शनिवार, 28 जनवरी 2012

‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति के दृष्टिकोण पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।




‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र

मनुष्य की सक्रियता, उसका आचरण-व्यवहार ( conduct - behavior ), सबसे पहले, उन लक्ष्यों से निर्धारित होता है, जो वह अपने समक्ष रखता है। उसके आचरण-व्यवहार तथा कार्यक्रम का मुख्य निर्धारक सदैव उसका व्यक्तित्व-रुझान ( personality-trends), यानि उसके हितों, आदर्शों तथा विश्वासों का कुल योग होता है। परंतु दो मनुष्य, जिनके बहुत ही एक जैसे वैयक्तिक रुझान में एक जैसे लक्ष्य एक दूसरे से मेल खाते हैं, अपने लक्ष्यों की सिद्धी के साधनों के चयन में एक दूसरे से सारभूत रूप से भिन्न हो सकते हैं। इन अंतरों के पीछे व्यक्ति के चरित्र की विशिष्टताएं होती हैं।

मनुष्य के चरित्र में, यह कहा जा सकता है, लाक्षणिक परिस्थितियों में उसके लाक्षणिक आचरण-व्यवहार का कार्यक्रम होता है। एक अध्यापक अपने छात्र के चरित्र के बारे में भली-भांति जानने के कारण उसके बारे में यह बताता है, ‘मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वह असंयत हो जाएगा, बहुत-सी बेकार की बाते करेगा, शायद अशिष्ट और अन्यायपूर्ण ढंग से पेश आएगा, पर फिर अपने आचरण-व्यवहार पर उसे खेद होगा, प्रायश्चित की मुद्रा धारण किए हुए इधर--उधर चक्कर काटता रहेगा और अंततः अपने अपराध का निवारण करने के लिए यथासंभव सब कुछ करेगा।’ चारित्रिक गुणों में, अतएव, कोई निश्चित प्रेरक शक्ति होती है, वह तनावभरी परिस्थितियों में पूरी मात्रा में प्रकट होती है, जब मनुष्य को विवश होकर निर्णय करना पड़ता है, बड़ी कठिनाइयों पर काबू पाना पड़ता है।

चरित्र की दृष्टि से कृतसंकल्प ( resolute ) मनुष्य, अभिप्रेरणों ( motivations ) के किसी लंबे संघर्ष के बिना ही उत्प्रेरणा ( inducements ) से आगे बढ़कर कार्य-क्षेत्र में पदार्पण ( debut ) करता है। चरित्र के एक गुण के रूप में व्यवहार-कुशलता के कारण मनुष्य दूसरे लोगों के साथ संवाद में सावधानी बरतता है और नाना परिस्थितियों तथा समस्याओं को ध्यान में रखता है, जो उसके लिए सारभूत हो सकती हैं।

उपलब्धिमूलक प्रेरणा ( achievement oriented motivation ) को भी चरित्र का एक गुण माना जा सकता है, उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यकलाप में, विशेष रूप से दूसरे लोगों के साथ प्रतिद्वंद्विता में सफलता प्राप्त करने की कर्ता की आवश्यकता आ जाती है। यह गुण, बच्चे की परवरिश की प्रक्रिया में, सफलताओं के लिए विधिवत तथा वैयक्तिक रूप से उल्लेखनीय प्रशंसा और विफलताओं के लिए दंड के फलस्वरूप गठित होता है।

चरित्र संबंधी गुणों के प्रथम शोधकर्मियों के अनुसार, उपलब्धिमूलक अभिप्रेरणा स्कूलपूर्व आयु में गठित होती है, फिर भी यह दावा नित्यप्रति के जीवन के तथ्यों से मेल नहीं खाता, जो बताते हैं कि अन्य गुणों की भांति व्यक्तित्व के इन या उन गुणों का गठन आरंभिक बाल्यकाल तक सीमित नहीं होता। संबद्ध व्यक्तित्व के विकास के इतिहास पर निर्भर करते हुए वह या तो सफलता की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो सकता है ( इस सूरत में मनुष्य जोखिम मोल लेता है, पहल, प्रतियोगितात्मक क्रियाशीलता, आदि प्रदर्शित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता ), अथवा विफलता से बचने की ओर उन्मुख हो सकता है ( इस सूरत में वह जोखिम मोल लेने, दायित्व ग्रहण करने से कतराता है, पहल दिखाने से बचता है, किसी अनिश्चित हालात में अहस्तक्षेप की स्थिति अपनाता है, आदि )।

चरित्र में विशेष विधियों की सहायता से प्रकाश में लायी जाने वाली उपलब्धिमूलक अभिप्रेरणा एक निश्चित आचरण-व्यवहार कार्यक्रम इंगित करती है और लाक्षणिक परिस्थितियों में मनुष्य के कार्यकलाप की दिशा को पहले से बताना संभव बना देती है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 21 जनवरी 2012

चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के संबंधों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।




चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण


चरित्र ( character ) , जो कर्ता की कार्रवाइयों और व्यवहार में, संयुक्त सक्रियता में उसकी सहभागिता ( participation ) के स्तर में अभिव्यक्त होता है, सक्रियता की अंतर्वस्तु ( content ) पर, कठिनाइयों पर क़ाबू पाने में कर्ता की सफलता या विफलता पर, आधारभूत जीवंत ध्येयों की सिद्धि में दूर तथा निकट के परिप्रेक्ष्यों ( perspectives ) पर निर्भर करता है।

अतः चरित्र इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य ( पहले बन चुकी चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर ) अपनी सफलताओं तथा विफलताओं, जनमत तथा अन्य परिस्थितियों के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। इस तरह एक ही कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों में अथवा एक ही उत्पादन-समूह में बराबरी के दर्जे पर काम करने वाले लोगों में चरित्र के भिन्न-भिन्न गुणों का विकास होता है। यह चीज़ इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपना कार्य किस प्रकार निबटाते हैं। कुछ लोग सफलता से प्रेरित होते हैं और पहले से ज़्यादा अच्छी तरह काम या अध्ययन करने के लिए प्रेरित होते हैं, कुछ में आगे आगे मैदान जीतने की कामना नहीं होती, कुछ का विफलताओं से हौसला पस्त हो जाता है, जबकि दूसरों में जुझारू भावना उद्दीप्त होती है।

