शनिवार, 25 सितंबर 2010

संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बौद्धिक व्यवहार पर चर्चा की थी, इस बार पशुओं के बीच संप्रेषण पर कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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संप्रेषण और पशुओं की "भाषा"


‘सामाजिक’ प्राणियों के परस्पर संबंध कभी-कभी अत्यधिक जटिल होते हैं। गुच्छिकीय तंत्रिकातंत्र वाले जीवों में भी, जो बड़े-बड़े समूह बनाकर रहते हैं, न केवल जटिल सहजवृत्तिमूलक व्यष्टिक व्यवहार मिलता है, बल्कि वे समूह के सदस्यों की "भाषा" ( यहां भाषा से अभिप्राय किसी भी संकेत-तंत्र अथवा सूचना-संप्रेषण के किसी भी माध्यम से है ) के बारे में अत्यंत परिष्कृत सहज प्रतिक्रियाएं भी दिखाते हैं।


उदाहरण के लिए, पाया गया है कि मकरंद लेकर लौटती और एक निश्चित अंदाज़ में हरकतें ( "नृत्य") करती हुई मधुमक्खी इस ढंग से सारे मधुमक्खी समुदाय को ऐसे फूलों के स्थान की सूचना देती हैं, जिनसे मकरंद मिल सकता है। चींटियों की "भाषा" भी बड़ी जटिल है। कुछ निश्चित हरकतें एक निश्चित संकेत का काम करती हैं। प्रेरक अनुक्रियाएं संयुक्त कार्य के आह्वान, भोजन की प्रार्थना, आदि की परिचायक भी हो सकती हैं।

गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र से युक्त जीवों की "भाषा" मुद्राओं, ध्वनि-संकेतों, रासायनिक ( गंध संबंधी ) सूचना और तरह-तरह के स्पर्शमूलक संकेतों से बनी होती है। समुदाय में कीटों का व्यवहार प्रेक्षक को अपनी सामान्य कार्यसाधकता और समन्वय से चकित कर देता है। फिर भी यह समन्वित कार्यसाधकता सूचना पाने वाले जीवों की रूढ़ बनी हुई प्रतिक्रियाओं की उपज है। उनकी प्रतिक्रियाएं सूचना के किसी भी तरह के विश्लेषण या संसाधन से पूर्णतः वंचित होती हैं। उनके द्वारा ग्रहण किये गये संकेत स्वतः अनुक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिसका स्वरूप उदविकास के दौरान निश्चित हुआ था।

उच्चतर जीवों ( पक्षियों, स्तनपायियों ) के समुदायों में भी कुछ निश्चित प्रकार के परस्पर-संबंध मिलते हैं। उनका हर जमघट अनिवार्यतः उसके विभिन्न सदस्यों के बीच सम्पर्क के लिए आवश्यक "भाषा" के जन्म का कारण बन जाता है


हर समुदाय में जैविकतः स्वाभाविक असमानता पायी जाती है, यानि शक्तिशाली जीव निर्बल जीवों को दबाते हैं। जो शक्तिशाली होते हैं, उन्हें आहार का बेहतर भाग मिलता है। निर्बल जीव अन्य जातियों के जीवों के लिए आहार का काम करते हुए अपनी जाति के सर्वोत्तम जीवों की उत्तरजीविता सुनिश्चित करते हैं। दूसरी ओर, निर्बल जीवों के पास ऐसे साधन भी होते हैं, जो समुदाय के भीतर उन्हें सापेक्ष सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इन साधनों में अधीनता की विशिष्ट मुद्रा भी है, जिसके माध्यम से अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी से लड़ाई में हारा हुआ जीव अपनी पराजय-स्वीकृति की सूचना देता है।

