रविवार, 4 सितंबर 2016

प्रकृति और समाज-श्रॄंखला समाप्ति-पीडीएफ़ पुस्तिका

हे मानवश्रेष्ठों,

प्रकृति और समाज’ पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।



प्रकृति और समाज - श्रॄंखला समाप्ति - पीडीएफ़ पुस्तिका

जैसा कि यहां की परंपरा है, ‘प्रकृति और समाज’ पर प्रस्तुत सामग्री को पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। नीचे प्रस्तुत लिंक से इसे डाउनलोड किया जा सकता है। इसे साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेगा ही।

प्रकृति और समाज - हिंदी - डाउनलोडेबल पीडीएफ़
nature and society - in hindi - free downloadable pdf - size 313kb - 28page



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 20 अगस्त 2016

पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष की चर्चा के साथ इस श्रृंखला का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष
( ecological consciousness and ideological struggle )

प्रकृति के विकास तथा सामाजिक विकास के नियम वस्तुगत ( objective ) ढंग से संक्रिया करते हैं, किंतु उनका कार्यान्वयन सचेत ( conscious ) लोगों के क्रियाकलाप द्वारा होता है। प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), प्रकृति के विकास तथा समाज के विकास दोनों के नियमों के अनुसार, यानी सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप अर्थात पारिस्थितिक चेतना के रूप में होना जरूरी है। मनुष्य और समाज को प्रकृति के महत्व का बोध धीरे-धीरे, सदियों के दौरान होता है। किंतु पारिस्थितिक चेतना सापेक्षतः हाल ही में, चंद दशकों के दौरान बनी है। 

इसका विशेष लक्षण यह है कि यह एक प्रकार की सामूहिक सामाजिक चेतना है, जो उस वास्तविक, जटिल, अंतर्विरोधी तथा अत्यंत ख़तरनाक स्थिति को परावर्तित ( reflect ) करती है जो आधुनिक जगत में पारिस्थितिक संतुलन की गड़बड़ी, पर्यावरणीय प्रदूषण, प्राकॄतिक संसाधनों के ख़त्म होने के ख़तरे तथा वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक नतीजों के रूप में मनुष्यजाति के सामाजिक पतन की सम्भावना के परिणामस्वरूप बनी है। शुरू में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, लेखकों व कलाकारों के अलग-अलह समूहों, विभिन्न जातीय समूहों, आदि द्वारा इन परिणामों के खिलाफ़ प्रतिरोध की शक्ल में उत्पन्न पारिस्थितिक चेतना ने अब सारे देशों के सैकड़ों लाखों के दिल-दिमाग़ों में घर कर लिया है। 

इसके विकास का एक सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निष्कर्ष है कि पारिस्थितिक संतुलन की पुनर्स्थापना और प्रकृति की सुरक्षा तथा ‘पुनर्वास’ ( rehabilitation ) सार्विक ( universal ) दिलचस्पी और सार्विक मूल्य के हैं। किंतु इससे यह तथ्य अपवर्जित ( exclude ) नहीं होता कि पारिस्थितिक चेतना के दायरे के अंतर्गत तीव्र वैचारिक संघर्ष चलाया जा रहा है और उसका चलना जारी रहेगा। विकसित पूंजीवादी देशों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के उत्साही समर्थक पारिस्थितिक महाविपत्ति के ख़तरे को मान्यता देते हुए इसका दोष विकासमान देशों के जनगण पर उन मेहनतकशों पर मढ़ने की चेष्टा कर रहे हैं, जो, उनके कथनानुसार, प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। 

इनके विपरीत ‘ग्रीन्स’ ( Greens ) के विचारक सारी पारिस्थितिक विपदाओं का दोष बड़े पैमाने के उद्योग, आधुनिक तकनीक और सारी वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को और साथ ही किसी भी क़ीमत पर ( यहां तक कि प्रकृति के विनाश की क़ीमत पर भी ) इसे आगे बढ़ाने में स्वार्थपूर्ण दिलचस्पी रखनेवाली इजारेदार पूंजी ( monopoly capital ) पर रखते हैं। इस आधार पर बनी तथा विकसित सामाजिक-दार्शनिक प्रवृत्ति को विज्ञान-विरोधवाद ( anti-scientism ) और तकनीक-विरोधवाद ( anti-technicism ) कहते हैं। इसके नेतागणों में आधुनिक समाज की सारी आपदाओं का स्रोत को विज्ञान और इंजीनियरी के विकास में देखने का रुझान ( trend ) है। इन कारकों ( factors ) की भूमिका की अतिरंजना ( exaggeration ) स्वतः ही उद्योग के अमानवीयकरण तथा प्रकृति के विनाश की ओर ले जाती है। 

वे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के अस्वीकरण ( rejection ) में, पूर्व-औद्योगिक, पारंपरिक उत्पादन, वैकल्पिक तकनीकों ( जिनसे उनका तात्पर्य दस्तकारी, आदिम लकड़ी के हलों से खेती, आदि से है ) की ओर वापसी में देखते हैं। किंतु तथ्यतः ये रूमानी आह्वान उनके पीछे छुपे निश्चित वैचारिक उसूलों को परावर्तित करते हैं। मनुष्यजाति के सारे दुर्भाग्यों के स्रोत को विज्ञान व तकनीक में देखते हुए इस प्रवृत्ति के प्रतिपादक वस्तुतः इस मुख्य बात को जाने-अनजाने पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक परिणाम स्वयं विज्ञान तथा तकनीक पर निर्भर नहीं करते, बल्कि उन्हें इस्तेमाल करने, उनका अनुप्रयोग करने के तरीक़ों पर, उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होते हैं, जिसके अंतर्गत उन्हें काम में लाया जाता है

पारिस्थितिक चेतना में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक यह समझ है कि प्रकृति केवल आर्थिक संसाधनों की एक प्रणाली, मनुष्यजाति के जीवित रहने का केवल एक पूर्वाधार ही नहीं, बल्कि सौंदर्यबोधात्मक ( aesthetic ) तथा नैतिक शिक्षा का, समाज के मानवीकरण का एक सबल कारक भी है।

पर्यावरण की रक्षार्थ कारगर, युक्तिसंगत, सुआधारित ( well-grounded ) उपायों के विकास के लिए वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती - इससे संज्ञान की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी। बल्कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को, निजी हितों के बजाय समाज के हितों को सर्वोपरि रखने वाली एक इस तरह की सामाजिक प्रणाली ( social system ) में ढालने की जरूरत है जिसमें वह पारिस्थितिक संतुलन के साथ आंगिक रूप से ( organically ) संयुक्त हो और पर्यावरण की अखंडता ( integrity ) था उसका साकल्य ( wholeness ) बरकरार रहे। विज्ञान के अनुप्रयोग तथा नयी तकनीकों के उपयोग के नकारात्मक परिणामों को, स्वयं विज्ञान तथा तकनीक से ही दूर किया जा सकता है। परंतु ऐसा करने के लिए, उनके कार्यान्वयन तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) के लिए यह ज़रूरी है कि समाज सबसे पहले महत्तर ( greater ) सामाजिक न्याय की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो।

समसामयिक पारिस्थितिक चेतना के विश्लेषण से पता चलता है कि यह स्वयं वैचारिकी का एक विकल्प ( alternative ) या उसका प्रतिपक्षी ( opposite ) नहीं है, क्योंकि पारिस्थितिक चेतना के अंदर एक वैचारिक संघर्ष भी जारी है। केवल ऐसी ही पारिस्थितिक चेतना सामाजिक समस्याओं के रिश्ते की सुस्पष्ट समझ दे सकती है तथा सामाजिक न्याय ( social justice ) के पुनर्निर्माण की ओर ले जा सकती है ; अतंतः केवल यही मनुष्यजाति के एक सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, प्रकृति और समाज की सांमजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया की उपलब्धि करा सकती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 13 अगस्त 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - ३
( scientific and technological progress and its consequences - 3 )

(५) जैविकी ( biology ) के, विशेषतः जैव तकनीकी, आनुवंशिकी तथा जीन इंजीनियरिंग के विकास से अब जीवित अंगियों की आनुवंशिकता ( heredity ) को नियंत्रित करना संभव हो गया है। निकट भविष्य में जीन इंजीनियरिंग के उपयोग से लोग फ़सलों और पशुओं की उत्पादकता में तीव्र वृद्धि करने में कामयाब हो जायेंगे। इस क्षेत्र की उपलब्धियों से कई बीमारियों का उन्मूलन या रोकथाम करने, स्वास्थ्य में आम सुधार करने तथा जीवन को दीर्घ बनाने की दशाओं का निर्माण हो रहा है।

परंतु पूंजीवादी व्यवस्था में यह लाखों-करोड़ो लोगों को दीर्घकालिक भूख तथा कुपोषण से नहीं बचाता, क्योंकि खाद्य उत्पदन का मुख्य लक्ष्य मनुष्य का कल्याण नहीं, मुनाफ़ा कमाना है। इसके अलावा साम्राज्यवादी, इन जीन इंजीनियरिंग तथा अन्य जैविक विज्ञानों की उपलब्धियों को जैविक, रोगाणु युद्ध की तैयारी के लिए बेज़ा इस्तेमाल कर रहे हैं, मनुष्यजाति के सामने नये ख़तरे पैदा कर रहे हैं। अतः जैविकी का और अधिक सफल विकास, बहुसंख्या के हित में समाज द्वारा उसके नियंत्रण और प्रबंध को आवश्यक बना रहा है।

