रविवार, 31 दिसंबर 2017

व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित किया था, इस बार हम सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत
(the theory of socio-economic formations)
व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य
(the individual, particular and general)

यह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न हैं। यहां तक की बिलियर्ड की दो समरूप गेंदें भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हजारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्‍वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अप्रभेद्य (indistinguishable) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त (given) क्षण पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों में हो सकते हैं और भिन्न-भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं और परमाणु भिन्न-भिन्न अणुओं के अंश की तथा अणु भिन्न-भिन्न भौतिक वस्तुओं के अंश की। बेशक सर्वोपरि बात यह है कि लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं और ये भिन्नताएं हैं सूरत, चरित्र, कुशलताओं, नियतियों, जातीयता, भाषा, आदि की। संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं (phenomena) और प्रक्रियाओं (processes) में अनूठे लक्षण (features) और गुण-धर्म (attributes) होते हैं, जो उनमें अंतर्निहित (inherent) होते हैं, यानी उनमें व्यष्टिकता (individuality) होती हैयह अनुगुण (property), प्रवर्ग (category) "व्यष्टिक" (individual) ( या अनन्य unique, एकल single ) में परावर्तित होता है

इसके साथ ही ऐसी पूर्णतः व्यष्टिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं नहीं है, जो अन्य किसी से न मिलती-जुलती हों। मसलन, सारे कौव्वों के पंख काले होते हैं, सारे तरलों में तरलता का एक-सा अनुगुण होता है। लोगों को एक दूसरे से भिन्न बनानेवाले व्यष्टिक अंतरों के बावजूद उनमें एकसमान लक्षण तथा अनुगुण भी होते हैं, यानी ऐसे विशेष लक्षण होते हैं जिनके आधार पर उन्हें कई समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लोगों को उनकी आयु, लिंग, वर्ग, बालों के रंग, रुधिर-वर्ग, जातीयता, भाषा, आदि के अनुसार विभिन्न समूहों में बांटा जा सकता है। ठीक इसी तरह, रासायनिक तत्वों को उनकी रासायनिक संरचना में अंतर के बावजूद क्षारीय धातुओं, हैलोजनों तथा निष्क्रिय गैसों ( जिनमें से प्रत्येक के अपने विशेष रासायनिक अनुगुण होते हैं ) में विभाजित किया जा सकता है। उनकी नियतियां, रूपरंग तथा ठोस क्रियाकलाप कुछ भी क्यों न हो, सिकंदर तथा जुलियस सीज़र, नेपोलियन व सुवोरोव के व्यक्तित्वों में अनेक एकसमान लक्षण देखें जा सकते हैं : संकल्प, साहस, सैनिक प्रतिभा, संगठन की योग्यता, आदि जिनकी बदौलत उनका महान सेनापति बनना संभव हुआ। 

इस तरह व्यष्टिक या एकल घटनाओं में ऐसे गुण-घर्म और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान भी बनाते हैं। इस आधार पर हम उन्हें समूहों में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं (objective traits) तथा अनुगुणों ( properties) को प्रवर्ग "विशेष" (particular) से परावर्तित (reflected) किया जाता है

घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-धर्मों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता (objective reality ) में एक प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की सार्विक लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें "सामान्य" (general) या "सार्विक" (common, universal) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। सारे रासायनिक तत्वों में सार्विक यह तथ्य है कि उनके परमाणुओं की संरचना में एक परमाणविक नाभिक तथा इलैक्ट्रोनों का खोल होता है। लिंग, भाषा, नस्ल, जाति, आदि के बावजूद सारे लोगों की सामान्य विशेषता यह है कि वे सब तर्कबुद्धिसंपन्न सामाजिक सत्व (rational social beings) हैं, जो औज़ारों के जरिये विविध वस्तुएं बनाने में समर्थ होते हैं। इस तरह, हम एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्रवर्ग "व्यष्टिक", "विशेष" और "सामान्य" हमारे परिवेशीय जगत के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं

स्वयं यथार्थता (reality) में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connections) होता है। सामान्य और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सामान्य विद्यमान होता है। यह कथन प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य (applicable) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशेष नियमों से भी संनियमित (governed) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसी प्रकार, प्रत्येक अलग-अलग व्यक्ति चाहे उसका व्यक्तित्व कितना ही मेधापूर्ण क्यों न हो, अपने व्यवहार तथा सामाजिक क्रियाकलाप में एक विशेषता को व्यक्त करता है, जो उसकी जाति, व्यवसाय और श्रम-समष्टि (work collective) की लाक्षणिकता होती है और साथ ही वह उन सामान्य गुणों को भी प्रदर्शित करता है, जो उसकी संस्कृति, उसके ऐतिहासिक युग और सामाजिक वर्ग (class) के लोगों में अंतर्निहित होते हैं। इसके साथ ही साथ सामान्य और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं।

सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के संबंध को स्पष्ट करने तथा यह दर्शाने के बाद कि वह प्रकृति और समाज दोनों पर लागू होता है अब हम सामाजिक विकास के सबसे सामान्य नियमों की चर्चा कर सकते हैं। यह समस्या सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत से अविभाज्य है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 24 दिसंबर 2017

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा की थी, इस बार हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल
(the basic principle of historical materialism )

प्रवर्ग ( category ) ‘सामाजिक अस्तित्व’ ( social being ), सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘भूतद्रव्य’ ( matter ) को सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है, ठीक उसी तरह जैसे कि ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ), अधिक सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘चेतना’ ( consciousness ) का सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, दर्शन के बुनियादी सवाल का उत्तर देते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ पूर्ण मेल सहित इस बात की पुष्टि करता है कि भूतद्रव्य प्राथमिक तथा चेतना द्वितीयक है। इसका तात्पर्य, सबसे पहले और सर्वोपरि, यह है कि क्रमविकास में भूतद्रव्य चेतना से पहले विद्यमान था और उससे स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान हो सकता है। इसके विपरीत चेतना भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान नहीं रह सकती है।

परंतु यह सोचना भ्रामक होगा कि सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से पहले तथा उससे स्वतंत्र रूप में विद्यमान हो सकता है। हालांकि जो सामाजिक संबंध तथा भौतिक घटनाएं, सामाजिक अस्तित्व का अंग हैं, उनका स्वतंत्र और वस्तुगत अस्तित्व है, उनकी रचना लोगों के द्वारा उनके सोद्देश्य क्रियाकलाप के, यानी चिंतनशील अस्तित्वों के क्रियाकलाप के दौरान होती है। ऐसे मानव समाज की कल्पना करना असंभव है, जिसमें सामाजिक अस्तित्व तो रूप ग्रहण कर चुका हो किंतु सामाजिक चेतना लापता हो। ऐसे समाज का क़तई अस्तित्व नहीं हो सकता है। इस हालत में सामाजिक जीवन तक विस्तारित दर्शन के बुनियादी सवाल का भौतिकवादी उत्तर कैसा है?

हम देख चुके हैं कि जिस प्रकार समाज का आर्थिक आधार, समाज की राजनीतिक और क़ानूनी अधिरचना ( superstructure ) का आधार है, उसी प्रकार भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति, आत्मिक क्रियाकलाप सहित सारे मानवीय क्रियाकलाप का आधार है। क्रियाकलाप के अन्य सारे रूप तथा सारी पद्धतियां जिस उत्पादन पद्धति पर आश्रित होती हैं, वह, अंततः, समाज के जीवन में गहनतम परिवर्तनों का और एक सामाजिक प्रणाली से दूसरे में संक्रमण ( transition ) का कारण है और इस अर्थ में ठीक उसी तरह निर्णायक भूमिका अदा करती है, जिस तरह से आधार में परिवर्तन अधिरचना के परिवर्तनों को नियंत्रित करते हैं, क्योंकि आधार इस तथ्य के बावजूद उनका पहला कारण होता है कि अधिरचना स्वयं आधार पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है। आधार की निर्णायक भूमिका इसी में व्यक्त होती है।

अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन पर किस तरह से लागू किया जा सकता है और इसका भौतिकवादी उत्तर कैसे दिया जा सकता है। समाज के संबंध में इस प्रश्न का रूप ऐसा होगा : निर्धारक ( determinant ) कौन है - सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक चेतना ? इसके उत्तर में ऐतिहासिक भौतिकवाद, ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) के विपरीत, इस बात की पुष्टि करता है कि लोगों के अस्तित्व को उनकी चेतना निर्धारित नहीं करती किंतु, इसके विपरीत, उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है। यह प्रस्थापना ( preposition ) मनुष्यजाति के संपूर्ण ऐतिहासिक अनुभव का वैज्ञानिक सामान्यीकरण ( scientific generalisation ) है और साथ ही समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) का बुनियादी नियम है। सामाजिक अस्तित्व इस अर्थ में भौतिक तथा प्राथमिक है कि केवल वही ऐसा है, जो सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु ( content ) और रूप ( form ) को और यहां तक कि सामाजिक अस्तित्व पर उसके प्रतिपुष्टिकारी ( feedback ) प्रभाव का भी निर्धारण करता है। यही कारण है कि सामाजिक चेतना के संबंध में सामाजिक अस्तित्व की निर्धारक भूमिका से संबंधित यह प्रस्थापना ऐतिहासिक भौतिकवाद का एक बुनियादी उसूल है।

इस उसूल ( principle ) से कई नतीजे निकलते हैं : (१) सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से बाहर वस्तुगत रूप से अस्तित्वमान होता है ; (२) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है ; (३) प्राथमिक तथा भौतिक होने की वजह से सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु तथा रूप, दोनों का नियमन करता है ; (४) सामाजिक चेतना में होनेवाले सारे परिवर्तन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः सामाजिक अस्तित्व में परिवर्तन के कारण होते हैं ; (५) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व के परिवर्तन तथा विकास पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है, किंतु अंततः यह प्रभाव स्वयं सामाजिक अस्तित्व के विकास तथा कार्यात्मकता के वस्तुगत नियमों से निर्धारित होता है ; (६) सामाजिक विकास के सारे नियम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल पर आधारित हैं और उनका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण इसी से मिलता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल इस प्रस्थापना की सटीकता पर बल देता है तथा उसे अभिपुष्ट करता है कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( formations ) के सिद्धांत में अत्यंत पूर्णता से मूर्त होता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 10 दिसंबर 2017

सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक सत्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना
( social being and social consciousness )

सामाजिक अधिरचना ( social superstructure ) के मुख्य तत्वों, यानी राज्य, पार्टियों तथा सामाजिक संगठनों के क्रियाकलाप में दो पक्षों, यानी आत्मिक ( spiritual ) और भौतिक ( material ), की अंतर्क्रिया ( interaction ) होती है। इस अंतर्क्रिया का नियमन ( regulation ) करनेवाली, सर्वाधिक सामान्य नियमितता ( pattern ) को निरूपित करने के लिए, ऐतिहासिक भौतिकवाद के इन दोनों प्रवर्गों ( categories ), यानी सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझना जरूरी है।

सामाजिक अस्तित्व में, उत्पादन के संबंधों के आधार पर उत्पन्न होनेवाले वस्तुगत ( objective ) सामाजिक और व्यावहारिक संबंधों की समग्रता ( totality ) तथा उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्व ( material elements ) शामिल होते हैं।

सामाजिक चेतना में, समाज के सदस्यों के उन सारे मतों, सिद्धांतों, दृष्टिकोणों, ज्ञान तथा अनुभवों की समग्रता शामिल होती है, जो सामाजिक अस्तित्व के परावर्तन ( reflection ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं। सामाजिक चेतना काल विशेष में समाज विशेष में रहनेवाले लोगों के मानसों ( minds ) का योग मात्र नहीं होती है। यह वह सामान्य ( general ), या वह सर्वनिष्ठ ( common ) है, जो किसी एक प्रदत्त ऐतिहासिक युग में समाज, वर्गों तथा सामाजिक समूहों के सदस्यों की चेतना में निहित होता है।

ये प्रवर्ग, ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के लिए केंद्रीय महत्व के हैं। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों ने अनेक बार कहा है कि वह सामाजिक चेतना को सीधे-सीधे अर्थव्यवस्थाओं से व्युत्पन्न करता है तथा सामाजिक जीवन के सारे पक्षों को महज़ आर्थिक उत्पादन कार्यों तक सीमित करता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद इस तरह की एकांगी और अधिभूतवादी ( metaphysical ) व्याख्याएं प्रस्तुत नहीं करता है, वास्तव में, ये स्वयं पूंजीवादी अध्येता ही हैं, जो ऐसे आदिम ‘आर्थिक भौतिकवाद’ के दोषी हैं। मसलन, अमरीकी समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री वाल्ट रोस्टो ने बुद्धि की अवस्थाओं का सिद्धांत पेश किया, जिसमें यह दावा किया गया कि समाज का सारा विकास उद्योग के विकास द्वारा निर्धारित होता है, कि सारे सामाजिक अंतर्विरोधों ( वर्गों के बीच अंतर्विरोधों सहित ) को आर्थिक क्रियाकलाप में सुधार भर करके तथा भौतिक संपदा की प्रचुरता से सुलझाया जा सकता है। हालांकि यह दृष्टिकोण जीवन के अनुभव से असत्य साबित हो गया है, क्योंकि पूंजीवादी देशों में सर्जित विराट संपदा मेहनतकशों ( working people ) की पहुंच से बिल्कुल बाहर है। फिर भी यह सिद्धांत अब भी बहुत प्रचलन में है।

विश्व में कई देशों की परिस्थितियों के विश्लेषण हमें बताते हैं कि, कई देशों में क्रांतियों और गृहयुद्धों के बाद वहां की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) तबाह हो गयी थीं, अधिकांश कारखाने और मिलें काम नहीं कर रही थीं, कृषि की उत्पादकता नीचे गिर गयी थी। यानी अर्थव्यवस्था संकटापन्न थी। परंतु इस सबके बावजूद उन देशों में सर्वसाधारण की चेतना क्रांतिकारी थी, वह ऐतिहासिक आशावाद ( optimism ), नयी राजनैतिक व्यवस्था की संभावना पर विश्वास और नये समाज के निर्माण की चाह से ओतप्रोत थी। साथ ही ऐसे कई देशों में, जहां कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं बेहतर स्थिति में थीं, उनकी उत्पादक शक्तियों का स्तर सापेक्षतः ऊंचा था, लेकिन उनकी सामाजिक चेतना आम निराशावादी स्वभाव की थी और सारी आत्मिक संस्कृति संकट में थी। यदि सामाजिक चेतना की अवस्था तथा अंतर्वस्तु केवल उत्पादक शक्तियों तथा अर्थव्यवस्था की हालत से ही निर्धारित होती, तो वस्तुस्थिति बिल्कुल उल्टी होनी चाहिये थी।

वर्तमान हालात में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पूंजीवादी औद्योगिक देशों में संकट की घटनाओं पर क़ाबू पाने, मुद्रास्फीति की दरों में अंशतः घटती होने, बेरोजगारी की बढ़ती बंद होने तथा किंचित आर्थिक उत्थान की उपलब्धि के बाद सार्वजनिक समझ तथा सार्वजनिक मनोदशा सार्विक, प्रशांत ( serene ) आशावाद के अनुरूप हो जाती होगी। लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी कदापि नहीं होती। गहन वैज्ञानिक-तकनीकि क्रांति और समाज में सूचना प्रणाली का द्रुत विकास, जनता के कुछ संस्तरों और व्यावसायिक समूहों के बीच काफ़ी अधिक अस्थायित्व ( instability ) और भविष्य पर अविश्वास को जन्म दे रहे हैं। उद्योगों के स्वचालन ( automation ), रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के सिलसिले में कई कर्मचारियों के सिर पर बेरोज़गारी का खतरा लगातार मंडराता रहता है। नयी तकनीकों से अतिरिक्त धंधों के निकलने का तथ्य भी इस बात की गारंटी नहीं है कि अनेक लोग काम से निकाले नहीं जायेंगे, बेरोजगार नहीं होंगे और सामाजिक संरचना में ‘फालतू’ नहीं हो जायेंगे। इसलिए देशों की ऐसी परिस्थितियों की सामाजिक चेतना में निराशावादी स्वर हावी होता जाता है।

उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सारे सामाजिक दृष्टिकोणों, सारे मतों, आदर्शों और राजनीतिक सिद्धांतों को प्रत्यक्षतः आधार से, यानी उत्पादन संबंधों से निगमनित ( deduce ) नहीं किया जा सकता है। ये संबंध तथा उनके अनुरूप भौतिक, व्यावहारिक क्रियाकलाप, वास्तव में अन्य सारे संबंधों व क्रियाकलाप के रूपों और सामाजिक प्रक्रियाओं की बुनियाद में निहित होते हैं। किंतु इसका मतलब यह है कि सामाजिक चेतना में केवल उत्पादन संबंध तथा उत्पादन के क्रियाकलाप ही परावर्तित नहीं होते, बल्कि अन्य वस्तुगत सामाजिक संबंध, क्रियाकलाप के रूप ( और उनसे जुड़ी हुई सामाजिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं, यानी सामाजिक अस्तित्व ) भी परावर्तित होते हैं। इस तरह, प्रवर्ग ‘आधार’ और ‘अधिरचना’ यह समझने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है कि सामाजिक चेतना क्या और कैसे परावर्तित करती है और लोगों के सामाजिक क्रियाकलाप को कैसे प्रभावित करती है।

प्रवर्ग ‘सामाजिक अस्तित्व’, ‘आधार’ ( basis ) से अधिक विस्तृत है, क्योंकि वह केवल उत्पादन संबंधों को ही नहीं, बल्कि उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्वों तथा अन्य सामाजिक संबंधों व संस्थानों और विविध प्रकार के क्रियाकलाप को भी अपने में समेट लेता है। इसके विपरीत प्रवर्ग ‘सामाजिक चेतना’, ‘अधिरचना’ से संकीर्णतर है क्योंकि अधिरचना में सामाजिक चेतना के अतिरिक्त राज्य, पार्टियां तथा वे अन्य संस्थान तथा संगठन भी शामिल हैं, जो सामाजिक चेतना के ‘उत्पादन’ तथा विभिन्न सिद्धांतों, विचारों तथा मतों के सर्जन में लगे हैं और उन्हें कार्यान्वित करने और जीवनीशक्ति प्रदान करने के लिए संघर्ष करते हैं। किंतु ये संस्थान और संगठन स्वयं चेतना से परे वस्तुगत रूप से विद्यमान हैं और उनके भौतिक तत्व सामाजिक चेतना द्वारा परावर्तित होते हैं। इस तरह, सामाजिक चेतना और सामाजिक अस्तित्व का रिश्ता सीधा-सादा नहीं है, यह विभिन्न सामाजिक समूहों, वर्गों तथा सामाजिक संस्थानों के क्रियाकलाप के द्वारा व्यवहित ( mediated ) है।

सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को सिर्फ़ परावर्तित ही नहीं करती, बल्कि प्रतिपुष्टिकर ( feedback ) प्रभाव भी डालती है। मसलन, पूंजीवादी अवधि की सामाजिक चेतना की प्रणाली में और दृष्टिकोणों तथा मतों के साकल्य ( aggregate ) में पूंजीवाद के आंतरिक संकट को परावर्तित करनेवाले क्रांतिकारी विचार उत्पन्न हो सकते हैं। जब ये विचार सर्वसाधारण में घर कर लेते हैं, तो वे क्रांतिकारी क्रियाकलाप में मूर्त हो सकते हैं और स्वयं अपने अस्तित्व या सत्ता को ही परिवर्तित कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप पूंजीवादी अस्तित्व या सत्ता के स्थान पर एक नया अस्तित्व या सत्ता - समाजवादी समाज - उत्पन्न हो सकता है। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को जितनी सटीकता से परावर्तित करती है, उतनी ही अधिक प्रबलता से सामाजिक अस्तित्व को प्रभावित करती है।

ऊपर कही गयी सारी बातों का समाहार करते हुए अब हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों ( basic principles ) को निरूपित कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 3 दिसंबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन
( social organisations in the system of the superstructure )

वर्ग समाजों में राज्य और राजनीतिक पार्टियों के साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक संगठन भी अधिरचना का अंग होते हैं। उनकी स्थापना शोषक और शोषित दोनों ही वर्गों द्वारा की जा सकती है। शोषकों के हितों की रक्षा करनेवाले संगठनों के उदाहरण हैं कुलीनों के संघ, धार्मिक संगठन, सामंती समाज में व्यापारियों के संघ और पूंजीवादी समाज में निजी संपत्ति के मालिकों तथा पूंजीपतियों के विभिन्न निगमित ( corporative ) संगठन ( जैसे उद्योगपतियों, बड़े किसानों के संघ, अन्य संस्थाएं )।

वर्ग संघर्ष के विकसित तथा तीक्ष्ण होने तथा मेहनतकशों की वर्ग चेतना बढ़ने के साथ ही साथ उन्होंने भी अपने हितों की रक्षार्थ संगठन बनाने शुरू कर दिये। पूंजीवादी समाज में ऐसे संगठनों में सबसे महत्वपूर्ण ट्रेड-यूनियनें हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मज़दूर वर्ग के संघर्ष को संगठित करना होता है। ट्रेड-यूनियनों के क्रियाकलाप का स्वभाव इस बात पर बहुत निर्भर होता है कि कौनसी राजनीतिक पार्टियां उन पर प्रभाव डालती हैं। पूंजीवादी विचारक, सुधारक ( reformists ) और संशोधनवादी ( revisionists ), ट्रेड-यूनियनों को पूंजीवादी लक्ष्यों के अंतर्गत लाने और क्रांतिकारी संघर्ष के रास्ते से डिगाकर ऐसी छिटपुट आर्थिक लड़ाइयों की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं, जिनसे पूंजीवाद की बुनियाद को कोई हानि नहीं होती। पूंजीवादी देशों में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रेड-यूनियन आंदोलन में अपने प्रभाव को बढ़ाना है। मज़दूरों की वर्ग चेतना को परिपक्व करने और क्रांतिकारी संघर्षों की राह पर ले जाने के लिए वे ट्रेड-यूनियनों में वैचारिक, शैक्षिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कामों पर बल देते रहते हैं।

समसामयिक पूंजीवादी समाज की अधिरचना में ट्रेड-यूनियनों के अलावा पुरुषों के , महिलाओं के, कलात्मक व साहित्यिक, संगीत, युद्ध विरोधी, खेलों के तथा बहुत सारे अन्य संगठन भी शामिल होते हैं। विभिन्न सामाजिक, सामूहिक और व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाले यह संगठन सामाजिक घटनाओं के प्रति अपने रुख़ ( attitude ) में भिन्न-भिन्न होते हैं और समाज के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार का असर डालते हैं। परंतु जब उनके कार्यकलाप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवादी वर्ग के मौलिक, मूलभूत हितों पर असर डालने लगते हैं, तो उन्हें पूंजीवादी राज्य और उसकी राजनीतिक पार्टियों के घोर विरोध का सामना करना पड़ता है

समाजवादी समाज में मेहनतकशों के हितों को व्यक्त करनेवाले सामाजिक संगठनों की भूमिका लगातार बढ़ती रहती है। उनके क्रियाकलापों का मक़सद समाजवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना, संस्कृति का विकास करना और सामाजिक जीवन के रूपों तथा दशाओं को बेहतर बनाना होता है। सहकारिता ( cooperation ) के विभिन्न रूपों की भूमिका बढ़ती है, जो सामाजिक स्वप्रबंध ( self-managements ) तथा अर्थव्यवस्था के विकास का कारगर साधन होते हैं। समाजवादी जनवाद के और अधिक विकसित होने के साथ-साथ सामाजिक संगठन समाज के प्रशासन में अधिक जटिल और सर्वसमावेशी ( all-embracing ) कार्य करने लगते हैं और अधिरचना में उनका महत्व लगातार बढ़ता जाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस क्रियाकलाप में आत्मगत ( subjective ) और वस्तुगत ( objective ) कारकों को कैसे मिलाया जाता है और वे कैसे अभिव्यक्त होते हैं, सारे सामाजिक संस्थानों और संगठनों की कार्यात्मकता ( functioning ) में निर्धारक कारक कौनसे हैं और कि क्या उनके क्रियाकलाप में वस्तुगत नियमों ( laws ) और नियमितताओं ( patterns ) को देखा जा सकता है। इस स्थल पर हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के सबसे महत्वपूर्ण प्रवर्गों के, अर्थात ‘सामाजिक अस्तित्व या सत्ता’ ( social being ) और ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ) के निकट आ पहुंचते हैं। इन पर चर्चा अगली बार करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 19 नवंबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा चल रही थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां
( political parties in the system of the superstructure )