हम अपने आस-पास विभिन्न पक्षियों, मुर्गे-मुर्गियों, कुत्तों आदि की ऐसी कई आक्रामक और अधीनता की मुद्राओं का प्रदर्शन देख सकते हैं। एक ऐसी स्थिति यूं देखी गई, एक युवा भेडि़ये ने, जो अपने में अदम्य शक्ति का उभार महसूस कर रहा था, झुंड़ के सरदार पर हमला कर दिया। मगर बूढ़े तपे हुए लड़ाके ने युवा दावेदार को अपने दांतों की ताकत जल्दी ही महसूस करवा दी। युवा भेड़िए ने तुरंत अधीनता-स्वीकृति की मुद्रा अपना ली, उसने अपने शरीर का सबसे नाज़ुक हिस्सा, यानि अपनी गरदन, जिसे लड़ाई के दौरान जानवर बहुत बचाकर रखता है, सरदार के सामने कर दी। बूढ़े सरदार का सारा गुस्सा तुरंत शांत हो गया, क्योंकि हारे हुए प्रतिद्वंद्वी के संकेत ने उसमें हजारों पीढ़ियों के अनुभव से उत्पन्न सहजवृत्ति को जगा दिया था। अधीनता की मुद्राएं समूहों में रहनेवाले सभी जीवों में मिलती हैं। वानरों में तो वे बड़ी ही अभिव्यक्तिपूर्ण होती हैं।

मुद्राओं और स्पर्शजन्य संपर्कों की "भाषा" के अतिरिक्त एक श्रव्य संकेतों की "भाषा" भी है। अनुसंधानकर्ताओं ने कौओं, डोल्फ़िनों और बंदरों की जटिल संकेत प्रणालियों का वर्णन किया है। जीवों द्वारा पैदा की गई ध्वनियां उनकी संवेगात्मक अवस्था को व्यक्त करती हैं। चिंपाजियों की वाचिक प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण ने दिखाया है कि वानरों के मुंह से निकली हर ध्वनि किसी निश्चित प्रतिवर्ती क्रिया से जुड़ी होती है। कई ध्वनि-समूहों को पहचाना गया है, जैसे खाते समय निकाली गई ध्वनियां, दिशा, प्रतिरक्षा और आक्रमण की सूचक ध्वनियां, काम-व्यापार से जुड़ी हुई ध्वनियां, वगैरह।



सभी जीव अपने समुदाय के अन्य सदस्यों की वाचिक प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देते हैं। ये प्रतिक्रियाएं समुदाय के सदस्यों को उनके जातिबंधुओं की अवस्था के बारे में भी सूचित करती हैं और इस तरह अंतर्सामुदायिक व्यवहार के लिए दिग्दर्शक का काम करती हैं।



उदाहरणार्थ, भूखे जीव भागकर वहां पहुंच सकते हैं, जहां से कोई चीज़ खा रहे दूसरे जीवों की तृप्तिसूचक आवाजें आ रही हैं। स्वस्थ और तृप्त जीव अपने समुदाय के अन्य जीवों की खेलकूद अथवा अभिविन्यास सूचक आवाजों पर ध्यान देते हैं और इस तरह गति अथवा अभिविन्यासात्मक व्यवहार की आवश्यकता की पूर्ति की संभावना पाते हैं। लड़ते हुए वानरों की आक्रामक आवाजें सुनते ही उनका सरदार झुंड़ में व्यवस्था बनाए रखने के लिए झगड़े के स्थल पर पहुंच जाता है। खतरे का संकेत सारे झुंड में भगदड़ मचा देता है।

किंतु पशुओं की भाषा में एक महत्त्वपूर्ण कमी है, मनुष्यों की भाषा की भांति वह अनुभव के संप्रेषण का साधन नहीं बन सकती। इसलिए चाहे हम यह मान भी ले कि किसी जीव ने आहार प्राप्त करने का कोई निराला तरीक़ा निकाला है, वह इस नई जानकारी को चाहने पर भी अपने "भाषायी" साधनों से अन्य जीवों तक नहीं पहुंचा सकता।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 18 सितंबर 2010

पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बौद्धिक व्यवहार पर चर्चा शुरू की थी, इस बार उसे ही थोड़ा और आगे बढाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - २


वानर अपने परिवेश की विभिन्न वस्तुओं के बीच मौजूद संबंधों को समझ सकते और उन्हें प्रभावित कर सकते हैं। उनकी ठीक यही क्षमता कभी-कभी उनके व्यवहार पर उल्टा असर डालती है। "तटस्थ जिज्ञासा" कभी-कभी वानर का ध्यान प्रयोग से इस हद तक हटा देती है कि वह "समस्या पेटी" में रखी लुभाने की चीज़ के बजाए किसी अखाद्य चीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाने लगता है। फिर भी जब वानरों के अनुकूलित प्रतिवर्त बन जाते हैं, तो उनमें भी इन प्रतिवर्तों की अभिव्यक्तियां उतनी ही रूढ़ होती हैं, जितनी कि अन्य उच्चतर प्राणियों में।


