शनिवार, 31 दिसंबर 2011

स्वभाव और शिक्षा


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में सक्रियता की व्यक्तिगत शैली को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम स्वभाव और शिक्षा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्वभाव और शिक्षा
स्वभाव की विशेषताओं के तौर पर क्रियाशीलता, संवेगात्मकता और गतिशीलता

बच्चों के प्रति वैयक्तिक, मनोविज्ञानसम्मत उपागम अपनाने के लिए उनके स्वभाव की विशेषताएं जानना बहुत ज़रूरी है। बच्चे के साथ अल्पकालिक संपर्क से उसके मानस के गतिक पक्ष की आंशिक और थोड़ी-बहुत ही स्पष्ट जानकारी पाई जा सकती है, जो उसके स्वभाव के सही मूल्यांकन के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। छात्र की सांयोगिक आदतों व तौर-तरीक़ों का उसके स्वभाव की बुनियादी विशेषताओं से भेद करने के लिए शिक्षक के वास्ते यह जानना जरूरी है कि उस छात्र का विकास किन परिस्थितियों में हुआ है। उसे विभिन्न परिस्थितियों में छात्र के व्यवहार तथा कार्यों की तुलना भी करनी चाहिए। एक जैसी परिस्थितियों में छात्रों के व्यवहार तथा सक्रियता का तुलनात्मक अध्ययन उनके मानस की गतिक अभिव्यक्तियों को जानने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

छात्र के स्वभाव का भेद निर्धारित करने के लिए शिक्षक को पहले उसकी क्रियाशीलता, संवेगात्मकता, गतिशीलता को आंकना चाहिए।

१. क्रियाशीलता : इसे नई जानकारियों, कार्यों तथा वस्तुओं के लिए बच्चों की ललक की प्रबलता से, परिवेश को बदलने तथा बाधाओं को पार करने की उसकी इच्छा की तीव्रता ( intensity ) से आंका जाता है।
२. संवेगात्मकता : इसे संवेगात्मक प्रभावों के प्रति बच्चे की संवेदनशीलता और संवेगात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहाना खोजने की उसकी प्रवृत्ति ( tendency ) से आंका जाता है। संवेगों की अभिप्रेरण-क्षमता और एक संवेगात्मक अवस्था से दूसरी अवस्था में संक्रमण की रफ़्तार भी इस संबंध में बड़ा महत्त्व रखती हैं।
३. गतिशीलता : बच्चे की गतिशीलता की विशेषताएं अपने को पेशीय क्रियाओं की गति, आकस्मिकता, लय, विस्तार और कई अन्य बातों में व्यक्त करती हैं ( उनमें से कुछ वाचिक गतिशीलता के भी अभिलक्षण हैं )। स्वभाव की इन अभिव्यक्तियों को अन्य अभिव्यक्तियों की अपेक्षा आसानी से देखा और आंका जा सकता है।

यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि स्वभाव की आयुगत विशेषताएं भी हैं और हर अवस्था में क्रियाशीलता, संवेगात्मकता तथा गतिशीलता अपने को अलग ढंग से व्यक्त करती हैं। उदाहरण के लिए, निचली कक्षाओं के बच्चों की क्रियाशीलता की विशेषताएं हैं रुचि का सहज ही जागृत हो जाना, बाह्य क्षोभकों के प्रति उच्च संवेदनशीलता, किसी बात पर ध्यान देर तक केंद्रित ना रख पाना। इनका कारण बच्चे के तंत्रिका-तंत्र की आपेक्षिक दुर्बलता और अत्यधिक संवेदनशीलता है। निचली कक्षाओं के बच्चों की संवेगात्मकता तथा गतिशीलता भी किशोरों के इन गुणों से बहुत भिन्न हैं। बच्चे की स्वभावगत विशेषताओं को उसकी आयु से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उनकी अभिव्यक्तियां हमेशा बच्चे के विकास से जुड़ी होती हैं।

स्वभाव की विशेषताएं और शिक्षा

हर प्रकार का स्वभाव अपने को सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के मानसिक अभिलक्षणों में प्रकट कर सकता है। पित्तप्रकृति व्यक्ति की उर्जा और कर्मशक्ति यदि उचित लक्ष्यों की ओर उन्मुख हों, तो वे मूल्यवान गुण हो सकती हैं, किंतु उसका संवेगात्मक तथा गतिशीलता संबंधी असंतुलन पालन की कमियों के साथ मिलकर अपने को उच्छॄंखलता, उद्दंड़ता तथा आपे से बाहर होने की स्थायी प्रवृत्ति में व्यक्त कर सकते हैं। रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य की जीवंतता और सह्रदयता श्रेष्ठ गुण हैं, किंतु समुचित शिक्षा के अभाव में ये गुण एकाग्रता की कमी, लापरवाही और निरुद्देश्यता की ओर ले जा सकते हैं। श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) मनुष्य की शांतचित्तता, आत्म-नियंत्रण और गंभीरता की सामान्यतः हर कोई प्रशंसा करेगा, किंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में वे उसे निश्चेष्ट, जड़ और ऊबाऊ आदमी में परिवर्तित कर सकते हैं। इसी तरह वातप्रकृति ( विषादी ) मनुष्य के भावनाओं की गहनता तथा स्थिरता और संयोगात्मक संवेदनशीलता जैसे गुण उसके बहुत काम आ सकते हैं, किंतु उचित शैक्षिक प्रभाव के अभाव में ये ही अन्यथा मूल्यवान गुण अतिशय संकोच में बदल जाएंगे और आत्मपरक अनुभवों की दुनिया में सिमट जाने की प्रवृत्ति को जन्म देंगे।

इस तरह स्वभाव के बुनियादी गुणधर्म व्यक्तित्व की विशेषताओं का पूर्वनिर्धारण ( predetermination ) नहीं करते और ख़ुद ही मनुष्य के अच्छे या बुरे गुणों में नहीं बदल जाते। अतः शिक्षक और अभिभावकों का कार्य एक तरह के स्वभाव को बदलकर दूसरी तरह का स्वभाव विकसित करना नहीं ( ऐसे प्रयास हमेशा विफल सिद्ध होते हैं ), बल्कि छात्र के स्वभाव के अच्छे पहलुओं को प्रोत्साहित करना साथ ही उसे बुरे, नकारात्मक पहलुओं से छुटकारा पाने में मदद देना है

जो चीज़ ख़राब शिक्षा या पालन का परिणाम है, उसे आंख मूंदकर स्वभाव से नहीं जोड़ना चाहिए। उदाहरण के लिए, व्यवहार में संयम व आत्म-नियंत्रण के अभाव का पित्तप्रकृति ( कोपशील ) स्वभाव से संबंध होना अनिवार्य नहीं है। वह ग़लत पालन का परिणाम भी हो सकता है। इसी तरह मनुष्य का बिलावजह अपनी रुचियां व शौक बदलना, उसमें संयम का अभाव, अन्य लोगों के प्रति उदासीनता, अनावश्यक संकोच, आदि स्वभाव के नहीं, अपितु अवांछनीय प्रभावों के परिणाम हो सकते हैं। बच्चा स्कूल के भीतर दब्बू, लगभग असहाय प्रतीत हो सकता है और वातप्रकृति, यानि विषादी प्ररूप का ठेठ प्रतिनिधी होने की सर्वथा मिथ्या छाप पैदा कर सकता है, किंतु वास्तव में वैसा व्यवहार उसके पढ़ाई में और सबसे पिछड़ा होने या औरों के बीच घुल-मिल न पाने का परिणाम हो सकता है।

विभिन्न स्वभावोंवाले लोगों के प्रति वैयक्तिक उपागम

ऊपर जो भी कुछ कहा गया है, उसका यह मतलब नहीं कि स्वभावगत अंतरों को अनदेखा करना चाहिए। बच्चों के स्वभावों का ज्ञान शिक्षक और अभिभावकों को उनके व्यवहार की विशिष्टताओं को बेहतर समझने और लालन-पालन तथा शैक्षिक प्रभाव की प्रणालियों को आवश्यकतानुसार बदलने की संभावना देता है।

छात्रों की प्रगति पर ख़राब अंकों का प्रभाव मालूम करने के लिए किये गए विशेष प्रयोगों ने दिखाया है कि पढ़ाई में समान रुचि रखनेवाले, किंतु स्वभाव के मामले में भिन्न बच्चे उनपर अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया करते हैं : प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले अपने को संभाल लेते हैं और दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले हतोत्साहित हो जाते हैं, आत्मविश्वास खो बैठते हैं और नहीं जानते कि क्या करें। स्पष्टतः ऐसी विभिन्न प्रतिक्रियाएं शिक्षक द्वारा छात्रों के प्रति अलग-अलग कार्यनीतियां ( strategies ) अपनाए जाने की आवश्कयता पैदा करती है।

शिक्षक भली-भांति जानते हैं कि स्कूल की समय-तालिका या पाठों के क्रम में परिवर्तन कक्षा के सामान्य काम में विघ्न पैदा कर देता है। कुछ छात्र ऐसे परिवर्तनों के जल्दी ही और आसानी से आदी हो जाते हैं, जबकि दूसरे अपने को नई स्थिति के अनुसार ढ़ाल पाने में कठिनाई अनुभव करते हैं। सामान्यतः शिक्षक को पित्तप्रकृति ( कोपशील ) तथा वातप्रकृति ( विषादी ) स्वभावोंवाले बच्चों पर विशेष ध्यान देना पड़ता है : पहलों को हमेशा उग्र प्रतिक्रियाओं से रोकने, अपने और अपनी क्रियाओं पर नियंत्रण करना सिखाने और शांति के साथ तथा निरंतर कार्य का प्रशिक्षण देने की जरूरत होती है, जबकि दूसरों को उनका खोया आत्म-विश्वास लौटाना, प्रोत्साहित करना तथा कठिनाइयों से विचलित न होना सिखाना होता है। कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चों के लिए कठोर दिनचर्या तथा काम की नपी-तुली गति निर्धारित की जानी चाहिए।

अच्छी शिक्षा-पद्धति दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चे में भी दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास कर सकती है। इसके विपरीत कृत्रिम परिस्थितियों में दी जानेवाली शिक्षा प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चे को भी पहलहीन तथा आत्म-विश्वासरहित बना सकती है। हर पित्तप्रकृति ( कोपशील ) मनुष्य अपने निश्चय पर अड़िग नहीं रहता और न हर रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य सह्रदय होता है। आत्म-नियंत्रण और स्वशिक्षा के द्वारा ये गुण विकसित करने होते हैं