राज्य की भांति राजनीतिक पार्टियां भी समाज के वर्ग विभाजन का फल हैं। पार्टियां, निश्चित वर्ग या उसके संस्तरों द्वारा गठित सर्वाधिक संगठित तथा सचेत समूह होती हैं जो उनके हितों को व्यक्त करते हैं। पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण विभेदक लक्षण ( distinguishing feature ), जो अधिरचना की प्रणाली में उनका स्थान निर्धारित करता है, यह है कि वे अपने वर्ग के राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों के बारे में जानती हैं, उन्हें ठोस आधार प्रदान करती हैं और सत्ता संघर्ष में उसकी दूरगामी तथा तात्कालिक कार्यनीतियों का विकास करती हैं, समाज के जीवन के समुचित आदर्शों को पेश करती तथा उनका औचित्य ( justification ) साबित करती हैं और अवाम के बीच अपने प्रभाव के वास्ते संघर्ष में अपनी शक्तियों को संगठित व लामबंद ( mobilise ) करती हैं।

सारे वर्ग समाजों में किसी न किसी तरह की राजनीतिक पार्टियां विद्यमान होती हैं, किंतु पूंजीवादी तथा समाजवादी समाजों की अधिरचना में उनका सबसे अधिक महत्व का स्थान होता है। पूंजीवादी लोकतंत्र, विभिन्न पूंजीवादी पार्टियों के उत्थान के लिए सबसे अधिक अनुकूल दशाओं का निर्माण करता है। आधुनिक पूंजीवादी देशों में, इन पार्टियों में से कुछ घोर प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी स्थिति अपनाती हैं, कुछ अन्य अधिक उदार राजनीतिक अवस्थिति को वरीयता देती हैं। पूंजीवादी समाज में कई राजनीतिक पार्टियों का अस्तित्व, जिसे राजनीतिक बहुत्ववाद ( political pluralism ) कहते हैं, ऐसा आभास देता है, मानों मेहनतकशों ( working people ) के पास चुनाव के लिए कई विकल्प हैं। किंतु वास्तव में ये पार्टियां, राजनीतिक कार्यों तथा समस्याओं से निबटने के साधनों तथा तरीक़ों में भिन्न होने के बावजूद प्रचलित आर्थिक आधार तथा पूंजीवादी राज्य को सुदृढ़ बनाने का ही प्रयत्न करती हैं

कुछ पूंजीवादी देशों में मेहनतकशों द्वारा कठोर वर्ग संघर्ष में हासिल प्राथमिक लोकतांत्रिक अधिकार ( भाषण, सभा करने तथा संगठन बनाने के अधिकार ) उन्हें अपनी ही राजनीतिक पार्टियों का गठन करने में समर्थ बना देते हैं। अपने सैद्धांतिक कार्यक्रम के रूप में वैज्ञानिक समाजवाद को नियमतः अमान्य समझने वाली विभिन्न सामाजिक-जनवादी और समाजवादी पार्टियां सतही सामाजिक सुधारों की नीति पर चलती हैं। इसका यह मतलब है कि सत्ता प्राप्त करने के बाद भी ऐसी पार्टियां सिर्फ़ सीमित सुधार करती हैं, जिनका मक़सद वर्ग संघर्ष को ‘मृदु’ बनाना होता है। वे पूंजीवाद की बुनियाद - बड़े निजी स्वामित्व - को हाथ भी नहीं लगातीं। यह इस बात का स्पष्टीकरण है कि ऐसी पार्टियां सत्ता प्राप्ति के बाद भी मेहनतकशों का समर्थन क्यों नहीं हासिल कर पाती और अवाम के बीच अपने प्रभाव को धीरे-धीरे क्यों गंवा देती हैं।

आज की दुनिया में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका, देश या प्रदेश विशेष की तीक्ष्ण सामाजिक समस्याओं के समाधान में उनके योगदान से तथा भूमंडलीय समस्याओं पर उनके दृष्टिकोण से निर्धारित होती है। इन समस्याओं में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं शांति और नाभिकीय निरस्त्रीकरण के लिए संघर्ष, पारिस्थितिक विनाश की रोकथाम, अधिक न्यायोचित व्यवस्था की उपलब्धि, मानवाधिकारों तथा भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक प्रणालियोंवाले देशों के बीच लचीले, समान सहयोग की स्थापना के लिए संघर्ष। समाज के सामाजिक रूपांतरण ( transformation ) के लिए मेहनतकशों के संघर्ष के हितों को व्यक्त करनेवाली प्रगतिशील पार्टियों की भूमिका का प्रश्न अधिकाधिक महत्व ग्रहण कर रहा है। इन पार्टियों की दूरगामी तथा तात्कालिक कार्यनीतियों की भूमिका ठोस ऐतिहासिक दशाओं तथा उनके सामान्य वैचारिक और सामाजिक-राजनीतिक समादेशों ( precepts ) से निर्धारित होती है।

अनेक समाजवादी देशों तथा विकास के गैरपूंजीवादी रास्ते पर अग्रसर देशों में कम्युनिस्ट, मज़दूर तथा राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टियों का, अधिरचना की प्रणाली में एक निर्णायक स्थान है। किंतु केवल एकपार्टी प्रणाली वाले समाजवाद का नमूना एकमात्र संभव नमूना नहीं है। ठोस ऐतिहासिक दशाओं में अन्य मॉडल भी संभव हैं, जिनमें वे भी शामिल हैं, जिनमें कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियां, लोकतांत्रिक संस्थानों तथा आबादी के व्यापक संस्तरों के समर्थन पर भरोसा करते हुए अन्य राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों के साथ फलप्रद सहयोग कर सकती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 12 नवंबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा चल रही थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिरचना की प्रणाली में राज्य - ३
( the state in the system of the superstructure - 3 )

उत्पादन के सुप्रचलित संबंधों से राज्य का प्रकार (type) निर्धारित होता है, इसके विपरीत, राज्य का रूप (form) ऐतिहासिक विकास की किसी भी अवस्था पर, वर्ग शक्तियों (class forces) के संबंधों, समाज के इतिहास की विशेषताओं और उसकी परंपराओं तथा ठोस घरेलू व विदेशी राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है।

सबसे ज़्यादा आम क़िस्म के शोषक राज्य, राजतंत्र (monarchy) ( यानी एक व्यक्ति का शासन ), कुलीनतंत्रीय (aristocratic) या अल्पतंत्रीय (oligarchic) गणतंत्र ( जिनमें कुलीन जातियों या अत्यंत अमीर नागरिकों के छोटे-से समूह का नेतृत्व होता है ) और जनवादी गणतंत्र (democratic republic), जिसमें विधिक व कार्यकारी निकायों का चुनाव मतदाताओं की कमोबेश बड़ी संख्या द्वारा होता है। आज अधिकांश पूंजीवादी देशों में बुर्जुआ गणतंत्र की कई क़िस्में हैं। ग्रेट ब्रिटेन, स्वीडन तथा कुछ अन्य पूंजीवादी देशों में संरक्षित संवैधानिक राजतंत्र (constitutional monarchies), उनसे सिर्फ़ अपने बाहरी पारंपरिक रूपों में ही भिन्न हैं। उनमें गणतंत्र के राज्याध्यक्ष के कार्य एक वंशानुगत राजा ( या रानी ) द्वारा किये जाते हैं किंतु उनकी सत्ता नाम मात्र की होती है।

बुर्जुआ जनवाद (bourgeois democracy), पूंजी की सत्ता के उपयोग के लिए सबसे ज़्यादा सुविधाजनक है। वह मेहनतकशों (working people) को औपचारिक मताधिकार तो देता है, परंतु उनके चुने जाने के अवसरों तथा राज्य के प्रशासन में भाग लेनें की संभावना को अधिकतम सीमा तक घटा देता है। समसामयिक पूंजीवादी समाज में क़ानून के सामने औपचारिक समानता तो जाहिर की जाती है परंतु इसको वास्तविक आर्थिक समानता से पूरित नहीं किया जाता।

