शनिवार, 24 सितंबर 2011

भावना के रूप में आवेश

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में संकीर्ण अर्थ में भावनाओं पर विचार किया था, इस बार हम आवेश पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



आवेश
( Intense emotion )

आवेश मनुष्य की एक विशेष प्रकार की स्थायी भावनाएं हैं। लोगों का जिससे वास्ता पड़ता है या जो उनके जीवन में घटता है, उसके प्रति उनका रवैया ( attitude ) सामान्यतः एक स्थायी रूप ग्रहण कर लेता है और उनकी सक्रियता की एक स्थायी प्रेरक-शक्ति ( persuasive ) बन जाता है। यह शक्ति मनुष्य के उसकी रुचि की वस्तुओं से संबद्ध प्रत्यक्षों ( perception ), परिकल्पनों और विचारों की विशेषताओं और उसके द्वारा क्रमानुवर्ती संवेगों, भावों तथा मनोदशाओं को अनुभव करने के ढंग को निर्धारित करती है। वह कुछ क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक और दत्त मनुष्य की गहन भावनाओं से मेल न खानेवाली क्रियाओं के लिए प्रबल अवरोधक बनती है। इस तरह भावना मनुष्य के चिंतन तथा सक्रियता से एकाकार हो जाती है। आवेश को मनुष्य के विचारों और कार्यों की दिशा का निर्धारण करने वाली स्थिर, प्रबल और सर्वतोमुखी भावना कहा जा सकता है

आवेश मनुष्य को अपने सभी विचार अपनी भावनाओं की वस्तु पर संकेंद्रित ( focus ) करने, इन भावनाओं के मूल में निहित आवश्यकताओं की पूर्ति की विस्तार से कल्पना करने और उसके मार्ग में खड़ी वास्तविक अथवा संभावित बाधाओं व कठिनाइयों के बारे में सोचने को विवश करता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए लड़नेवाले देशभक्त के मामले में उसकी गहनतम आवश्यकताओं और स्वप्नों से जुड़ी हुई मातृभूमि से प्रेम की भावना एक ऐसी अदम्य शक्ति में परिवर्तित हो जाती है कि जो उसे विजय प्राप्ति के निमित्त जान की बाज़ी भी लगा देने को मजबूर कर देती है।

जो चीज़ें मुख्य आवेश से संबद्ध नहीं हैं, वे गौण होकर पृष्ठभूमि में चली जाती हैं, वे मनुष्य को उत्तेजित नहीं करती और कभी-कभी तो भुला ही दी जाती हैं। इसके विपरीत जो चीज़ें मनु्ष्य के आवेश से संबंध रखती हैं, वे उसकी कल्पना को आलोड़ित करती हैं, उसका ध्यान खींचती है, उसके मन पर छायी रहती है और स्मृति में अंकित हो जाती हैं। अतुष्ट आवेश सामान्यतः प्रबल संवेगों और भावावेशों ( क्रोध, क्षोभ, हताशा, नाराजगी, आदि ) को जन्म देता है।

कभी-कभी मातृभूमि-प्रेम अथवा सत्य की खोज और जनसेवा के एक साधन के नाते अविष्कारकर्म तथा विज्ञान से प्रेम जैसी उदात्त तथा उच्च भावना भी आवेश में परिणत हो सकती है। ऐसे मामलों में आवेश मनुष्य को शोधपूर्ण कार्यों के लिए उत्प्रेरित करेगा, अथक प्रयास करते रहने के लिए वर्षों तक उसका संबल बना रहेगा और वैज्ञानिक खोजों तथा सृजनात्मक उपलब्धियों के स्रोत में परिणत हो जाएगा। आवेश ऐसी नैतिकतः निंदनीय भावनाओं से भी पैदा हो सकता है, जिनकी जड़ें मनुष्य के विकास की परिस्थितियों या उसकी वैयक्तिक विशेषताओं में हैं। ऐसे आवेशों को हम निकृष्ट आवेश कहते हैं ( उदाहरणार्थ, नशे की लत ) और जो आदमी उसके वशीभूत होकर अपने को गिरने देता है, उसकी हम निंदा करते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 21 सितंबर 2011