अतः चरित्र के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व यह होता है कि मनुष्य परिवेश के प्रति, स्वयं अपने प्रति, दूसरों के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाता है। ये दृष्टिकोण चरित्र के प्रमुख गुणों के वर्गीकरण के आधार का काम देते हैं।

मनुष्य का चरित्र, पहले इस चीज़ में प्रकट होता है कि वह दूसरे लोगों ( अपने सगे-संबंधियों तथा मित्रों, सहयोगियों तथा सहपाठियों, परिचितों तथा अजनबियों, आदि ) के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। वह स्थिर अथवा अस्थिर अनुरक्तियों ( attachments ) में, सिद्धांतनिष्ठता अथवा सिद्धांतहीनता में , मिलनसार अथवा गैर-मिलनसार स्वभाव में, सत्यप्रियता अथवा मिथ्यावादिता में, व्यवहारकुशलता अथवा अभद्रता में प्रकट होता है। केवल समूहों में ही, सामाजिकता में ही, दूसरों लोगों से दैनंदिन संसर्ग-संपर्क की प्रक्रिया में ही मनुष्य के ह्र्दय की व्यापकता अथवा संकीर्णता, गैर-मिलनसार स्वभाव अथवा नमनशीलता ( flexibility ), शांतिप्रियता अथवा विवादप्रियता जैसे चारित्रिक गुण सुस्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं।

दूसरे, चरित्र मनुष्य के स्वयं अपने प्रति दृष्टिकोण में, अर्थात आत्मगौरव तथा आत्मसम्मान में अथवा विनम्रता तथा अपनी शक्ति में अविश्वास में प्रकट होता है। कुछ लोगों में स्वार्थ की तथा आत्म-केन्द्रिकता ( अपने को समस्त घटनाओं के बीच में रखने ) की भावना अधिक बलवती होती है, जबकि कुछ अपने हितों को समूह के हितों के मातहत कर देते हैं, संयुक्त ध्येय के लिए संघर्ष में निस्स्वार्थ भाव से भाग लेते हैं।

तीसरे, चरित्र काम के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण में प्रकट होता है। चरित्र के सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में निर्मल अंतःकरण, कार्य-कुशलता, गंभीरता, उत्साह, प्राप्त कार्य के प्रति उत्तरदायित्व ( responsibility ) की भावना तथा उसके परिणामों के लिए चिंता शामिल है। परंतु कुछ लोगों के चरित्र में कैरियरपरस्ती, छिछोरापन, श्रम के प्रति कोरा औपचारिक दृष्टिकोण पाया जाता है।

चौथे, चरित्र व्यक्ति के वस्तुओं के प्रति दृष्टिकोण मे, केवल सामाजिक संपत्ति के प्रति ही नहीं, अपितु अपने निज़ी माल-असबाब, वस्त्रों, जूतों, आदि के प्रति दृष्टिकोण में भी प्रकट होता है।




इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 14 जनवरी 2012

चारित्रिक गुणों के संबंध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में चरित्र की अवधारणा पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के संबंधो को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र की संरचना
चारित्रिक गुणों के संबंध

मनुष्य का चरित्र सदैव बहुआयामी ( multidimensional ) होता है। उसके पृथक-पृथक गुणों या पहलुओं का चयन किया जा सकता है, जो एक दूसरे से अलग-अलग रूप में विद्यमान नहीं होते, अपितु एक सूत्र में जुड़े होते हैं, उनसे चरित्र की एक अखंड संरचना बनती है।

चरित्र की संरचनात्मकता, उसके पृथक-पृथक गुणों के बीच नियमसंगत निर्भरता में उजागर होती है। यदि कोई मनुष्य कायर है, तो उसके बारे में हम यह भी मान सकते हैं कि उसमें पहलकदमी ( initiative ) का अभाव है ( यानि वह डरता है कि उसके प्रस्ताव या कार्रवाई के प्रति, जिनके लिए उसने पहलकदमी की, प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो सकती है ), उसमें दृढ़ संकल्प तथा स्वावलंबन नहीं है ( क्योंकि निर्णय लेने का अर्थ व्यक्तिगत दायित्व ग्रहण करना है ), उसमें आत्मत्याग तथा उदारता का अभाव है ( दूसरों की सहायता से उसके निजी हितों को आंच आ सकती है, जो उसके लिए खतरनाक है )। इसके साथ ही चरित्र की दृष्टि से कायर व्यक्ति में हीन-भावना तथा चापलूसी ( अधिक बलवान के प्रति ), अनुरूपता ( औरों से अलग न दिखाई देने के लिए ), लालच ( भविष्य में अपनी भौतिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ), गद्दारी की तत्परता ( कम से कम उन परिस्थितियों में, जब उसकी सुरक्षा खतरे में हो ), अविश्वास की भावना तथा अतिसतर्कता, आदि लक्षण भी पाए जाते हैं।

जाहिर है, प्रत्येक व्यक्ति में, जिसके चरित्र पर कायरता हावी होती है, ये सब चर्चित लक्षण प्रकट नहीं होते। जीवन की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में मनुष्य के चरित्र की संरचना सारतः रूपांतरित ( convert ) हो सकती है और उसमें वे लक्षण तक शामिल हो सकते हैं, जो प्रतीयमान ( seeming ) रूप से हावी लक्षण के विपरीत होते हैं ( उदाहरण के लिए, कायर उद्धत भी हो सकता है )। परंतु कायर मनुष्य में समग्र रूप से चरित्र के ऐसे ही गुणों की ओर आम रूझान देखने को मिलता है।