जब वर्गों (classes) के बीच अंतर्विरोध (contradictions) बहुत तीक्ष्ण हो जाते हैं, तो पूंजीपति वर्ग ऐसे नरम जनवाद (moderate democracy) को भी किनारे कर देता है और खुली सैनिक-पुलिस (open military-police) या फ़ासिस्ट तानाशाही (fascist dictatorship) के रूप ग्रहण कर लेता है। इस सदी के पूर्वार्ध में इटली तथा जर्मनी में फ़ासिस्ट राज्यों के उत्थान, उनके द्वारा छेड़े नये दूसरे विश्वयुद्ध का इतिहास विश्वसनीय ढंग से दर्शाता है कि ऐसे तानाशाही शासन बड़े इजारेदार पूंजीपतियों (monopoly capitalists) का हित-साधन करते हैं। कुछ देशों में, जहां बुर्जुआ जनवाद के मामूली तरीक़े काम नहीं देते, विद्यमान सैनिक-पुलिस राज्य भी उन्हीं अंचलों की सेवा करते हैं।

बुर्जुआ जनवाद की सारी क़िस्मों से भिन्न, समाजवादी जनवाद (socialist democracy) मेहनतकशों को व्यापक अधिकार ही नहीं देता, बल्कि समाज के प्रशासन के सारे स्तरों में उनकी भागीदारी के अवसरों की गारंटी भी करता है, जो जनगण का समाजवादी स्वशासन है। असली समाजवादी जनवाद इस बात में व्यक्त होता है कि प्रत्येक सचेत, सक्रिय नागरिक केवल विधिनिर्माण के, समाज के प्रशासन तथा उद्योग के प्रबंध में ही भाग नहीं लेता, बल्कि कार्यकारी निकायों के क़ानूनी कार्यों तथा निर्णयों पर भी सक्रियता से बहस करता है। समाजवादी जनवाद, समाजवादी राज्यत्व के विकास का रूप होने के कारण, साम्यवादी स्वशासन के रूपों में संक्रमण (transition) करने का रास्ता भी तैयार करता है।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिरचना की प्रणाली में राज्य - २
( the state in the system of the superstructure - 2 )

समाजवादी समाज में संक्रमण (transition) के साथ एक नये प्रकार के राज्य - समाजवादी राज्य (socialist state) - का जन्म होता है। यह संपूर्ण जनता के राजनीतिक प्राधिकार (authority) का उपयोग करनेवाले संगठन होते हैं। देश की ठोस दशाओं के आधार पर तथा राजनीतिक शक्तियों की अवस्थिति और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के अनुरूप पूंजीवादी समाज में निर्मित राजकीय तंत्र में कमोबेश गहरे रूपांतरण (transformation) होते हैं और नये क़ानून बनाये जाते हैं। किंतु राजकीय सत्ता के संगठन का कोई एकल (single), अनिवार्य नमूना (obligatory model) नहीं होता, जो सारे देशों और राष्ट्रों के लिए उपयुक्त हो। समाजवादी राज्य की स्थापना में, राष्ट्रीय परंपराओं, राजनीतिक संघर्ष की तीक्ष्णता (acuteness) तथा अन्य कारकों पर निर्भर करते हुए, ठोस रूपों की बड़ी विविधता की पूर्वापेक्षा की जाती है।

इसके अलावा, निर्णायक कारक (decisive factor) शोषक वर्गों के प्रतिरोध का दर्जा होता है। जब राष्ट्रीय बुर्जुआ (bourgeoisie), निम्न बुर्जुआ, किसान तथा बुद्धिजीवी, समाजवादी सुधारों के बुनियादी उसूलों (principles) को स्वीकार कर लेते हैं, तो उन्हे व्यापक जनवादी आधार पर, नयी राजकीय प्रणाली में सहयोग करने को तत्पर आबादी के सारे संस्तरों (strata) की सहभागिता के साथ शनैः शनैः संपन्न किया जा सकता है। किंतु अगर समाजवादी सुधारों के ख़िलाफ़ तीक्ष्ण प्रतिरोध होता है, तो राज्य को स्वभावतः पदच्युत शोषकों (overthrown exploiters) को दबाने के लिए नितांत उचित उपाय करने ही होते हैं। किंतु समाजवादी राज्य का मुख्य कार्य दमन (suppression) का नहीं, जो अस्थायी (temporary), क्षणिक (transient) तथा प्रतिरक्षात्मक (defensive) स्वभाव का होता है, बल्कि रचनात्मक (creative) होता है, सामाजिक न्याय, समानता, जनवाद तथा मानवतावाद के उसूलों के आधार पर नये समाज के निर्माण में जुटे अवाम का नेतृत्व होता है।

सर्वहारा अधिनायकत्व (dictatorship of proletariat) नये समाज के निर्माण में निर्णायक भूमिका अदा करता है और उसके दृढ़ीकरण (consolidation) के दौरान स्वयं भी परिवर्तित होता है। अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के बाद सर्वहारा का अधिनायकत्व, सारे मेहनतकशों के राजनीतिक संगठन में विकसित हो जाता है और सर्वहारा राज्य सारे जनगण का ऐसा राज्य बन जाता है, जो समस्त जनगण के हितों को व्यक्त करता है। समाज के साम्यवादी (communist) संगठन की ओर विकास के दौरान राज्य के प्रशासनिक, संगठक तथा शैक्षिक कार्य अधिक घनीभूत और विस्तृत हो जाते हैं। उनमें से कुछ कार्य विभिन्न सामाजिक संगठनों और श्रम समष्टियों के द्वारा संपन्न होने लगते हैं। इसमें समाजवादी समाज का जनवादी चरित्र अभिव्यक्त होता है।

जब समुचित सामाजिक-राजनीतिक और वैचारिक दशाओं का निर्माण तथा प्रशासन और प्रबंध में सारे नागरिकों की सहभागिता होने लगेगी तथा बाहरी ख़तरे समाप्त हो जाएंगे एवं समुचित अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां मौजूद होंगी, तब ही एक समाजवादी राज्य एक संक्रमणात्मक रूप ग्रहण करेगा - राज्य से राज्यहीनता (non-state) की तरफ़ जाने का - और अधिरचना के एक विशेष राजनीतिक तत्व के रूप में राज्य की आवश्यकता शनैः शनैः लुप्त हो जायेगी।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल के रूप में वर्ग और वर्ग संघर्ष पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा शुरू करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १
( the state in the system of the superstructure - 1 )

राज्य ( state ) हमेशा विद्यमान नहीं था। समाज के वर्गों ( classes ) में विभाजित होने तक सैकड़ों-हज़ारों वर्ष के दौरान लोग राज्य तथा शासकीय निकायों व एजेंसियों के बिना ही काम चला लिया करते थे। तो फिर राज्य का जन्म क्यों हुआ? और यह है क्या?

अंग्रेज दार्शनिक टामस हाब्स (१५८८-१६७९) यह मान कर चले कि प्राकृतिक दशाओं में लोग लगातार एक दूसरे से लड़ते हैं क्योंकि ‘आदमी आदमी का दुश्मन है’। कभी बंद न होनेवाले इस संघर्ष में, न मरने के लिए लोग एक सामाजिक अनुबंध ( contract ) करने और सार्विक पुनर्मिलन ( universal reconciliation ) के एक निकाय ( body ) के रूप में, एक राज्य बनाने के लिए विवश हो गये। बाद में बुर्जुआ सिद्धांतकारों ने इस विचार को ही कई संस्करणों में विस्तारित ( elaborate ) किया और आज हमारे युग में भी कमोबेश यही विचार जारी है। वे दावा करते हैं कि राज्य समाज में मेल-मिलाप कराने और, वर्गीय तथा प्रतिरोधी अंतर्विरोधों सहित, सारे अंतर्विरोधों के नियमन ( regulation ) का निकाय है। इसलिए समाज के सारे संस्तरों ( strata ) को चाहिए कि वे एक ऐसे संस्थान ( institution ) के रूप में राज्य का समर्थन करें, जो संपूर्ण समाज के तथा प्रत्येक व्यक्ति के हितों में काम करता है, न कि कुछ निजी समूहों या वर्गों के।

ऐसे विचार वास्तविकता ( reality ) से मेल नहीं खाते हैं। तथ्य यह दर्शाते हैं कि दासों पर स्वामित्ववाला पहला राज्य समाज के वर्गों में बंटने के बाद बना। राज्य, प्रभावी वर्गों ( dominant classes ) के हितों के लिए संघर्ष करने तथा उनकी रक्षा करनेवाले लोगों के विशेष समूहों की सकलता ( ensemble ) है