विकासोन्मुख मनुष्य को शनैः शनैः अपने व्यवहार तथा सक्रियता का सचेतन नियंत्रण करना सीखना चाहिए। विभिन्न स्वभावोंवाले व्यक्ति इस काम को विभिन्न तरीक़ो से करते हैं। स्वभावगत भेदों का तकाज़ा है कि छात्रों में आवश्यक मानसिक गुण संवर्धित ( enhanced ) करने के लिए शिक्षक अलग-अलग बच्चों के साथ अलग-अलग प्रणालियां इस्तेमाल करे। मनुष्य के स्वभाव की विशेषताएं अपने को विभिन्न क्षेत्रों में ( उदाहरणार्थ, स्कूल में और घर में ) विभिन्न रूपों में प्रकट करती हैं। स्वभाव की कुछ अभिव्यक्तियां मनुष्य के विन्यासों तथा आदतों के प्रभाव से एक निश्चित दिशा में सीमित तथा निदेशित की जा सकती हैं। दूसरे शब्दों में, स्वभाव व्यवहार के संरूपों को प्रभावित करता है, न कि उन्हें पहले से तयशुदा बनाता है। यहां शैक्षिक प्रभाव और परिवेश के प्रति विकासोन्मुख मनुष्य ( बच्चा, किशोर, आदि ) के रवैयों ( attitudes ) की सारी पद्धति सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वभाव की विशेषताएं, अर्थात मन की गत्यात्मक पद्धति के अभिलक्षण उन अत्यंत महत्त्वपूर्ण गुणों के विकास की एक पूर्वापेक्षा ही है, जिनसे मनुष्य का चरित्र ( character ) बनता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

रविवार, 25 दिसंबर 2011

सक्रियता की व्यक्तिगत शैली


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम सक्रियता की व्यक्तिगत शैली पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यावसायिक अपेक्षाएं और स्वभाव

कुछ ख़ास क्षेत्रों में स्वभाव ( nature ) की विशेषताएं न केवल सक्रियता को, अपितु उसके अंतिम परिणामों को भी प्रभावित करती हैं। ऐसे क्षेत्रों के संबंध में मन के कुछ गतिक गुण ज़्यादा अनुकूल होते हैं और कुछ कम अनुकूल। जिन क्षेत्रों में क्रियाओं की तीव्रता की दर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, वहां बौद्धिक गतिक गुण, काम के लिए मनुष्य की उपयुक्तता का निर्धारण करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। वास्तव में कतिपय व्यवसायों ( professions ) के लिए उच्च गतिक अभिलक्षणों ( high dynamic characteristics ) की अपेक्षा होती है, जो प्रत्याशियों का प्राथमिक चुनाव आवश्यक बना देती है। उदाहरण के लिए, पायलट, ड्राइवर या सर्कस के कलाबाज़ के लिए गतिशील तथा मजबूत तंत्रिका-तंत्र की आवश्यकता होती है। इसी तरह संवेगात्मक उत्तेज्यता ( impulsive excitement ) जैसे गुण के बिना अभिनेता या संगीतज्ञ नहीं बना जा सकता।

किंतु अधिकांश व्यवसायों में सक्रियता की गतिकी से संबंधित स्वभावगत विशेषताएं उसकी अंतिम कारगरता ( effectiveness ) को प्रभावित नहीं करती। स्वभाव के किसी भी भेद की जो कमियां हैं, उनकी प्रतिपूर्ति ( compensation ) अपनी सक्रियता में मनुष्य की गहन रुचि, तैयारी के उच्च स्तर और संकल्पात्मक प्रयासों ( volitive efforts ) से की जा सकती है।

सर्वविदित है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कला जैसे सभी सृजनात्मक ( creative ) क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलताएं पानेवाले सभी लोगों के स्वभाव एक जैसे नहीं होते। सृजनशील व्यक्ति की एक मुख्य विशेषता अपने कार्यों की प्रणालियों का विशिष्टिकरण है, यानि वह सचेतन अथवा अचेतन रूप से अपने कार्य में ऐसी शैलियों ( styles ) तथा तकनीकों ( techniques ) का प्रयोग करता है कि जो उसके अपने स्वभाव से अधिकतम मेल खाती है

सक्रियता की व्यक्तिगत शैली

स्वभाव अपने को सर्वप्रथम कार्य-प्रणालियों की विशिष्टता ( specialty, uniqueness ) में व्यक्त करता है, ना कि कार्य की कारगरता ( effectiveness ) में। कार्य-निष्पादन में उच्च-परिणाम गतिशील और जड़, दोनों तरह के तंत्रिका-तंत्रवाले व्यक्तियों द्वारा पाये जा सकते हैं। यह पाया गया है कि विपरीत गतिशीलता-अभिलक्षणवाले व्यक्ति, श्रम-परिस्थितियों के समान होने पर भी अलग-अलग कार्यनीतियां ( strategies ) अपनाते हैं। शानदार उत्पादन-परिणाम उन व्यक्तियों द्वारा पाए जाते हैं, जिनके काम की शैली तथा प्रणालियां उनकी अपनी विशेषताओं से मेल खाती हैं। इस तरह हम देखते हैं कि स्वभाव, सक्रियता की व्यक्तिगत शैली ( personal style ) का निर्धारण करता है।

व्यक्तिगत शैलियों की समस्या का अध्ययन करनेवाले मनोविज्ञानियों की खोजें दिखाती हैं कि ये शैलियां तुरंत और संयोगवश नहीं पैदा होतीं। व्यक्तिगत शैली का निर्माण तथा सुधार तभी होता है, जब मनुष्य बेहतर परिणाम पाने के लिए अपने स्वभाव के अनुरूप उपाय तथा तरीक़े सक्रिय रूप से खोज रहा हो। सभी दक्ष मज़दूरों, उत्कृष्ट खिलाड़ियों और तेज़ छात्रों की कार्य करने की अपनी व्यक्तिगत शैली होती है।

यह ध्यान देने योग्य बात हैं कि हर व्यक्ति द्वारा अलग से कार्य किए जाने की तुलना में संयुक्त सक्रियता में, विशेषतः जब कार्य दो व्यक्तियों द्वारा मिल-जुलकर किया जा रहा हो, उनके स्वभाव के गतिक लक्षण, सक्रियता के अंतिम परिणाम पर कहीं अधिक प्रभाव डालते है। इतना ही नहीं, संयुक्त सक्रियता से किन्हीं निश्चित स्थितियों के लिए विभिन्न प्रकार के स्वभावों के अधिक अनुकूल और कम अनुकूल संयोजन ( combination  ) भी पता चल जाते हैं। उदाहरण के लिए, उन मामलों में पित्तप्रकृति ( कोपशील ) मनुष्य की सक्रियता तब अधिक कारगर सिद्ध होती है, जब वह किसी श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) या वातप्रकृति ( विषादी ) व्यक्ति के साथ मिलकर काम करता है। उसका किसी रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) अथवा अपने ही जैसे स्वभाववाले व्यक्ति के साथ मिलकर काम करना उतना कारगर नहीं साबित होता। ऐसे तथ्य दिखाते हैं कि स्वभाव की किन्हीं निश्चित विशेषताओं का महत्त्व ठीक-ठीक तभी आंका जा सकता है कि जब संयुक्त-सक्रियता मे उनकी भूमिका को पूरी तरह ध्यान में रखा जाए।

मनुष्य अपने स्वभाव को जानना बचपन में ही शुरू कर देता है। शिक्षण तथा शिक्षा की प्रक्रिया में वह स्वभाव के नकारात्मक पहलुओं से होनेवाली हानि की प्रतिपूर्ति ( compensation ) के तरीक़े सीखता है और सक्रियता की अपनी व्यक्तिगत शैली विकसित करता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव

बौद्धिक योग्यताओं के स्तर और स्वभाव के बीच संबंध की संभावना विषयक विशेष अध्ययन ने दिखाया है कि उच्च बौद्धिक योग्यताओंवाले व्यक्तियों के स्वभावों में बड़ा अंतर हो सकता है। इसी तरह समान स्वभाव वाले बड़ी ही भिन्न बौद्धिक योग्यताएं प्रदर्शित कर सकते हैं। बेशक बौद्धिक सक्रियता को स्वभाव से पृथक नहीं किया जा सकता, जो मानसिक सक्रियताओं की गति तथा धाराप्रवाहिता, ध्यान की स्थिरता तथा परिवर्तनशीलता, काम में ‘प्रवृत्त’ होने की गतिकी, काम के दौरान संवेगात्मक आत्म-नियंत्रण और तंत्रिका-तनाव तथा क्लांति ( stress and fatigue ) की मात्रा जैसे अभिलक्षणों को प्रभावित करता है। किंतु सक्रियता के ढंग तथा शैली ( style ) को प्रभावित करनेवाली स्वभाव की विशेषताएं, स्वयं बौद्धिक योग्यताओं का निर्धारण नहीं करतीं। स्वभाव की विशेषताएं मनुष्य के काम के ढंग तथा तरीक़ों का तो निर्धारण करती है, किंतु उसकी उपलब्धियों के स्तर का नहीं। अपनी बारी में मनुष्य की बौद्धिक योग्यताएं ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करती हैं कि जिनमें वह अपने स्वभाव की कमियों की प्रतिपूर्ति ( compensation ) कर सकता है

इसकी मिसाल के तौर पर हम नीचे उत्तम अंकों के साथ स्कूली शिक्षा समाप्त करनेवाले दो नवयुवकों का तुलनात्मक मनोवैज्ञानिक चित्र पेश करेंगे।

अमित सक्रिय तथा उर्जावान नवयुवक है। वह सामान्यतः अपने काम में दिलचस्पी लेता है और अन्य लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह एक साथ कई काम कर सकता है, पेचीदा काम और बदलते हालात उसकी उर्जा को कम नहीं करते। किंतु हिमांशु अपना काम दूसरे ढंग से करता है। उसे अपना होमवर्क करने में बड़ा समय लगता है, तैयारीवाले चरण के बिना उसका काम नहीं चल पाता। छोटी-छोटी बाधाएं और अप्रत्याशित परिस्थितियां भी उसे देर तक सोचने को विवश कर देती हैं। अमित को, जो सदा बड़ी फुर्ती से काम करता है, आराम के लिए भी बहुत कम समय चाहिए। स्कूल से पैदल घर लौटना, दो-चार इशर-उधर की बातें, और जो सबसे बड़ी चीज़ है, काम का बदलाव उसकी शक्ति की बहाली के लिए पर्याप्त है। जहां तक हिमांशु का संबंध है, तो वह पाठों के बाद अपने को थका हुआ अनुभव करता है और अन्य कोई बौद्धिक कार्य शुरू करने से पहले उसे दो घंटे आराम की जरूरत होती है।

नई सामग्री और उसे दोहराने के बारे में दोनों नवयुवकों के रवैयों ( attitudes ) का अंतर भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है, जिन पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि वे उनकी मनोरचना की विशेषताओं का अच्छा परिचय देते हैं। शिक्षक जब नई सामग्री पढ़ाता है, तो अमित उसे बहुत चाव से सुनता है। उसे कोई भी पाठ्यपुस्तक पहली बार पढ़कर अत्यंत संतोष मिलता है। नये विषय की कठिनता उसके मस्तिष्क के लिए एक चुनौती होती है और उसे वह सहर्ष स्वीकार करता है। नयापन उसे उत्साहित और उत्तेजित करता है, इसके विपरीत दोहराने का काम उसे ज़्यादा आकर्षित नहीं करता और वह पाठों को दोहराने के बजाए अन्य काम करना पसंद करता है। हिमांशु के साथ बिल्कुल दूसरी बात है, उसे दोहराने का काम सबसे ज़्यादा पसंद है। नई सामग्री भी उसे रुचिकर लगती है। वह सोचने वाला और जिज्ञासू छात्र है, किंतु शिक्षक के विषय को देर तक समझाते रहना उसे थका डालता है। उसे नई सामग्री को दिमाग़ में बैठाने में समय लगता है। किंतु यदि दोहराने का पाठ हो, तो तब दूसरी ही बात होती है। सामग्री का वह आदि हो चुका होता है, मुख्य मुद्दों और संकल्पनाओं ( concepts ) वह परिचित हो चुका होता है और इसीलिए वह अपने आत्म-विश्वास तथा कथनों की परिशुद्धता और प्रोढ़ता से श्रोताओं को चकित कर सकता है।

