ़ी दूर तक अपनी ओर आकृष्ट किया और जब उनके बीच की दूरी काफ़ी कम हो गयी, तो अपने शिकार पर झपट्टा मार दिया।

हम जानते हैं कि चींटियां और मधुमक्खियां अत्यंत जटिल संरचनाएं बनाती है, बीवर नामक जीव छतदार बिल और बिल तक जाने के लिए पानी के नीचे से रास्ता ही नहीं बनाते, बल्कि असली बांध भी बनाते हैं, इससे भी बड़ी बात यह है कि वे पानी के बाह्य प्रवाह के लिए तथा तलैया में स्तर के अनुसार नियंत्रण रखने के लिए एक निकास द्वार भी छोड़ देते हैं। इन सब बातों से जानवरों के कथित तर्कबुद्धिपूर्ण, सचेत व्यवहारक की बात कहने का आधार मिलता है, पर वास्तव में यह परावर्तन के अत्यंत विकसित रूपों के आधार पर, पर्यावरण के प्रति उच्चतर जानवरों के सक्रिय अनुकूलन मात्र का मामला हो सकता है।

उच्चतर जानवरों में सक्रिय अनुकूलन, अपने निवास के लिए अपने परिवेशी पर्यावरण का सक्रिय उपयोग, अधिक अनुकूल दशाओं की खोज तथा अपनी जीवन क्रिया के लिए, चाहे सीमित पैमाने पर ही क्यों ना हो, पर्यावरण को अपने अनुसार अनुकूलित करने में निहित होता है। किंतु उनके क्रियाकलापों में कोई योजना नहीं होती और वे बाह्य वास्तविकता को आमूलतः रूपांतरित नहीं करते।

जानवरों के व्यवहार के अनेक रूप, क्रमविकास के लाखों वर्षों के दौरान विकसित होते हैं और आनुवंशिकता द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होते हैं। व्यवहार के इन अंतर्जात ( inborn, inbred ) रूपों को सहजवृत्ति कहते हैं और वे अत्यंत जटिल हो सकती हैं। किंतु जीवन की दशाओं में तीव्र परिवर्तन होने पर ये जानवर, अपनी ही सहजवृत्तियों के ‘बंदी’ हो जाते हैं और अपने को नयी स्थितियों के अनुकूल बनाकर उन्हें बदलने में अक्षम होते हैं। इसके अलावा वे उन दशाओं को निर्णायक ढ़ंग से बदलने तथा उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित करने की स्थिति में नहीं होते।

इस बात को स्पष्ट करने के लिए हम अत्यंत संगठित कीटों के जीवन से एक उदाहरण लेते हैं। चीड़ के पेड़ों पर रहने तथा जुलूस की शक्ल में चलनेवाले पतंगों की शुंडियां भोजन की तलाश में एक सघन कालम बनाकर आगे बढ़ती हैं। प्रत्येक शुंडी अपने आगेवाले को अपने रोयों से छूते हुए उसके पीछे-पीछे चलती है। शुंडियां महीन जालों का स्रावण करती हैं, जो पीछे से आनेवाली शुंडियों के लिए मार्गदर्शक तागे का काम देता है। सबसे आगेवाली शुंडी सारी भूखी सेना को चीड़ के शीर्षों की तरफ़, नये ‘चरागाहों’ की तरफ़, ले जाती है।

प्रसिद्ध फ़्रांसीसी प्रकृतिविद जान फ़ाब्रे ने अगुआई करने वाली शुंडी के सिर को कालम के अंत की शुंडी की ‘पूंछ’ की तरफ़ लगा दिया। वह फ़ौरन मार्गदर्शक तागे से चिपक गई और, इस तरह, ‘सेनापति’ शुंडी मामूली ‘सिपाही’ में तब्दील हो गई, तथा उस सबसे पीछे वाली शुंडी के पीछे-पीछे चलने लगी, जिससे वह जुडी हुई थी। इस तरह कालम का सिरा और दुम परस्पर जुड गये और शुंडियों ने एक ही स्थान पर एक मर्तबान के गिर्द अंतहीन चक्कर काटने शुरू कर दिये। सहजवृत्ति उन्हें इस मूर्खतापूर्ण स्थिति से छुटकारा दिलाने में असमर्थ सिद्ध हुई। भोजन पास ही रख दिया गया लेकिन किसी भी शुंडी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। एक घंटा बीता, दूसरा बीता, दिन गुजर गये और शुंडियां, मंत्रमुग्ध जैसी चक्कर पर चक्कर लगाती रहीं। वे पूरे एक सप्ताह तक चक्कर लगाती रहीं, इसके बाद कालम टूट गया, शुंडियां इतनी कमजोर हो गयीं कि अब वे जरा भी आगे नहीं बढ सकीं।