वास्तव में, राज्य ‘एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर प्रभुत्व क़ायम रखने का कार्यतंत्र ( mechanism ) है’। शोषक राज्य ( exploiter state ) कई घरेलू और विदेशी कार्य करता है। इसका मुख्य घरेलू कार्य शोषित ( exploited ) वर्गो के वर्ग संघर्ष ( class struggle ) को दबाना है। इस काम को अंजाम देने के लिए उसमें कई अभिकरण ( agencies ), संगठन और संस्थान शामिल किये जाते हैं, जैसे सेना, पुलिस, जासूसी और प्रतिजासूसी सेवाएं, अदालतें, दंडाधिकारी, सरकार तथा उसकी कार्यकारी एजेंसिया और विधि ( legislative ) निकाय। विधी निकाय, क़ानूनी प्रणाली ( क़ानून, मानक, क़ायदे ) को निरूपित करता है, जो सामाजिक व्यवस्था पर प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों तथा दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करते हैं और उनके संकल्प ( will ) तथा प्राधिकार ( authority ) को सुदृढ़ बनाते हैं।

अदालतें तथा क़ानून लागू करने वाले निकाय, इन क़ानूनों के सख़्ती से अनुपालन को सुनिश्चित बनाते हैं, अपराधियों का पीछा करते हैं और उन्हें निर्ममता से दंड देते हैं। यह बात प्रभुत्वशाली वर्ग के उन अलग-अलग सदस्यों पर भी लागू होती है, जो प्रभावी वर्गों के लिए लाभप्रद क़ानून को तोड़ते हैं या क़ानून द्वारा स्थापित व्यवहार के मानदंड का अनुपालन नहीं करते हैं। राज्य, व्यक्तिगत हितों ( personal interests ) की नहीं, बल्कि वर्ग के समान हितों ( common interests ) की रक्षा करता है। इसलिए पूंजीवादी सिद्धांतकारों द्वारा. प्रभुत्वशाली वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के ख़िलाफ़ राजकीय उपायों और दंडात्मक कार्रवाइयों के तथ्य को, वर्ग समाजों में राज्य के राष्ट्रीय स्वभाव के साक्ष्य ( evidence ) के रूप में पेश करने के प्रयास नितांत सारहीन ( insubstantial ) हैं।

कोई भी शोषक राज्य, एक या दूसरे प्रभुत्वशाली वर्ग की तानाशाही ( dictatorship ) होता है। इसके अनुसार शोषक राज्यों के तीन प्रकारों में भेद किया जाता है: दासप्रथात्मक ( slave-owning ) राज्य, सामंती ( feudal ) राज्य तथा पूंजीवादी ( capitalist ) राज्य। फलतः, राज्य का प्रकार अंततोगत्वा स्वामित्व ( ownership ) की प्रचलित क़िस्म पर और इस क़िस्म के ही आधार पर बनने वाले प्रमुख उत्पादन संबंधों ( relation of production ) पर निर्भर करता है। अपने कार्य करते हुए राज्य अपने आधार को दृढ़ बनाता और उसकी रक्षा करता है।



इस बार इतना ही।
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रविवार, 8 अक्तूबर 2017

समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के आधार और अधिरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल के रूप में वर्ग और वर्ग संघर्ष पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष
( classes and class struggle in the society )

राज्यों के तथा राजनीतिक पार्टियों के जन्म तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) का कारण वर्ग और वर्ग संघर्ष है। समाज के मामलों में वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका, समाज के इतिहास पर उनके संघर्ष के प्रभाव और समाज की दिशा का उसके द्वारा निर्धारण होने के तथ्य की खोज बुर्जुआ इतिहासकारों तथा अर्थशास्त्रियों ने ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) की उत्पत्ति से पहले ही कर ली थी। नियमतः, वे वर्ग विभाजन ( class division ) के कारणों को कुछ लोगों की अन्य पर आत्मिक या नस्लीय श्रेष्ठता ( spiritual or racial superiority ) या  उनकी अंतर्जात ‘कुलीनता’ ( innate nobility ) में देखते थे। यह सच है कि फ्रांसीसी प्रबोधक जां जाक रूसो ( १७१२-१७७८) ने इस आशय की दलील दी थी कि सामाजिक असमानता और वर्ग विभाजन निजी संपत्ति ( private property ) की उत्पत्ति के परिणाम हैंमार्क्स  ने उनकी इस दलील का बहुत ऊंचा मूल्यांकन किया था। किंतु रूसो की ग़लती यह थी कि वे निजी स्वामित्व की स्थापना को व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता ( personal arbitrariness ) का कृत्य समझते थे। उनका कहना था कि यदि पहले-पहले संपत्तिवानों का विरोध किया जाता तो मनुष्य जाति का बाद का इतिहास नितांत भिन्न होता। 

आधुनिक पूंजीवादी सिद्धांतकार समाज के वर्ग विभाजन को मान्यता तो देते हैं, किंतु उसे या तो शाश्वत ( eternal ) या अनुच्छेदनीय ( unabolishable ) मानते हैं या यह दावा करते हैं कि वर्ग हितों ( class interests ) के पारस्परिक विरोध को सार्विक समृद्धि ( universal prosperity ) के समाज की रचना से, किंतु निजी संपत्ति को हाथ लगाये बिना, ख़त्म किया जा सकता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की एक महानतन उपलब्धि वर्गों तथा वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति के वस्तुगत कारणों ( objective reasons ) को खोजना और इस प्रस्थापना ( proposition ) को प्रमाणित करना था कि इन कारणों के लुप्त हो जाने पर विश्व इतिहास में अंततः एक नयी अवस्था का, यानी वर्गहीन समाज ( classless society ) की अवस्था का सूत्रपात हो जायेगा। वर्गों और वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति के कारण क्या हैं? और वर्ग क्या है?

निजी संपत्ति की उत्पत्ति से पहले समाज में कोई वर्ग नहीं थे। यह तब बनी जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) ऐसे पर्याप्त स्तर पर पहुंच गयी, जहां भोजन, कपड़े, शरण, आदि की फ़ौरी जरूरतों की पूर्ति के बाद कुछ अधिशेष ( surplus ) का उत्पादन होने लगा था। इस स्तर पर पहुंच जाने के उपरांत, इस अधिशेष के ज़रिये दूसरों के श्रम ( labour ) को काम में लाना, उसका शोषण करना संभव हो गया। उससे चंद लोगों के पास संपदा ( wealth ) का संचय होने लगा और उसे समाज के अन्य सदस्यों पर आर्थिक शक्ति ( power ) व प्राधिकार ( authority ) की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल में लाया जाने लगा। उस प्रक्रिया से समाज भिन्न-भिन्न वर्गों में बंट गया।

सारे सामाजिक समूह, वर्ग नहीं हैं। "वर्ग, लोगों के बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं, जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास द्वारा निर्धारित पद्धति में अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों ( means of production ) के प्रति अपने संबंधों की दृष्टि से ( अनेक मामलों में क़ानूनों द्वारा निश्चित तथा प्रतिपादित ), श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका ( role ) की दृष्टि से और फलस्वरूप सामाजिक संपदा के उस भाग की, जो उनके पास रहता है, प्राप्ति की विधि तथा आकार की दृष्टि से भिन्न होते हैं।"

इन लक्षणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण, उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व ( ownership ) है। जिन वर्गों के पास ऐसी संपत्तियां होती हैं और जो उसे अन्य लोगों के श्रम के परिणामों का विनियोजन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, शोषक वर्ग हैं, जबकि जिन वर्गों के पास ऐसी संपत्ति नहीं होती, उनका शोषण होता है, वे शोषित वर्ग हैं। इसलिए समाज के वर्ग विभाजन के आधार में कुछ संबंध ( relations ) निहित होते हैं और वे उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव व स्तर को नियंत्रित ( govern ) करते हैं।

किसी प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि में, प्रचलित उत्पादन पद्धति के अनुरूप ही उसके मुख्य वर्ग होते हैं। एक युग में वे थे दास और दास स्वामी ( slaves ans slave-owners ), दूसरे में भूदास और सामंती भूपति ( serfs and feudal lords ) और तीसरे में उजरती मज़दूर और पूंजीपति ( wage workers and capitalists )। समाजवादी समाज में, जहां उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व नहीं होता है और फलतः कोई शोषक वर्ग नहीं होता है, मुख्य वर्ग हैं मज़दूर वर्ग ( working class ) और सहकारी किसानों का समुदाय ( co-operative peasantry )।