अमित और हिमांशु संवेगों के मामले में एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं, पहला जल्दी क्रुद्ध हो जाता है, जबकि दूसरा जल्दी द्रवित तथा मुग्ध होता है।

इन दो नवयुवकों की पृष्ठभूमि और प्रेक्षण ( observation ) से प्राप्त सामग्री से उनके स्वभाव के बारे में निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। सभी तथ्य यह बताते हैं कि अमित का तंत्रिका-तंत्र प्रबल असंतुलित की श्रेणी में आता है और उसके स्वभाव में पित्तप्रकृति ( कोपशीलता ) का प्राधान्य है। इसके विपरीत हिमांशु संभवतः दुर्बल श्रेणी में आता है और विषादी स्वभाव के कतिपय लक्षणों का प्रदर्शन करता है। किंतु उल्लेखनीय है कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्र से उसके कक्षा का एक सर्वोत्तम छात्र बनने और अपने में उच्च बौद्धिक योग्यताएं विकसित करने में बाधा नहीं पड़ी। अंतिम विश्लेषण में हम पाते हैं कि हिमांशु की तुलना में अमित की श्रेष्ठता सापेक्ष ( relative ) है। निस्संदेह, तत्काल प्रतिक्रियाएं और अपने को आसानी से नये कार्यभार के अनुरूप बदलने की योग्यता अत्यंत मूल्यवान गुण है। किंतु अमित अपनी सारी बौद्धिक शक्ति जैसे कि एक साथ झौंक देता है, जबकि हिमांशु अपना रास्ता टटोलते और धीरे-धीरे तथा अनिश्चय के साथ आगे बढ़ते हुए विषय में, उसकी पेचीदगियों तथा बारीकियों में बहुत गहराई तक पैठने की क्षमता रखता है। हिमांशु के बौद्धिक कार्य का दक्षता-स्तर ( efficiency level ) मात्रात्मक ( quantitative ) रूप से नीचा है, किंतु गुणात्मक ( qualitative ) दृष्टि से वह अमित के कार्य से किसी भी प्रकार हीनतर नहीं है। वास्तव में हिमांशु की सोचने की प्रक्रिया का धीमापन, जिसका कारण उसका दुर्बल तंत्रिका-तंत्र है, गहराई में पैठने की एक पूर्वापेक्षा बन जाता है।

क्रियाशीलता के स्तर और गतिशीलता के स्तर जैसे स्वभाव के अभिलक्षणों का पढ़ाई की कारगरता ( effectiveness ) पर बहुत ही विभिन्न क़िस्मों का प्रभाव पड़ सकता है। सब कुछ इसपर निर्भर है कि मनुष्य इन या उन गतिक गुणों का कैसे इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, निम्न बौद्धिक क्रियाशीलता जैसी कमी की प्रायः उच्च परिशुद्धता तथा सतर्कता द्वारा प्रतिपूर्ति कर ली जाती है। सामान्यतः मनुष्य की स्वभावगत विशेषताएं ही उसे कार्य की सर्वोत्तम प्रणाली या ढंग सुझा देती है। इसमें संदेह नहीं कि हर प्रकार के स्वभाव के अपने ही लाभ हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों और भेदों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका

मन की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति अपने को मनुष्य के व्यवहार के ढंग में ही नहीं, उसकी क्रियाओं में ही नहीं, अपितु उसके बौद्धिक क्षोभ ( excitement ), उसके अभिप्रेरकों और उसकी सामान्य कार्य-क्षमता में भी व्यक्त करती है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि मनुष्य के स्वभाव की विशेषताएं उसकी पढ़ाई या श्रम-सक्रियता को प्रभावित करती है।

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि स्वभावगत अंतरों का संबंध मनुष्य की मानसिक क्षमताओं ( mental abilities ) से नहीं, उसके मानस की अभिव्यक्तियों ( expressions ) से है। हर स्वभाव में कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक बातें होती हैं, जिन्हें तंत्रिका-तंत्र के भेद का स्वभाव के संबंधित गुणधर्मों के साथ, मनुष्य की सक्रियता के लिए उनके महत्त्व की दृष्टि से, संबंध स्थापित करके ही आंका जा सकता है।

प्रबल और दुर्बल प्रकार की सक्रियताएं

विशेष अनुसंधानों ने दिखाया है कि तंत्रिका-तंत्र का दौर्बल्य ( infirmity ), उत्तेजन ( stimulation ) और प्रावरोध ( inhibit ) की प्रक्रियाओं की अल्प प्रबलता का ही नहीं, अपितु मनुष्य की अति संवेदनशीलता ( high sensitivity ) अथवा प्रतिक्रियात्मकता का भी सूचक है। इसका मतलब है कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्र के अपने लाभ हैं। उसकी अभिलाक्षणिक विशेषताएं और अंतर्निहित संभावनाएं अनेक प्रयोगों और दैनंदिन प्रेक्षणों द्वारा प्रकाश में लाई जा चुकी हैं।

एक प्रयोग में छात्रों के एक समूह को सारे पाठ के दौरान सरल सवाल हल करने को दिये गए। छात्रों के तंत्रिका-तंत्र की क़िस्मों का पहले ही पता लगा लिया गया था। पाया गया कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों ने परिवेश के प्रति अपनी अधिक संवेदनशीलता और प्रतिक्रियात्मकता के कारण आरंभ में प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों से अधिक सवाल किए, किंतु वे ज़्यादा ही जल्दी थक जाते थे। इसके विपरीत जिन छात्रों के स्वभाव का निर्धारण प्रबल तंत्रिका-तंत्र द्वारा हुआ था, उन्हें ‘उत्प्रेरण-अवधि’ ( trigger - period ) की जरूरत पड़ी और फिर वे अपनी उत्पादिता घटाए बिना कहीं ज़्यादा लंबे समय तक काम करते रहे।

एक अन्य जांच में प्रयोगकर्ताओं ने ऊंची कक्षाओं के पढ़ाई में अच्छे छात्रों की अध्ययन-प्रक्रिया का प्रेक्षण किया। इनके तंत्रिका-तंत्र की प्रबलता पहले प्रयोगशाला-प्रयोगों द्वारा मालूम की गई थी। पता चला कि उनमें प्रबल और दुर्बल, दोनों तरह के तंत्रिका-तंत्रवाले छात्र हैं। किंतु उनके काम करने के ढंग अलग-अलग और उनके स्वभाव के अनुरूप थे। उनके स्वतंत्र कार्य को तीन कालों - तैयारी, निष्पादन तथा जांच के कालों - में बांटकर प्रयोगकर्ताओं ने देखा कि ज़्यादा तेज़ छात्र तैयारी और जांच पर कम समय खर्च करते थे ( उदाहरणार्थ, वे अपने निबंधों को उन्हें लिखने की प्रक्रिया में ही जांच या सुधार लेते थे ),  जबकि अपेक्षाकृत कमज़ोर छात्र तैयारी और जांच में ज़्यादा समय लगाते थे और आवश्यक सुधार करने के लिए उन्हें अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ती थी। दूसरा अंतर यह था कि तेज़ छात्र कई सारे काम विशेष आयोजना ( planning ) तथा समय-वितरण के बिना कर लेते थे, जबकि कमज़ोर छात्र नया काम पहले काम को पूरा कर लेने के बाद ही शुरू करना पसंद करते थे और दीर्घकालिक कामों के लिए दैनिक, साप्ताहिक, आदि योजनाएं बना लेते थे। जहां तक कार्य की सामान्य दक्षता का प्रश्न है, तो किसी भी स्वभाव को अधिमान ( precedence ) नहीं दिया जा सकता था।

यह पाया गया है कि कुछ प्रकार के नीरस कामों में अपेक्षाकृत कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले मनुष्य फ़ायदे में रहते हैं : उनकी अधिक संवेदनशीलता आवश्यक प्रतिक्रिया-स्तर पर बनाए रखने में और इंद्रियों को सुस्त बनानेवाली निद्रालुता ( somnolence ) को रोकने में सहायक बनती है। दूसरी ओर, जिन सक्रियताओं में मनुष्य का विशेषतः प्रबल, अप्रत्याशित अथवा भयावह क्षोभकों से वास्ता पड़ता है, उनमें अपेक्षाकृत दुर्बल लोग मात्र अपनी शरीरक्रियात्मक विशिष्टताओं के कारण चालू कार्यभारों ( assignments ) को पूरा करने में असमर्थ सिद्ध होते है।

इसका प्रमाण खेलकूद संबंधी गतिविधियों के मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण से प्राप्त जानकारी से मिलता है। एक अध्ययन में अनुसंधान का विषय प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के दौरान स्कूली बच्चों के खेल के व्यक्तिपरक अंतर ( subjective difference ) थे। पाया गया कि प्रबलतर तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों ने प्रशिक्षणात्मक अभ्यासों के बजाए महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिताओं में बेहतर परिणाम दिखाए, जबकि दुर्बलतर तंत्रिका-तंत्रवालों ने प्रशिक्षण के चरण में बेहतर और ज़्यादा स्थिर उपलब्धियां प्रदर्शित कीं। इसका कारण उनके स्वभावों के अंतर, अर्थात उत्तेज्यता, तंत्रिका-प्रबलता और बढ़े हुए उत्तरदायित्व तथा जोखिम के प्रभाव से संबंधित अंतर थे।

इस तरह प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले एक तरह की समस्याओं को हल करने में बेहतर परिणाम दिखाते हैं और कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले दूसरी तरह की समस्याओं को हल करने में। प्रायः तंत्रिका-तंत्र प्रबलता के मामले में असमान लोगों को एक ही तरह के कार्यभार की पूर्ति के लिए एक दूसरे से भिन्न मार्ग अपनाने पड़ते हैं।

गतिशील और जड़ सक्रियताएं

तंत्रिका प्रक्रियाओं की जड़ता ( inertia ), यानि उनकी अल्प सचलता, जो अपने को एक प्रक्रिया से विरोधी कर्षणशक्ति ( anti traction power ) की दूसरी प्रक्रिया में मंद परिवर्तन में प्रकट करती है, और धीरे उत्तेजन तथा प्रावरोध में व्यक्त उनकी भिन्न अस्थिर संवेगिता के नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों पहलू हो सकते हैं। जड़ता का नकारात्मक पहलू तंत्रिका-प्रक्रियाओं की धीमी गति है और सकारात्मक पहलू उनकी दीर्घता तथा स्थायित्व। संबंधित मानसिक अंतर मुख्यतः एक प्रक्रिया के रूप में सक्रियता की विशेषताओं ( characteristics ) की उपज होते हैं, न कि उसकी प्रभाविता ( effectiveness ) की उपज।

