शनिवार, 26 अगस्त 2017

मनुष्य व उसके क्रियाकलाप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां विषय-प्रवेश करते हुए भाववादी दृष्टिकोणों की कुछ मूल प्रस्थापनाओं और उनकी सीमाओं को प्रस्तुत किया था, इस बार हम इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य व उसके क्रियाकलाप 
( man and activity )
इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधार
( preconditions for the materialist conception of history )

ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रमुख उसूल ( principles ) क्या हैं? समाज व उसके इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का क्या आशय है?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें उस प्रस्थान-बिंदु या आधारिका को निर्धारित व परिभाषित करना होगा, जहां से हम अपने विचार-विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं। मानव क्रियाकलाप के विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

प्रकृति में सारे परिवर्तन वस्तुगत ( objective ) होते हैं। वे चिंतन ( thought ) या किसी भी प्रकार की चेतना ( consciousness ) से जुड़े हुए नहीं होते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य के क्रियाकलाप का मुख्य विशिष्ट लक्षण यह है कि उसकी प्रत्येक क्रिया में दो अंतर्संबंधित पक्ष ( interconnected aspects ) होते हैं : भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), जिसमें चिंतन भी शामिल है। नींद या रुग्ण, अचेतावस्था में किये गये कृत्यों को छोड़कर, एक स्वस्थ, सामान्य व्यक्ति की कोई भी क्रिया चेतना के किसी कृत्य के साथ जुड़ी होती है। कार्य कर सकने से पहले एक व्यक्ति अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करता है। यह लक्ष्य किसी ऐसी चीज़ के बारे में एक बिंब, संकल्पना या धारणा होता है, जिसका अस्तित्व नहीं है, किंतु जिसके लिए उसे प्रयास करना ही है। व्यक्ति का लक्ष्य कुछ वस्तुएं हासिल करना, एक मकान बनाना, आदि हो सकता है। एक श्रम समष्टि का लक्ष्य किसी उत्पादन प्रक्रिया को सुधारना, एक नया औद्योगिक समुच्चय बनाना, आदि हो सकता है। एक समाज का लक्ष्य जीवन की भौतिक दशाओं को बदलना और एक नयी समाज व्यवस्था बनाना हो सकता है।

संक्षेप में, संपूर्ण क्रियाकलाप और क्रियाकलाप का प्रत्येक घटक, दो पक्षों, भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों का एक एकत्व ( unity ) होता है। एक व्यक्ति की कोई भी भौतिक क्रिया ( चलना-फिरना, लकड़ी चीरना, खराद पर काम करना, आदि ) यह मांग करती है कि किये गये कार्यों का आशय समझा जाये, क्रियाकलाप के क़ायदों की जानकारी हो, कुछ कुशलता प्राप्त हो तथा कार्य करनेवाले को अपने लक्ष्य की जानकारी हो। इन बातों के बिना मनुष्य के क्रियाकलाप असंभव हैं। इसके विपरीत, भौतिक दैहिक क्रियाकलाप के बिना, भौतिक साधनों और औज़ारों के उपयोग के बिना, व्यक्ति का एक भी विचार, एक भी लक्ष्य कार्यान्वित नहीं हो सकता है। एक व्यक्ति के स्वयं विचार भी, किसी अन्य की समझ के लिए केवल भाषाई क्रियाकलाप से ही सुलभ हो सकते हैं, जो कि एक नितांत भौतिक क्रिया है। इस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप में भौतिक और प्रत्ययिक पक्ष घनिष्ठता से जुड़े और अविभाज्य हैं। यह एक द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) है, जिसमें प्रतिपक्षी ( opposites ) एक दूसरे को संपूरित ( supplement ) करते हैं और अंतर्गुथित ( intertwine ) होते हैं।

परंतु प्रश्न उठता है कि मानव क्रियाकलाप के भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों के संबंध में प्राथमिक और निर्धारक ( determinant ) कौन है?

जहां तक इस प्रश्न का संबंध है, अंग्रेज इतिहासकार तथा दार्शनिक कॉलिंगवुड ( १८८९-१९४३ ) ने दावा किया कि मनुष्य के क्रियाकलाप में मुख्य चीज़ उसका ‘आंतरिक पक्ष’, यानी विचार, भावनाएं, प्रेरणाएं, इरादे, लक्ष्य तथा सचेत निर्णय हैं। ‘बाह्य पक्ष’, यानी संवेद द्वारा प्रत्यक्षीकृत ( sense-perceived ) भौतिक कर्मों व क्रियाओं पर केवल उसी सीमा तक विचार करने की ज़रूरत है, जिस सीमा तक वे मानव चेतना की गहराई में पैठने में सहायता करती हैं। उनके दृष्टिकोण से, इतिहास को समझने का अर्थ लोगों के प्रयोजनों, इरादों तथा लक्ष्यों को समझना है। यह इतिहास की लाक्षणिक भाववादी संकल्पना ( idealist conception ) है। इसके आधार पर यह स्पष्ट करना असंभव है कि मिलती-जुलती ऐतिहासिक दशाओं में लोगों के बीच मिलते-जुलते लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे कैसे विकसित हो जाते हैं ; ये लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों के सदस्यों के बीच भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं ; और अंतिम, कुछ निश्चित दशाओं में लोगों के कुछ लक्ष्य तथा इरादे कार्यान्वित किये जा सकते हैं और कुछ अन्य कार्यान्वित नहीं होते और अनेपक्षित परिणामों पर और यहां तक कि उल्टे परिणामों पर क्यों पहुंचा देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपने को, अपनी जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से, केवल कल्पना में ही अलग कर सकता है।