संकीर्ण अर्थ में भावनाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताओं पर विचार किया था, इस बार हम संकीर्ण अर्थ में भावनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भावनाएं और व्यक्तित्व

मनुष्य की संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं और उसके व्यवहार और सक्रियता के संकल्पमूलक नियमन की अनुषंगी भावनाएं व्यक्तित्व की एक सबसे सजीव अभिव्यक्ति है। उनकी उत्पत्ति संज्ञान और सक्रियता की वस्तुओं के प्रति मनुष्य के स्थायी रवैयों ( permanent or stable attitudes ) से होती है। किसी मनुष्य का वर्णन करने का अर्थ सर्वप्रथम यह बताना है कि उसे क्या पसंद और क्या नापसंद है, वह किससे घृणा या ईर्ष्या करता है, किस बात पर वह गर्व या शर्म महसूस करता है, किस बात से उसे ख़ुशी मिलती है, वग़ैरह। मनुष्य की स्थायी भावनाओं के विषय, इन भावनाओं की प्रगाढ़ता, स्वरूप तथा संवेगों, भावों, आदि के रूप में अभिव्यक्ति की प्रायिकता ( probability ) उसके भावना-जगत और उसके व्यक्तित्व का परिचय देते हैं। इस कारण संवेगात्मक प्रक्रियाओं का गहराई में विश्लेषण अल्पकालिक अवस्थाओं पर नहीं, अपितु मनुष्य के व्यक्तित्व की विशेषतासूचक स्थायी भावनाओं पर केंद्रित होना चाहिए।

संकीर्ण अर्थ में भावनाएं
( Emotions in narrow sense )

संवेगों, भावों, मनोदशाओं और खिंचावों के विपरीत, जिनका स्थिति-सापेक्ष स्वरूप ( situation-relative format ) होता है और जो किसी निश्चित क्षण या परिस्थितियों में किसी वस्तु ( अथवा व्यक्ति ) के प्रति मनुष्य के रवैये को प्रतिबिंबिंत करते हैं, अपने संकीर्ण अर्थ में भावनाएं मनुष्य की स्थिर आवश्यकताओं की वस्तु के प्रति मनुष्य के रवैये को प्रतिबिंबिंत करती हैं, यानि उसके व्यक्तित्व के रुझान ( personality trends ) को दिखाती हैं। उनकी स्थिरता को घंटों या दिनों में नहीं, अपितु महीनों और वर्षों में व्यक्त किया जाता है। भावनाएं सदा यथार्थ ( reality ) से जुड़ी होती हैं। उन्हें तथ्य, घटनाएं, लोग, परिस्थितियां जन्म देते हैं, जिनके प्रति मनुष्य स्थिर रूप से सकारात्मक अथवा नकारात्मक रवैया रखता है। स्थिर अभिप्रेरक तभी मनुष्य को सदा के लिए सक्रिय बना सकते हैं, यानि उसे अविराम सक्रियता के लिए उत्तेजित कर सकते हैं, जब वे उसकी स्थायी भावनाओं का विषय बनते हैं।