इस दृष्टि से विशेष प्रयोगों में अपेक्षाकृत गतिशील तथा जड़ स्वभावोंवाले छात्रों द्वारा श्रम-कौशल अर्जित करने की आरंभिक अवस्था में प्रदर्शित अंतर बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। अनुसंधानों ने दिखाया कि गतिशील छात्र, एक ओर, विभिन्न कार्यभारों की पूर्ति की उच्च दर प्रदर्शित करते हैं, तो, दूसरी ओर, अपर्याप्त विश्वसनीयता भी दिखाते हैं ( अनावश्यक जल्दबाजी के कारण कार्यभार के कुछ घटकों को छोड़ देना )। जिन कार्यभारों के लिए धीमी गतियों की जरूरत होती है, वे जड़ छात्रों द्वारा बेहतर तथा अधिक समरूप ढंग से संपन्न किए जाते हैं। बेशक, उनके काम में कभी-कभी अवांछित ( unwanted ) विलंब हो जाता है, किंतु कुलमिलाकर काम अधिक सावधानी के साथ पूरा किया जाता है। उनमें से अधिकांश अपने अपेक्षाकृत धीमेपन की कमी को शिक्षक की बातों तथा नक़्शों पर अधिक ध्यान देकर पूरी कर लेते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के भेद और स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभावो के भेदों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम उसी को आगे बढाते हुए उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों और भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्म
( properties of higher nervous system )

उच्चतर तंत्रिका-तंत्र, अथवा तंत्रिका-सक्रियता के भेदों का सिद्धांत, स्वभाव के वैज्ञानिक अध्ययन के इतिहास में एक वास्तविक मोड़बिंदु सिद्ध हुआ है। वैज्ञानिकों ने प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों के कार्य की सामान्य नियमसंगतियों के अलावा तंत्रिका-तंत्र के उन भेदों की भी खोज और जांच की, जो पशुओं की वैयक्तिकता ( individuality ) से संबंध रखते थे ( प्रयोग कुत्तों पर किये गए थे )। पाया गया कि कुत्ते के व्यवहार की कुछ विशेषताएं ( उदाहरणार्थ, सजीवता अथवा सुस्ती, साहसिकता अथवा कायरता ) मुख्य तंत्रिका-प्रक्रियाओं - उत्तेजन ( stimulation ) और प्रावरोध ( inhibition ) - की कतिपय विशेषताओं से संबद्ध थीं। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे जिन वैयक्तिक अंतरों का अध्ययन कर रहे थे, वे ऐसे शरीरक्रियात्मक अभिलक्षणों पर आधारित हैं, जैसे उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता ( predominance ), उनकी सचलता ( mobility ), अर्थात तेज़ी से एक दूसरे का स्थान लेने की योग्यता, और उत्तेजन तथा प्रावरोध के बीच संतुलन ( balance )। उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के विभिन्न भेदों के मूल में इन गुणधर्मों के विभिन्न संयोजन ( combination ) ही होते हैं।

तंत्र की जीवन-क्षमता का परिचायक सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता है। उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता पर ही प्रांतस्था के न्यूरानों की कार्यक्षमता तथा मज़बूती निर्भर होती है। वास्तव में परिवेश बहुसंख्य विभिन्न उद्दीपनों के रूप में तंत्रिका-तंत्र पर प्रबल प्रभाव डालता है : मनुष्य को लंबे समय तक कोई बहुत ही कठिन कार्य करना, आपात स्थिति से जूझना, अतिशय मानसिक तनाव पैदा करनेवाले प्रबल क्षोभकों पर प्रतिक्रिया दिखाना और कुछ क्षोभकों के प्रभाव में अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को इसलिए दबाना पड़ सकता है कि अन्य, अधिक महत्त्वपूर्ण क्षोभकों के संबंध में पूर्ण प्रतिक्रिया दिखाई जा सके। तंत्रिका-तंत्र कितना भार वहन कर सकता है, यह उत्तेजन और प्रावरोध की प्रक्रियाओं की प्रबलता पर निर्भर होता है।

अगला महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था में तंत्रिका-सक्रियताओं की सचलता है। परिवेश बदलता रहता है और मनुष्य पर उसका प्रभाव आकस्मिक और अप्रत्याशित हो सकता है। ऐसे में तंत्रिका-प्रक्रियाओं को पिछड़ना नहीं चाहिए। प्रयोगों ने दिखाया है कि कतिपय प्राणियों में उत्तेजन और प्रावरोध की वैकल्पिक प्रक्रियाएं अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक तेज़ी से संपन्न होती हैं। तंत्रिका-तंत्र का तीसरा अभिलक्षण भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है। यह है उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता के बीच संतुलन। कभी-कभी इन कारकों के बीच संतुलन नहीं होता और प्रावरोध उत्तेजन से कमज़ोर सिद्ध हो जाता है। संतुलन का स्तर सभी पशुओं में समान नहीं होता।

उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के भेद

यह पाया गया है कि उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के सभी वैयक्तिक अंतर उपरोक्त किसी एक अभिलक्षण से नहीं, अपितु सदा उनके संयोजनों से पैदा होते हैं। प्रयोगशाला-प्रयोगों ने दिखाया है कि इनमें से कुछ संयोजन और संयोजनों की अपेक्षा अधिक प्रायिकता ( probability ) के साथ घटित होते हैं अथवा उनकी अभिव्यक्तियां अन्यों की अपेक्षा अधिक सुस्पष्ट होती हैं। उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के मुख्य प्रभेद निश्चित किये गए, और तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता के अनुसार सभी कुत्तों को दो श्रेणियों में बांटा गया : बलवान और दुर्बल

दुर्बल क़िस्म के पशुओं में दोनों ही तंत्रिका-प्रक्रियाएं ( विशेषतः प्रावरोध की प्रक्रिया ) दुर्बल होती है। ऐसे कुत्ते घबराहट और हड़बड़ी दिखाते हैं, लगातार पीछे झांकते रहते हैं या किसी एक मुद्रा में जड़, निश्चेष्ट बनकर खड़े रहते हैं। इसका कारण यह है कि बाह्य प्रभाव, जो कभी-कभी बिल्कुल मामूली होता है, उनके लिए बड़ा प्रबल सिद्ध होता है। दीर्घ अथवा प्रबल उद्दीपन उन्हें जल्दी थका डालता है। बेशक दुर्बल पशुओं में आपस में तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता के अनुसार ही भेद नहीं होता, फिर भी ये भेद उनके तंत्रिका-तंत्र की सामान्य दुर्बलता के सामने गौण बन जाते हैं।

प्रबल पशुओं को संतुलित और असंतुलित में बांटा जाता है। असंतुलित को सामान्यतः प्रबल उत्तेजन और क्षीण प्रावरोध से पहचाना जाता है। चूंकि ऐसे कुत्तों में उत्तेजन की प्रक्रिया, प्रावरोध की प्रक्रिया द्वारा संतुलित नहीं होती, इसलिए वे भारी मानसिक तनाव की स्थिति में तंत्रिकावसाद के शिकार बन जाते हैं। उनमें से अधिकांश आक्रामक, अति-उत्तेजनीय पशु होते हैं। प्रबल संतुलित कुत्तों को उनकी तंत्रिका-सक्रियता में परिवर्तन की गति के अनुसार फुरतीला और शांत, इन दो कोटियों में बांटा जाता है। उनके व्यवहार से उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है - फुरतीले कुत्ते हलचलपूर्ण तथा उत्तेजनीय होते हैं और शांत कुत्ते मंदगति तथा मुश्किल से उत्तेजित होनेवाले।

अतः वैज्ञानिकों ने उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के चार मुख्य भेद निर्धारित किये हैं : ( १ ) प्रबल संतुलित स्फूर्तिशील, ( २ ) प्रबल संतुलित शांत, ( ३ ) प्रबल असंतुलित ( निरंकुश ) और ( ४ ) दुर्बल

तंत्रिका-सक्रियता का हर भेद शरीर का एक प्राकृतिक अभिलक्षण ( characteristics ) है। सारतः वंशागत होने पर भी वह अपरिवर्तनीय नहीं है और कुछ सीमाओं के भीतर परिवेश के प्रभावों पर प्रतिक्रिया करते हुए विकास की प्रक्रिया से गुजरता है। उदाहरण के लिए, प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि उत्तेजन की तुलना में पिछड़ी हुई प्रावरोध की प्रक्रिया को समुचित प्रशिक्षण द्वारा प्रबलित किया जा सकता है। यह भी ज्ञात है कि उम्र के साथ तंत्रिका-प्रक्रियाओं का स्वरूप बदलता जाता है।

स्वभावों का शरीरक्रियात्मक आधार तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता, संतुलन और सचलता के विभिन्न संयोजन होते हैं, जिनके अनुसार उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के विभिन्न भेदों का निर्धारण किया जाता है। प्रबल संतुलित सफूर्तिशील प्रकार की तंत्रिका-सक्रियता का संबंध रक्तप्रकृति ( उत्साही स्वभाव ) से है, प्रबल संतुलित मंद तंत्रिका-सक्रियता का श्लैष्मिक प्रकृति ( शीत स्वभाव ) से, प्रबल अंसतुलित प्रकार का पित्तप्रकृति ( कोपशील स्वभाव ) से और दुर्बल प्रकार का वातप्रकृति ( विषादी स्वभाव ) से है।

पशुओं पर प्रयोगों के परिणामस्वरूप किया गया तंत्रिका-तंत्रों का वर्गीकरण पूर्णतः मनुष्यों पर भी लागू होता है। मनुष्य के तंत्रिका-तंत्र का हर गुणधर्म उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है और क्रियाशीलता, संवेगात्मकता तथा गतिशीलता जैसा हर परिवर्तनशील अभिलक्षण उसके तंत्रिका-तंत्र के किसी एक गुणधर्म पर ही नहीं, बल्कि तंत्रिका-तंत्र के भेद पर भी निर्भर होता है।

मनुष्य के स्वभाव की अभिव्यक्तियां अपने पर उसके सामाजिक परिवेश, मानकों तथा अपेक्षाओं की छाप लिए रहती हैं। इसके अतिरिक्त हर मनुष्य का अपना स्वभाव होता है, जो उसके तंत्रिका-तंत्र के स्थिर गुणधर्मों से निर्धारित होता है। मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति के इस आधार की किसी भी प्रकार उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 26 नवंबर 2011

स्वभावो के भेद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभाव की संकल्पना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम स्वभावो के भेद पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्वभावो के भेद
( differences in human natures )