(६) वैज्ञानिक कृषि तकनीक आधुनिक समाज में अतिमहत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। बात यह है कि लोगों ने अनेक सहस्त्राब्दियों के दौरान कृषि तथा पशुपालन के क्षेत्र में विराट अनुभव अर्जित कर लिया है, जिससे उन्हें आवश्यक खाद्य प्राप्त होता रहा। किंतु अब तथाकथित जनसंख्या विस्फोट के कारण कई देशों में विशेषतः उपनिवेशवाद से मुक्त मुल्कों में परंपरागत ढंग से उत्पादित खाद्य रिज़र्व काफ़ी नहीं है।

आधुनिक विज्ञान ने कृषि के गहनीकरण के कई कारगर तरीक़ों का विकास किया है। उनमें शामिल हैं कारगर उर्वरकों, नवीनतम कृषि यंत्रों व इलेक्ट्रोनिकी का उपयोग, जल निकासी व सिंचाई की जटिल व्यवस्था करना तथा उच्च उत्पादकता वाले मवेशियों और पोल्ट्री तथा नये क़िस्म की फ़सलों का विकास करना। किंतु भिन्न-भिन्न सामाजिक प्रणालियों में इनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं। मसलन, यूरोप और अमरीका के कुछ देश केवल अपनी ही आबादी के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी पर्याप्त खाद्य का उत्पादन कर रहे हैं, परंतु वे खाद्य को अक्सर राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं; जो देश उनकी राजनीतिक नीति का अनुसरण करते हैं वे उन्हें ही अनुकूल और मनचाही शर्तों पर खाद्य की पूर्ति करते हैं। 

इससे निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है : आधुनिक वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के परिणामों का स्वभाव स्वयं यंत्रों व तकनीक पर या पृथक वैज्ञानिक नतीजों पर निर्भर नहीं होता। यह उनके अनुप्रयोग की परिस्थितियों तथा उसके उद्देश्य पर निर्भर होता है। इस विश्लेषण का दार्शनिक अर्थ यह है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का या प्रकृति के साथ समाज का संबंध, निश्चित सामाजिक दशाओं द्वारा व्यवहित और संनियमित ( governed ) होता है। यदि हम इस संबंध को प्रकृति में गड़बड़ी न करनेवाला और साथ ही मानवजाति के विकासार्थ अनुकूल दशाओं को सुनिश्चित बनानेवाला सांमजस्यपूर्ण और रचनात्मक संबंध बनाना चाहते हैं, यो सबसे पहले और सर्वोपरि समुचित सामाजिक दशाओं का निर्माण करना जरूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 30 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा  की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - २
( scientific and technological progress and its consequences - 2 )

(२) मनुष्यजाति की एक सबसे महत्वपूर्ण भूमंडलीय समस्या है ऊर्जा के नये स्रोतों की रचना और उपयोग। अभी तक ऊर्जा तकनीक की प्रमुख उपलब्धि परमणु ऊर्जा को उपयोग में लाना रही है, परंतु इसमें कई ख़तरे और अंतर्विरोध निहित हैं। एक तरफ़, परमाणु ऊर्जा सस्ती बिजली हासिल करना और क़ुदरती ईंधन की बचत करना संभव बनाती है। दूसरी तरफ़, यह लगातार रेडियो सक्रिय प्रदूषण का ख़तरा पैदा कर रही है। किंतु इसमें कोई शक नहीं कि सबसे बड़ा ख़तरा नाभिकीय अस्त्रों के निर्माण में निहित है।

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें यह उम्मीद बंधाती हैं कि निकट भविष्य में नियंत्रित तापनाभिकीय क्रिया उपलब्ध कर ली जायेगी, जिससे लगभग असीमित ऊर्जा संसाधनों की प्राप्ति होने की संभावना है। इससे अनेक खनिजों का संरक्षण करना तथा तेल, कोयला व प्राकृतिक गैस के उपयोग को केवल रासायनिक उद्योग तक ही सीमित रखना संभव हो जायेगा।

(३) आधुनिक रासायनिक उद्योग ऐसी नयी कृत्रिम सामग्री हासिल करना संभव बना रहा है, जो प्रकृति में नहीं पाये जाते। इनसे प्राकृतिक चमड़े, लकड़ी, रबर, ऊन तथा कुछ धातुओं, आदि को प्रतिस्थापित किया जा रहा है। रसायन के अनुप्रयोग ( application ) से अत्यंत कारगर उर्वरकों, दवाओं और कीटनाशी पदार्थों का उत्पादन हो रहा है। इन सबसे प्राकृतिक संपदा के बेहतर उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है, कृषि की उत्पादकता बढ़ रही है और लोगों के स्वास्थ्य में सुधार व उम्र में वृद्धि हो रही है। परंतु साथ ही रासायनिक अपशिष्ट ( waste ) वायुमंडल, जल, मिट्टी, सागर-तल को दूषित भी कर रहे हैं। सारे संसार में पर्यावरणीय प्रदूषण की रोकथाम पर विराट संसाधन लगाये जा रहे हैं।

(४) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति अपशिष्टरहित तकनीकी की रचना करना संभव बना रही है। आधुनिक उद्योग और कृषि विज्ञान की उपलब्धियों के उपयोग से तकनीकी प्रक्रिया को इस तरह से व्यवस्थित कर सकते हैं कि जिससे उत्पादन जन्य अपशिष्ट वायुमंडल को दूषित करने के बजाय द्वितीयक कच्चे माल के रूप में फिर से उत्पादन चक्र में प्रविष्ट हो जाएंगे। जैव तकनीकी, रसायन का उपयोग तथा अपशिष्टरहित तकनीकी अनेक प्रकृति संरक्षण विधियों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है और साथ ही साथ मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल में उल्लेखनीय सुधार करने में मदद कर रही है।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

शनिवार, 23 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा  की थी, इस बार हम वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर बात शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - १
( scientific and technological progress and its consequences - 1 )

अब वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की सामान्य विशेषताओं व लक्षणॊं से परिचित होने के बाद हम पूछ सकते हैं कि क्या प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), समसामयिक ( contemporary ) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर निर्भर करती है और अगर ऐसा है, तो किस हद तक, और इसके परिणाम तथा नतीज़ों को सामाजिक-आर्थिक प्रणाली ( socio-economic system ) किस तरह निश्चित करती है?

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की वज़ह से उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) का तूफ़ानी विकास मनुष्य की शक्ति में बढ़ती कर रहा है। किंतु इस शक्ति का किस तरह से उपयोग हो रहा है? किसके लिए हो रहा है? मनुष्य की लगातार बढ़ती हुई शक्ति से कौन लाभ उठा रहा है? इस विचार-विमर्श को अधिक सारवान बनाने के लिए हमें इस प्रगति की मुख्य दशा-दिशाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

(१) हम इसकी चर्चा कर चुके हैं कि किस तरह एक विशेष तकनीक, सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की समसामयिक अवस्था पर उत्पादन तथा प्रबंध के कार्यकलाप के उत्प्रेरक की निर्धारक भूमिका अदा करती है। अब मानवजाति ऐसे सुपर कंप्यूटर बनाने की क्षमता से संपन्न है जो दसियों अरब संक्रियाएं प्रति सेकंड कर सकते हैं और उनकी स्मृति दसियों लाखों पुस्तकों में विद्यमान सूचना के बराबर जानकारी का भंडारण करने में समर्थ है और उनका आकार भी निरंतर कमतर होता जा रहा है।

आज कृत्रिम मस्तिष्क की रचना करने का काम जारी है। कृत्रिम मस्तिष्क युक्त कंप्यूटर अत्यंत जटिल तार्किक युक्तियां ( logical arguments ) संपन्न करने में समर्थ होंगे और उनकी मदद से वैज्ञानिक अनुसंधान, मशीनों की डिज़ाइनिंग तथा उद्यमों तक की डिज़ाइनिंग करना संभव हो सकेगा। वे लचीली ( flexible ) तकनीकों का नियंत्रण करने में समर्थ होंगे। और शायद व्यक्तिगत कंप्यूटरों की मदद से आधुनिक घरेलू उत्पादन इकाइयां बनाना, श्रम की उत्पादकता में तीव्र बढ़ती करना और शिक्षण के स्वरूप को बदलना संभव हो सकेगा। बच्चों और वयस्कों को नयी सूचना को दसियों गुना अधिक तेज़ी से आत्मसात करने का अवसर मिल सकता है, केवल विशेषज्ञों को उपलब्ध ज्ञान करोड़ों लोगों के लिए सुलभ किया जा सकता है। लोगों की जीवन पद्धति और पारस्परिक संसर्ग बदल जायेंगे और भाषा की बाधाएं भंग हो जायेंगी। कोशिश की जा रही हैं कि कंप्यूटर वैज्ञानिक साहित्य और दस्तावेज़ों को एक भाषा से दूसरी में क़रीब-क़रीब मनुष्य की सहायता के बिना ही अनूदित कर लेंगे। मनुष्य की भाषा को समझने में तथा रंगों व त्रि-आयामी दृश्य को देखने में समर्थ नयी पीढ़ी के रोबोटों का विकास जारी है। इस सबके क्या परिणाम होंगे?