चरित्र के नाना गुणों में से कुछ बुनियादी, अग्रणी गुणों के रूप में पेश आते हैं, जो उसकी अभिव्यक्तियों के विकास की पूर्ण समग्रता ( totality ) की आम दिशा निर्धारित करते हैं। उनके साथ-साथ द्वितीयक गुण भी विद्यमान होते हैं, जो कुछ सूरतों में मुख्य गुणों से निर्धारित होते हैं और दूसरी सूरतों में उनका मुख्य गुणों के साथ सामंजस्य नहीं होता। वास्तविक जीवन में अधिक अखंड तथा अधिक विरोधपूर्ण, दोनों तरह के चरित्र देखने को मिलते हैं। चरित्रों की अपार विविधता में अखंड चरित्रों के अस्तित्व की बदौलत कुछ निश्चित क़िस्में निर्धारित की जा सकती हैं, जिनमें कतिपय लक्षण एक समान होते हैं। चरित्र की अखंडता उसमें विरोधात्मकता को पूर्णतः वर्जित नहीं करती : सह्र्दयता की कभी-कभी सिद्धांतनिष्ठता से और विनोद की भावना की उत्तरदायित्व से टक्कर हो सकती है।

चारित्रिक गुणों को आस्थाओं, जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा व्यक्तित्व के रूझान ( trends ) की अन्य विशेषताओं के सदृश नहीं माना जा सकता। एक बहुत नेक स्वभाववाला और ख़ुशमिज़ाज मनुष्य बहुत सदाचारी तथा शिष्ट हो सकता है, जबकि वैसा ही दूसरा सदाचारी तथा ख़ुशमिज़ाज मनुष्य टुच्चा धंधेबाज़ हो सकता है, जो केवल अपनी ही सुख-समृद्धि की चिंता करता है और अपने लक्ष्यों की सिद्धि के लिए हर तरह के गंदे साधनों तक का उपयोग करने में नहीं चूकता।

परंतु चरित्र के कुछ लक्षण व्यक्तित्व के रूझान से निर्धारित होते हैं। अतः कुछ लक्षण निश्चित नैतिक सिद्धांतों तथा आस्थाओं से मेल खा सकते हैं, कभी-कभी वे अनिवार्य रूप से उनके साथ संलग्न होते हैं, कुछ मामलों में वे संबद्ध परिवेश में विद्यमान विचारों, नैतिकता के मापदंडों तथा सिद्धांतों के विपरीत हो सकते हैं। उदाहरण के रूप में ईमानदारी जैसा महत्त्वपूर्ण, प्रमुख गुण उनके साथ मेल खा भी सकता है और नहीं भी खा सकता है।

अक्सर हमें इस या उस मनुष्य की असाधारण ईमानदारी के क़िस्से सुनने को मिलते हैं। उदाहरण के लिए, किसी टैक्सी-ड्राइवर को अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर एक बड़ा हैंडबैग पड़ा मिला, जिसमें बहुत बड़ी धनराशि थी। उसने मुसाफ़िर को ढूंढ निकाला, और धनराशि लौटा दी गई। ईमानदारी की ऐसी अभिव्यक्तियां लोगों के मन में आम तौर पर आदर की भावना पैदा करती हैं, परंतु वे असामान्य भी नहीं प्रतीत होतीं। फिर भी हमें ऐसे लोग मिल सकते हैं, जो ऐसी कार्रवाइयों से सचमुच चकित हो उठते हैं अथवा उनका मखौल तक उड़ा सकते हैं।



इस बार इतना ही।
 
जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 7 जनवरी 2012

चरित्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,
यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभाव और शिक्षा पर चर्चा की थी, इस बार से हम "चरित्र" पर चर्चा शुरू करेंगे और चरित्र की अवधारणा को समझने की कोशिश करेंगे।
यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



चरित्र की अवधारणा
चरित्र की परिभाषा

चरित्र ( character ) शब्द उन अभिलाक्षणिक चिह्नों ( characteristic signs ) का द्योतक है, जिन्हें सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ग्रहण करता है। जिस प्रकार मनुष्य की वैयक्तिकता ( individuality ) अपने को मानसिक प्रक्रियाओं ( अच्छी स्मृति, फलप्रद कल्पना, हाज़िर जवाबी, आदि ) की विशिष्टताओं और स्वभाव के लक्षणों में प्रकट करती है, उसी प्रकार वह मनुष्य के चरित्र के गुणों को प्रदर्शित करती है।

चरित्र की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है : चरित्र मनुष्य के स्थिर वैयक्तिक गुणों का कुल योग है, जो उसके कार्यकलाप तथा संसर्ग-संपर्क में उत्पन्न तथा उजागर होते हैं और उसके आचरण के अभिलाक्षणिक रूपों को निर्धारित करते हैं

मनुष्य का व्यक्तित्व केवल इसी बात से अभिलक्षित नहीं होता है कि वह क्या करता है, अपितु इस बात से भी अभिलक्षित होता है कि वह उसे किस तरह करता है। साझे हितों तथा आस्थाओं को अपना आधार बनाते हुए तथा जीवन में साझे ध्येयों की सिद्धी की कामना करते हुए लोग अपने सामाजिक आचरण-व्यवहार तथा कार्यकलाप में सर्वथा भिन्न-भिन्न, कभी-कभी तो एक-दूसरे के विपरीत वैयक्तिक गुण प्रदर्शित करते हैं।

एक जैसी कठिनाइयां झेलते हुए, एक जैसे दायित्व निभाते हुए, एक जैसी वस्तुएं पसंद या नापसंद करते हुए भी कुछ लोगों में नरमी और सुनम्यता होती है, तो कुछ कठोर और असहिष्णु होते हैं, कुछ प्रफुल्लचित्त होते हैं, तो कुछ उदास रहते हैं, कुछ में आत्मविश्वास होता है, तो कुछ कायर होते हैं, कुछ सब को साथ लेकर चल सकते हैं, तो कुछ ऐसा नहीं कर पाते। छात्रों को संबोधित एक ही अर्थ से युक्त व्याख्याएं कुछ अध्यापकों द्वारा नरमी, भद्रतापूर्वक और प्रीतिकर ढंग से, तो कुछ द्वारा कर्कश और शिष्टताहीन ढंग से की जाती हैं। ऐसे अंतर्निहित वैयक्तिक गुण उन लोगों में तो आम तौर पर और भी अधिक स्पष्ट रूप से पाये जाते हैं, जिनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है, जिनकी रुचियां, सांस्कृतिक स्तर तथा नैतिक सिद्धांत भिन्न-भिन्न होते हैं।