व्यक्ति के स्वभाव ( nature ) के बारे में हमारी राय सामान्यतः इस व्यक्ति की मानसिक विशेषताओं के हमारे ज्ञान पर आधारित होती है। इस तरह मानसिकतः सक्रिय मनुष्य को, जो सामाजिक परिवेश में परिवर्तनों पर तुरंत प्रतिक्रिया दिखाता है, नये-नये अनुभव पाना चाहता है, उचित हद तक आशावादी है, स्फूर्तिवान और ज़िंदादिल है और हाव-भाव के मामले में उन्मुक्त है, उसे रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य कहा जाता है। श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) उसे कहा जाता है, जो अति-संयत है, जिसकी इच्छाएं तथा मनोदशाएं बदलती नहीं रहतीं, जिसकी भावनाओं में स्थायित्व तथा गहनता है, जो अपना संतुलन नहीं खोता, ऊंची आवाज़ में नहीं बोलता और मन के भावों को बाहर नहीं आने देता। इसके विपरीत पित्तप्रकृति ( कोपशील ) व्यक्ति की विशेषताएं उर्जा का उफान, काम के प्रति घोर लगन, कर्मठता, सहज ही भावावेश में आ जाना, मनोदशा में एकाएक परिवर्तन और असंयत चेष्टाएं हैं। वातप्रकृति ( विषादी ) मनुष्य संवेदनशील, सहज ही चोट खा जानेवाला, बाहर से संयत लगने पर भी भावुक, मंदगति और मंदभाषी होता है।

हर प्रकार के स्वभाव में मानसिक विशेषताओं का अपना अन्योन्यसंबंध, क्रियाशीलता तथा संवेगात्मकता का अपना अनुपात और अपनी विशिष्ट गतिशीलता होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हर स्वभाव के लिए मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति की एक निश्चित संरचना अभिलाक्षणिक है। स्वाभाविकतः सभी लोगों को इन चार कोटियों में नहीं रखा जा सकता। फिर भी उपरोक्त भेदों को सामान्यतः मुख्य भेद माना गया है और अधिकांश लोग उसके अंतर्गत आते हैं।

१२-१३ वर्ष की आयु में स्वभाव के मुख्य भेदों की ठेठ मिसालें कुछ इस तरह दी जा सकती हैं।

रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) - राहुल बड़ा ज़िंदादिल तथा चंचल है, कक्षा में कभी चैन से नहीं बैठता, हर समय कुछ न कुछ करता रहता है, तेज़ और कूदते हुए चलता है, जल्दी-जल्दी बोलता है। बड़ा संवेदनशील है और आसानी से प्रभावित हो जाता है। फिल्म या किताब के बारे में बड़े चाव और उत्साह से बातें करता है, पाठ के दौरान हर नई जानकारी को तुरंत ग्रहण कर लेता है और नये कार्यभारों ( assignments ) को पूरा करने को तैयार रहता है। साथ ही उसकी रुचियां और शौक बड़े अस्थायी हैं तथा जैसे आसानी से पैदा होते हैं, वैसे ही आसानी से खत्म भी हो जाते हैं। उसका चेहरा उसकी मनोदशाओं तथा रवैयों ( attitudes ) को साफ़-साफ़ दिखा देता है। जो पाठ उसे दिलचस्प लगते हैं, उनमें वह अत्यधिक क्षमता दिखाता है, और जो पाठ नीरस ( monotonous ) लगते हैं उनमें जम्हाइयां लेता है, बगल के बच्चों से बातों में व्यस्त रहता है। उसकी भावनाएं और मनोदशाएं बड़ी परिवर्तनशील हैं। कम अंक आने पर उसकी आंखों में आंसू छलछला आते हैं, पर थोड़ी देर बाद ही आधी छुट्टी में गलियारे में उछल-कूद मचाने लगता है। उसकी चंचलता और शोख़पन के बावज़ूद उसे क़ाबू में किया जा सकता है, अनुभवी शिक्षकों की कक्षाओं में वह कभी ऊधम नहीं मचाता। वह अन्य लड़के-लड़कियों से खूब हिला-मिला हुआ है और सामूहिक कार्यों में सक्रिय भाग लेता है।

पित्तप्रकृति ( कोपशील ) - कमल सहपाठियों के बीच अपने उतावलेपन के लिए प्रसिद्ध है। शिक्षक की बातें यदि उसे दिलचस्प लगती हैं, तो वह अत्यंत उत्तेजित हो जाता है और बीच में ही अपनी प्रतिक्रिया दिखाने लगता है। वह बिना सोचे ही प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार रहता है और इसीलिए प्रायः अप्रासंगिक ( irrelevant ) उत्तर देता है। चिढ़ने या निराश होने पर बड़ी जल्दी संयम खो बैठता है और लड़ने लगता है। वह अध्यापक को ध्यान से सुनता है और ऐसे ही ध्यान से गृहकार्य और कक्षा में दिया गया काम भी करता है। मध्यांतर में दौड़ता-भागता रहता है या किसी से गुत्थमगुत्था हो जाता है। जल्दी-जल्दी और जोर से बोलता है, और चेहरा अत्यंत अभिव्यक्तिपूर्ण है। सामूहिक कार्यों, खेलकूद में समर्पण भाव से भाग लेता है। कमल की रुचियां स्थायी और स्थिर हैं, वह कठिनाइयों से नहीं घबराता और उन्हें लांघकर ही दम लेता है।

वातप्रकृति ( विषादी ) - सुमित पाठों के दौरान चुपचाप, एक ही स्थिति में बैठा और हाथों में कोई चीज़ लिए उलटता-पुलटता रहता है। उसकी मनोदशा मामूली-सी वजह से भी बदल सकती है। वह बड़ा संवेदनशील है। एक बार शिक्षक ने उसे दूसरी जगह पर बैठने को कहा, यह उसे अच्छा न लगा और वह बहुत देर तक इसके बारे में सोचता रहा और सारे दिन परेशान और उदास रहा। दूसरी ओर, उसमें भावनाएं धीरे-धीरे ही जागृत होती हैं। सर्कस में वह काफ़ी समय तक चुपचाप , भावशून्य बैठा रहता है, फिर धीरे-धीरे चेहरे पर मुस्कान उभरती है और वह हंसने तथा पडौ़सियों से बातें करने लगता है। वह बड़ी जल्दी घबड़ा जाता है। वह अपनी भावनाओं को मुश्किल से ही प्रकट होने देता है। कम अंक मिलने पर वह चुपचाप, चेहरे के भाव में कोई परिवर्तन लाए बिना अपनी जगह पर जाकर बैठ जाता है, मगर जब घर पहुंचता है, तो देर तक शांत नहीं हो पाता। प्रश्नों के उत्तर झिझकते-झिझकते और रुकते-रुकते देता है। अपनी योग्यताओं और ज्ञान के बारे में कोई ऊंची राय नहीं रखता, हालांकि उनका स्तर सामान्य से ऊंचा ही है। कठिनाइयों से विचलित हो जाता है और अक्सर काम को अंत तक पूरा नहीं कर पाता।

श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) - सुधीर मंदगति और शांत लड़का है। उत्तर अच्छी तरह जानने पर भी विलंब से और बिना किसी उत्साह के देता है। वह अतिरिक्त दिमाग़ी मेहनत से कतराता नहीं और चाहे कितनी भी देर तक काम करे, कभी थकता नहीं है। वह बोलते समय आवाज़ एक सी बनाए रखता है, अपनी बात को विस्तार से और लंबे-चौडें तर्कों के साथ पेश करना पसंद करता है। वह बाहर से सदा शांत बना रहता है और कक्षा की कोई भी घटना उसे चकित नहीं करती। उसे गणित और शारीरिक व्यायाम के पाठ शुरु से ही पसंद थे, और आज भी लगाव बना हुआ है। वह खेलकूद प्रतियोगिताओं में भाग लेता है, पर अन्य अधिकांश बच्चों जैसे अतिशय जोश और उत्तेजना का प्रदर्शन नहीं करता। किसी ने उसे कभी तमाशा करते, खुलकर हंसते-खेलते या परेशान होते नहीं देखा है।

स्वभावो के इन भेदों के पीछे उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के जन्मजात गुणधर्म और तंत्रिका-सक्रियताओं के वैयक्तिक विकास के दौरान उत्पन्न हुए भेद हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 19 नवंबर 2011

स्वभाव की संकल्पना (concept of human nature)

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताओं को समझने की कोशिश की थी, इस बार से हम व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कोशिश करेंगे और स्वभाव की संकल्पना से चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षण
स्वभाव की संकल्पना ( concept of human nature )

वैयक्तिक-मानसिक भेदों में तथाकथित गतिशील अभिलक्षण ( dynamic characteristics ) भी शामिल किए जाते हैं, जो मनुष्य की मनोरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गतिशील अभिलक्षणों से आशय मुख्य रूप से मानसिक प्रक्रियाओं की सघनता ( denseness ) और गति से होता है। सर्वविदित है कि सक्रियता तथा व्यवहार के अभिप्रेरक और परिवेशी प्रभाव बहुत कुछ एक जैसे होने पर भी लोगों में संवेदनशीलता ( sensitivity ), आवेगशीलता ( impulsiveness ) और ऊर्जा ( energy ) के लिहाज़ से आपस में बड़ा अंतर होता है। उदाहरण के लिए, एक मनुष्य मंद और ढीला-ढाला होता है, तो दूसरा तेज़ और जल्दबाज़ ; एक की भावनाएं बड़ी आसानी से भड़क जाती हैं, तो दूसरा धैर्य और शांति बनाए रखता है ; एक के बोलते समय अगर उसकी हाथ की मुद्राएं तथा चेहरे के भाव भी भी बोलते हैं, तो दूसरा अपने अंगों की गतियों को नियंत्रण में रखता है और चेहरे पर लगभग कोई भाव नहीं आने देता। अन्य स्थितियां समान होने पर गतिशील भेद मनुष्य की सामान्य क्रियाशीलता, उसकी गतिशीलता तथा संवेगात्मकता में भी दिखाई देते हैं।

निस्संदेह मनुष्य के गातिशील अभिलक्षण काफ़ी हद तक उसके द्वारा सीखी गई आदतों ( habits ), रवैयों ( attitudes ) और स्थिति के तकाज़ों पर निर्भर होते हैं। फिर भी इस बारे में दो रायें नहीं है कि विचाराधीन व्यक्तिगत भेदों का एक जन्मजात आधार भी है। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि वे अपने को आरंभिक बाल्यावस्था में ही प्रकट कर देते हैं और स्थिर होते हैं, और व्यवहार के विभिन्न रूपों तथा सक्रियता के अत्यंत विविध क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

मनुष्य के जन्मजात गतिशील गुण परस्पर-संबद्ध होते हैं और मिलकर स्वभाव ( nature ) के नाम से पुकारे जाते हैं। स्वभाव मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति ( reactionary tendency ) के प्राकृतिकतः अनुकूलित अभिलक्षणों ( naturally conditioned characteristics ) की समष्टि है