स्पष्ट है कि शुरूआत में जो सवाल पेश किया गया था, उसका सिर्फ़ नकारात्मक उत्तर ही दिया जा सकता है। अर्थात तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क की उपस्थिति मात्र से ही, चिंतन क्षमता और तर्कबुद्धियुक्त सचेत व्यवहार पैदा हो पाना संभव नहीं हो जाता।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण की सैद्धांतिक अवधारणाओं के सार-संक्षेप पर एक नज़र ड़ाली थी। आज हम यहां जीवन के क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणाओं से गुजरेंगे।

यहां एक बात कहने की जरूरत महसूस हो रही है।

सैद्धांतिक अवधारणाएं, इनसे अब तक अपरिचित मानवश्रेष्ठों के लिए थोड़ा दुरूह होती हैं, पर यही दुरूहता गंभीर दिलचस्पी रखने वाले मानवश्रेष्ठों के लिए इन्हें समझे जाने की जरूरत और इस हेतु सक्रिय प्रयासों का रास्ता भी प्रशस्त करती है। दुरूहताओं से सप्रयास जूझना, इनके संबंध में मानवश्रेष्ठों की समझ को अंदर से मथता है और प्राप्त संगतियां और निष्कर्ष उसकी समझ का हिस्सा बनते हैं, जिससे कि अंततः उसका व्यवहार निर्देशित होता है।

बिना इस प्रक्रिया के प्राप्त ज्ञान, - जो पहले से प्राप्त अनुकूलित प्रबोधन के साथ अंतर्क्रियाएं तथा अंतर्संबध नहीं पैदा कर पाता, इसका स्वाभाविक विकास नहीं कर पाता - आंतरिक मानसिक जगत के लिए सिर्फ़ सूचनाओं का जंजाल बनता है (जिन्हें स्मृति कई बार, अक्सर भुला भी देती है), वह समझ और व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाता, मनुष्य का अपना एक सार्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा नहीं कर पाता।

आखिर यह अकारण नहीं होता कि न्यूटन जैसा महान वैज्ञानिक अपने जीवन के अंत समय में धार्मिकता की ओर उन्मुख हो जाता है, चोटी के वैज्ञानिक भाववादी मानसिकताओं में उलझे रहते हैं, रॉकेटों, चंद्रयानों को नारियल फोड़ कर अंतरिक्ष में भेजा जाता है, बड़े-बड़े डॉक्टर अलौकिक चमत्कारिकता में विश्वास करते पाये जाते हैं, और कई प्रबुद्ध और समझदार से लगते लोग अपने कार्यक्षेत्र में भी और इससे बाहर की चीज़ों के साथ भी अमूमन अपनी सामंती परंपराओं से प्राप्त मानसिकता औए समझ के साथ सोचते और व्यवहार करते नज़र आते हैं।

कभी अवसर उपलब्ध हुआ और समय मिला तो सामाजिक-वैयक्तिक मनोविज्ञान की इन स्वाभाविक परिणितियों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, फिलहाल आपके मनोजगत में हलचल के लिए इतने ही इशारे पर्याप्त से लग रहे है। आखिर कहा भी तो जाता है कि समझदार को इशारा काफ़ी होता है।

चलिए अपने उसी विषय पर लौटते हैं, और चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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जीवन का क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति

परावर्तन का आगे का विकास जीवन के क्रमविकास से संबद्ध था। जीवन भूतद्रव्य के अस्तित्व तथा उसकी गति का एक विशेष रूप है। इसके बुनियादी भौतिक वाहक हैं प्रोटीन और न्यूक्लीय अम्ल, जो जीवित अंगियों की संतानोत्पत्ति तथा आनुवंशिकता के संचारण और नियंत्रण को सुनिश्चित बनाते हैं। जीवित अंगियों के विशिष्ट लक्षण हैं उपापचयन, वृद्धि, उत्तेज्यता ( क्षोभनशीलता ), स्वपुनरुत्पादन, स्वनियमन और पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता। सरलतम अंगी एककोशिकीय हैं। जीवन का और अधिक परिष्करण लंबी, जटिल, अंतर्विरोधी विकास की प्रक्रिया के जरिए हुआ। इस प्रक्रिया को जैविक क्रमविकास कहते हैं।