पूंजीवादी समाज में, यहां तक कि विकसित देशों में भी ऐसे लोगों की विशाल संख्या है जो वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के कारण उत्पादन क्रियाकलाप के बाहर कर दिये गये हैं। कुछः नये रोज़गार उत्पन्न होने के बावजूद रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के कारण बननेवाली बेरोज़गारों की फ़ौज लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी वज़ह यह है कि पूंजीवादी उद्यम, सूचना तकनीक को मुख्यतः मुनाफ़े कमाने का तरीक़ा समझते हैं। फलतः इस तकनीक के फैलाव के नकारात्मक परिणाम स्वयं कंप्यूटरों तथा रोबोटों के अनुप्रयोग ( application ) नहीं, बल्कि उनके पूंजीवादी उपयोग के दुष्परिणाम हैं। अतएव ज़रूरत इस बात की है कि इस वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के लक्ष्य को सर्वथा भिन्न बनाया जाये। इसका उपयोग मुनाफ़ा कमाने के अधीन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के हित में नियोजित ( planned ) किया जाये। समाजवादी ढांचे के अंतर्गत नयी तकनीकों के विकास की योजनाएं इस तरह से बनायी जायें कि सारी श्रम समर्थ आबादी सामाजिक दृष्टि से उपयोगी काम करती रहे।



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समय अविराम

शनिवार, 16 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २
( what is scientific and technological progress - 2 )

किंतु आधुनिक अर्थ में तकनीक पद कोई भिन्न चीज़ है। इसकी विशिष्टता क्या है? बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में हमें उन सब संसाधनों की सीमित प्रकृति का बोध हो गया है, जिन्हें मनुष्य अब तक इस्तेमाल करता रहा। प्राकृतिक, तकनीकी, ऊर्जा, खाद्य, भूमि के, मानवीय तथा वित्तीय संसाधन अत्यधिक, असंयमित उपयोग से समाप्त या नष्ट हो सकते हैं। इसके साथ ही विराट परिमाण में ऊर्जा तथा कच्चे माल व शक्तिशाली मशीनों का उपयोग करनेवाली नयी, शक्तिशाली उत्पादन प्रणालियों का विकास शुरू हो गया है। उत्पादन के ये सभी नये रूप मनुष्य की ज़रूरत के उपयोगी उत्पाद बनाने के साथ ही काफ़ी ज़्यादा अवांछित ( undesirable ) और हानिकारक फल भी उत्पन्न करते हैं। 

उदाहरण के लिए, परमाणविक बिजलीघरों का निर्माण जहां बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली हासिल करना, तेल व कोयले की बचत करना संभव बनाता है, वहां इससे रेडियो सक्रिय अपशिष्ट ( waste ) भी बनते हैं और मनुष्य तथा प्रकृति दोनों के लिए ख़तरनाक रेडियो सक्रियता बढ़ जाती है। बड़े रासायनिक कारख़ाने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए मूल्यवान सामग्री व अन्य चीज़ों का उत्पादन करते हैं, लेकिन उनसे उत्पन्न होनेवाले अपशिष्टों को विशाल इलाक़ों में जमा कर दिया जाता है या नदियों में डाल दिया जाता है, उनसे ज़मीन और पानी दूषित हो जाते हैं जिससे मनुष्यों और जानवरों के लिए भारी ख़तरा पैदा हो जाता है।  इन सारे तथा अन्य अवांछित परिणामों से बचने के लिए, अपशिष्ट रहित उद्योग का निर्माण करने और स्वयं औद्योगिक अपशिष्टों को पुनर्प्रयोज्य ( re-usable ) सामग्री में रूपांतरित करने तथा नये उत्पादन चक्रों में इस्तेमाल करने के लिए हमारे लिए ज़रूरी है कि तकनीक को ही बदला जाये। अतः अब लोग महज़ नयी मशीनों और उपकरणों के बजाय नयी तकनीक की बातें करते हैं।

नई तकनीकों का विकास हर प्रकार के प्राकृतिक तथा सामाजिक संसाधनों के अधिकतम किफ़ायती ( economic ) उपयोग के ज़रिये समाज और उत्पादन के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंधों की स्थापना में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इन तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण सूचना तकनीक ( information technology ) है जो अन्य सब पर निर्धारक प्रभाव डाल रही है। इसमें शामिल हैं प्रति सेकंड खरबों संक्रियाएं ( operations ) करने में समर्थ तथा विराट स्मृति ( memory ) से संपन्न आधुनिक कंप्यूटरों का डिज़ाइन बनाना तथा निर्माण करना, ऐसे माइक्रोप्रोसेसर बनाना जो कंप्यूटरों को संहत ( compact ) बनाते हैं, हर प्रकार के कार्यक्रम लिखना और ऐसी विशेष कार्यक्रमीय भाषाओं ( programming languages ) का विकास, जो सूचना के भंडारण, प्रोसेसिंग, पुनर्प्राप्ति ( retrieval ) तथा निबटान ( disposal ) से संबंधित अत्यंत जटिल समस्याओं के समाधान को सुविधापूर्ण बना देती है। इसकी वज़ह से सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी तकनीकी अवस्था का मूलाधार और उत्प्रेरक बनती जा रही है और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक शक्तिशाली क्रांतिकारी कारक ( factor ) में तब्दील होती जा रही है। 

इसका महत्व लगातार बढ़ रहा हैं, क्योंकि यह संसाधनों का एक ही ऐसा प्रकार है, जिसे मानवजाति अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान ख़र्च नहीं करती, बल्कि इसके विपरीत उसे संवर्द्धित करती और बढ़ाती रहती है। यही नहीं, वैज्ञानिक सूचना के परिमाण की, प्रकृतिवैज्ञानिक, तकनीकी तथा मानवीय ज्ञान के सारे प्रकारों सहित वृद्धि, उन सारे ख़तरों को मिटाने की बुनियाद डाल रही है जिनका जिक्र निराशावादी और आशावादी के संवाद में किया गया है। एक ऐसी संभावना भी प्रकट हो रही है, जिससे उन संसाधनों को संरक्षित ही नहीं, बल्कि नवीकरण ( restoring ) तथा संवर्द्धित भी किया जा सकेगा, जिन्हें मनुष्यजाति ने अब तक इतने अविवेकपूर्ण ढंग से बर्बाद किया है। परंतु इस संभावना को व्यावहारतः कार्यान्वित करने के लिए कुछ विशेष दशाओं तथा निश्चित प्रकार के सामाजिक विकास की दरकार है

सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सभी प्रक्रियाओं की तरह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी जटिल और अंतर्विरोधी ( contradictory ) है। सरल, असंदिग्ध समाधान ख़ुद-ब-ख़ुद हासिल नहीं होते। यह प्रगति, प्रकृति और समाज के बीच संबंधों में एक नयी अवस्था है। वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति की पृष्ठभूमि में श्रम प्रक्रिया, अधिकाधिक नयी प्राकृतिक संपदा, ऊर्जा साधनों, पृथ्वी के अविकसित भूक्षेत्रों, विश्व महासागरों और अंतरिक्ष से भी संबंधित होती है। इसलिए दो सर्वथा विरोधी संभावनाएं प्रकट हो रही हैं। इनमें से एक प्रकृति व समाज के बीच अधिकाधिक अंतर्विरोधों की तरफ़ ले जाती है; और दूसरी उनके बीच मूलतः नयी अंतर्क्रिया ( interaction ) की, उनके बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण संबंधों तथा सर्वाधिक कठिन अंतर्विरोधों के उन्मूलन ( elimination ) की ओर ले जाती है। इनमें से कौनसी संभावना ऊपर उभरेगी तथा वास्तविकता बनेगी - यह प्रश्न भूमंडलीय पैमाने पर समाज के आमूल सामाजिक रूपांतरणों ( radical social transformations ) पर निर्भर है।



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समय अविराम

शनिवार, 9 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा की थी, इस बार से हम वर्तमान वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज के संबंधो को समझने की कोशिश शुरू करेंगे और इसी क्रम में आज देखेंगे कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति से क्या तात्पर्य है

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - १
( what is scientific and technological progress - 1 )

आज भौतिक संपदा का उत्पादन तथा सेवा क्षेत्र इतनी तेज़ी से विकसित हो रहे हैं कि उत्पादित वस्तुओं की क़िस्में तथा उन्हें बनाने की तकनीक और लोगों की उत्पादन कुशलताएं एक ही पीढ़ी में तीव्रता से बदल जाती है। पूर्ववर्ती अवस्थाओं में से अनेक में स्थिति नितांत भिन्न थी। एक ही उत्पाद को तैयार करने के लिए एक ही तकनीक को कई पीढ़ियों तक इस्तेमाल किया जाता था और पीढ़ी-दर-पीढी काम के संगठन की एक ही विधि का उपयोग होता था। तकनीक में द्रुत ( rapid ) परिवर्तन के साथ होनेवाले उत्पादन के वर्तमान रूप को, वस्तुओं के उत्पादन के पारंपरिक रूप के विपरीत, अनवरत वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति कहा जा सकता है। इस अक्सर वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी कहा जाता है। इसके विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उत्पादन में विज्ञान निर्णायक शक्ति और निर्धारक कारक है। पहले भी उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) की रचना करनेवाले लोगों का ज्ञान और अनुभव, औज़ारों को और उत्पादन क्रिया को परिष्कृत बनाने का एक महत्वपूर्ण प्रेरक हुआ करता था, किंतु ज्ञान और अनुभव स्वयं उत्पादन के स्वीकृत और स्थापित रूपों और विधियों के सामान्यीकरण ( generalization ) हुआ करते थे। उत्पादन की नयी खोजें तथा अविष्कार विरल घटनाएं थीं। यहां तक कि जब आधुनिक विज्ञान का उद्‍भव होना शुरू हुआ, तो भौतिक उत्पादन - उद्योग और कृषि - की निर्णायक भूमिका थी।

विज्ञान मुख्य रूप से व्यवहार की मांगों तथा अपेक्षाओं का जवाब देने का प्रयत्न करता था, किंतु यह काम हमेशा पूरा नहीं कर पाता था क्योंकि विज्ञान के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में ज्ञान का संचय और परिष्करण बेहद मंद गति से होता था। २०वीं सदी के मध्य में इस स्थिति में आमूल परिवर्तन हो गया। ज्ञान के परिमाण में विराट बढ़ती हुई और यह बढ़ती तूफ़ानी वेग से जारी है। साठोत्तरी दशक के अंत और सत्तरोत्तरी दशक के प्रारंभ में वैज्ञानिक ज्ञान का परिमाण प्रति पांच-सात वर्षों में दो गुना होने लगा। अब यह लगभग हर साल दो गुना होता जाता है। इसकी वज़ह से स्वयं विज्ञान, उत्पादन का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेरक बल बन गया है। यह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति का पहला विशिष्ट लक्षण है।