प्राचीन काल में भी वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने वैयक्तिक मानसिक भेदों की प्रकृति पर ध्यान दिया था। प्रसिद्ध आयुर्विज्ञानी हिप्पोक्रेटीज़ ( पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व ) का विश्वास था कि शरीर की अवस्थाएं मुख्य रूप से ‘रसों’ या शरीर के तरल पदार्थों - रक्त ( blood ), लसीका ( lymph ), पित्त ( bile ) - के परिणामात्मक अनुपात पर निर्भर होती हैं। शनैः शनैः यह माना जाने लगा कि मनुष्य की मानसिक विशेषताएं शरीर में जीवनदायी रसों के इस अनुपात पर निर्भर होती हैं। दूसरी शताब्दी ईसापूर्व के रोमन शरीररचनाविज्ञानी गालेन ने पहली बार स्वभावों का विशद वर्गीकरण किया और उनके १३ भेद बताए। बाद में उनकी संख्या घटाकर केवल ४ कर दी गई। उनमें से प्रत्येक में शरीर के चार द्रवों - रक्त, लसीका, पीत पित्त और कृष्ण पित्त - में से किसी एक द्रव की प्रधानता होती है। ये चार प्रकार के स्वभाव इस प्रकार थे : रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव, उत्साही ), श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ), पित्तप्रकृति ( कोपशील ) और वातप्रकृति ( विषादी )।

प्राचीन यूनानी-रोमन विज्ञान द्वारा प्रतिपादित स्वभाव के शारीरिक आधार के सिद्धांत में अब केवल ऐतिहासिक रूचि ली जा सकती है। फिर भी यह कहना ही होगा कि प्राचीन मनीषियों के इस विचार की विज्ञान के उत्तरकालीन विकास से पूर्ण पुष्टि हो गई है कि वैयक्तिक प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्तियों ( मानस की गत्यात्मक अभिव्यक्तियों ) के सभी रूपों को चार आधारभूत रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

बाद के युगों में स्वभावों के बीच भेदों का कारण बताने के लिए बहुत-सी प्राक्कल्पनाएं ( hypothesis ) प्रस्तुत की गईं। वैज्ञानिक चिंतन पर प्राचीन आयुर्विज्ञानियों के प्रभाव की पुष्टि देहद्रवी तंत्रों को दिये गए महत्व से होती है। जर्मन दार्शनिक इम्मानुएल कांट ( १८वीं शताब्दी ) का विश्वास था कि स्वभाव का निर्धारण रक्त के गुणधर्मों से होता है। इससे ही मिलता जुलता मत रूसी शरीररचनाविज्ञानी प्योत्र लेसगाफ़्त  ने व्यक्त किया, जिन्होंने लिखा ( १९वीं शताब्दी के अंत में ) कि स्वभाव रक्त के संचार, विशेषतः रक्त वाहिकाओं की भित्तियों की मोटाई तथा प्रत्यास्थता, उनके आंतरिक व्यास, ह्र्दय के आकार, आदि की क्रिया है। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर की उत्तेज्यता के व्यक्तिपरक अभिलक्षण और विभिन्न उद्दीपनों के संबंध में शरीर की प्रतिक्रिया की अवधि रक्त के प्रवाह की गति और दाब पर निर्भर होते हैं। जर्मन मनश्चिकित्सक एन्सर्ट क्रेट्‍श्मेर ने यह विचार प्रतिपादित किया ( १९२० के दशक और बाद में ) कि मनुष्य की मनोरचना उसके शरीर की रचना तथा डील-डौल के अनुरूप होती है। यहां डील-डौल और कतिपय मानसिक विशेषताओं के बीच संबंध इसलिए है कि उनका एक ही आधार है : रक्त की रासायनिक संरचना और अंतःस्रावी तंत्र की ग्रंथियों द्वारा निस्सारित हार्मोन। १९४० के दशक में अमरीकी वैज्ञानिक वाल्टर शेल्डन ने भी यही मत प्रकट किया कि मनुष्य की वैयक्तिक मानसिक विशेषताएं हार्मोनी तंत्र द्वारा नियंत्रित शारीरिक ढांचे से, यानी शरीर के विभिन्न ऊतकों के परस्परसंबंध से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती है।

यह नहीं कहा जा सकता कि ये मत सर्वथा निराधार हैं। किंतु वे समस्या के एक ही पहलू की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं और वह भी मुख्य पहलू नहीं है। सभी मानसिक परिघटनाएं सीधे मानस के आधारभूत अंग, मस्तिष्क के गुणधर्मों की उपज होती हैं और यही मुख्य बात है। यद्यपि शरीर के तरलों अथवा रसों के महत्त्व का प्राचीन विचार हार्मोनी कारकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका से संबद्ध बाद के विचारों से मेल खाता है, फिर भी स्वभाव के प्राकृतिक आधार के बारे में आजकल किए जा रहे अनुसंधान इस बुनियादी तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकते कि व्यवहार की गतिकी ( dynamics ) को प्रभावित करनेवाले सभी आंतरिक ( और बाह्य ) कारक अपना कार्य अनिवार्यतः मस्तिष्क के माध्यम से करते हैं। आधुनिक विज्ञान स्वभाव के व्यक्तिपरक भेदों का कारण मस्तिष्क ( प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था और अवप्रांतस्था केंद्रों ) की प्रकार्यात्मक ( functional ) विशेषताओं में, उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों में देखता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 नवंबर 2011

इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं
( Subjective features of volition )

मनुष्य की सक्रियता के सचेतन संगठन तथा नियमन ( regulation ) के रूप में इच्छाशक्ति आंतरिक कठिनाइयों को लांघने की ओर लक्षित होती है और मुख्य रूप से आत्म-नियंत्रण ( self control ) के रूप में अपने को प्रकट करती है। सर्वविदित है कि आत्म-नियंत्रण की क्षमता सभी लोगों में एक जैसी नहीं होती। इच्छाशक्ति की बहुत ही विविध व्यक्तिपरक विशिष्टताएं मिलती हैं। फिर तीव्रता की दृष्टि से भी, प्रचंड और दुर्बल के बीच इसकी बहुविध अभिव्यक्तियां पाई जाती हैं। प्रचंड इच्छाशक्तिवाला मनुष्य अपने लक्ष्य के मार्ग में आनेवाली कैसी भी कठिनाइयों को लांघ सकता है और दृढ़निश्चय, साहस और सहनशक्ति जैसे संकल्पमूलक गुण प्रकट करता है। इसके विपरीत दुर्बल इच्छाशक्तिवाला आदमी कठिनाइयों से कतराता है, साहस, दृढ़ता तथा संयम का अभाव दिखाता है और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित उच्चतर अभिप्रेरकों की ख़ातिर क्षणिक इच्छाओं, आकांक्षाओं को दबाने में असमर्थ सिद्ध होता है।

दुर्बल इच्छाशक्ति की अभिव्यक्तियां भी उतनी ही विविध हैं, जितने विविध दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए लाक्षणिक गुण हैं। इच्छाशक्ति की दुर्बलता की चरम अभिव्यक्तियां, जैसे संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता, सामान्य मानस की सीमा के बाहर है।

संकल्प-अक्षमता सक्रियता के उत्प्रेरण के अभाव और निर्णय लेने या कार्य करने की अयोग्यता को कहते हैं, जिनका कारण मस्तिष्क के विकार हैं। संकल्प-अक्षमता का रोगी चिकित्सक के निर्देशों के पालन की आवश्यकता स्पष्टतः अनुभव करने पर भी अपने को उनके पालन के लिए तैयार नहीं कर पाता। गति-अक्षमता प्रमस्तिष्क के प्रेरक क्षेत्र ( ललाट खंडों ) में विकृतियों के कारण सोद्देश्य क्रियाएं करने की अयोग्यता को कहते हैं। यह अपने को निर्धारित कार्यक्रम के बाहर स्थित गतियों तथा क्रियाओं के ऐच्छिक विनिमयन ( voluntary regulation ) के क्षीण बनने में प्रकट करता है। गति-अक्षमता संकल्पात्मक क्रियाओं के निष्पादन ( execution ) को असंभव बना देती है।

संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता अपेक्षाकृत विरल विकृतियां हैं और मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचे होने का संकेत देती हैं। शिक्षकों का अपने कार्य के दौरान दुर्बल इच्छाशक्ति की जिस परिघटना से प्रायः साक्षात्कार होता है, सामान्यतः उसका कारण कोई विकृति नहीं, अपितु ग़लत शिक्षा और पालन होते हैं। यह कमी व्यक्तित्व-निर्माण की व्यूह रचना के दायरे में संगठित शिक्षा प्रयासों से दूर की जा सकती है। दुर्बल इच्छाशक्ति की सबसे ठेठ अभिव्यक्ति आलस्य ( laziness ), अर्थात कठिनाइयों से बचने और संकल्पात्मक प्रयासों से कतराने की प्रवृत्ति है। ध्यान देने योग्य बात है कि बहुत-से लोग सामान्यतः अपनी कमियां स्वीकार करने को सहमत न होने पर भी आलस्य को अपनी सभी दिक़्क़तों की जड़ मान लेने पर तुरंत राज़ी हो जाते हैं। "आपने ठीक कहा, मैं आलसी हूं" - मित्रों द्वारा आलोचना किए जाने पर कोई भी आदमी यह कह सकता है और मुस्कुराते हुए अपनी छोटी-मोटी ग़लतियां सहर्ष स्वीकार कर लेता है। इस सहजता से की हुई स्वीकारोक्ति के पीछे वास्तव में मनुष्य की अपने बारे में ऊंची राय छिपी होती है। वह जैसे यह कहती है कि इस आदमी में बहुत से गुण छिपे हैं, जो अगर यह आलसी न होता, तो वे अपने को अवश्य ही प्रकट कर देते।

किंतु स्वीकारोक्ति में छिपा यह भाव सर्वथा भ्रांतिजनक है। निष्कर्मण्यता मनुष्य की अशक्तता तथा ढीले-ढालेपन को, उसकी अपने को जीवन के अनुकूल ढाल पाने की असमर्थता तथा साझे ध्येय के प्रति उदासीनता को इंगित करती है। आलसी मनुष्य की विशेषता नियंत्रण का बाह्य स्थान-निर्धारण है और इसलिए वह ग़ैर-ज़िम्मेदार होता है। आलस्य और दुर्बलता की अन्य अभिव्यक्तियां - कायरता, अनिश्चय, संयम का अभाव, आदि - व्यक्तित्व के गंभीर दोष हैं, जिन्हें दूर करने के लिए बड़े शैक्षिक प्रयासों और मुख्य रूप से कड़ी आत्म-शिक्षा ( self-education ) की आवश्यकता होती है।

इच्छाशक्ति के सकारात्मक गुण, उसकी दृढ़ता की अभिव्यक्तियां सफल सक्रियता की महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) हैं और उनसे मनुष्य के व्यक्तित्व की अच्छी तस्वीर बनती है। इन गुणों में निर्भीकता, कर्मठता, दृढ़निश्चय, आत्मनिर्भरता, आत्म-नियंत्रण, आदि शामिल किए जाते हैं। दृढ़निश्चय ( determination ) एक संकल्पमूलक गुण है, जो दिखाता है कि दत्त मनुष्य स्वतंत्र महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकता है और उन्हें क्रियान्वित कर सकता है। दृढ़ चरित्रवाले मनुष्य में अभिप्रेरकों का द्वंद लंबी प्रक्रिया नहीं बनता और शीघ्र ही किसी निर्णय के लिए जाने और क्रियान्वित किए जाने के साथ समाप्त हो जाता है। यह निर्णय सदा सामयिक ( कभी-कभी तत्क्षण भी ) और खूब सोचा-विचारा होता है। जल्दबाज़ी में लिया हुआ निर्णय प्रायः मनुष्य की आंतरिक तनाव से मुक्ति पाने और अभिप्रेरकों के द्वंद को खत्म करने की इच्छा का सूचक होता है, ना कि चरित्र की दृढ़ता का। दूसरी ओर, निर्णय लेने तथा उसे अमली रूप देने को लगातार टालना निश्चय ही कमज़ोर इच्छाशक्ति का प्रमाण है।