स्वयं मनुष्य के लिए भावनाएं, उसकी आवश्यकताओं के अस्तित्व के स्वयं उसके लिए आत्मपरक ( subjective ) रूपों के तौर पर पैदा होती हैं। वास्तव में कोई भी प्रेक्षक ( अर्थात् जांचकर्ता मनोविज्ञानी ) मनुष्य के कार्यों के पीछे छिपे अभिप्रेरकों ( motives ) को प्रकट कर सकता है और कारणात्मक अरोपण की प्रणाली के ज़रिए उनकी व्याख्या कर सकता है। किंतु स्वयं मनुष्य अपने व्यवहार तथा सक्रियता के अभिप्रेरकों को भावनाओं के रूप में अनुभव करता है। इसका मतलब है कि अभिप्रेरक, कर्ता के सामने ऐसी भावनाओं की शक्ल में आते हैं, जो उसे बताते हैं कि कोई वस्तु उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए कैसे और किस हद तक जरूरी है। मनुष्य के व्यक्तित्व के रुझान को तय करनेवाले अभिप्रेरक जितने ही स्थिर होंगे, उसे अपनी सक्रियता या व्यवहार में सहायक या बाधक हर चीज़ उतनी ही अपने भावजगत से संबद्ध लगेगी, और उसके रवैये ऐसी भावनाओं का रूप लेंगे, जो उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि की प्रक्रिया की सफलता या विफलता की परिचायक हैं।

संवेगात्मक अनुभव के सामान्यीकरण ( generalization ) के फलस्वरूप पैदा हुई भावनाएं व्यक्ति के संवेगात्मक क्षेत्र में प्रमुख बन जाती हैं और स्थितिसापेक्ष संवेगों, मनोदशाओं तथा भावों की गतिकी ( dynamics ) तथा अंतर्वस्तु ( content ) को निर्धारित करने लगती हैं।

भावना, स्थितिसापेक्ष संवेगों की गतिकी तथा अंतर्वस्तु को निर्धारित करती हैं, इसे एक मिसाल देकर स्पष्ट करें। प्रियजन के प्रति प्रेम की भावना, अपने को स्थिति के अनुसार अलग-अलग ढंग से व्यक्त करती है : जब वही प्रिय व्यक्ति सफलता पाता है, प्रेम हर्ष का रूप लेता है, और जब नहीं पाता, तो दुख के रूप में प्रकट होता है, यदि प्रिय व्यक्ति का व्यवहार आशा के अनुरूप निकलता है, तो प्रेम उसपर गर्व का रूप लेता है और यदि आशा के प्रतिकूल पाया जाता है, तो प्रेम रोष के रूप में प्रकट होता है। भावना जितनी ही प्रबल होगी, उसपर क्षणिक संवेगों का प्रभाव उतना ही कम पड़ेगा।

मां अपनी बेटी से उसकी किसी हरकत के कारण नाराज़ हो सकती है, फिर भी कुछ समय बाद बेटी के प्रति प्रेम की भावना का पलड़ा भारी हो जाएगा, उसकी हरकत भुला दी जाएगी और उसे क्षमा कर दिया जाएगा। यह भावना का प्रबल और साथ ही दुर्बल पहलू है। भावना में स्पष्ट परिवर्तन लाने के लिए नकारात्मक संवेगों के संचय के वास्ते बहुत अधिक हरकतों की जरूरत होती है। इसके विपरीत एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति अपेक्षाकृत अनिश्चित संवेगात्मक रवैये को पूर्णतः सकारात्मक या नकारात्मक भावना में बदलने के लिए दूसरे मनुष्य द्वारा पहले मनुष्य में केवल एक प्रबल सकारात्मक या नकारात्मक संवेग जगाना ही पर्याप्त है। प्रायः किसी छात्र के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया ऐसे ही पैदा होता है और इस ख़तरे से शिक्षक को सदा सतर्क रहना चाहिए।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 10 सितंबर 2011

मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं के रूपों के अंतर्गत मनोदशा तथा खिंचाव पर विचार किया था, इस बार हम मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं
और उनकी मनोवैज्ञानिक विशेषताएं तथा बाह्य अभिव्यक्तियां