दूसरा विशिष्ट लक्षण यह है कि प्रकृति के गहनतम रहस्यों की खोज पर आधारित बुनियादी अन्वेषण ( research ) की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नये प्रकार के उत्पाद व तकनीक, सतर्कतापूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणन ( substantiation ) की मांग करते हैं और विज्ञान के सर्वाधिक जटिल बुनियादी नियमों पर आधारित हैं। मसलन, परमाणु ऊर्जा के उपयोग, जीन इंजीनियरी, कृत्रिम भूउपग्रहों, मूलतः नयी सामग्रियों, आदि की याद कीजिये। इनमें से किसी को भी मात्र पूर्ववर्ती अनुभव के आधार पर नहीं रचा जा सकता था, उनके लिए बुनियादी वैज्ञानिक ज्ञान की ज़रूरत थी।

तीसरा लक्षण यह है कि किसी वैज्ञानिक खोज या अविष्कार के होने तथा उद्योग में उसका उपयोग करने के बीच का समयांतराल घटता जा रहा है। जहां पहले नये वैज्ञानिक-तकनीकी विचारों के फैलाव तथा कार्यान्वयन में दसियों वर्ष नहीं, सदियों तक लग जाती थी, वहां अब यह अंतराल चंद वर्षों और यहां तक कि चंद महिनों में नापा जाता है।

अंतिम और चौथा विशिष्ट लक्षण पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी अवस्था में संक्रमण ( transition ) से संबद्ध है। पारंपरिक उत्पादन में तकनीक क्या है? उत्पादन की किसी भे प्रक्रिया में केवल औज़ार, मशीनें, यांत्रिक विधियां ही आवश्यक नहीं हैं, बल्कि कार्य प्रक्रिया को सही ढंग से संगठित ( organize ) करना भी ज़रूरी है। इसके लिए यह निर्धारित करने में समर्थ होना महत्वपूर्ण है कि ठीक कौनसी संक्रिया ( operation ) कब संपन्न की जाये तथा किस क्रम में की जाये और विभिन्न संक्रियाएं किस रफ़्तार से की जानी चाहिए तथा अमुक-अमुक उत्पाद के विनिर्माण ( manufacturing ) में विभिन्न उपकरणों, यंत्रों और मध्यवर्ती अवस्थाओं द्वारा क्या अपेक्षाएं पूरी की जानी चाहिए। समुचित ज्ञान सहित इन सबको समग्र रूप में तकनीक कहा जाता है



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

( the artificial habitat - 2 )

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कृत्रिम निवास स्थल का विकास और परिष्करण ( perfection ), सामाजिक संबंधों तथा समाज के संगठन के विकास तथा परिष्करण के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है। जब समाज निजी स्वामित्व ( private property ) पर आधारित होता है और उसका कोई एकल लक्ष्य ( single aim ) नहीं होता, प्रतिरोधी अंतर्विरोधों ( antagonistic contradictions ) के कारण छिन्न-भिन्न हुआ रहता है और इसीलिए नियोजित ढंग ( planned way ) से विकसित नहीं हो सकता है, तब कृत्रिम निवास स्थल के निर्माण से प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्यतः अस्तव्यस्त हो जाता है क्योंकि इन हालतों में कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण, मुनाफ़ों की होड़ के चलते परिवेशीय प्रकृति के निर्मम विनाश और शोषण के ज़रिये होता है।

परंतु यदि हम सामाजिक प्रणाली ( social system ) को प्रत्येक व्यक्ति तथा सारे समाज के हितों के अनुरूप और चहुंमुखी विकास के लिए अनुकूल दशाओं की व्यवस्था करने के अंतिम उद्देश्य के अनुसार संगठित करने की कोशिश करेंगे तभी यह संभव हो सकता है कि कृत्रिम निवास स्थल को भी इसी लक्ष्य के अनुसार निर्मित, विकसित, व्यवस्थित और रूपांतरित ( transform ) किया जा सकेगा। ऐसा विकास, प्राकृतिक निवास स्थल के रख-रखाव, संरक्षण और सुधार की अपेक्षा रखता है, क्योंकि उसके बिना मानव का चौतरफ़ा और सांमजस्यपूर्ण ( harmonious ) विकास असंभव है।

अतएव मनुष्य के प्राकृतिक व कृत्रिम निवास स्थल के बीच अंतर्विरोधों में व्यक्त, समाज और प्रकृति के बीच के अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना तथा उनका समाधान किया जाना, स्वयं समाज के आमूल, क्रांतिकारी रूपांतरण के साथ जुड़ा हुआ है। कृत्रिम निवास स्थल का चहुंमुखी विकास और व्यक्ति तथा मानवजाति के विकासार्थ उसका सर्वाधिक अनुकूल दशाओं की प्रणाली में परिवर्तन, प्रबल वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की मांग तथा आह्वान करता है।

आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं के समाधान के तरीक़े विशेष प्राकृतिक, तकनीकी तथा सामाजिक विज्ञानों का काम हैं। इसका दार्शनिक पहलू इस समझ में निहित है कि प्रकृति और समाज के बीच और कृत्रिम व प्राकृतिक निवास स्थलों के बीच अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना और उनके मध्य सामंजस्य की स्थापना करना केवल तभी संभव है, जबकि निम्नांकित तीन वस्तुगत शर्तों को पूरा किया जाये : (१) समाज के विकास की प्रक्रिया का सचेत ( conscious ), नियोजित, सबके हित में नेतृत्व और प्रबंध करना; (२) सामाजिक प्रणाली में ऐसा आमूल ( radical ) परिवर्तन करना कि व्यक्तियों, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय इजारेदारियों ( monopolies ) के निजी हित, मनुष्य की विशाल जनसंख्या के हितों का दमन ना कर सकें; और (३) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विस्तार तथा गहनीकरण ( deepening ) को हर तरह का संभव प्रोत्साहन देना क्योंकि इतिहास के स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) क्रम की पूर्ववर्ती अवस्थाओं में उत्पन्न कठिनाइयों को इसी आधार पर दूर किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल को और गहराई से समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १
( the artificial habitat - 1 )

हम पिछली प्रविष्टियों में यह भली-भांति देख चुके हैं कि प्राकृतिक निवास स्थल, प्रकृति के नियम ( जैविक नियमों सहित ) समाज पर सीधा प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उत्पादन पद्धति ( mode of production) तथा उसके आधार पर उत्पन्न सामाजिक संबंधों के ज़रिये अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। भौतिक उत्पादन के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने आसपास की प्रकृति में फेर-बदल करता जाता है और एक कृत्रिम निवास स्थल की रचना करता है, जो उसके अपने जीवन के क्रियाकलाप का ही उत्पाद ( product ) होता है।

कृत्रिम निवास स्थल में केवल मनुष्य द्वारा निर्मित अजैव तथा प्रकृति में नहीं पायी जानेवाली वस्तुएं ही नहीं, बल्कि जीवित अंगी ( living organism ) - कृत्रिम वरण ( selection ) या जीन इंजीनियरी से मनुष्य द्वारा प्रजनित या रचित पौधे तथा जानवर - भी शामिल होते हैं। किंतु कृत्रिम निवास स्थल को केवल इस भौतिक आधार तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है। मनुष्य केवल कुछ निश्चित सामाजिक संबंधों की प्रणाली ( system ) में ही रह और काम कर सकता है। ये सामाजिक संबंध, निश्चित भौतिक दशाओं में, मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित परिस्थितियों सहित प्रकट होते हैं और दोनों मिलकर मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल बनाते हैं।

समाज के विकास के साथ ही कृत्रिम निवास स्थल की भूमिका लगातार बढ़ती जाती है और मनुष्य के जीवन में उसका महत्व निरंतर बढ़ता है। इस बात पर विश्वास दिलाने के लिए हम निम्नांकित तथ्य पर विचार कर सकते हैं। मानव निर्मित सारी अजैव चीज़ों तथा सजीव अंगियों के द्रव्यमान को तकनीकी द्रव्यमान ( technomass ) कहा जाता है जबकि प्राकृतिक दशाओं के अंतर्गत विद्यमान सारे जीवित अंगियों को जैव द्रव्यमान ( biomass ) कहते हैं। कुछ दशकों पहले अनुमान लगाया गया था कि मनुष्य द्वारा एक वर्ष में निर्मित तकनीकी द्रव्यमान क़रीब १०१३- १०१४ टन के और थल पर उत्पन्न जैव द्रव्यमान क़रीब १०१२ टन के बराबर होता है। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्यजाति एक ऐसा कृत्रिम निवास स्थल बना चुकी है, जो प्राकृतिक निवास स्थल की तुलना में दसियों या सैकड़ों गुना अधिक उत्पादक है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं है कि अब लोग प्रकृति और प्राकृतिक निवास स्थल के बिना ही काम चला सकते हैं। प्रकृति हमेशा मनुष्य समाज के अस्तित्व की पूर्वशर्त ( precondition ) व आधार ( foundation ) बनी रहेगी। स्वयं कृत्रिम निवास स्थल केवल तभी अस्तित्वमान और विकसित हो सकता है, जब प्राकृतिक पर्यावरण मौजूद हो। किंतु आज मानवजाति की भौतिक और आत्मिक जरूरतों के एक काफ़ी बड़े अंश की पूर्ति कृत्रिम निवास स्थल से होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 11 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २
( the role of population in the development of society - 2 )