रफ़ाएल नामक एक चिंपाज़ी पर कुछ प्रयोग किये गए। उनमें से एक प्रयोग यह था। प्रयोगकर्ता ने एक पेटी में काफ़ी नीचे रखे गये फलों के सामने स्पिरिट का बर्नर जलाया। फलों को पाने की कई असफ़ल कोशिशों के बाद अचानक रफ़ाएल के हाथ से बर्नर के ऊपर रखी गई पानी की टंकी की टोंटी खुल गई। पानी गिरने लगा और बर्नर बुझ गया। कई बार दोहराए जाने पर यह क्रिया आदत बन गयी। अब पानी की टंकी को बर्नर से कुछ दूर रखा गया। कुछेक कोशिशों के बाद रफ़ाएल ने इस बार भी अपना लक्ष्य पा लिया, उसने पानी मुंह में भरा और जाकर बर्नर पर छिड़क दिया। अगले प्रयोग में फल को एक तख़्ते पर तालाब के बीच रखा गया। पानी की टंकी दूसरे तख़्ते पर थी। इस बार रफ़ाएल आग बुझाने के लिए एक डगमगाती पुलिया पर चलकर टंकी वाले तख़्ते के पास पहुंचा।

इस तरह हम देखते हैं कि चिंपाज़ी ने पुराने ( सीखे हुए ) व्यवहार-संरूप ( आदत ) को नयी स्थिति में अंतरित किया। बेशक यह क्रिया अनावश्यक थी, क्योंकि तख़्ते के इर्द-गिर्द तालाब में पानी पहले से ही मौजूद था, मगर जैव दृष्टि से वह सर्वथा नियमसंगत थी। डगमगाती पुलिया पर दौड़ना चिंपाज़ी के लिए शारीरिकतः कठिन नहीं था, इसलिए प्रयोग में उसके सामने रखा गया लक्ष्य उसके लिए ऐसी समस्यात्मक स्थिति नहीं बना कि जिसमें किसी बौद्धिक प्रयास की आवश्यकता होती।

प्रतिक्रिया के अधिक रूढ़ तरीक़े के नाते सहजवृत्तियां और आदतें प्राणियों को अपने दिमाग़ पर ज़्यादा जोर डालने से बचाती हैं। कई बार असफ़ल रहने पर ही प्राणी चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी उच्चतर शक्तियों - बौद्धिक योग्यताओं - से काम लेता है। किंतु सामान्य स्थितियां उनके लिए समस्याएं विरले ही पैदा करती हैं और इसलिए वे अधिक ऊंचे, बौद्धिक स्तर पर प्रतिक्रिया दिखाए जाने का तकाज़ा नहीं करती। जीव-जंतुओं के लिए बौद्धिक व्यवहार अधिकांशतः एक प्रच्छन्न संभावना बना रहता है



एक और वैज्ञानिक ने परीस नाम के एक चिंपाज़ी पर कुछ प्रयोग किये थे। परीस को जब अंदर कोई खाने की चीज़ रखी हुई नली दी जाती थी, तो वह नली के भीतर से उस चीज़ को बाहर निकालने के लिए कोई उपयुक्त औजार चुन लेता था। वह वस्तुओं में आकृति, लंबाई, घनत्व,  और मोटाई की अनुसार भेद करना जानता था। यदि कोई उपयुक्त वस्तु नहीं मिलती थी, तो वह पास पड़ी टहनी से डंड़ी तोड़कर, या किसी चौड़ी तख़्ती से छिल्ली निकालकर या मुड़े हुए तार को सीध करके उससे काम चला लेता था। दूसरे शब्दों में, वह "औजार" बनाता था।



किंतु उच्चतर वानरों की "औजार-निर्माण" सक्रियता का महत्त्व बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंका जाना चाहिए। अनेक प्रयोगों के दौरान चिंपाज़ी अपना लक्ष्य पाने के लिए दो डंडियों को आपस में जोड़ने में असमर्थ पाये गये हैं। ऐसा स्वाभाविक भी है, क्योंकि दांतों से छिल्लियां निकालना या ड़ंडियों को तोड़ना प्राकृतिक परिस्थितियों में एक सर्वथा सामान्य बात है। जबकि ड़ंडियों को जोड़ना एक ऐसा काम है, जिसमें कई प्रयत्नों और पूर्वाधारों की जरूरत होती है। कभी-कभार वानर दो छोटी ड़ंडियों को जोड़कर एक बड़ी डंडी, यानि "औजार" बनाने में समर्थ सिद्ध हुए हैं, मगर वे न तो इन निर्मित औजारों को सुरक्षित रखते हैं और न उन्हें पहले से बनाते हैं। "औजार" वानर के प्रत्यक्ष कार्य के दौरान प्रकट होता है और फिर तुरंत विलुप्त हो जाता है। अतः मनुष्य की श्रम-सक्रियता और वानरों के संबंधित क्रिया-कलाप के बीच समानता की बात केवल आलंकारिक अर्थ में ही की जा सकती है।