मनुष्य जब संवेगों ( impulses ), भावों ( sentiments ), मनोदशाओं ( moods ), और खिंचावों ( stresses ) के रूप में भावनाओं ( emotions ) को अनुभव करता है, तो सामान्यतः वह साथ ही इसके न्यूनाधिक प्रत्यक्ष संकेत ( direct indications ) भी देता है। इन संकेतों में मनुष्य के हाव-भाव, मुद्राएं, बोलने का लहजा, पुतलियों का सिकुड़ना अथवा फैलना, आदि शामिल हैं। हाव-भाव अचेतन और सचेतन, दोनों प्रकार के हो सकते हैं। सचेतन हाव-भावों, मुद्राओं को संप्रेषण की प्रक्रिया में अवाचिक संप्रेषण-माध्यम के तौर पर जान-बूझकर उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य अपना रोष मुट्ठियां भींचकर, भौहों पर ज़ोर देते हुए देखकर या धमकाने के लहजे में बोलकर व्यक्त कर सकता है।

मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं निम्न हैं और इनमें से हरेक की अपनी मनोवैज्ञानिक विशेषताएं तथा बाह्य अभिव्यक्तियां हैं।

रुचि ( interest )( एक संवेग के तौर पर ) - यह सकारात्मक संवेगात्मक अवस्था अध्ययन, ज्ञान प्राप्ति और आदतों व कौशल ( skill ) के विकास में सहायक बनती है।

हर्ष ( joy ) - यह सकारात्मक संवेगात्मक अवस्था, किसी वास्तविक आवश्यकता, जो अब तक संदिग्ध अथवा अनिश्चित थी, की पूर्ण तुष्टि की संभावना से जुड़ी हुई है।

आश्चर्य ( wonder ) - यह नई परिस्थितियों के अकस्मात पैदा होने पर दिखाई जानेवाली संवेगात्मक अवस्था है, जिसका कोई निश्चित सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव नहीं होता। आश्चर्य पहले के सभी संवेगों को अवरुद्ध कर देता है और मनुष्य का ध्यान उसे ( आश्चर्य को ) पैदा करनेवाल वस्तु या स्थिति पर संकेंद्रित करके रुचि में बदल सकता है।

कष्ट ( pain ) - यह एक नकारात्मक संवेगावस्था है। वह मनुष्य द्वारा ऐसी प्रामाणिक ( अथवा देखने में प्रामाणिक ) सूचना पाने से पैदा होता है कि जिसने उसकी बुनियादी आवश्यकताओं की तुष्टि की आशाओं पर पानी फेर दिया है। कष्ट आम तौर पर संवेगात्मक खिंचाव का रूप लेता है और दुर्बलताकारी प्रभाव उत्पन्न करता है।

क्रोध ( anger ) - यह भी नकारात्मक संवेगावस्था है, और सामान्यतः भाव का रूप लेता है। इसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की तुष्टि में पैदा होनेवाली गंभीर बाधा जन्म देती है। कष्ट के विपरीत क्रोध सबलताकारी प्रभाव डालता है और चाहे थोड़े समय के लिए ही सही, मनुष्य की जीवनीय शक्तियों में उभार लाता है।

विद्वेष ( rancor ) - इस नकारात्मक संवेग को वे वस्तुएं, लोग, स्थितियां, आदि जन्म देते हैं, जिनसे संपर्क ( अन्योन्यक्रिया, संप्रेषण, आदि ) मनुष्य के वैचारिक, नैतिक तथा सौंदर्यबोध संबंधी सिद्धांतों व विन्यासों ( configurations ) के विरुद्ध होता है। अंतर्वैयक्तिक ( interpersonal ) संबंधों में विद्वेष, क्रोध के साथ मिलकर आक्रामक व्यवहार को जन्म दे सकता है, जिसमें आक्रमण का कारण क्रोध होता है और विद्वेष का कारण ‘किसी आदमी या वस्तु से पीछा छुड़ाने’ की इच्छा होती है।

अवमानना ( contempt ) - यह नकारात्मक संवेगात्मक अवस्था अंतर्वैयक्तिक संबंधों में पैदा होती है और मनुष्य के अपने सिद्धांतों, दृष्टिकोणों तथा व्यवहार की अपनी भावना के विषय बने दूसरे मनुष्य के सिद्धांतों, दृष्टिकोणों तथा व्यवहार से असंगति का परिणाम होती है। मनुष्य को लगता है कि उसकी भावना के विषय, दूसरे मनुष्य के सिद्धांत, आदि गर्हित ( hateful ) हैं और सामन्यतः स्वीकृत नैतिक मानकों तथा सौंदर्य-मानदंड़ों से मेल नहीं खाते।