क्रमविकास के दौरान जीवित अंगी अधिक जटिल और परिष्कृत बनते गये। चूंकि पर्यावरण तथा जीवन की सारी दशाएं धीरे-धीरे बदलीं, इसलिए अंगियों की वही किस्में जीवित बची रहीं, जो इन परिवर्तनों के लिए सर्वोत्तम ढ़ंग से अनुकूलित थीं। पर्यावरण के प्रति अनुकूलन दो प्रक्रियाओं पर आधारित है: पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होने वाले अनुगुण तथा विशेषताएं ( आनुवंशिकता ) और परिवर्तनशीलता ( उत्परिपर्तन )। विभिन्न कारणों से प्रभावांतर्गत अंगियों की कई विशेषताएं सहसा छलांगनुमा ढ़ंग से परिवर्तित हो जाती हैं। यह परिवर्तन सारी जाति की दृष्टि से सांयोगिक हो सकते हैं। यदि कोई अनेपक्षित परिवर्तन उपयोगी सिद्ध हुआ ( बाह्य जगत के प्रति बेहतर अनुकूलन की क्षमता और आनुवंशिकता के द्वारा संचारण ) तो उस अंगी के वंशज पौधों व जानवरों की अन्य जातियों के साथ अस्तित्व के लिए संघर्ष में अधिक आसानी से जीवित बचे रहे।

जीवित अंगी बाह्य पर्यावरण की क्रिया के ही विषय नहीं हैं, बल्कि स्वयं भी उसको प्रभावित करते हैं। अपने जीवन के क्रियाकलाप के दौरान, पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होते समय वे एक निश्चित क्रिया या निश्चित कार्य करते हैं। यह परावर्तन के सिद्धांत के नज़रिए से विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवित अंगियों में परावर्तन सिर्फ़ उनकी आंतरिक संरचनाओं में प्रतिकूल परिवर्तनों से ही नहीं, बल्कि उनकी जीवन क्रिया से भी संबद्ध हैं।

जीवन संघर्ष के दौरान अंगी अधिक जटिल तथा परिष्कृत होते गये और इसी प्रक्रिया में एककोशिकीय से बहुकोशिकीय अंगियों में संक्रमण हुआ। बहुकोशिकीय अंगियों की कोशिकाओं के समूह और अंग अलग-अलग कार्य करने के लिए विशेषीकृत हो गये। समय बीतने पर तंत्रिका कोशिका नाम की कोशिकाओं के समूह पैदा होते हैं, जो परावर्तन का कार्य करने के लिए विशेषीकृत होते हैं।

जीवित अंगियों में परावर्तन उत्तेजनशीलता के अनुगुण के रूप में प्रकट होता है, यानि पर्यावरण के असर के प्रति अनुक्रिया करने की अंगी की क्षमता के रूप में। इसमें वह एक निश्चित समयांतराल में अपने को इस ढ़ंग से परिवर्तित कर लेता है कि वह उस प्रभाव के प्रति बेहतर ढ़ंग से अनुकूलित होने और अपने को जीवित तथा सुरक्षित रखने में समर्थ हो जाता है। उत्तेजनशीलता का आधार भौतिक जैव-विद्युतीय प्रक्रियाएं होती हैं।

क्रम-विकास की अगली अवस्था में अधिक विकसित प्राणियों ( मत्स्य, कीट, जलस्थलचारी, स्तनपायी ) में एक जटिल बहुशाखीय तंत्रिकातंत्र बन गया। नये विशेषीकरण के फलस्वरूप कुछ तंत्रिका कोशिकाएं पर्यावरण के केवल प्रकाश के प्रभावों, कुछ केवल ध्वनि प्रभावों और कुछ यांत्रिक प्तभावों का ही प्रत्यक्षण करने लगीं। कोशिकाओं का एक विशेष समूह अन्य के बीच संबंध स्थापित करनेवाला मध्यस्थ बन गया यानि तंत्रिका आवेगों को अन्य अंगों तक संचारित करने, पूर्ववर्ती प्रभावों के बारे में सूचना संग्रह ( स्मरण ) करने तथा पर्यावरण से प्राप्त संकेतों का विश्लेषण तथा उनमें फेरबदल करने के विशेष कार्य करने लगा। उच्चतर जानवरों में इन विशेष तंत्रिका कोशिकाओं से एक विशेष अंग की रचना हुई, जो पर्यावरण के सारे परावर्तनों तथा उसके साथ अंतर्क्रिया के नियंत्रण का कार्य करने लगा। यह अंग मस्तिष्क है।

तंत्रिकातंत्र और ख़ासकर मस्तिष्क की उत्पत्ति के साथ परावर्तन एक नये और अधिक ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। बाह्य जगत के वस्तुगत प्रभावों के प्रति अनुक्रिया के रूप में प्रतिकूल संरचनात्मक परिवर्तन ऐसे कार्य संबंधी परिवर्तनों से संपूरित हो गये, जो अंगी को बनाए या सुरक्षित रखने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक वास-स्थल के प्रति तथा उसके साथ अंतर्क्रिया करने के लिए भी बेहतर अनुकूलित थे।
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इस बार इतना ही।
अगली प्रस्तुतियों में, यथार्थता के निष्क्रिय और सक्रिय परावर्तन पर नज़र ड़ालेंगे, और चेतना की उत्पत्ति की ओर आगे बढ़ेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय
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