इस संबंध में खाने की चीज़वाली पेटी की साथ किये गये हुए प्रयोग दिलचस्प हैं। वानर पेटी पर बने तिकोने छेद से उस चीज़ को देख सकता था। एक तिकोनी अनुप्रस्थ काटवाली डंडी इस छेद में डाल कर और अंदर बने लीवर को दबाकर पेटी को खोला जा सकता था। प्रयोगकर्ता ने बंदर को यह कार्य कई बार करके दिखाया। वानर के सामने गोल, चौकोर, तिकोनी, आदि कई तरह की डंडियां पड़ी थीं। उसने पहले जो भी डंडी हाथ में आई, उसे छेद में डालने का प्रयत्न किया। फिर उसने दूसरी डंडियों को हाथ से टटोला, सूंघा, जांचा और एक-एक करके छेद में डाला। आख़िरकार उपयुक्त डंडी मिल ही गई।



इस तरह हम देखते हैं कि अभिविन्यासात्मक हस्तक्रिया के दौरान वानरों के बौद्धिक कार्य ठोस व्यवहारिक चिंतन का रूप धारण कर लेते हैं। उच्चतर वानरों के व्यवहार की एक चारित्रिक विशेषता अनुकरण है।


उदाहरण के लिए, वानर झाड़ू लगा सकता है, कपड़ा गीला कर सकता, निचोड़ सकता और पोंछा लगा सकता है। ऐसे अनुकरणात्मक कार्य बड़े आदिम ढंग के होते हैं। वानर सामान्यतः क्रिया की नक़ल करते हैं, न कि उसके परिणाम की। इसलिए जब वह फ़र्श "बुहारता" है, तो वह आम तौर पर फ़र्श को साफ़ किये बिना धूल को मात्र एक जगह से दूसरी जगह फैंकता है ( वैसे विशेष प्रशिक्षण के बाद फ़र्श साफ़ करने का लक्ष्य भी पाया जा सकता है )। वानरों में बौद्धिक अनुकरण की क्षमता के कोई अकाट्य प्रमाण नहीं पाये गये हैं।

इस तरह परावर्तन के रूपों ( अनुवर्तन, सहजवृत्तियां, आदतें और बौद्धिक क्रियाएं ) के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं है। पशुजगत में विकास की एक अटूट, अविच्छिन्न रेखा है, उदाहरणार्थ, सहजवृत्तियां बदलकर आदतें बन जाती हैं और आदतें सहजवृत्तियों में परिणत हो जाती हैं।

फिर भी हम पाते हैं कि अपनी ठोस अभिव्यक्तियों में विकास की प्रक्रिया का स्वरूप छलांगनुमा है और नैरंतर्य में भी विराम है। कतिपय जीवजातियों में सहजवृत्तियों का प्राधान्य मिलता है और कतिपय जीवजातियों में उनके अपने अनुभव के आधार पर बने साहचर्यों का बोलबाला पाया जाता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 4 सितंबर 2010

पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां जीवों द्वारा उपार्जित व्यवहार पर चर्चा की थी इस बार पशुओं के बौद्धिक व्यवहार के कुछ रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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पशुओं का बौद्धिक व्यवहार - १

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, सहजवृत्ति पर आधारित व्यवहार-संरूपों के साथ-साथ उच्चतर जीव अन्य प्रकार के व्यवहार भी दिखाते हैं, जो अलग-अलग जीवों में अलग-अलग होते हैं। ये व्यवहार-संरूप हैं आदतें और बौद्धिक क्रियाएं। यहां हम पशुओं के बौद्धिक व्यवहार संरूपों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे, क्योंकि यह एक सामान्य दिलचस्पी का विषय है और अपने दैनंदिनी जीवन में हम कई भ्रामक मान्यताओं के साथ होते हैं।