मुख्य वर्गों के अलावा अन्य सामाजिक संस्तर भी होते हैं, जो मुख्य नहीं होते और जो अन्य लोगों के श्रम का शोषण नहीं करते हैं ( अलग-अलग किसान, कारीगर तथा दस्तकार, जो पण्य उत्पादक होते हैं ) और कुछ ऐसे विशेष सामाजिक संस्तर भी हैं, जिनकी उत्पादन प्रणाली में कोई सुपरिभाषित स्थिति नहीं होती है, मसलन, बुद्धिजीवी ( intelligentsia ), जो शोषक समाज में नियमतः प्रभावी वर्ग का पल्ला थामें रहते हैं और उनके हितों की सेवा करते हैं। समाजवादी समाज में, जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण नहीं होता, अधिकतर बुद्धिजीवी मज़दूरों और किसानों के परिवारों के होते हैं और उनके हित और लक्ष्य मज़दूर-किसानों के हितों के तदनुरूप होते हैं।

चूंकि समाज के वर्ग विभाजन का कारण सामाजिक उत्पादन का वस्तुगत विकास ( objective development ) है, इसलिए वर्ग भी कुछ निश्चित वस्तुगत अवस्थाओं ( objective conditions ) में ही लुप्त हो सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का उन्मूलन है। चूंकि निजी संपत्ति का प्राबल्य ( prevalence ) होने पर समाज के मुख्य वर्गों के हित, एक दूसरे के विरोधी और असमाधेय ( irreconcilable ) होते हैं, इसलिए उनके बीच वर्गों की उत्पत्ति के समय से ही कटु संघर्ष होता चला आ रहा है। जिन समाजों में कुछ वर्ग अन्य वर्गों की क़ीमत पर अस्तित्वमान हैं, उनमें वर्ग संघर्ष हिंसक और निर्मम है। ऐसे समाजों को प्रतिरोधी समाज ( antagonistic society ) कहते हैं।

उत्पादक शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच आंतरिक प्रतिरोधी अंतर्विरोध ( antagonistic contradictions ) इसी संघर्ष से हल किये जाते हैं, समाज के संगठन के पुराने रूप विघटित हो जाते हैं और नये रूपों की रचना होती है। जहां तक वर्गों का संबंध है, वे अपने आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्यों को जानते-समझते हैं और उन लक्ष्यों की प्राप्ति और अपने विरोधी वर्गों को पराजित करने के लिए आवश्यक कुछ दृष्टिकोण ( views ), मत ( doctrines ) और सिद्धांत ( theories ) पेश करते हैं। वर्ग संघर्ष, उत्पादन तथा आर्थिक क्रियाकलाप से लेकर सामाजिक चेतना तक, समाज के जीवन के सारे पक्षों पर असर डालता है और, इस तरह, साबित कर देता है कि इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल ( motive force ) वर्ग संघर्ष ही है।

चूंकि शोषक वर्ग, समाज में नियमतः अल्पसंख्यक होते हैं, इसलिए उन्हें ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था में अपने आर्थिक हितों की हिफ़ाज़त करने और सामाजिक उत्पादन की प्रणाली में अपनी प्रभावी स्थिति को बनाए रखने के लिए विशेष संस्थानों और संगठनों की ज़रूरत होती है। इन सामाजिक संस्थानों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं राज्य  ( state ) और पार्टियां ( parties )। ये सारे वर्ग समाजों की अधिरचना का अंग हैं और महत्वपूर्ण क़ानूनी व राजनीतिक कार्य संपन्न करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 30 सितंबर 2017

समाज के आधार और अधिरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के आधार और अधिरचना को समझने और सुपरिभाषित करने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

समाज के आधार और अधिरचना
( basis and superstructure of the society )

ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( historical idealism ) के दृष्टिकोण से समाज अलग-अलग व्यक्तियों और ऐसे एकल व्यक्तियों का समुच्चय है, जो निर्णय लेते हैं और ख़ुद जोखिम उठाकर लागू करते हैं। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति   जैसे एक वीरान द्वीप में अकेले रहनेवाला, एक प्रकार का रॉबिन्सन क्रूसो है। ऐसे विचार घोर व्यक्तिवाद ( extreme individualism ) को व्यक्त करते हैं। बेशक, समाज के मामलों में व्यक्तिगत पहल, अविष्कार तथा उद्यम ( enterprise ) ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनके द्वारा अनेक जटिल समस्याओं का समाधान हुआ है, किंतु व्यक्तिवाद का अर्थ, व्यष्टिक ( individual ) क्रियाकलाप के महत्व को मानने तथा उसे उचित ठहराने में नहीं, बल्कि उसे जनगण की सामूहिक, संयुक्त कार्र्वाइयों और जनता की एकजुटता की संभावना ही के ख़िलाफ़ खड़ा करने और सामूहिक/सामाजिक मूल्यों और आधारों को नकारने में निहित है। परंतु इसके बावजूद, वर्ग संघर्ष, ट्रेड-यूनियनों, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के कार्यों, आदि कि बुनियाद में समान लक्ष्यों तथा हितों के आधार पर निर्मित ऐसी ही एकजुटता अंतर्निहित होती है।

समाज की प्रत्ययवादी तथा व्यक्तिवादी संकल्पना के विपरीत ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) इसे एक जटिल प्रणाली ( complex system ) या एक ऐसा सामाजिक अंगी ( social organism ) मानता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न सामाजिक बंधनों और संबंधों के ज़रिये अन्य सबसे जुड़ा होता है। समाज को समझने और उसके विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के नियमों का अध्ययन करने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले मौजूदा सामाजिक बंधनों ( ties ), संबंधों और प्रक्रियाओं को समझा जाये। ऐसे स्थायी बंधनों और संबंधों ही के कारण, पीढ़ियों में परिवर्तन के बावजूद समाज की मुख्य विशेषताएं सदियों तक बनी रहती हैं, वह एक ही वस्तुगत प्रतिमान ( objective patterns ) से संचालित होता है। अतः समाज की जीवन को समझने की कुंजी अलग-अलग ‘रॉबिन्सन क्रूसोओं’ के अध्ययन में नहीं, बल्कि उन सामाजिक संबंधों व संयोजनों ( connections ) के अध्ययन में निहित है, जो लोगों के विभिन्न समूहों और अलग-अलग व्यक्तियों को अपने दायरे में ले लेते हैं।

इनमें से कौनसे संबंध निर्धारक ( determinant ) हैं? उत्पादन पद्धति ( mode of production ) को समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता के आधार के रूप में मान्यता देकर ऐतिहासिक भौतिकवाद इस बात को मान्यता देता है कि उत्पादन संबंध ( relation of production ) ही निर्धारक हैं। अन्य सारे संबंध और क्रियाकलाप के रूप ( मसलन, पारिवारिक-घरेलू, क़ानूनी, नैतिक, राजनीतिक, कलात्मक, सौंदर्यात्मक, सैनिक, राष्ट्रीय व अन्य संबंध ) और उनके अनुरूप चेतना भी, वस्तुतः उत्पादन संबंधों के आधार पर ठीक वैसे ही बनते हैं, जैसे आधारशिलाओं पर एक इमारत बनायी जाती है। इसलिए समाज की आर्थिक प्रणाली की रचना करनेवाले उत्पादन संबंधों को समाज का आधार ( basis ) और वैचारिक, क़ानूनी तथा राजनीतिक संबंधों तथा उन सार्वजनिक संगठनों व संस्थानों को, जिनके ज़रिये ये संबंध कार्यान्वित होते हैं, समाज की अधिरचना ( superstructure ) कहा जाता है। अधिरचना में सामाजिक चेतना के वे विभिन्न रूप भी शामिल हैं, जो वस्तुगत सामाजिक घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को परावर्तित ( reflect ) करते हैं।

अधिरचना, आधार पर निर्मित तथा उससे निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि आधार पर एक सक्रिय प्रतिप्रभाव ( active feedback effect ) भी डालती है। इसलिए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि वर्ग समाजों ( class societies ) की अधिरचना में वे सार्वजनिक संगठन व संस्थान शामिल होते हैं, जो विभिन्न सामाजिक समूहों तथा वर्गों के हितों ( interests ) को व्यक्त करते हैं और इस कारण से आधार पर भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभाव डालते हैं। कुछ, उन वर्गों और सामाजिक समूहों के हितों को व्यक्त करते हुए उसे मजबूत और ठोस बनाते हैं, जिनके लिए यह आधार समाज में प्रभावी स्थिति ( dominant position ) को सुनिश्चित बनाता है। अधिरचना के, अधिकारविहीन व सत्ताविहीन शोषित वर्गों और समूहों के हितों को व्यक्त करनेवाले अन्य तत्व, आधार को कमजोर बनाते हैं और उसे परिवर्तित करने तथा अंततः नये उत्पादन संबंधों, नयी उत्पादन पद्धति और फलतः एक नयी सामाजिक प्रणाली की स्थापना का प्रयास करते हैं। वर्ग समाजों में अधिरचना के सबसे महत्वपूर्ण तत्व राज्य और राजनीतिक पार्टियां हैं। अब हम अधिरचना की इन सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं की तरफ़ ध्यान देंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 24 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा जारी थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - ३
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 3)