भय ( fear ) - यह नकारात्मक संवेग मनुष्य द्वारा यह सूचना पाने पर पैदा होता है कि उसकी खुशहाली के लिए ख़तरा उत्पन्न हो सकता है या स्वयं उसके लिए कोई ( वास्तविक या अवास्तविक ) ख़तरा है। कष्ट के विपरीत, जो मनुष्य की बुनियादी आवश्यकताओं की तुष्टि के प्रत्यक्ष अवरोध का परिणाम होता है, भय प्राक्कल्पनात्मक ( hypothetical ) हानि की प्रत्याशा से जन्म लेता है और मनुष्य को एक अनिश्चित ( प्रायः अतिरंजित ) पूर्वानुमान के अनुसार कार्य करने को उकसाता है। भय में आदमी तिल का ताड़ बनाता है। भय सबलताकारी और दुर्बलताकारी, दोनों तरह के प्रभाव डाल सकता है और खिंचाव, अवसाद तथा चिंता अथवा भाव ( संत्रास भय की चरम अभिव्यक्ति है ) का रूप ले सकता है।

लज्जा ( shame ) - इस नकारात्मक संवेग के मूल में मनुष्य की यह चेतना छिपी होती है कि उसके इरादों, कार्यों तथा रूप और उसके आसपास के लोगों के मापदंडों तथा नैतिक अपेक्षाओं के बीच, जिनसे वह भी सहमत है, संगति नहीं है।

मुख्य संवेगावस्थाओं की उपरोक्त सूची किसी वर्गीकरण ( classification ) पर आधारित नहीं है ( संवेगों की कुल संख्या बहुत बड़ी है )। उपरोक्त हर संवेग को प्रखरता के क्रम में बढ़ती हुई अवस्थाओं का सोपान कहा जा सकता है, जैसे सामान्य संतुष्टि, हर्ष, आह्लाद, उल्लास, हर्षोन्माद, आदि, अथवा संकोच, घबराहट, लज्जा, अपराध-बोध, आदि, अथवा नाराज़गी, परेशानी, कष्ट, दुख। किंतु यह सोचना ग़लत होगा कि मुख्य सकारात्मक संवेगावस्थाओं की कम संख्या ( उपरोक्त नौ में से तीन ) मानव-जीवन में नकारात्मक संवेगों की प्रधानता का प्रमाण है। नकारात्मक संवेगों की अधिकता तथा विविधता से निश्चय ही मनुष्य को अपने को ज़्यादा कारगर ढंग से प्रतिकूल परिस्थितियों के अनुकूल ढाल पाने में मदद मिलती है, क्योंकि नकारात्मक संवेगात्मक अवस्थाएं सही व सूक्ष्म ढंग से इनके संकेत दे देती हैं।

किसी भी भावना का अनुभव सदा एकरूप नहीं होता। संवेगात्मक अवस्था में दो विरोधी भावनाएं सम्मिलित हो सकती हैं, जैसे ईर्ष्या में प्रेम तथा घृणा का संयोग ( भावनाओं की द्वेधवृत्ति )।

महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने यह प्राक्कल्पना पेश की थी कि मनुष्य की भावनाओं के सहवर्ती हाव-भावों का जन्म उसके पशु पूर्वजों की सहजवृत्तिक ( instinctive ) क्रियाओं से हुआ था। प्राचीन मानवाभ वानरों में ग़ुस्से के दौरान मुट्ठियां भींचने या दांत निकालना और कुछ नहीं, बल्कि शत्रु को भयरहित दूरी पर रखनेवाले प्रतिरक्षात्मक अननुकूलित प्रतिवर्त ( unconditioned reflex ) ही हैं।