वैयक्तिक गुण, जिनसे मनुष्य का चरित्र बनता है, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि इच्छा ( उदाहरण के लिए, संकल्प अथवा अनिर्णय, भीरूता ) और अनुभूतियों ( उदाहरण के लिए, प्रफुल्लचित्तता अथवा विषाद ) और कुछ हद तक बुद्धि ( उदाहरण के लिए, चंचलता अथवा विचारशीलता ) से जुड़े होते हैं। परंतु चरित्र की अभिव्यक्तियां संजटिल ( complex ) प्रक्रियाएं हैं और सांकल्पिक ( volitional ), भावनात्मक अथवा बौद्धिक गुणों के अर्थ में उनका बहुधा वर्गीकरण नहीं किया जा सकता ( उदाहरण के लिए, संदेही स्वभाव, ह्र्दय की विशालता, उदारता, विद्वेष, आदि को इन तीन प्रवर्गों ( categories ) में से किसी के भी अंतर्गत नहीं रखा जा सकता )।

चरित्र, सामाजिक संबंध तथा सामाजिक समूह

व्यक्तिगत चरित्र का निर्माण विकास के भिन्न-भिन्न स्तरोंवाले भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों में ( परिवार में, मित्रमंडली में, अध्ययन-समूहों अथवा व्यवसायिक कार्य-समूहों में, किसी समाज-उदासीन संगठन, आदि में ) होता है। किसी व्यक्ति में, उदाहरण के लिए, किसी किशोर में खुलेपन, बेलागपन ( mindedness ), साहस तथा अडिगता के गुण, तो दूसरे मामले में घुन्नेपन, मिथ्यावादिता, कायरता, लीकपरस्ती और ढीलेपन के गुण विकसित हो सकते हैं। यह संदर्भ-समूह में मनुष्य की वैयक्तिकता तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relationship ) के स्तर पर निर्भर करता है। विकास के उच्च स्तरवाला सामाजिक-समूह, सर्वोत्तम मानव गुणों के विकास तथा सुदृढ़ीकरण के लिए सबसे अधिक अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता हैं। यह प्रक्रिया व्यक्तित्व के समूह के साथ इष्टतम समेकन ( optimize integration ) तथा स्वयं समूह के आगे विकास को बढ़ावा देती है।

व्यक्ति के चरित्र को जानने पर यह पहले से कहा जा सकता है कि वह इन या उन परिस्थितियों में किस तरह से पेश आएगा। और इसके फलस्वरूप उसके व्यवहार का निदेशन किया जा सकता है। अतः अध्यापक को अपने छात्रों को सामाजिक कार्य सौंपते समय उनके ज्ञान तथा हुनर को ही नहीं, अपितु उनके चरित्र को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई छात्र अपनी धुन का पक्का और अध्यवसायी ( diligent ), परंतु साथ ही कुछ मंथर ( slow ) और आवश्यकता से अधिक सावधान होता है। दूसरा स्फूर्तिवान है, उसे साझा ध्येय बहुत प्रिय हैं, परंतु अपने से ज़रा भी भिन्न रायों के प्रति असहिष्णु ( intolerant ) होता है और इस कारण वह अकारण रूखा और अशिष्ट हो सकता है। छात्र के चरित्र के मूल्यवान गुणों को ध्यान में रखते हुए अध्यापक द्वारा उन्हें सुदृढ़ और सशक्त बनाने का तथा उनके नकारात्मक गुणों को निर्बल बनाने या कम से कम उनका प्रतिकार करने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए वह उनमें निहित अन्य समाजोपयोगी गुणों का विकास कर सकता है।

प्रत्येक बालक-बालिका के चरित्र तथा स्वभाव के विषय में अध्यापक की जानकारी प्रत्येक पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिए जाने की पूर्वशर्त है। अध्यापन और शिक्षा के क्षेत्र में यह बात अत्यधिक महत्त्व रखती है।




इस बार इतना ही।
 
जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

स्वभाव और शिक्षा


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में सक्रियता की व्यक्तिगत शैली को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम स्वभाव और शिक्षा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्वभाव और शिक्षा
स्वभाव की विशेषताओं के तौर पर क्रियाशीलता, संवेगात्मकता और गतिशीलता

बच्चों के प्रति वैयक्तिक, मनोविज्ञानसम्मत उपागम अपनाने के लिए उनके स्वभाव की विशेषताएं जानना बहुत ज़रूरी है। बच्चे के साथ अल्पकालिक संपर्क से उसके मानस के गतिक पक्ष की आंशिक और थोड़ी-बहुत ही स्पष्ट जानकारी पाई जा सकती है, जो उसके स्वभाव के सही मूल्यांकन के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। छात्र की सांयोगिक आदतों व तौर-तरीक़ों का उसके स्वभाव की बुनियादी विशेषताओं से भेद करने के लिए शिक्षक के वास्ते यह जानना जरूरी है कि उस छात्र का विकास किन परिस्थितियों में हुआ है। उसे विभिन्न परिस्थितियों में छात्र के व्यवहार तथा कार्यों की तुलना भी करनी चाहिए। एक जैसी परिस्थितियों में छात्रों के व्यवहार तथा सक्रियता का तुलनात्मक अध्ययन उनके मानस की गतिक अभिव्यक्तियों को जानने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

छात्र के स्वभाव का भेद निर्धारित करने के लिए शिक्षक को पहले उसकी क्रियाशीलता, संवेगात्मकता, गतिशीलता को आंकना चाहिए।