उत्पादन पद्धति तथा उसके संनियमन ( governing ) के प्रतिमान ( pattern ) ही आबादी की वृद्धि के प्रतिमानों तथा उसकी संरचना पर निर्धारक प्रभाव क्यों डालते हैं? ऐतिहासिक भौतिकवाद इस प्रश्न का उत्तर भी देता है। मुद्दा यह है कि मनुष्य मुख्य उत्पादक शक्ति है और सारे ऐतिहासिक युगों में आबादी की बहुसंख्या उत्पादक कार्य करती रही है। इसलिए सामाजिक क्रियाकलाप के सारे रूप, उत्पादक क्रियाकलाप के तदनुरूप बने, जिसके दौरान ख़ुद मानवजाति के अस्तित्व की भौतिक दशाओं का निर्माण व विकास हुआ। इसीकी वज़ह से उत्पादन क्रियाकलाप के प्रतिमान अंततः मानव क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों के संदर्भ में निर्धारक ( determinant ) होते हैं। आधुनिक समाज में इस बात का भी स्पष्टतः पता लगाया जा सकता है कि जनसंख्या के विकास तथा उसकी वृद्धि में उत्पादन पद्धति और इसके द्वारा निर्धारित उत्पादन संबंधों की भूमिका निर्णायक है।

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, यह विश्वास किया जाता है कि खेती के उपकरणों तथा कृषि विज्ञान की वर्तमान स्थिति में खेती की मौजूदा ज़मीनों पर दस अरब से भी अधिक लोगों को भरपेट खिलाने के लिए पर्याप्त खाद्य पैदा किया जा सकता है। यह तथ्य कि विश्व की आबादी इसकी आधी के बराबर है और कई पूंजीवादी तथा विकासमान देशों में सैकड़ों लाखों भुखमरी से पीड़ित हैं या भुखमरी के कगार पर हैं, इस बात का परिणाम है कि पूंजीवादी समाज में अत्यंत विकसित उत्पादक शक्तियों को पूरी तरह से काम में नहीं लगाया जा रहा है। इसकी वजह निजी स्वामित्व ( private property ) की प्रमुखता तथा उसके तदनुरूप ही विकसित सामाजिक प्रणाली में निहित है।

यही नहीं, ‘अतिरिक्त’ ( surplus ) आबादी, जनसंख्या की अत्यंत द्रुत वृद्धि ( rapid growth ) का परिणाम नहीं, बल्कि समाज के एक विशेष रूप का फल है। मालूम है कि सभी प्रमुख पूंजीवादी देशों में बेरोजगारों की एक भारी फ़ौज हमेशा विद्यमान रहती है। यह साबित किया जा चुका है कि बेरोजगारी मनुष्य की संतानोपत्ति के जैविक ( biological ) नियमों के कारण नहीं, बल्कि मुनाफ़ा ( profit ) आधारित पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के विशेष लक्षणों के कारण है। समाज के समाजवादी पुनर्निर्माण के जरिए आबादी वृद्धि को सामाजिक न्याय तथा मानववाद के जनवादी उसूलों के आधार पर संपूर्ण समाज की खुशहाली के लिए संनियमित किया जा सकता है, उसे प्रोत्साहित तथा नियंत्रित भी किया जा सकता है।

साथ ही साथ हमें इस द्वंद्व ( dialectics ) को भी समझ लेना चाहिए कि अत्यधिक आबादी की वृद्धि उत्पादन को धीमा कर सकती है और बड़ी सामाजिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है। और दूसरी तरफ़, आबादी में बहुत कम बढ़ती और काम करने वाले हाथों की तंगी, उत्पादक शक्तियों के विकास पर नकारात्मक असर डाल सकती है। इसलिए आज की दशाओं में इस प्रक्रिया के वैज्ञानिक प्रबंध की वस्तुगत ( objective ) आवश्यकता पैदा हो रही है। अभी तक जनसंख्या वृद्धि, सामाजिक उत्पादन और सामाजिक विकास के आम नियमों के आधार पर ही सही पर अचेतन रूप से होती रही है। अब आबादी की वृद्धि के सचेत नियंत्रण की दशाएं और वस्तुगत आवश्यकता पैदा होने लगी है।

यह जन्मदर का जबरिया, अनिवार्य माल्थसवादी परिसीमन ( limitation ) का मामला नहीं, बल्कि कई सुविचारित उपायों ( measures ) का मामला है, जिनके ज़रिये देश के कुछ इलाकों में आबादी बढ़ेगी तथा कुछ अन्य अन्य में रफ़्तार घट जायेगी। इस प्रकार का नियंत्रण मुख्यतः मानवजाति की बहुत बड़ी संख्या की संस्कृति तथा चेतना ( consciousness ) के ऊंचे स्तर पर आधारित होगा। ऐसा केवल उन्हीं सामाजिक-राजनैतिक दशाओं में ही संभव है, जहां सारे श्रम संसाधनों ( labour resources ) का निजी हितों के लिए नहीं, वरन् सारे समाज के हित में नियोजित ( planned ) उपयोग करने की संभावनाएं मूर्त रूप लेंगी।

फलतः इस प्रश्न, कि मौजूदा जनसंख्या विस्फोट प्रकृति और समाज को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है और इसके ख़तरनाक परिणामों से कैसे बचा जा सकता है, का उत्तर जैविक नहीं, बल्कि समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के सामाजिक नियमों में खोजा जाना चाहिए।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 4 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में आबादी की भूमिका को समझने की शुरुआत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १
( the role of population in the development of society - 1 )

पश्चिमी अध्येता सामाजिक विकास में सामाजिक नियमों की नहीं, जैविक ( biological ) नियमों की निर्णायकता को सिद्ध करने की कोशिश में आबादी की वृद्धि ( growth ) द्वारा अदा की जानेवाली विशेष भूमिका का नियमतः हवाला देते हैं। वे दावा करते हैं कि समाज की अवस्था, आबादी की वृद्धि पर निर्भर होती है और अपनी बारी में वृद्धि, पुनरुत्पादन ( reproduction ) के जैविक नियमों से निर्धारित होती है, अतः समाज की जीवन क्रिया तथा विकास, जैविक नियमों से संचालित होते हैं। क्या यह सच है? यह मुद्दा ठोस ऐतिहासिक विश्लेषण ( analysis ) की अपेक्षा करता है।

समाज के मामलों में आबादी तथा आबादी की वृद्धि की भूमिका को समझने के लिए हम कुछ तथ्यों पर विचार करेंगे। अब विश्व की आबादी छः अरब से अधिक हो गयी है और उसका तेजी से बढ़ना जारी है। यह वृद्धि कितनी तेज है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए याद करें कि दस हजार साल पहले मानवजाति की संख्या लगभग ५० लाख थी, दो हजार वर्ष पूर्व करीब २० करोड़ थी, १६५० में कम से कम ५० करोड़, १९५० में लगभग ढाई अरब और १९८७ में पांच अरब। आबादी के हाल के वर्षों में देखी इस तीव्र वृद्धि दर को अक्सर ‘जनसंख्या विस्फोट’ कहा जाता है। पश्चिमी अध्येताओं की राय में, और आजकल उनकी यह राय सामान्य रूप से प्रचलन में आती जा रही है, इतने लोगों को आवश्यक वस्तुएं, आवास, वस्त्र, पीने का पानी और वायु मुहैया करने के लिए सारे के सारे प्राकृतिक संसाधन भी काफ़ी नहीं होंगे। अंततः मनुष्यजाति प्रकृति को नष्ट कर देगी और उसके फलस्वरूप स्वयं भी मर जायेगी। ये दलीले ( arguments ) नयी नहीं हैं।

अंग्रेजी अर्थशास्त्री टामस माल्थस ( १७६६-१८३४ ) ने १८वीं सदी के अंत में यह सिद्धांत पेश किया था कि दुनिया की आबादी बहुत तेजी से, ज्यामितिक श्रेढ़ी ( geometric progression ) में बढ़ रही है, जबकि खाद्य तथा अन्य वस्तुओं का उत्पादन अधिक मंद गति से, अंकगणितीय ( arithmetic ) श्रेढ़ी में बढ़ रहा है। उनके अनुयायियों का ख़्याल था कि युद्ध, महामारियां तथा आबादी का विनाश करनेवाली अन्य विपत्तियां आबादी की वृद्धि के नियमन ( regulation ) के आवश्यक साधन हैं। आज के नवमाल्थसवादी भी आबादी के नियंत्रण के लिए कमोबेश वैसे ही, परंतु किंचित छद्मरूप में बाध्यकारी उपाय सुझाते हैं और इस बात पर जोर देना जारी रखते हैं कि विश्व में हमेशा जनाधिक्य रहा है, ऐसे ‘अनावश्यक’ लोगों की अतिरिक्त ( surplus ) संख्या रही है, जो कि उनके कथनानुसार, सामाजिक विकास में बाधा डालते हैं और इसके बिना ही पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों ( resources ) को हड़प जाते हैं। क्या यह बात सच है?