इच्छा की स्वतंत्रता के लिए, एक ओर, दूसरों की सलाहों तथा रायों को सुनना और, दूसरी ओर, उनके बारे में संयत रवैया ( moderate attitude ) अपनाना आवश्यक है। दृढ़निश्चय और स्वावलंबन ( independence ) संकल्पात्मक कार्यों में नियंत्रण के आंतरिक स्थान-निर्धारण के परिचायक होते हैं। स्वतंत्र इच्छा, एक ओर, जिद्दीपन ( waywardness ) तथा नकारवाद ( denial ) की विरोधी है और, दूसरी ओर, सहजप्रभाव्यता ( impressionable ) तथा अनुकारिता ( imitability ) की प्रतिध्रुवस्थ। सहजप्रभाव्य मनुष्य की अपनी कोई राय नहीं होती और उसका व्यवहार परिस्थितियों तथा दूसरे लोगों के प्रभाव पर निर्भर होता है, जबकि जिद्दीपन मनुष्य को तर्कबुद्धि के विरुद्ध कार्य करने और अन्य लोगों की सलाह पर कोई ध्यान न देने को प्रेरित करता है। अंतर्वैयक्तिक संबंधों में आत्म-निर्भरता अथवा इच्छा-स्वातंत्र्य व्यक्तित्व की एक विशेषता के नाते अपने को सामूहिकतावादी आत्म-निर्णय में अधिकतम व्यक्त करते हैं।

इच्छाशक्ति को "दृढ़ता-दुर्बलता" के मापदंड से ही नहीं आंका जा सकता। इच्छा का नैतिक पहलू, उसकी समाजोन्मुखता तथा परिपक्वता भी, अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरे शब्दों में, संकल्पात्मक कार्यों का नैतिक मूल्यांकन मनुष्य के अभिप्रेरकों की सामाजिक महत्व पर निर्भर होता है



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 5 नवंबर 2011

संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति और जोखिम के अंतर्संबंधों पर चर्चा की थी, इस बार हम संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना
( structure of volitive actions )

मनुष्य की इच्छाशक्ति और सामान्यतः क्रियाशीलता का आधार उसकी आवश्यकताएं ( needs ) हैं, जो क्रियाओं और कार्यों के लिए तरह-तरह के अभिप्रेरकों ( motivators ) को जन्म देती हैं।

संकल्पात्मक क्रियाओं के अभिप्रेरक

मनोविज्ञान में अभिप्रेरक तीन अपेक्षाकृत स्वतंत्र प्रकार की मानसिक परिघटनाओं ( phenomena ) को कहा जाता है, जो आपस में घनिष्ठतः संबद्ध ( related, associated ) तो हैं, किंतु एक नहीं है। इनमें सर्वप्रथम वे अभिप्रेरक आते हैं, जो मनुष्य की आवश्यकताओं की तुष्टि की ओर लक्षित सक्रियता के लिए अभिप्रेरणा का काम करते हैं। इस दृष्टि से देखे जाने पर अभिप्रेरक मनुष्य की सामान्यतः क्रियाशीलता का और मनुष्य को सक्रियता के लिए जागृत करने वाली आवश्यकताओं का स्रोत है।

दूसरे, अभिप्रेरक क्रियाशीलता की वस्तुओं को इंगित करते हैं और बताते हैं कि मनुष्य ने किसी ख़ास स्थिति में किसी ख़ास ढंग से ही व्यवहार क्यों किया है। इस अर्थ में अभिप्रेरकों को मनुष्य द्वारा चुने गए व्यवहार के एक निश्चित ढंग के पीछे छिपे कारणों का समानार्थक समझा जा सकता है और अपनी समग्रता में वे मनुष्य के व्यक्तित्व की अभिमुखता ( personality orientation ) के परिचायक होते हैं।

तीसरे, अभिप्रेरक मनुष्य के स्वतःनियमन ( self-regulation ) के साधन, यानि अपने व्यवहार तथा सक्रियता को नियंत्रित ( control ) करने का उपकरण हैं। इन साधनों में संवेगों, इच्छाओं, अंतर्नोदों, आदि को शामिल किया जाता है। संवेग मनुष्य द्वारा अपनी क्रिया के व्यक्तिगत महत्त्व का मूल्यांकन हैं और यदि क्रिया उसकी सक्रियता के अंतिम लक्ष्य से मेल नहीं खाती, तो संवेग उस क्रिया की सामान्य दिशा को बदल देते हैं, मनुष्य के व्यवहार को पुनर्गठित ( reconstituted ) करते हैं और मूल उत्प्रेरकों के प्रबलन ( reinforcement ) के लिए नये उत्प्रेरक लाते हैं।

संकल्पात्मक क्रिया में उसकी अभिप्रेरणा के उपरोक्त तीनों प्रकारों अथवा पहलुओं - क्रियाशीलता का स्रोत, उसकी दिशा और स्वतःनियमन के साधन - का समावेश रहता है।

संकल्पात्मक क्रिया के घटक

आवश्यकताओं से पैदा होनेवाले अभिप्रेरक मनुष्य को कुछ क्रियाएं करने को प्रोत्साहित करते हैं और कुछ क्रियाएं करने से रोकते हैं। मनुष्य को अपने अभिप्रेरकों का कितना ज्ञान है, इसे देखते हुए अभिप्रेरकों को अंतर्नोदों और आकांक्षाओं में बांटा जाता है।

अंतर्नोद सक्रियता का ऐसा अभिप्रेरक है, जो अभी पूरी तरह न समझी गई, न पहचानी गई आवश्यकता का प्रतिनिधित्व करता है। किसी निश्चित व्यक्ति के प्रति अंतर्नोद की अभिव्यक्ति यह है कि मनुष्य को उस व्यक्ति को देखते ही, उसकी आवाज़ सुनते ही हर्ष अनुभव होता है, और वह उससे, प्रायः अनजाने ही, मिलना, बातें करना चाहता है। किंतु कभी-कभी मनुष्य अपने हर्ष के कारण से अनभिज्ञ भी हो सकता है। अंतर्नोद अस्पष्ट और अव्यक्त होते हैं।

आकांक्षाएं सक्रियता के वे अभिप्रेरक हैं, जिनकी विशेषता है उनके मूल में निहित आवश्यकताओं की मनुष्य को चेतना। प्रायः मनुष्य अपनी आवश्यकता की वस्तु को ही नहीं जानता, अपितु उसकी तुष्टि के संभावित उपाय भी जानता है। गरमी में चिलचिलाती धूप में प्यास लगने पर आदमी छाया और शीतल जल के बारे में सोचने लग जाता है।

सक्रियता के अभिप्रेरक मनुष्य के जीवन की परिस्थितियों और अपनी आवश्यकताओं की उसकी चेतना को प्रतिबिंबित करते हैं। मनुष्य को कभी कोई अभिप्रेरक अधिक महत्त्वपूर्ण लगते हैं, तो कभी कोई। उदाहरण के लिए, अपने मित्र के साथ सिनेमा जाने की अपेक्षाकृत गौण इच्छा कभी-कभी किशोर के लिए अपनी पढ़ाई करने की आवश्यकता से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत हो सकती है। विभिन्न उत्प्रेरकों के बीच से किसी एक ( या कुछेक ) को चुनने की आवश्यकता से पैदा होनेवाले अभिप्रेरकों के द्वंद में उच्चतर क़िस्म के अभिप्रेरक, यानि जिनके मूल में सामाजिक हित ( social interests ) हैं, वे अभिप्रेरक स्वार्थसिद्धि की ओर लक्षित निम्नतर क़िस्म के अभिप्रेरकों से टकरा सकते हैं। यह संघर्ष कभी-कभी मनुष्य के लिए बड़ी पीड़ा तथा चिंता का कारण बनता है, किंतु कभी-कभी वह विभिन्न विकल्पों के बारे में शांतिमय बहस चलाए जाने और हर विकल्प का सभी पहलुओं से मूल्यांकन किए जाने का रूप भी ले सकता है। उदाहरण के लिए, किसी छात्र के लिए यह तय करने में कठिनाई हो सकती है कि शाम को पुस्तकालय जाए या थियेटर, अथवा अपने मित्र के किसी बेईमानीभरे काम की वज़ह से उससे मैत्री तोड़ने का निर्णय करते समय कर्तव्य की भावना और मित्र से लगाव की भावना के बीच टकराव की पीड़ा सहनी पड़ सकती है। अभिप्रेरकों के इस संघर्ष में निर्णायक भूमिका कर्तव्य की भावना, विश्व-दृष्टिकोण तथा नैतिक मान्यताओं की होती हैं

अभिप्रेरकों के संयत विश्लेषण ( analysis ) अथवा संघर्ष ( struggle ) के परिणामस्वरूप मनुष्य कोई निश्चित निर्णय करता है, यानी लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के साधन निर्धारित करता है। इस निर्णय पर या तो तुरंत अमल किया जा सकता है या अमल को टाला जा सकता है। टालने की स्थिति में निर्णय एक दीर्घकालिक इरादे ( intention ) का रूप ले लेता है। इरादे का निर्णय लिए जाने और उसपर अमल के बीच की अवधि में मनुष्य के व्यवहार पर नियामक ( regulatory ) प्रभाव पड़ता है ( उसके बारे में सोचता रहना, उससे संबंधित तैयारी करते रहना, उसे जांचते-परखते रहना, आदि )। कभी-कभी इरादा त्यागा जा सकता है, निर्णय बदला जा सकता है या काम को अधूरा छोड़ा जा सकता है। किंतु यदि हर बार या ज़्यादातर, निर्णय को क्रियान्वित नहीं किया जाता, तो यह दुर्बल इच्छाशक्ति का परिचायक होता है।

निर्णय पर अमल ( implementation of decision ) संकल्पात्मक क्रिया का अंतिम चरण है और मनुष्य की इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है। इच्छाशक्ति को कर्म से आंका जाना चाहिए, न कि उदात्त अभिप्रेरकों, दृढ़ निर्णयों और नेक इरादों से। कार्यों का विश्लेषण मनुष्य के अभिप्रेरकों को समझने की कुंजी है और अपनी बारी में अभिप्रेरकों का ज्ञान विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य के व्यवहार का पूर्वानुमान करना संभव बनाता है।

संकल्पात्मक प्रयास

संकल्पात्मक क्रिया के मुख्य घटकों - निर्णय लेना और उसपर अमल करना - को साकार बनाने के लिए प्रायः संकल्पात्मक प्रयास ( volitive efforts ) की आवश्यकता होती है, जो एक विशिष्ट संवेगात्मक अवस्था है। संकल्पात्मक प्रयास को यूं परिभाषित किया जा सकता है : यह संवेगात्मक खिंचाव का वह रूप है, जो मनुष्य की मानसिक शक्तियों ( स्मृति, चिंतन, कल्पना, आदि ) को जुटाता है, क्रिया के लिए अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा करता है और काफ़ी अधिक तनाव की अवस्था के रूप में अनुभव किया जाता है