अननुकूलित प्रतिवर्तों का परिणाम होने पर भी मनुष्य की भावनाएं अपनी प्रकृति से सामाजिक हैं। मनुष्य और पशु की भावनाओं में फ़र्क़ यह है कि पहले, मनुष्य की भावनाएं उन मामलों में भी अतुलनीय रूप से जटिल होती हैं, जब वे पशुओं की भावनाओं से समानता रखती हैं। यह मनुष्यों और पशुओं में क्रोध, भय, जिज्ञासा, हर्ष, अवसाद, आदि भावनाओं की उनकी उत्पत्ति तथा अभिव्यक्तियों की दृष्टि से तुलना करने पर स्पष्ट हो जाता है।

दूसरे, मनुष्य ऐसी बहुत सारी भावनाएं अनुभव कर सकता है, जो पशुओं में नहीं मिलतीं। श्रम की प्रक्रिया, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों और पारिवारिक जीवन में लोगों के बीच बननेवाले अति विविध संबंध बहुत सारी शुद्धतः मानवीय भावनाओं को जन्म देते हैं, जैसे अवमानना, गर्व, ईर्ष्या, विजयोल्लास, ऊब, आदर, कर्तव्यबोध, आदि। इनमें से प्रत्येक भावना की अभिव्यक्ति के अपने विशिष्ट तरीक़े हैं ( लहजे, हाव-भाव, हंसी, आंसुओं, आदि के ज़रिए )।

तीसरे, मनुष्य अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर सकता है, उनकी अनुचित अभिव्यक्ति को रोक सकता है। प्रायः प्रबल तथा गंभीर संवेगों को अनुभव करनेवाले लोग बाहर से शांत रहते हैं और उदासीन होने का बहाना करते हैं, ताकि अपनी भावनाओं का पता न चलने दें। अपनी वास्तविक भावनाओं छिपाने या दबाने के लिए मनुष्य कभी-कभी उनसे बिल्कुल विपरीत भावनाएं भी प्रदर्शित कर सकता है, जैसे दुख या पीड़ा में भी मुस्कुराना, हंसने की इच्छा होने पर भी मुंह लटकाना, आदि।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 3 सितंबर 2011

भावनाओं के रूप - मनोदशा तथा खिंचाव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं के रूपों के अंतर्गत संवेग तथा भाव पर विचार किया था, उसी को आगे बढ़ाते हुए इस बार हम मनोदशा तथा खिंचाव पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनोदशा ( Mood )

मनोदशा ( चित्तवृत्ति ) अपेक्षाकृत लंबी अवधि में मनुष्य के व्यवहार की पृष्ठभूमि का काम करनेवाली सामान्य संवेगात्मक अवस्था ( general impulsive state ) को कहते है। मनोदशाएं आनंदपूर्ण अथवा उदासीभरी, आह्लादमय अथवा विषादभरी, उत्तेजित अथवा विषण्ण ( despondent ), गंभीर अथवा चंचल, चिड़चिड़ी अथवा सह्रदयतापूर्ण, वग़ैरह कैसी भी हो सकती है। दोस्ताना मज़ाक या बात पर आदमी की प्रतिक्रिया काफ़ी हद तक इस पर निर्भर होती है कि उसका मिज़ाज अच्छा या बुरा, कैसा है।

आम तौर पर मनोदशाएं अनैच्छिक ( involuntary ) और अस्पष्ट होती हैं। हो सकता है कि मनुष्य उसपर ग़ौर भी न करे। किंतु कभी-कभी मनोदशा ( उदाहरणार्थ, उल्लास अथवा चिंता ) काफ़ी प्रखर ( intensive ) बन जाती है। ऐसे मामलों में वह मनुष्य की मानसिक सक्रियता ( उसके विचारों के क्रम, मस्तिष्क के द्रुत कार्य ), उसकी गतियों व कार्यों और यहां तक कि वह जो काम कर रहा है, उसकी उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।