समाज के जीवन के विशिष्ट स्वभाव तथा इतिहास को समझने के लिए, मानव क्रियाकलाप को भौतिक और प्रत्ययिक, दोनों पक्षों को एक एकत्व के रूप में, एक को दूसरे से पृथक किये बिना तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखे बग़ैर, उनके अंतर्संयोजन ( interconnections ) में देखना अनिवार्य है। इसके वास्ते इस प्रश्न का जवाब देना जरूरी है कि इस क्रियाकलाप का कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 20 अगस्त 2017

समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये - सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों - भौतिकवादी और भाववादी - में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 12 अगस्त 2017

एक नई शृंखला की शुरुआत

एक नई शृंखला की शुरुआत


हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां काफ़ी समय पहले दर्शन पर एक शृंखला प्रस्तुत कर चुके हैं। दर्शन की उस प्रारंभिक यात्रा में हमने दर्शन की संकल्पनाओं ( concepts ) तथा दर्शन और चेतना के संबंधों को समझने की कोशिश की थी। तत्पश्चात हमने यहां उसे ही आगे बढ़ाते हुए, द्वंद्ववाद ( dialectics ) पर, जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के अंतर्गत समझा जाता है, पर एक शृंखला यहां प्रस्तुत की थी। वह सामग्री यहां उपलब्ध है ही, साथ ही उस सामग्री के समेकित पीडीएफ़ डाउनलोड़ लिंक ‘दर्शन और चेतना’ तथा ‘द्वंद्ववाद-समग्र-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ भी साइड़बार में प्रदर्शित है। इच्छुक मानवश्रेष्ठ उससे पुनः गुजर सकते हैं।

अब हमारी योजना है कि दर्शन पर उस शृंखला को आगे बढ़ाया जाए और सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझने के प्रयासों के संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के ज्ञान और सिद्धांत से परिचित होने की कोशिशें शुरू की जाएं।

दर्शन का बुनियादी सवाल यह होता है कि परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या मनुष्य उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है। इस तरह इस सवाल का पहला पक्ष परिवेश के साथ उसके संबंधों से है और आम तौर पर इसे इस तरह निरूपित किया जाता है कि आसपास की वास्तविकता ( reality ) या भूतद्रव्य ( matter ) के साथ चेतना और चिंतन का संबंध क्या है?  पूर्व में हम यहां पर भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर ‘दर्शन और चेतना’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री के अंतर्गत चर्चा कर चुके हैं। किंतु मनुष्य समाज में रहता है और उसे सामाजिक विकास के नियमों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी होती है। उन्हें समझने के लिए दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन के संदर्भ में जांचना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि हमें सामाजिक अस्तित्व या सत्ता और सामाजिक चेतना के बीच संबंध का और इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि जनगण के क्रियाकलाप और समाज के इतिहास में, इनमें से प्राथमिक और निर्धारक ( primary and determining ) तत्व क्या है। इसका उत्तर हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद यानी इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना से प्राप्त होता है।

हम इस नई श्रृंखला में ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इससे संबंधित विभिन्न संकल्पनाओं/अवधारणाओं को समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सामान्य जीवन में हम इन दार्शनिक अवधारणाओं से अपरिचित होते हुए भी, जीवन से मिली सीख के अनुसार ही भौतिकवादी चिंतन और पद्धतियों का प्रयोग करते हैं, निर्णय और तदनुकूल व्यवहार भी करते हैं। परंतु यह भी सही है कि कई बार, कई जगह हम अपने वैचारिक अनुकूलनों ( conceptual conditioning ) के प्रभाव या सटीक विश्लेषण-संश्लेषण ( analysis-synthesis ) के अभाव के कारण कई परिघटनाओं ( phenomena ) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाते, सही समझ नहीं बना पाते और तदनुकूल ( accordingly ) ही हमारे निर्णय और व्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस श्रृंखला से गुजरकर हम निश्चित ही, अपनी चिंतन प्रक्रिया और व्यवहार को अधिक सटीक तथा अधिक बेहतर बनाने में अधिक सक्षम हो पाएंगे, अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार ( refinement ) कर पाएंगे।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत रहेगा ही।

शुक्रिया।

समय अविराम
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