पुरातत्वीय ( archaeological ) आधार सामग्री से पता चलता है कि मनुष्य के पुरखों और समाज की शुरुआती अवधि में, मानवों की संख्या में वृद्धि बहुत मंद थी। कठोर प्राकृतिक दशाओं तथा उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर की वजह से वह बढ़ नहीं पाती थी। जब-जब अधिक विकसित उत्पादन की तरफ़ पहुंचा जाता था, तब-तब जनसंख्या वृद्धि त्वरित ( accelerate ) हो जाती थी। मसलन, पत्थर के औज़ारों से धातु के औज़ारों में संक्रमण ( transition ) और आखेट ( hunting ) तथा खाना बटोरने के युग से पशुपालन व खेती में संक्रमण के साथ ही पृथ्वी पर मनुष्यों की आबादी में छंलागनुमा वृद्धि हुई। 

हालांकि भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( socio-economic formation ) में उत्पादन शक्तियों के विकास स्तर और जनसंख्या वृद्धि की दर के बीच संबंध की हमेशा के लिए सटीकतः ( exactly ) स्थापना नहीं हुई है, फिर भी इतिहास की आधार सामग्री की मदद से विश्वसनीय ढंग से यह दर्शाना संभव हो जाता है की आबादी की वृद्धि अंततः उत्पादन के विकास पर निर्भर होती है। सामंतवादी उत्पादन पद्धति के लिए, जिसमें कि विकास सापेक्षतः मंद था, आबादी की वृद्धि भी नियमतः धीरे-धीरे होती थी। इसके विपरीत, मशीनी उत्पादन पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) के द्रुत ( rapid ) विकास ने आबादी की वृद्धि को त्वरित कर दिया।

इस सिलसिले में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आबादी की वृद्धि में निर्णायक कारक ( determinant factor ) होने के बावजूद उत्पादन पद्धति उसका एकमात्र कारण नहीं है। आबादी की वृद्धि और संरचना ( structure ) केवल उत्पादक शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों से ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि कई राष्ट्रीय परंपराओं, जनता की संस्कृति, विविध ऐतिहासिक घटनाओं, युद्धों आदि से भी होती है। इसके साथ-साथ जनसंख्या की वृद्धि दरें तथा इसकी संरचना, भौतिक उत्पादन की सारी प्रणाली पर एक उलट, प्रतिप्रभाव भी डालती है। कुछ मामलों में ये उत्पादन के विकास को बढ़ावा देती हैं, तो कुछ अन्य मामलों में उसके लिए बाधक भी हो जाती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 28 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - ३
( races and nations - 3 )

आधुनिक विज्ञान ने साबित कर दिया है कि सारी नस्लें मनुष्यजाति के समान पुरखों ( ancestors ) से उत्पन्न हुई हैं। मानवजाति की रचना के दौरान, निर्वाह के प्राकृतिक साधनों ने, बाह्य प्राकृतिक दशाओं की प्रणाली में, निर्णायक भूमिका अदा की। प्राचीन, आदिम क़बीलों ( tribes ) के विभाजन के फलस्वरूप तथा अलग-अलग जैविक उत्परिवर्तनों ( biological mutations ), यानी आनुवंशिकता ( heredity ) में सांयोगिक परिवर्तनों, के परिणाम के रूप में मनुष्य की कुछ द्वितीयक जैविक विशेषताएं ( चमड़ी का रंग, नैन-नक्श आदि ) पैदा हो गयीं और बाद में सुस्थापित होकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने लगीं।

कुछ ऐतिहासिक दशाओं में उन्होंने उन ठोस प्राकृतिक निवास स्थलों ( natural habitats ) के प्रति मनुष्य के बेहतर अनुकूलन को आगे बढ़ाया जिनमें एक गोत्र-क़बीलाई समुदाय बहुत लंबे समय तक रहता रहा था। सामाजिक विकास के त्वरण ( acceleration ) के साथ-साथ जब प्राकृतिक संपदा ( wealth ) एवं आंतरिक प्राकॄतिक संसाधनों ने अधिकाधिक बड़ी भूमिका अदा करनी शुरू कर दी, तब नस्लीय, जैविक विशेषताओं का अनुकूलनात्मक महत्व अंततः समाप्त हो गया। हमारे युग में सारी नस्लों के सदस्य सारे महाद्वीपों में तथा किन्हीं भी प्राकृतिक तथा सामाजिक दशाओं में रहते हैं और सफलतापूर्वक काम करते हैं।

यह भी साबित कर दिया गया है कि विभिन्न नस्लों के सदस्यों की समान मानसिक क्षमताएं होती हैं तथा समान मनोवैज्ञानिक लक्षण, आदि होते हैं। विभिन्न नस्लों और राष्ट्रों के सदस्यों के बीच मिश्रित विवाहों से नितांत जीवंत संतानें पैदा होती हैं। मानवजाति के दसियों लाख वर्षों के क्रमविकास ( evolution ) के दौरान, जातियों तथा विभिन्न नस्लों के व्यक्तियों ने सैकड़ों बार अपने निवास स्थान बदले और विविध रक्त संबंध तथा पारिवारिक व विवाह संबंध क़ायम किये। इसलिए किसी प्रकार की ‘शुद्ध’ नस्ल की बातें करना उचित नहीं है। ‘शुद्ध’ नस्लें, नस्लवादियों, फ़ासिस्टों तथा राष्ट्रवादी प्रचार ( propaganda ) की वैचारिक मिथक ( ideological myth ) हैं।

आधुनिक राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन तथा एशिया, अफ़्रीका और दक्षिणी अमरीका और कैरीबियन क्षेत्र में अनेकों नये विकासमान देशों का उद्‍भव यह दिखलाता है कि नीग्रो तथा मंगोल नस्लों के जनगण तथा राष्ट्र, वैज्ञानिक-तकनीकी विकास के रास्ते पर सफलतापूर्वक चल सकते हैं और अपने विज्ञान, संस्कृति और अर्थव्यवस्थाओं का ठीक उतनी ही अच्छी तरह से विकास कर सकते हैं जैसे कि यूरोपी नस्ल। वे श्वेत उपनिवेशी अधिकारियों के बिना प्रबंध करने तथा अपनी नियति का स्वयं निर्धारण करने में समर्थ हैं।

हम यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि सारी नस्लों के सदस्यों ने सारे इतिहास में एक निश्चित भूमिका अदा की है। असाधारण वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, लेखकों और दार्शनिकों के बीच प्रत्येक नस्ल के सदस्यों को देखा जा सकता है। इन तथ्यों से दो अविवादास्पद निष्कर्ष निकलते हैं : (१) सारी नस्लें बराबर हैं और समाज तथा उसकी संस्कृति के विकास में अपना योगदान करने में समर्थ है और नस्लीय श्रेष्ठता का मिथक निराधार है ; (२) नस्लों की जैविक विशेषताएं, विविध राष्ट्रों तथा जनगण की ऐतिहासिक नियति के लिए निर्धारक नहीं है, किंतु इतिहास के दौरान स्वयं उभरी तथा परिवर्तित हुई हैं और बहुत हद तक सामाजिक कारकों से संचालित है। इससे यह स्पष्ट नतीजा निकलता है कि प्रकृति के प्रति लोगों के रुख़ तथा अंतर्क्रिया नस्ल से नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक दशाओं तथा कारणों से निर्धारित होती है

जहां तक नस्लों और राष्ट्रों ( जातियों ) के रिश्ते का संबंध है, राष्ट्र नितांत निश्चित ऐतिहासिक दशाओं में बनते हैं और कुलमिलाकर जैविक नहीं, बल्कि सामाजिक विशेषताओं से निर्धारित होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 21 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २
( races and nations - 2 )

१९वीं सदी के उत्तरार्ध में और २०वीं सदी के प्रारंभ में, जब विश्व की उपनिवेशी प्रणाली ( colonial system ) तथा दुनिया में पुनर्विभाजन ( redivide ) के लिए साम्राज्यवादियों ( imperialists ) का संघर्ष ज़ोर पर था, तब विविध नस्लवादी ( racist ) तथा राष्ट्रवादी ( nationalistic ) सिद्धांतों और दृष्टिकोणों का उत्पन्न होना शुरू हुआ और उनका व्यापक रूप से प्रचार होने लगा।

नस्लवादियों के दृष्टिकोण से लोगों की मुख्य विशेषता उनकी जैविक प्रकृति से निर्धारित होती है। नस्लों के जैविक अनुगुण शाश्वत ( eternal ) और अपरिवर्तनीय हैं, जो लोगों की मानसिक क्षमता, संस्कृति की रचना, आविष्कार तथा शासन करने, अन्य जातियों को अपने अधीन लाने की क्षमता, आदि का निर्धारण करते हैं। नस्लवादी यह सोचते हैं कि कुछ नस्लें ऊंची और कुछ नीची होती हैं और कि मनुष्यजाति के इतिहास तथा उसकी संस्कृति में हर मूल्यवान चीज़ की रचना उच्चतर नस्लों ने की है, जबकि नीची नस्लें उनको आत्मसात करने में भी अक्षम हैं और इसीलिए नीची नस्लों को ऊंची नस्लों द्वारा शासित होना चाहिए।

जर्मन फ़ासिज़्म ( fascism ) के विचारकों का ख़्याल था कि आर्य उच्चतम नस्ल हैं और आर्य भावना जर्मन राष्ट्र में सर्वाधिक पूर्णता से मूर्त है। अमरीकी और दक्षिण अफ़्रीकी नस्लवादी आज भी अश्वेतों ( नीग्रो ) पर श्वेत नस्ल ( यूरोपीय ) की श्रेष्ठता के गुण गाते हैं। नस्लवाद के दृष्टिकोण से नीची जातियां परजीवी ( parasitic ) हैं और प्रकृति तथा सभ्यता को विघटित करती हैं और इसीलिए उनके क्रियाकलाप को ऊंची नस्लों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद, नस्लवाद के साथ घनिष्ठता से संबंधित है। राष्ट्रवादी, एक राष्ट्र की दूसरे पर श्रेष्ठता की शिक्षा देते हैं। सारतः, वे राष्ट्रों को विभाजित करके तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में खड़ा करके प्रभुतासंपन्न वर्गों ( dominant classes ) द्वारा ग़ुलाम बनाये गये जनगण व राष्ट्रों के शोषण को प्रोत्साहित करते हैं।