१. क्रियाशीलता : इसे नई जानकारियों, कार्यों तथा वस्तुओं के लिए बच्चों की ललक की प्रबलता से, परिवेश को बदलने तथा बाधाओं को पार करने की उसकी इच्छा की तीव्रता ( intensity ) से आंका जाता है।
२. संवेगात्मकता : इसे संवेगात्मक प्रभावों के प्रति बच्चे की संवेदनशीलता और संवेगात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहाना खोजने की उसकी प्रवृत्ति ( tendency ) से आंका जाता है। संवेगों की अभिप्रेरण-क्षमता और एक संवेगात्मक अवस्था से दूसरी अवस्था में संक्रमण की रफ़्तार भी इस संबंध में बड़ा महत्त्व रखती हैं।
३. गतिशीलता : बच्चे की गतिशीलता की विशेषताएं अपने को पेशीय क्रियाओं की गति, आकस्मिकता, लय, विस्तार और कई अन्य बातों में व्यक्त करती हैं ( उनमें से कुछ वाचिक गतिशीलता के भी अभिलक्षण हैं )। स्वभाव की इन अभिव्यक्तियों को अन्य अभिव्यक्तियों की अपेक्षा आसानी से देखा और आंका जा सकता है।

यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि स्वभाव की आयुगत विशेषताएं भी हैं और हर अवस्था में क्रियाशीलता, संवेगात्मकता तथा गतिशीलता अपने को अलग ढंग से व्यक्त करती हैं। उदाहरण के लिए, निचली कक्षाओं के बच्चों की क्रियाशीलता की विशेषताएं हैं रुचि का सहज ही जागृत हो जाना, बाह्य क्षोभकों के प्रति उच्च संवेदनशीलता, किसी बात पर ध्यान देर तक केंद्रित ना रख पाना। इनका कारण बच्चे के तंत्रिका-तंत्र की आपेक्षिक दुर्बलता और अत्यधिक संवेदनशीलता है। निचली कक्षाओं के बच्चों की संवेगात्मकता तथा गतिशीलता भी किशोरों के इन गुणों से बहुत भिन्न हैं। बच्चे की स्वभावगत विशेषताओं को उसकी आयु से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उनकी अभिव्यक्तियां हमेशा बच्चे के विकास से जुड़ी होती हैं।

स्वभाव की विशेषताएं और शिक्षा

हर प्रकार का स्वभाव अपने को सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के मानसिक अभिलक्षणों में प्रकट कर सकता है। पित्तप्रकृति व्यक्ति की उर्जा और कर्मशक्ति यदि उचित लक्ष्यों की ओर उन्मुख हों, तो वे मूल्यवान गुण हो सकती हैं, किंतु उसका संवेगात्मक तथा गतिशीलता संबंधी असंतुलन पालन की कमियों के साथ मिलकर अपने को उच्छॄंखलता, उद्दंड़ता तथा आपे से बाहर होने की स्थायी प्रवृत्ति में व्यक्त कर सकते हैं। रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य की जीवंतता और सह्रदयता श्रेष्ठ गुण हैं, किंतु समुचित शिक्षा के अभाव में ये गुण एकाग्रता की कमी, लापरवाही और निरुद्देश्यता की ओर ले जा सकते हैं। श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) मनुष्य की शांतचित्तता, आत्म-नियंत्रण और गंभीरता की सामान्यतः हर कोई प्रशंसा करेगा, किंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में वे उसे निश्चेष्ट, जड़ और ऊबाऊ आदमी में परिवर्तित कर सकते हैं। इसी तरह वातप्रकृति ( विषादी ) मनुष्य के भावनाओं की गहनता तथा स्थिरता और संयोगात्मक संवेदनशीलता जैसे गुण उसके बहुत काम आ सकते हैं, किंतु उचित शैक्षिक प्रभाव के अभाव में ये ही अन्यथा मूल्यवान गुण अतिशय संकोच में बदल जाएंगे और आत्मपरक अनुभवों की दुनिया में सिमट जाने की प्रवृत्ति को जन्म देंगे।

इस तरह स्वभाव के बुनियादी गुणधर्म व्यक्तित्व की विशेषताओं का पूर्वनिर्धारण ( predetermination ) नहीं करते और ख़ुद ही मनुष्य के अच्छे या बुरे गुणों में नहीं बदल जाते। अतः शिक्षक और अभिभावकों का कार्य एक तरह के स्वभाव को बदलकर दूसरी तरह का स्वभाव विकसित करना नहीं ( ऐसे प्रयास हमेशा विफल सिद्ध होते हैं ), बल्कि छात्र के स्वभाव के अच्छे पहलुओं को प्रोत्साहित करना साथ ही उसे बुरे, नकारात्मक पहलुओं से छुटकारा पाने में मदद देना है

जो चीज़ ख़राब शिक्षा या पालन का परिणाम है, उसे आंख मूंदकर स्वभाव से नहीं जोड़ना चाहिए। उदाहरण के लिए, व्यवहार में संयम व आत्म-नियंत्रण के अभाव का पित्तप्रकृति ( कोपशील ) स्वभाव से संबंध होना अनिवार्य नहीं है। वह ग़लत पालन का परिणाम भी हो सकता है। इसी तरह मनुष्य का बिलावजह अपनी रुचियां व शौक बदलना, उसमें संयम का अभाव, अन्य लोगों के प्रति उदासीनता, अनावश्यक संकोच, आदि स्वभाव के नहीं, अपितु अवांछनीय प्रभावों के परिणाम हो सकते हैं। बच्चा स्कूल के भीतर दब्बू, लगभग असहाय प्रतीत हो सकता है और वातप्रकृति, यानि विषादी प्ररूप का ठेठ प्रतिनिधी होने की सर्वथा मिथ्या छाप पैदा कर सकता है, किंतु वास्तव में वैसा व्यवहार उसके पढ़ाई में और सबसे पिछड़ा होने या औरों के बीच घुल-मिल न पाने का परिणाम हो सकता है।

विभिन्न स्वभावोंवाले लोगों के प्रति वैयक्तिक उपागम

ऊपर जो भी कुछ कहा गया है, उसका यह मतलब नहीं कि स्वभावगत अंतरों को अनदेखा करना चाहिए। बच्चों के स्वभावों का ज्ञान शिक्षक और अभिभावकों को उनके व्यवहार की विशिष्टताओं को बेहतर समझने और लालन-पालन तथा शैक्षिक प्रभाव की प्रणालियों को आवश्यकतानुसार बदलने की संभावना देता है।