मनोदशाओं के तात्कालिक और अप्रत्यक्ष, सभी तरह के कारण हो सकते हैं। मनोदशाओं का मुख्य स्रोत यह है कि मनुष्य अपने जीवन, काम, पारिवारिक जीवन, पढ़ाई, जीवन के विभिन्न द्वंदों के हल के ढंग, आदि से किस हद तक संतुष्ट है। यदि चिंता अथवा अवसाद की स्थिति देर तक बनी रहती है, तो यह इसका निश्चित लक्षण है कि दत्त मनुष्य के जीवन में जरूर कुछ गड़बड़ी है।

मनोदशाएं काफ़ी हद तक मनुष्य के स्वास्थ्य पर, विशेषतः तंत्रिका-तंत्र और जो अंतःस्रावी ग्रंथियां चयापचय का नियंत्रण करती हैं, उनकी अवस्था पर निर्भर होती हैं। रोग का मनुष्य की सामान्य मनोदशा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। शारीरिक व्यायाम और खेलकूद निम्न मनोबल का बड़ा कारगर इलाज है, फिर भी सर्वोत्तम दवा यह है कि मनुष्य अपने काम की उपयोगिता को समझे, उसमें संतोष पाए और अपने साथियों तथा प्रिय व्यक्ति से उसे नैतिक समर्थन मिले

मनुष्य को अपनी मनोदशा के स्रोत की जानकारी होना अनिवार्य नहीं है, फिर भी मनोदशाओं के स्रोतों को जाना जा सकता है, हालांकि इसके लिए कुछ कौशल की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, किसी मनुष्य के उदास रहने का कारण यह हो सकता है कि वह अपना कोई वायदा पूरा नहीं कर पाया है। इस तरह की चूकें उसकी ‘अंतरात्मा’ को कचोटती रहती हैं, हालांकि वह ज़्यादातर यह कहेगा कि उसकी उदासी का कोई उचित कारण नहीं है। ऐसे मामलों में उसे अपनी विषण्णता ( despondency ), उदासी का वास्तविक कारण मालूम करने और यदि संभव हो, तो उस कारण को ख़त्म करने का प्रयत्न करना चाहिए।

खिंचाव ( Stress )

खिंचाव ( स्ट्रेस ) अथवा संवेगात्मक खिंचाव एक विशेष प्रकार का संवेग है, जो अपने मनोवैज्ञानिक लक्षणों की दृष्टि से भाव से और मियाद की दृष्टि से मनोदशा से समानता रखता है। संवेगात्मक खिंचाव ख़तरे, नाराज़गी, शर्म, तनाव, आदि की परिस्थितियों में पैदा होता है, किंतु भाव जितना प्रखर विरले ही बन पाता है। सामान्यतः खिंचाव की अवस्था में मनुष्य का व्यवहार व वाक् अव्यवस्थित हो जाते हैं और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता होने पर भी मनुष्य निष्क्रियता तथा सुस्ती दिखाता है। किंतु जब खिंचाव ज़्यादा नहीं होता, वह मनुष्य को सक्रियता के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित कर सकता है। ख़तरा प्रायः मनुष्य की सोई शक्तियों को जगा देता है और उसे साहस तथा संकल्प के साथ कार्य करने को उकसाता है।

खिंचाव की परिस्थिति में मनुष्य का व्यवहार काफ़ी हद तक उसके तंत्रिका-तंत्र पर, उसकी तंत्रिका-प्रक्रियाओं की शक्ति अथवा दुर्बलता पर निर्भर करता है। खिंचाव पैदा करने वाले कारकों का सामना करने की मनुष्य की क्षमता की एक कसौटी परीक्षा है। कुछ परीक्षार्थी अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, उन्हें कुछ याद नहीं रहता और वे सवालों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते, जबकि कुछ अपनी पूरी ताक़त जुटा लेते हैं और सामान्य स्थितियों से भी बेहतर ढंग से काम करते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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