फलतः नस्लवाद और राष्ट्रवाद प्रतिक्रियावादी ( reactionary ) भूमिका अदा करते हैं। मनुष्यजाति को ग़रीबी, अधिकारों के अभाव और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए वर्ग संघर्ष के क्रांतिकारी सिद्धांत के मुक़ाबले में, वे कुछ लोगों की अन्य पर श्रेष्ठता के जैविक आधारों के मत को, कुछ राष्ट्रों द्वारा अन्य को ग़ुलाम बनाने के अधिकार को, राष्ट्रीय अंतर्विरोधों और राष्ट्रीय झगड़ों के शाश्वत स्वभाव तथा उन पर क़ाबू पाने की असंभाव्यता के मत को ला खड़ा करते हैं। इन दृष्टिकोणों का मक़सद शोषित वर्ग की शक्तियों में फूट डालना, समान शत्रु के ख़िलाफ़ तथा समानता आधारित समाज की ख़ातिर उनके संघर्ष को कमज़ोर बनाना होता है।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

शनिवार, 14 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १
( races and nations - 1 )

जैविक और सामाजिक के संबंध की सटीक समझ हमें समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय ( राष्ट्रीय ) विशेषताओं का निर्धारण करने में मदद देती है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव से हर कोई यह जानता है कि लोग अपने विविध गुणों, चरित्र की विशेषताओं, शिक्षा के स्तर, सार्वजनिक हितों के प्रति रुख़, चमड़ी के रंग, ऊंचाई, चहरे की आकृति, भाषा, आदि में एक दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ गुण मनोवैज्ञानिक हैं, कुछ सामाजिक और कुछः अन्य जैविक हैं। जैविक में निम्नांकित शामिल हैं : रंग, क़द, शरीर की कुछ विशेषताएं, आदि। मनुष्य की उत्पत्ति ( origin ), क्रमविकास ( evolution ) तथा मनुष्य की जैविक संविरचना ( biological constitution ) का अध्ययन करनेवाला नृतत्वविज्ञान ( anthropology ) इन गुणों के अनुसार कई नस्लों ( races ) को विभेदित ( distinguish ) करता है।

नस्लें ऐसे विभिन्न मानव समुदायों ( क़बीलों, जातियों, राष्ट्रों ) के समूहन हैं जो कई समान जैविक गुणों की उपस्थिति द्वारा आपस में एक हैं। सामान्यतः तीन नस्लों को विभेदित किया जाता है : यूरोपीय ( सफ़ेद चमड़ीवाले लोग ) ; मंगोलियाई ( पीताभ चर्म तथा तिरछी आंखों वाले लोग ) ; और नीग्रों ( काली चमड़ी वाले लोग )। बेशक, ये सारी विशेषताएं सोपाधिक, यादृच्छिक तथा सापेक्ष हैं और साथ ही वे हमेशा सुस्पष्ट नहीं होती हैं। कभी-कभी मध्यवर्ती, ग़ैरबुनियादी, छोटी नस्लों की बात भी की जाती है। लोगों की नस्लीय विशेषताएं जैविक स्वभाव की होती हैं

नस्लीय विशेषताओं के विपरीत जातीय व राष्ट्रीय विशेषताएं, सामाजिक विशिष्टताओं में व्यक्त होती हैं और इतिहासानुसार विरचित जन-समुदायों ( communities of people ) के लक्षणों को चित्रित करती हैं। इन समुदायों में क़बीले ( tribes ), जातियां ( nationalities ) और राष्ट्र ( nations ) शामिल हैं। सबसे जटिल समुदाय राष्ट्र है, जो एक निश्चित युग में, पूंजीवाद में संक्रमण के युग में लंबे ऐतिहासिक विकास के फलस्वरूप बनते हैं।

एक क़बीले या जाति के सदस्य कुछ पारिवारिक रिश्तों, रक्त संबंधों और एक निश्चित समान मूल ( common origin ) के द्वारा एकीकृत ( united ) होते हैं। परंतु राष्ट्र, विभिन्न क़बीलों तथा जातियों ( कभी-कभी नज़दीकी मूल के ) के एकीकरण, ‘मेल’ ( merging ), ‘संलयन’ ( fusing ) से बनते हैं। एक राष्ट्र के लोग एक भाषा बोलते हैं। वे समान आर्थिक क्रियाकलाप, एक ही भूक्षेत्र पर अधिकार, संस्कॄति और सामाजिक मानसिकता की समरूपता तथा राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताओं से परस्पर जुड़े होते हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब विशेषताएं सामाजिक विकास के क्रम में उत्पन्न तथा रूपायित ( moulded ) होती हैं और जैविक गुण नहीं होती हैं। राष्ट्र का बनना सामाजिक, ऐतिहासिक तथा आर्थिक विकास की एक नितांत निश्चित अवस्था के साथ जुड़ा होता है।

अब हम नस्लों और राष्ट्रों के बीच के रिश्ते पर, तथा इस बात पर विचार करेंगे कि इसका प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया से और मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक के संबंध से क्या नाता है।



इस बार इतना ही।
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रविवार, 8 मई 2016

मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - २
( the biological and social in Man -2 )

सामाजिक और जैविक के संबंध की वास्तविक वैज्ञानिक समझ, प्रकृति और समाज की भौतिकवादी संकल्पना ही दे सकती है। मनुष्य एक जीवित प्राणी है, किंतु ऐतिहासिक विकास के दौरान उसकी जैविक प्रकृति में, श्रम तथा सामाजिक जीवन के उन्नत रूपों के ज़रिये आमूल परिवर्तन हो गया। हालांकि रुधिर परिसंचरण, श्वसन, पाचन, आदि जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं सामान्य जैविक नियमों या शरीरक्रिया के नियमों के अनुसार चलती हैं, फिर भी कुछ हद तक वे भी सामाजिक जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर होती हैं।

मनुष्य के व्यवहार और क्रियाकलाप के रूप जितने उच्चतर तथा जटिल होते हैं, सामाजिक नियमों की भूमिका उतनी ही बड़ी होती जाती है। लोगों की अंतर्क्रिया, उनके चिंतन का विकास तथा उनका सामाजिक जीवन अंततोगत्वा उनके भौतिक उत्पादन तथा सामाजिक क्रियाकलाप द्वारा निर्धारित होते हैं। सामाजिक वर्गों तथा समूहों में विभाजन, युद्ध व शांतिपूर्ण सहयोग, पारिवारिक लालन-पालन और संस्कृति का विकास, जैविक नहीं, सामाजिक नियमों के अनुसार होता है। मनुष्य के व्यवहार में सामाजिक क्रियातंत्र के नियम, जैविक क्रियातंत्र के नियमों पर हावी होते हैं, हालांकि वे उनका उन्मूलन ( abolish ) नहीं करते।

इन क्रियातंत्रों ( mechanism ) का विनाशक नहीं, बल्कि सृजनात्मक व रचनात्मक होने के लिए सबसे पहले स्वयं समाज का आमूल रूपांतरण ( radical transformation ) आवश्यक है, न कि मनुष्य की जैविक प्रकृति का पुनर्निर्माण होना

मनुष्य के चरित्र, क्षमताओं तथा व्यवहार के रूपों और उसके रुझानों एवं दिलचस्पियों का बनना उस सामाजिक माध्यम से निर्धारित होता है, जिसमें वह रहता है। रुडयार्ड किपलिंग की एक कहानी का ‘मावग्ली’ में एक ऐसे लड़के की कहानी बतायी गयी है जो भेड़ियों के बीच पला और कालांतर में सामान्य जीवन की ओर लौट आया। अपनी कहानी ‘टार्ज़न आफ़ एप्स’ में एडगर बेरौज़ ने एक ऐसे आदमी की कथा कही है जो वानरों के बीच पला और बाद में पूंजीवादी व्यापार की दुनिया में बहुत सफल सिद्ध हुआ। वास्तव में, जैसा कि पूर्णतः साबित कर दिया गया है, ऐसी बातें नितांत असंभव हैं। वास्तविक मामलों में जो बच्चे जानवरों के बीच जा पड़े और किसी तरह से जीवित बचे रह गये, वे बच्चे कालांतर में सामान्य मानव जीवन बिताने में कभी भी समर्थ नहीं हो पाये।

मनुष्य एक वास्तविक मानवीय प्राणी के रूप में केवल सामाजिक पर्यावरण में ही पल और बढ़ सकता है। केवल इसी के ज़रिये वह भाषा, चेतना, संस्कृति, सामाजिक व्यवहार की आदतों, काम करने तथा विश्व को बदलने में पारंगत हो सकता है। बेशक, किसी भी अन्य जीवित प्राणी की तरह मनुष्य में भी कुछ जैविक सहजवृत्तियां ( instincts ), अंतर्जात ( inborn ) गुण तथा वंशानुगत ( inherited ) विशेषताएं अंतर्निहित होती हैं, किंतु वे मात्र जैविक क्रमविकास का परिणाम नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के सामाजिक विकास का फल भी हैं, यही कारण है कि भौतिकवादी दर्शन मनुष्य की जीवन क्रिया के जैविक आधार से इनकार न करते हुए आधुनिक समाज की सारी समस्याओं के समाधान की कुंजी, जैविक के बजाय सामाजिक में खोजता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १
( the biological and social in Man -1 )

प्राकृतिक निवास स्थल ( natural habitat ) में जीवन के विविध रूप शामिल हैं। मनुष्य स्वयं एक अत्यंत विकसित तर्कबुद्धिसंपन्न जानवर है जो श्रम की बदौलत प्रकृति से अलग हो गया। एक ओर, वह एक जीवित प्राणी ( living creature ) है और सजीव प्रकृति या जैवमंडल के विकास के सामान्य नियमों से संचालित होता है। दूसरी ओर, वह एक सामाजिक प्राणी ( social creature ) है जो निश्चित प्रकार के औज़ार और अपनी जरूरत की चीज़ें बनाता है और उनकी सहायता से खाद्य पदार्थ हासिल करता है तथा विशेष कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण करता है। जैवमंडल जैविक विकास के नियमों द्वारा संचालित है। मनुष्य सामाजिक विकास के नियमों के अनुसार रहता है। इस तरह, स्वयं मनुष्य में दो स्रोत एकीकृत हैं, अर्थात प्राकृतिक ( जैविक ) और सामाजिक