छात्रों की प्रगति पर ख़राब अंकों का प्रभाव मालूम करने के लिए किये गए विशेष प्रयोगों ने दिखाया है कि पढ़ाई में समान रुचि रखनेवाले, किंतु स्वभाव के मामले में भिन्न बच्चे उनपर अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया करते हैं : प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले अपने को संभाल लेते हैं और दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले हतोत्साहित हो जाते हैं, आत्मविश्वास खो बैठते हैं और नहीं जानते कि क्या करें। स्पष्टतः ऐसी विभिन्न प्रतिक्रियाएं शिक्षक द्वारा छात्रों के प्रति अलग-अलग कार्यनीतियां ( strategies ) अपनाए जाने की आवश्कयता पैदा करती है।

शिक्षक भली-भांति जानते हैं कि स्कूल की समय-तालिका या पाठों के क्रम में परिवर्तन कक्षा के सामान्य काम में विघ्न पैदा कर देता है। कुछ छात्र ऐसे परिवर्तनों के जल्दी ही और आसानी से आदी हो जाते हैं, जबकि दूसरे अपने को नई स्थिति के अनुसार ढ़ाल पाने में कठिनाई अनुभव करते हैं। सामान्यतः शिक्षक को पित्तप्रकृति ( कोपशील ) तथा वातप्रकृति ( विषादी ) स्वभावोंवाले बच्चों पर विशेष ध्यान देना पड़ता है : पहलों को हमेशा उग्र प्रतिक्रियाओं से रोकने, अपने और अपनी क्रियाओं पर नियंत्रण करना सिखाने और शांति के साथ तथा निरंतर कार्य का प्रशिक्षण देने की जरूरत होती है, जबकि दूसरों को उनका खोया आत्म-विश्वास लौटाना, प्रोत्साहित करना तथा कठिनाइयों से विचलित न होना सिखाना होता है। कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चों के लिए कठोर दिनचर्या तथा काम की नपी-तुली गति निर्धारित की जानी चाहिए।

अच्छी शिक्षा-पद्धति दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चे में भी दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास कर सकती है। इसके विपरीत कृत्रिम परिस्थितियों में दी जानेवाली शिक्षा प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले बच्चे को भी पहलहीन तथा आत्म-विश्वासरहित बना सकती है। हर पित्तप्रकृति ( कोपशील ) मनुष्य अपने निश्चय पर अड़िग नहीं रहता और न हर रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य सह्रदय होता है। आत्म-नियंत्रण और स्वशिक्षा के द्वारा ये गुण विकसित करने होते हैं

विकासोन्मुख मनुष्य को शनैः शनैः अपने व्यवहार तथा सक्रियता का सचेतन नियंत्रण करना सीखना चाहिए। विभिन्न स्वभावोंवाले व्यक्ति इस काम को विभिन्न तरीक़ो से करते हैं। स्वभावगत भेदों का तकाज़ा है कि छात्रों में आवश्यक मानसिक गुण संवर्धित ( enhanced ) करने के लिए शिक्षक अलग-अलग बच्चों के साथ अलग-अलग प्रणालियां इस्तेमाल करे। मनुष्य के स्वभाव की विशेषताएं अपने को विभिन्न क्षेत्रों में ( उदाहरणार्थ, स्कूल में और घर में ) विभिन्न रूपों में प्रकट करती हैं। स्वभाव की कुछ अभिव्यक्तियां मनुष्य के विन्यासों तथा आदतों के प्रभाव से एक निश्चित दिशा में सीमित तथा निदेशित की जा सकती हैं। दूसरे शब्दों में, स्वभाव व्यवहार के संरूपों को प्रभावित करता है, न कि उन्हें पहले से तयशुदा बनाता है। यहां शैक्षिक प्रभाव और परिवेश के प्रति विकासोन्मुख मनुष्य ( बच्चा, किशोर, आदि ) के रवैयों ( attitudes ) की सारी पद्धति सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वभाव की विशेषताएं, अर्थात मन की गत्यात्मक पद्धति के अभिलक्षण उन अत्यंत महत्त्वपूर्ण गुणों के विकास की एक पूर्वापेक्षा ही है, जिनसे मनुष्य का चरित्र ( character ) बनता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

रविवार, 25 दिसम्बर 2011

सक्रियता की व्यक्तिगत शैली


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम सक्रियता की व्यक्तिगत शैली पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यावसायिक अपेक्षाएं और स्वभाव

कुछ ख़ास क्षेत्रों में स्वभाव ( nature ) की विशेषताएं न केवल सक्रियता को, अपितु उसके अंतिम परिणामों को भी प्रभावित करती हैं। ऐसे क्षेत्रों के संबंध में मन के कुछ गतिक गुण ज़्यादा अनुकूल होते हैं और कुछ कम अनुकूल। जिन क्षेत्रों में क्रियाओं की तीव्रता की दर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, वहां बौद्धिक गतिक गुण, काम के लिए मनुष्य की उपयुक्तता का निर्धारण करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। वास्तव में कतिपय व्यवसायों ( professions ) के लिए उच्च गतिक अभिलक्षणों ( high dynamic characteristics ) की अपेक्षा होती है, जो प्रत्याशियों का प्राथमिक चुनाव आवश्यक बना देती है। उदाहरण के लिए, पायलट, ड्राइवर या सर्कस के कलाबाज़ के लिए गतिशील तथा मजबूत तंत्रिका-तंत्र की आवश्यकता होती है। इसी तरह संवेगात्मक उत्तेज्यता ( impulsive excitement ) जैसे गुण के बिना अभिनेता या संगीतज्ञ नहीं बना जा सकता।

किंतु अधिकांश व्यवसायों में सक्रियता की गतिकी से संबंधित स्वभावगत विशेषताएं उसकी अंतिम कारगरता ( effectiveness ) को प्रभावित नहीं करती। स्वभाव के किसी भी भेद की जो कमियां हैं, उनकी प्रतिपूर्ति ( compensation ) अपनी सक्रियता में मनुष्य की गहन रुचि, तैयारी के उच्च स्तर और संकल्पात्मक प्रयासों ( volitive efforts ) से की जा सकती है।