बौद्धिक व्यवहार अलग-अलग वस्तुओं के बीच मौजूद जटिल संबंधों के परावर्तन पर आधारित होता हैं। इसे निम्न प्रयोग से देखा जा सकता है।

दो खोखली नलियोंवाला एक उपकरण लिया गया। फिर एक कौए के सामने उनमें से एक नली में डोरी से बंधा हुआ गोश्त का टुकड़ा डाला गया। कौए ने टुकड़े को ऊपरी नली में घुसते, नलियों के बीच की ख़ाली जगह से गुजरते और फिर निचली नली में ग़ायब होते देखा। वह तुरंत उड़कर निचली नली के दूसरे किनारे पर चला गया और वहां गोश्त के टुकड़े के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा ( दूसरे हिंस्र पक्षियों, कुत्तों और बिल्लियों ने भी ऐसा ही किया )।

यह मिसाल दिखाती है कि उच्चतर जीव वस्तुओं के बीच संबंध को पहचानने और दत्त स्थिति के परिणाम का पूर्वानुमान करने, यानि इसका पता लगाने में समर्थ हैं कि कोई चलती हुई वस्तु कहां प्रकट हो्गी। यह बौद्धिक व्यवहार का ही एक रूप है।

उच्चतर पशुओं में प्राइमेट ( मानवाभ वानर ) विशेष स्थान रखते हैं। अधिकांश स्तनपायियों के विपरीत वे न केवल आहारयोग्य वस्तुओं में, अपितु स्पष्टतः निरर्थक वस्तुओं में भी दिलचस्पी दिखाते हैं। मनोविज्ञान में "सतत ( अथवा तटस्थ ) जिज्ञासा" और "अन्वेषणात्मक आवेग" के नाम से ज्ञात यह रूचि वानरों की लाक्षणिक तीव्र दृष्टि के साथ मिलकर उनकी प्रत्यक्षण की क्षमता तथा जानकारी-संचय की योग्यता को बहुत बढ़ा देती है और आदतों तथा व्यवहार के परिष्कृत रूपों के विकास की संभावनाओं के मामले में उन्हें अन्य प्राणियों से बहुत अधिक उन्नत बना देती है।

वानरों की बुद्धि की विशेषता उनके द्वारा हल की जानेवाली समस्याओं की जटिलता ही नहीं, अपितु उनकी सक्रियता की लक्ष्योन्मुखी होना भी है। वानर किसी वस्तु को तोड़ने के लिए घंटों प्रयत्न करते रह सकते हैं, दर्शक का ध्यान आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की चालें चल सकते हैं और रेंगते हुए कीड़े को देखते रह सकते हैं। उनके व्यवहार की इन विशिष्टताओं का कारण उनके अस्तित्व का रूप है। प्राकृतिक परिस्थितियों में वानर को आहार की खोज में अपने परिवेश की लगातार "छानबीन" करनी पड़ती है। जंगली चिंपांज़ी के भोजन में कोई इक्यासी "व्यंजन" होते हैं। उनमें से आधे फल, एक चौथाई पत्ते और शेष बीज, फूल, डंडियां और छाल होते हैं। अपने आहार में वे कीड़ों, छिपकलियों, छोटे चूहों और कभी-कभी अधिक बड़े जंतुओं को भी शामिल कर लेते हैं। यह दिखाता है कि उनके अन्वेषणमूलक व्यवहार और वस्तुओं के प्रति जिज्ञासा की गहरी जैविक जड़े हैं। वानर जो फल खाते हैं, उनके न केवल आकार और रंगों को वे पहचान जाते हैं, बल्कि स्वाद के मामले में भी उनके अनुकूलित प्रतिवर्त काफ़ी विकसित हैं। आहार की खोज करते हुए वानर से खाद्य के योग्य और अयोग्य, यानि विषैली वस्तुओं में अंतर करने में कोई ग़लती नहीं होती।