इच्छाशक्ति या संकल्प के प्रयास से मनुष्य कुछ अभिप्रेरकों को निष्प्रभावी और अन्य को अधिकतम प्रभावी बना सकता है। कर्तव्य-बोध वश किया जानेवाला प्रयास बाह्य बाधाओं ( किसी कठिन समस्या को हल करने में, थकान की अवस्था में, आदि ) और आंतरिक कठिनाइयों ( किसी दिलचस्प पुस्तक को पढ़ने से अपने को न रोक पाना, दिनचर्या का पालन करने की अनिच्छा, आदि ) को लांघने के लिए मनुष्य की मानसिक शक्तियों को एकजुट करता है। संकल्पात्मक प्रयास के फलस्वरूप आलस्य, भय, थकान, आदि पर विजय पाने से मनुष्य को बड़ा नैतिक संतोष मिलता है और इसे वह अपने ऊपर विजय के रूप में अनुभव करता है।

बाह्य बाधा को लांघने के लिए संकल्पात्मक प्रयास की आवश्यकता तब होती है, जब उसे ऐसी आंतरिक कठिनाई के तौर पर, ऐसी आंतरिक बाधा के तौर पर अनुभव किया जाता है, जिसे अवश्य लांघा जाना है।

इसकी एक सरल सी मिसाल देखें। यदि हम फ़र्श पर एक मीटर के फ़ासले पर रेखा खींचकर इस बाधा ( फ़ासले ) को लांघने का प्रयत्न करें, तो इसमें हमें कोई कठिनाई नहीं होगी और कोई विशेष प्रयास न करना पड़ेगा। किंतु यदि पर्वत पर चढ़ते हुए बर्फ़ में उतनी ही चौडी़ दरार सामने आ जाए, तो इसे एक गंभीर बाधा समझा जाएगा और इसे लांघने के लिए हमें काफ़ी इच्छाशक्ति जुटानी होगी। फिर भी पहाड़ों में इस डग के भरे जाने से दो अभिप्रेरकों - आत्मरक्षा की भावना और कर्तव्य ( उदाहरणार्थ, ख़तरे में पड़े साथी की सहायता करने के कर्तव्य ) की पूर्ति की भावना - के बीच संघर्ष चलता है। यदि जीत पहले अभिप्रेरक की हुई, तो पर्वतारोही डरकर पीछे खिसक जाएगा और यदि कर्तव्य-भावना अधिक बलवती सिद्ध हुई, तो अपने भय पर काबू पाकर बाधा को लांघ जाएगा।

संकल्पात्मक प्रयास हर शौर्यपूर्ण कर्म का अभिन्न अंग होता है। संकल्प, इच्छाशक्ति से काम लेना दृढ़ चरित्र के निर्माण की एक आवश्यक पूर्वापेक्षा है। हर राष्ट्र का इतिहास शौर्यपूर्ण कारनामों से भरा हुआ है और उनमें से हर कारनामे को संकल्पात्मक क्रिया की मिसाल समझा जा सकता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

इच्छाशक्ति और जोखिम

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और "इच्छा-स्वातंत्र्य" पर चर्चा की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति और जोखिम के अंतर्संबंधों को समझेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



इच्छाशक्ति और जोखिम
( will and risk )

जोखिमभरी स्थिति ( risky situations ) में मनुष्य का व्यवहार उसकी इच्छाशक्ति ( will power, volition ) का एक सबसे अचूक सूचक ( indicator ) है।

जोखिम ( risk ) उस स्थिति में सक्रियता का एक आवश्यक पहलू है, जब कर्ता परिणाम ( result ) के बारे में अनिश्चित होता है और उसे लगता है कि असफलता ( failure ) की सूरत में उसे प्रतिकूल परिणाम ( adverse results ) भुगतने पड़ सकते हैं ( दंड, पीड़ा, चोट, प्रतिष्ठा-हानि, आदि )। जोखिमभरी स्थिति में अपेक्षित हानि ( expected loss ), असफलता की संभाव्यता पर और व्यक्ति के लिए जो ख़तरा उत्पन्न हो सकता है, उसपर निर्भर होती है। स्वाभाविकतः प्रश्न उठता है : यदि सफलता पाने के अवसर कम हैं और असफलता के लिए भारी दंड मिलेगा, तो मनुष्य को जोखिम उठाने को क्या विवश करता है? मनोविज्ञान जोखिमभरी स्थिति के एक अनिवार्य मानसिक घटक के नाते इच्छाशक्ति द्वारा शासित जोखिमी व्यवहार के दो परस्परसंबंध कारण या अभिप्रेरक ( motivator ) बताता है।

जोखिम के लिए पहला अभिप्रेरक और इसलिए जोखिम का पहला रूप भी सफलता की प्रत्याशा ( anticipation ) पर आधारित है, जिसका परिणाम असफलता की सूरत में होनेवाली संभावित हानि की मात्रा से अधिक होता है। ( स्थितिपरक जोखिम situational risk )। सफलता की आकांक्षा, विफलता से बचने की इच्छा से अधिक बलवती सिद्ध होती है। यदि हम ध्यान में रखें कि दैनंदिन जीवन में यह संबंध उलट सकता है ( विफलता से बचने की इच्छा सफलता की आकांक्षा से अधिक बलवती निकल सकती है ), तो हमें स्वीकार करना होगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में जोखिम एक प्रमुख स्थान रखता है। परंतु इस प्रकार का व्यवहार अनोखा नहीं है, यद्यपि इसके लिए संकल्पमूलक निर्णय लेना आवश्यक है।

मनोविज्ञानी उचित और अनुचित जोखिम के बीच अंतर करते हैं। जोखिमभरी स्थिति का परिणाम कितना भी अनिश्चित क्यों न हो, अनुचित जोखिम के विपरीत, उचित जोखिम में यह जरूरी होता है कि संकल्पमूलक निर्णय के सभी पहलुओं के बारे में, जोखिमभरे व्यवहार के पीछे जो अभिप्रेरक हैं, उनकी नैतिक तथा वैचारिक एकता के बारे में और अपेक्षाकृत निरापद पसंद के मुक़ाबले ख़तरनाक पसंद के लाभ के बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर लिया जाए। ऐसी भी स्थितियां हो सकती हैं जिनमें परिणाम संयोग ( "चित्त या पट") पर या इसके विपरीत मनुष्य के वैयक्तिक गुणों ( योग्यताओं, अध्यवसाय diligence, कौशल skill, आदि ) पर निर्भर होता है। यह पाया गया है कि अन्य बातें समान होने पर लोग उन स्थितियों में कहीं अधिक जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, जिनमें परिणाम संयोग के बजाए मनुष्य की अपनी योग्यताओं, कौशलों और आदतों पर निर्भर होता है

जोखिमी पसंद का दूसरा अभिप्रेरक और जोखिम का दूसरा रूप व्यक्ति की तथाकथित स्थिति-निरपेक्ष क्रियाशीलता से, उसकी दत्त स्थिति की अपेक्षाओं से ऊपर उठ पाने और अपने लिए आरंभिक कार्यभार ( assignments ) से ज़्यादा ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करने की योग्यता से पैदा होते हैं। प्रयोगों में जोखिममापी नामक एक विशेष उपकरण की मदद से प्रकट किए गए जोखिम के दूसरे रूपभेद को "स्थिति-निरपेक्ष", "निःस्वार्थ" अथवा "जोखिम की ख़ातिर जोखिम" की संज्ञा दी गई है।

कुछ लोगों को एक निश्चित प्रायोगिक क्षेत्र में ख़ुद अपने द्वारा चुने गए निशानों पर मार करने का काम दिया गया। किंतु उन्हें चेतावनी दे दी गई कि क्षेत्र में एक ख़तरनाक जगह है और उसपर मार करने से दंड मिल सकता है। पाया गया कि कुछ लोगों ने अपने निशाने उस ख़तरनाक जगह के आसपास ही चुने और इस तरह जान-बूझकर दंड का जोखिम उठाया, जबकि दूसरों ने निषिद्ध जगह से दूर के निशाने चुनकर ऐसे जोखिम से बचने का प्रयत्न किया। प्रयोग की कई बार पुनरावृत्ति और उसके डिज़ायन में परिवर्तनों से प्रयोगकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे पहले समूह के लोगों में निःस्वार्थ जोखिम के लिए परिस्थितिवश विकसित हुआ स्वाभाविक झुकाव था।

बाद के अध्ययनों ने दिखाया कि जोखिम की ख़ातिर जोखिम उठानेवाले, ऊंचाई पर काम करनेवाले निर्माण-मज़दूरों, मोटर-साइकिल के खेल के शौक़ीनों, उच्च-वोल्टता बिजली लाइनें बनानेवालों और उन पर काम करने वालों, आदि के बीच ज़्यादा मिलते हैं।

प्रयोगों ने यह भी दिखाया कि स्थितिमूलक जोखिम उठानेवालों में जोखिम की ख़ातिर जोखिम के लिए ज़्यादा झुकाव होता है। इसके विपरीत जिन लोगों ने प्रयोगों के दौरान निःस्वार्थ जोखिम की क्षमता नहीं दिखायी, वे सामान्यतः उस स्थिति में भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे, जिसमें अपेक्षित लाभ और संभावित हानि बराबर-बराबर थे। निःस्वार्थ जोखिम के लिए रुझान, जिसे मनोवैज्ञानिक प्रयोग द्वारा, यानि अल्पकालिक जांच द्वारा प्रकट किया जा सकता है, दिखाता है कि वैसा मनुष्य वास्तविक ख़तरेवाली स्थिति में भी संकल्पात्मक क्रियाएं करने की क्षमता रखता है। इस तरह जोखिममापी की मदद से, एक दमकल दल का मुखिया अपने लोगों में काम का इष्टतम वितरण कर सकता है, जिसमें जोखिम उठाने का झुकाव नहीं है, उन्हें सहायक कामों में और जो जोखिम के लिए झुकाव रखते हैं, उन्हें सीधे आग से लड़ने के काम में लगाया जा सकता है।

दृढ़ इच्छाशक्ति और निःस्वार्थ जोखिम के लिए क्षमता एक ही चीज़ नहीं है। प्रयोग दिखाते हैं कि दमकल दल के जोखिम उठाने को तैयार लोगों को जब सहायक कामों पर लगाया जाता है, तो वे उनमें कोई ज़्यादा सफल नहीं रहते। रोजमर्रा का काम, जो कभी-कभी बड़ा कठिन तथा नीरस होता है, कठोर परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रयोग की अपेक्षा करता है। अध्यवसाय, धेर्य, निर्देशों का ईमानदारी से पालन, आदि संकल्पमूलक गुण ख़तरे का सामना करने के लिए आवश्यक गुणों से भिन्न होने पर भी समाज के लिए कम मूल्यवान नहीं है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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