सर्वविदित है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कला जैसे सभी सृजनात्मक ( creative ) क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलताएं पानेवाले सभी लोगों के स्वभाव एक जैसे नहीं होते। सृजनशील व्यक्ति की एक मुख्य विशेषता अपने कार्यों की प्रणालियों का विशिष्टिकरण है, यानि वह सचेतन अथवा अचेतन रूप से अपने कार्य में ऐसी शैलियों ( styles ) तथा तकनीकों ( techniques ) का प्रयोग करता है कि जो उसके अपने स्वभाव से अधिकतम मेल खाती है

सक्रियता की व्यक्तिगत शैली

स्वभाव अपने को सर्वप्रथम कार्य-प्रणालियों की विशिष्टता ( specialty, uniqueness ) में व्यक्त करता है, ना कि कार्य की कारगरता ( effectiveness ) में। कार्य-निष्पादन में उच्च-परिणाम गतिशील और जड़, दोनों तरह के तंत्रिका-तंत्रवाले व्यक्तियों द्वारा पाये जा सकते हैं। यह पाया गया है कि विपरीत गतिशीलता-अभिलक्षणवाले व्यक्ति, श्रम-परिस्थितियों के समान होने पर भी अलग-अलग कार्यनीतियां ( strategies ) अपनाते हैं। शानदार उत्पादन-परिणाम उन व्यक्तियों द्वारा पाए जाते हैं, जिनके काम की शैली तथा प्रणालियां उनकी अपनी विशेषताओं से मेल खाती हैं। इस तरह हम देखते हैं कि स्वभाव, सक्रियता की व्यक्तिगत शैली ( personal style ) का निर्धारण करता है।

व्यक्तिगत शैलियों की समस्या का अध्ययन करनेवाले मनोविज्ञानियों की खोजें दिखाती हैं कि ये शैलियां तुरंत और संयोगवश नहीं पैदा होतीं। व्यक्तिगत शैली का निर्माण तथा सुधार तभी होता है, जब मनुष्य बेहतर परिणाम पाने के लिए अपने स्वभाव के अनुरूप उपाय तथा तरीक़े सक्रिय रूप से खोज रहा हो। सभी दक्ष मज़दूरों, उत्कृष्ट खिलाड़ियों और तेज़ छात्रों की कार्य करने की अपनी व्यक्तिगत शैली होती है।

यह ध्यान देने योग्य बात हैं कि हर व्यक्ति द्वारा अलग से कार्य किए जाने की तुलना में संयुक्त सक्रियता में, विशेषतः जब कार्य दो व्यक्तियों द्वारा मिल-जुलकर किया जा रहा हो, उनके स्वभाव के गतिक लक्षण, सक्रियता के अंतिम परिणाम पर कहीं अधिक प्रभाव डालते है। इतना ही नहीं, संयुक्त सक्रियता से किन्हीं निश्चित स्थितियों के लिए विभिन्न प्रकार के स्वभावों के अधिक अनुकूल और कम अनुकूल संयोजन ( combination  ) भी पता चल जाते हैं। उदाहरण के लिए, उन मामलों में पित्तप्रकृति ( कोपशील ) मनुष्य की सक्रियता तब अधिक कारगर सिद्ध होती है, जब वह किसी श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) या वातप्रकृति ( विषादी ) व्यक्ति के साथ मिलकर काम करता है। उसका किसी रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) अथवा अपने ही जैसे स्वभाववाले व्यक्ति के साथ मिलकर काम करना उतना कारगर नहीं साबित होता। ऐसे तथ्य दिखाते हैं कि स्वभाव की किन्हीं निश्चित विशेषताओं का महत्त्व ठीक-ठीक तभी आंका जा सकता है कि जब संयुक्त-सक्रियता मे उनकी भूमिका को पूरी तरह ध्यान में रखा जाए।

मनुष्य अपने स्वभाव को जानना बचपन में ही शुरू कर देता है। शिक्षण तथा शिक्षा की प्रक्रिया में वह स्वभाव के नकारात्मक पहलुओं से होनेवाली हानि की प्रतिपूर्ति ( compensation ) के तरीक़े सीखता है और सक्रियता की अपनी व्यक्तिगत शैली विकसित करता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 17 दिसम्बर 2011

बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



बौद्धिक योग्यताएं, सक्रियता-प्रणाली और स्वभाव

बौद्धिक योग्यताओं के स्तर और स्वभाव के बीच संबंध की संभावना विषयक विशेष अध्ययन ने दिखाया है कि उच्च बौद्धिक योग्यताओंवाले व्यक्तियों के स्वभावों में बड़ा अंतर हो सकता है। इसी तरह समान स्वभाव वाले बड़ी ही भिन्न बौद्धिक योग्यताएं प्रदर्शित कर सकते हैं। बेशक बौद्धिक सक्रियता को स्वभाव से पृथक नहीं किया जा सकता, जो मानसिक सक्रियताओं की गति तथा धाराप्रवाहिता, ध्यान की स्थिरता तथा परिवर्तनशीलता, काम में ‘प्रवृत्त’ होने की गतिकी, काम के दौरान संवेगात्मक आत्म-नियंत्रण और तंत्रिका-तनाव तथा क्लांति ( stress and fatigue ) की मात्रा जैसे अभिलक्षणों को प्रभावित करता है। किंतु सक्रियता के ढंग तथा शैली ( style ) को प्रभावित करनेवाली स्वभाव की विशेषताएं, स्वयं बौद्धिक योग्यताओं का निर्धारण नहीं करतीं। स्वभाव की विशेषताएं मनुष्य के काम के ढंग तथा तरीक़ों का तो निर्धारण करती है, किंतु उसकी उपलब्धियों के स्तर का नहीं। अपनी बारी में मनुष्य की बौद्धिक योग्यताएं ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करती हैं कि जिनमें वह अपने स्वभाव की कमियों की प्रतिपूर्ति ( compensation ) कर सकता है

इसकी मिसाल के तौर पर हम नीचे उत्तम अंकों के साथ स्कूली शिक्षा समाप्त करनेवाले दो नवयुवकों का तुलनात्मक मनोवैज्ञानिक चित्र पेश करेंगे।