आहार की क़िस्मों अथवा परिस्थितियों के संबंध में वानर की प्रतिक्रियाएं सहजवृत्ति पर आधारित नहीं होती। वानरों के परिष्कृत व्यवहार का, जो अन्य जीवों के व्यवहार से कहीं ज़्यादा जटिल है, कारण उनके अग्रांगों की मनुष्य के हाथों से समानता भी है। हाथ की बदौलत वानर, अपनी परिवेशी वस्तुओं से बहुर सारे अस्थायी पेचीदे संबंध ( साहचर्य ) विकसित करता है, जो अन्य प्राणियों के लिए अज्ञात हैं। कुछ परिस्थितियों में उसका व्यवहार स्पष्टतः सहजवृत्तिमूलक होता है। अन्य कशेरुकियों की भांति वानरों में भी सहज प्रतिक्रियाएं किसी सामान्य उद्दीपन द्वारा पैदा की जा सकती हैं। शोधों ने यह दिखाया है कि नवजात वानर, कृत्रिम माताओं से वास्तविक लगाव तभी दिखाते हैं, जब कुछ निश्चित क्षोभक मौजूद हों।

प्रयोग यूं किया गया। दो नवजात मकाक वानरों को लगभग वास्तविक माता के ही आकार की कृत्रिम माताओं के साथ एक पिंजड़े में रखा गया। एक माता धातु के ढ़ाचे की थी और दूसरी माता लकड़ी के कुंदे की, जिस पर ऊपर से बाल चिपकाये हुए थे। जिस बच्चे को बालोंवाली माता मिली, वह ज़्यादातर समय उससे चिपका या उसपर चढ़ता रहता था। ज्यों ही कोई ख़तरा पैदा होता, बच्चा तुरंत उससे जा चिपकता। जिस बच्चे को धातु के ढ़ांचेवाली मां मिली थी, वह बड़ा दुखी था। अध्ययनों ने दिखाया है कि वानर-शिशु दूध पिलानेवाली लोहें के तारों से बनी मां की बजाए, दूध न पिलानेवाली चीथड़ों की बनी माता को ज़्यादा पसंद करते थे। चीथड़ों की बनी माता बच्चों को एक तरह का सुक़ून और विश्वास व सुरक्षा की भावना देती थी।

किंतु व्यस्क उच्चतर वानरों का सहज व्यवहार निम्नतर प्राणियों के सहज व्यवहार से बहुत भिन्न होता है। उच्चतर वानरों, उदाहरणार्थ, चिंपाज़ियों में व्यवहार का आनुवंशिक रूप पाया जाता है, जैसे बसेरा बनाना। प्राकृतिक परिस्थितियों में वे रोज़ाना पेड़ो की टहनियों से बसेरा बनाते हैं। प्रेक्षणों ने दिखाया है कि बसेरा बनाने से पहले वनर निर्माण सामग्री की व्यवहारिक जांच कर लेते हैं।

अनुसंधानों के दौरान वानरों की निर्माण-सक्रियता की चूहों की घर बनाने की आदतों से तुलना की गई। यदि उन्हें उपलब्ध सामग्री कठोरता के मामले अलग-अलग तरह की होती थी, यानि उन्हें, उदाहरण के लिए, टहनियों और कागज़ से घर बनाना होता था, तो चिंपाज़ी भी और चूहे भी लगभग एक ही ढंग से घर बनाते थे। ज़्यादा कड़ी सामग्री से ढ़ांचा और ज़्यादा मुलायम सामग्री से दीवारें तथा फ़र्श। यदि चिंपाज़ी को भी और चूहे को भी केवल मुलायम सामग्री दी जाती थी, तो दोनों उससे घर बनाना शुरू कर देते थे। किंतु यदि उन्हें घर बना लेने के बाद कड़ी सामग्री और दी जाती थी, तो उनकी प्रतिक्रियाओं में गुणात्मक अंतर तुरंत प्रकट हो जाता था। कड़ी सामग्री पाने पर चिंपाज़ी तुरंत घ्र को फिर से बनाने लग जाता था। हाथ की एक ही हरक़त से वह मुलायम सामग्री के ढ़ांचे को हटा देता था और पहले कड़ी सामग्री से ढ़ांचा बनाता था और फिर मुलायम सामग्री को दीवारें तथा फ़र्श बनाने के लिए इस्तेमाल करता था। किंतु ऐसी ही स्थिति में चूहे की प्रतिक्रिया यह होती थी कि वह कड़ी सामग्री को मुलायम सामग्री के ऊपर रख भर देता था।

इस तरह वानरों की बसेरा बनाने की सक्रियता बुनियादी तौर पर सहजवृत्ति पर आधारित है, किंतु उसमें बाह्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम पशुओं में बौद्धिक व्यवहार पर ही अपनी चर्चा आगे बढ़ाएंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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