जब बुर्जुआ दार्शनिक समाज के विकास तथा प्रकृति के साथ उसकी अंतर्क्रिया का अध्ययन करते हैं, तो वे अक्सर यह दावा करते हैं कि मनुष्य मुख्य रूप से जीवन क्रिया के जैविक नियमों से संचालित है। बेशक, वे यह समझते हैं कि लोग ऐसे सचेत, चिंतनशील प्राणी हैं, जो अपने लिए बुद्धिमत्तापूर्ण लक्ष्य निश्चित करते हैं। परंतु इसके बावजूद, उनकी राय में, मनुष्य मुख्यतः जानवरों की भांति कार्य करते हैं। आस्ट्रियाई मनोचिकित्सक फ़्रायड ( १८५६-१९३९ ) का दावा है कि नैतिकता और संस्कृति, मनुष्य की पाशविक सहजवृत्तियों ( animal instincts ) के ख़िलाफ़ प्रतिरक्षा के रूप में समाज द्वारा सर्जित निरोधक ( restraining ), नियंत्रक क्रियातंत्र ( controlling mechanism ) हैं। अधिकांश मामलों में ये सहजवृत्तियां, जिन्हें फ़्रायड ने ‘अवचेतन’ ( subconscious ) की संज्ञा दी, व्यक्ति और सारे समाज के व्यवहार में निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। फ़्रायड के अनुयायियों की दृष्टि से, लोगों का व्यवहार अंततः मनुष्य के पुरखों से विरासत में प्राप्त सहजवृत्तियों से निर्धारित होता है और इनमें लैंगिक सहजवृत्ति ( sex instincts ) निर्धारक होती है। लोगों के व्यवहार में आक्रामकता, प्रतिद्वंद्विता या सहयोग जैसे रूप पशुओं के क्रियाकलाप का सिलसिला मात्र हैं।

पिछले दशकों में अमरीकी आनुवंशिकीविद ( geneticist ) विल्सन का सामाजिक जैविकी का एक सिद्धांत बहुत प्रचलित हुआ है। उनका दावा है कि संस्कृति स्वयं आनुवंशिकी के जैविक नियमों ( biological laws of inheritance ) से संचालित होती है और कि सांस्कृतिक आनुवंशिकी ( cultural genetics ) की रचना करना जरूरी है जो जैविकी ( biology ) के दृष्टिकोण से मानव संस्कृति के विकास का अध्ययन करेगी। किंतु वे और उनके समर्थक, वैज्ञानिक तथ्यों के कारण यह स्वीकार करने को बाध्य हो गये कि वस्तुतः मानव व्यवहार के केवल १५ प्रतिशत कृत्यों में शुद्ध जैविक स्वभाव अंतर्निहित होता है। परंतु प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रतिशत सही है या नहीं अथवा सत्यापन की मांग करता है, बल्कि यह है कि ऐसे दृष्टिकोणों का अर्थ क्या है और वे किन लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं।

मनोविश्लेषण और सांस्कृतिक आनुवंशिकी के प्रतिपादक, आक्रामक युद्धों और विभिन्न सामाजिक झगड़ों की जिम्मेदारी मनुष्य की पाशविक सहजवृत्ति तथा आनुवंशिकता पर डाल देते हैं। इसी तरह से सामाजिक बुराइयों के विविध रूपों, युद्धों की अनिवार्यता, आदि के लिए ‘वैज्ञानिक’ प्रमाण जुटाने की कोशिश की जाती है। १९वीं सदी में डार्विन के सिद्धांत के प्रकाशित होने के बाद पूंजीवादी समाज में सामाजिक डार्विनवाद का बहुत प्रचलन हुआ ; इसने डार्विन द्वारा अन्वेषित जीवन के लिए जैविक संघर्ष के नियमों को समाज पर लागू करने का प्रयत्न किया। उस दृष्टिकोण से डार्विन द्वारा अन्वेषित अंतरा-प्रजाति संघर्ष ( जिसने जैविक प्रजातियों के परिष्करण तथा विकास को बढ़ावा दिया ), वर्ग संघर्ष ( class struggle ) में भी व्यक्त होता है। इसके अनुसार जब तक मानवजाति है, तब तक वर्ग संघर्ष भी रहेगा। इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि ऐसे विचारों के प्रतिपादक कथित जैविक उत्पत्ति के हवाले से पूंजीवाद तथा वर्ग संघर्ष को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।



इस बार इतना ही।
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शनिवार, 23 अप्रैल 2016

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २
( mankind and the natural environment - 2 )

मनुष्य के प्राकृतिक निवास स्थल ( habitat ) में, घटनाओं के दो समूहों को विभेदित ( distinguish ) किया जा सकता है : निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत ( जंगली पौधे, फल, जानवर, आदि ) और प्राकृतिक संपदा ( कोयला, तेल, जल-शक्ति, पवन, आदि जो श्रम की वस्तुएं हैं )। मानव समाज के क्रमविकास की प्रारंभिक अवस्था में, जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) विकास के निम्न स्तर पर थीं, लोग बहुत हद तक निर्वाह के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थे। अभी जब वे फ़सल उगाना, पालतू जानवरों का प्रजनन व पालन करना, गर्म आवास बनाना, आदि नहीं जानते थे, तब वे केवल गर्म जलवायु, प्रचुर वनस्पति, बड़े परिमाण में शिकार के जानवरोंवाले भूप्रदेशों में ही रह सकते थे। जब औज़ारों का विकास तथा परिष्करण कर लिया गया तब प्राकृतिक स्रोतों पर लोगों की निर्भरता कम हो गयी। परंतु प्राकृतिक संपदा, यानी खनिजों, ऊर्जा साधनों, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी

आधुनिक उद्योग और इंजीनियरी ने पृथ्वी उन क्षेत्रों को भी सुगम बना दिया, जो पहले अगम्य ( inaccessible ) थे। रासायनिक उर्वरकों ( chemical fertilizers ) से मनुष्य अनुर्वर ( infertile ) ज़मीनों को उर्वर बना सकता है। नयी निर्माण सामग्री तथा तापन प्रणाली के उपयोग से वह ध्रुवीय क्षेत्रों पर भी नियंत्रण क़ायम कर सकता है। ऊर्जा के विभिन्न प्रकारों के उपयोग से वह उस सामान्य ईंधन ( लकड़ी ) पर निर्भर नहीं रहता, जो पहले गर्मी का एकमात्र स्रोत था। परंतु इसके साथ ही तेल, लौह खनिज, यूरेनियम, खनिज, आदि जैसी प्राथमिक सामग्री पर उद्योग और कृषि की निर्भरता बढ़ रही है। इस प्रक्रिया के मूल में, उत्पादक शक्तियों का विकास निहित है और अपनी बारी में वह काफ़ी हद तक उत्पादन संबंधों ( सर्वोपरि स्वामित्व के प्रभावी रूप ) से निर्धारित होता है

ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) मनुष्य की जीवन क्रिया पर प्राकृतिक निवास स्थल के प्रभाव से इनकार नहीं करता, किंतु यह दर्शाता है कि यह प्रभाव भौतिक संपदा के उत्पादन की विधि के ज़रिये निष्पादित होता है। फलतः इस प्रभाव का स्वरूप और उसमें परिवर्तन स्वयं प्रकृति के बजाय सामाजिक कारकों पर और सर्वोपरि भौतिक उत्पादन पर निर्भर होता है, जो सारे सामाजिक जीवन का आधार है।

मसलन, एक भावी संभावना पर विचार करते हैं। समाज पर अंतरिक्ष का प्रभाव आधुनिक अंतरिक्ष यानों के विकास के द्वारा संभव हो रहा है, जिससे निकट भविष्य में हमारी पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर मंडल के ग्रहों के खनिजों और ऊर्जा संसाधनों को उपयोग में लाना संभव हो जायेगा। इस कारक का प्रभाव इंजीनियरी तथा उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होगा, जिसके अंतर्गत वह संक्रियाशील तथा विकसित होगा। सारे समाज के हित में अंतरिक्ष तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग, ऐसी सामाजिक प्रणाली के अस्तित्व की पूर्वापेक्षा करता है, जिसमें अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा को मनुष्यजाति की सेवा में लगाया जायेगा और पार्थिव प्रकृति के विकास तथा संरक्षण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ( militarization ) अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा के तर्क-सम्मत उपयोग में बाधा डाल सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने का संघर्ष विशेष ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता जायेगा।

अतः मानवजाति के विकास पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभाव के बारे में निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। (१) प्राकृतिक निवास स्थल मनुष्य की जीवन क्रिया का एक सबसे महत्वपूर्ण भौतिक पूर्वाधार है। (२) इसका प्रभाव न तो प्रमुख है और न निर्णायक। इसका स्वभाव समाज की उत्पादक शक्तियों के स्तर और उत्पादन संबंधों की क़िस्म पर निर्भर करता है। (३) निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत मुख्य रूप से इतिहास की प्रारंभिक अवस्था में समाज पर उस समय असर डालते हैं, जब उत्पादक शक्तियों का विकास सापेक्षतः निम्न स्तर पर होता है, जबकि उत्पादक शक्तियों की अभिवृद्धि के साथ प्राकृतिक संपदा का प्रभाव बढ़ जाता है।



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