अमित सक्रिय तथा उर्जावान नवयुवक है। वह सामान्यतः अपने काम में दिलचस्पी लेता है और अन्य लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह एक साथ कई काम कर सकता है, पेचीदा काम और बदलते हालात उसकी उर्जा को कम नहीं करते। किंतु हिमांशु अपना काम दूसरे ढंग से करता है। उसे अपना होमवर्क करने में बड़ा समय लगता है, तैयारीवाले चरण के बिना उसका काम नहीं चल पाता। छोटी-छोटी बाधाएं और अप्रत्याशित परिस्थितियां भी उसे देर तक सोचने को विवश कर देती हैं। अमित को, जो सदा बड़ी फुर्ती से काम करता है, आराम के लिए भी बहुत कम समय चाहिए। स्कूल से पैदल घर लौटना, दो-चार इशर-उधर की बातें, और जो सबसे बड़ी चीज़ है, काम का बदलाव उसकी शक्ति की बहाली के लिए पर्याप्त है। जहां तक हिमांशु का संबंध है, तो वह पाठों के बाद अपने को थका हुआ अनुभव करता है और अन्य कोई बौद्धिक कार्य शुरू करने से पहले उसे दो घंटे आराम की जरूरत होती है।

नई सामग्री और उसे दोहराने के बारे में दोनों नवयुवकों के रवैयों ( attitudes ) का अंतर भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है, जिन पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि वे उनकी मनोरचना की विशेषताओं का अच्छा परिचय देते हैं। शिक्षक जब नई सामग्री पढ़ाता है, तो अमित उसे बहुत चाव से सुनता है। उसे कोई भी पाठ्यपुस्तक पहली बार पढ़कर अत्यंत संतोष मिलता है। नये विषय की कठिनता उसके मस्तिष्क के लिए एक चुनौती होती है और उसे वह सहर्ष स्वीकार करता है। नयापन उसे उत्साहित और उत्तेजित करता है, इसके विपरीत दोहराने का काम उसे ज़्यादा आकर्षित नहीं करता और वह पाठों को दोहराने के बजाए अन्य काम करना पसंद करता है। हिमांशु के साथ बिल्कुल दूसरी बात है, उसे दोहराने का काम सबसे ज़्यादा पसंद है। नई सामग्री भी उसे रुचिकर लगती है। वह सोचने वाला और जिज्ञासू छात्र है, किंतु शिक्षक के विषय को देर तक समझाते रहना उसे थका डालता है। उसे नई सामग्री को दिमाग़ में बैठाने में समय लगता है। किंतु यदि दोहराने का पाठ हो, तो तब दूसरी ही बात होती है। सामग्री का वह आदि हो चुका होता है, मुख्य मुद्दों और संकल्पनाओं ( concepts ) वह परिचित हो चुका होता है और इसीलिए वह अपने आत्म-विश्वास तथा कथनों की परिशुद्धता और प्रोढ़ता से श्रोताओं को चकित कर सकता है।

अमित और हिमांशु संवेगों के मामले में एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं, पहला जल्दी क्रुद्ध हो जाता है, जबकि दूसरा जल्दी द्रवित तथा मुग्ध होता है।

इन दो नवयुवकों की पृष्ठभूमि और प्रेक्षण ( observation ) से प्राप्त सामग्री से उनके स्वभाव के बारे में निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। सभी तथ्य यह बताते हैं कि अमित का तंत्रिका-तंत्र प्रबल असंतुलित की श्रेणी में आता है और उसके स्वभाव में पित्तप्रकृति ( कोपशीलता ) का प्राधान्य है। इसके विपरीत हिमांशु संभवतः दुर्बल श्रेणी में आता है और विषादी स्वभाव के कतिपय लक्षणों का प्रदर्शन करता है। किंतु उल्लेखनीय है कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्र से उसके कक्षा का एक सर्वोत्तम छात्र बनने और अपने में उच्च बौद्धिक योग्यताएं विकसित करने में बाधा नहीं पड़ी। अंतिम विश्लेषण में हम पाते हैं कि हिमांशु की तुलना में अमित की श्रेष्ठता सापेक्ष ( relative ) है। निस्संदेह, तत्काल प्रतिक्रियाएं और अपने को आसानी से नये कार्यभार के अनुरूप बदलने की योग्यता अत्यंत मूल्यवान गुण है। किंतु अमित अपनी सारी बौद्धिक शक्ति जैसे कि एक साथ झौंक देता है, जबकि हिमांशु अपना रास्ता टटोलते और धीरे-धीरे तथा अनिश्चय के साथ आगे बढ़ते हुए विषय में, उसकी पेचीदगियों तथा बारीकियों में बहुत गहराई तक पैठने की क्षमता रखता है। हिमांशु के बौद्धिक कार्य का दक्षता-स्तर ( efficiency level ) मात्रात्मक ( quantitative ) रूप से नीचा है, किंतु गुणात्मक ( qualitative ) दृष्टि से वह अमित के कार्य से किसी भी प्रकार हीनतर नहीं है। वास्तव में हिमांशु की सोचने की प्रक्रिया का धीमापन, जिसका कारण उसका दुर्बल तंत्रिका-तंत्र है, गहराई में पैठने की एक पूर्वापेक्षा बन जाता है।

क्रियाशीलता के स्तर और गतिशीलता के स्तर जैसे स्वभाव के अभिलक्षणों का पढ़ाई की कारगरता ( effectiveness ) पर बहुत ही विभिन्न क़िस्मों का प्रभाव पड़ सकता है। सब कुछ इसपर निर्भर है कि मनुष्य इन या उन गतिक गुणों का कैसे इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, निम्न बौद्धिक क्रियाशीलता जैसी कमी की प्रायः उच्च परिशुद्धता तथा सतर्कता द्वारा प्रतिपूर्ति कर ली जाती है। सामान्यतः मनुष्य की स्वभावगत विशेषताएं ही उसे कार्य की सर्वोत्तम प्रणाली या ढंग सुझा देती है। इसमें संदेह नहीं कि हर प्रकार के स्वभाव के अपने ही लाभ हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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