आधुनिक पूंजीवादी समाज में उत्पादक शक्तियां ( productive forces ), स्वचालित मशीनों तथा रोबोटों का उपयोग करनेवाली जटिल तकनीकों ( complex technologies ) पर आधारित हैं। उत्पादन की प्रक्रिया में लाखों लोगों को शामिल किया गया है। फलतः उत्पादक शक्तियों का स्वभाव सामाजिक है। परंतु उत्पादन के संबंध, स्वामित्व ( ownership ) के उस निजी ( private ) पूंजीवादी रूप पर आधारित हैं, जो उन उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव व स्तर के अनुरूप था, जो पूंजीवाद के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में बनी थीं। उस काल में उत्पादन के पूंजीवादी संबंध, समाज की उत्पादक शक्तियों के साथ बहुत अधिक पूर्णता के साथ मेल खाते थे और उनके द्रुत विकास के लिए गुंज़ाइश बनाते थे। अब उत्पादन के पूंजीवादी संबंध, उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास के स्तर से मेल नहीं खाते हैं। यद्यपि ये संबंध तकनीकी प्रगति को नहीं रोक सकते हैं, तथापि वे उसकी गति को बहुत मंद कर देते हैं और उत्पादक शक्तियों के विकास को रोकते हैं। 

फलतः लोगों के संकल्प व इच्छा से अलग, उत्पादक शक्तियों के सामाजिक स्वभाव के अनुरूप ही, उत्पादन के साधनों पर नये, सामूहिक, समाजवादी स्वामित्व की स्थापना करने की एक वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता पैदा हो जाती है। इसका तात्पर्य है कि पूंजीवादी शोषण तथा प्रतियोगिता के संबंधों के स्थान पर उत्पादन के नये संबंध, अर्थात पारस्परिक सहायता व मदद के और समाजवादी प्रतिद्वंद्वता व सहयोग के संबंध निश्चय ही वस्तुगत रूप से बनेंगे।

अतः उत्पादक शक्तियों के साथ उत्पादन संबंधों की अनुरूपता के नियम के प्रभावांतर्गत जब नये प्रकार के स्वामित्व की स्थापना होती हैं, तो फलतः स्वामित्व के संबंधों द्वारा निर्धारित अन्य संबंध भी बदलते हैं। ऐसा मुख्यतः भौतिक संपदा के वितरण ( distribution ) के क्षेत्र में होता है। पूंजीवादी समाज में जो बड़ी पूंजी ( capital ) के स्वामी होते हैं, वे सबसे ज़्यादा मुनाफ़े ( profit ) भी प्राप्त करते हैं। अमीर ज़्यादा अमीर और ग़रीब ज़्यादा ग़रीब बनते जाते हैं। इसके विपरीत समाजवादी समाज में भौतिक संपदा ( material wealth ) और सामाजिक कोशों ( social funds ) को, सर्वोपरि रूप से, श्रम के परिमाण ( quantity ) तथा गुणवत्ता ( quality ) के अनुसार वितरित किया जाता है। फलतः उत्पादन की पद्धति में परिवर्तन के साथ उत्पादन संबंध पूर्णतः भिन्न हो जाते हैं।

लोग ऐसे दूरगामी सामाजिक सुधारों से अवगत हो सकते हैं और उन्हें बढ़ावा दे सकते हैं या वे उन प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए उनका विरोध भी कर सकते हैं जिन्हें पुराने उत्पादन संबंधों को बनाए रखने की चिंता रहती है। परंतु वे, एक ऐतिहासिक प्रक्रिया ( historical process ) के रूप में उत्पादन के समाजवादी संबंधों की देर-सवेर होने वाली स्थापना को रोक नहीं सकते, क्योंकि यह स्थापना उत्पादक शक्तियों के विकास के वस्तुगत स्वभाव ( objective character ) पर आश्रित होती है। उत्पादन पद्धति की लाक्षणिकता को दर्शानेवाले उत्पादन संबंधों की क़िस्म और, सर्वोपरि, उत्पादन के अन्य सारे संबंधों का निर्धारण करनेवाले स्वामित्व की क़िस्म का ठीक इसी अर्थ में वस्तुगत स्वभाव होता है और वे लोगों के संकल्प और उनकी इच्छाओं पर निर्भर नहीं होते। लोग उत्पादन के विकास के नियमों और सर्वोपरि उत्पादन की शक्तियों के विकास स्तर के साथ अनुरूपता के नियम की संक्रिया को कमोबेश बढ़ावा दे सकते हैं या उसमें रुकावट डाल सकते हैं, लेकिन वे इन नियमों का उच्छेदन ( abolish ) नहीं कर सकते, उन्हें रूपांतरित ( transform ) नहीं कर सकते और उनकी क्रिया को रोक नहीं सकते।

इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना पर सचमुच पारंगति हासिल करने के लिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ऐतिहासिक युग इस बात में एक दूसरे में भिन्न नहीं होते कि लोग क्या-क्या उत्पादित करते हैं, बल्कि इस बात में भिन्न होते हैं कि वे कैसे उत्पादित करते हैं, यानी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) में भिन्न होते हैं। लोग केवल भौतिक वस्तुओं का ही उत्पादन नहीं करते, वे धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का, कलात्मक वस्तुओं, नैतिक मानकों तथा मानदंडों, न्यायिक क़ानूनों, आदि का भी ‘उत्पादन’ करते हैं, यानी उनकी रचना, विकास तथा विस्तारण करते हैं। इनकी रचना बौद्धिक ( intellectual ), आत्मिक उत्पादन के अंतर्गत आती है, लेकिन ये सब अधिकांशतः भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति पर निर्भर हो्ते है। बेशक, कलाकृति व साहित्य की रचना के लिए समुचित भौतिक वस्तुओं तथा दशाओं की ज़रूरत होती है। 

फलतः संपदा की उत्पादन पद्धति में परिवर्तन, आत्मिक उत्पादन में परिवर्तन पर प्रभाव डालता है तथा उत्पादन प्रक्रिया में लोगों के क्रियाकलाप और उसके आधार पर उत्पन्न होने वाले संबंध, सामाजिक क्रियाकलाप तथा सामाजिक संबंधों के अन्य सारे रूपों का निर्धारण करते हैं। इस प्रकार भौतिक उत्पादन पद्धति समाज के विकास तथा कार्यात्मकता का आधार सिद्ध होती है और उसे संचालित करनेवाले वस्तुगत नियम, सामाजिक विकास की अन्य सारी नियमसंगतियों की बुनियाद है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 17 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - २
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 2)

उत्पादन कार्य करते समय लोग उत्पादन के संबंधों की स्थापना में भाग लेते हैं, जो उनके संकल्प ( will ) व चेतना ( consciousness ) पर निर्भर नहीं होते। उत्पादन संबंध उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग की प्रक्रिया में लोगों के बीच बनने वाले संबंध हैं। अतः भौतिक संपदा के उत्पादन की प्रक्रिया या उत्पादन की प्रणाली के दो अंतर्संबंधित पक्ष होते हैं - उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) और उत्पादन के संबंध ( relations of production )। उत्पादक शक्तियां उत्पादन पद्धति की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन के संबंध उसका रूप हैं। अंतर्वस्तु किसी भी घटना का निर्धारक या प्रमुख पक्ष होती है। लेकिन रूप भी एक महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका अदा करता है। यह घटना के अनुरूप होने पर उसके विकास को बढ़ावा देता है और जब यह अनुरूपता गड़बड़ा जाती है तो यह विकास में बाधक बन जाता है।

उत्पादन पद्धति के दो पक्षों के बीच एक वस्तुगत ( objective ) व अनिवार्य, यानी नियमसंचालित संबंध होता है। इस संबंध को ऐतिहासिक भौतिकवाद के संस्थापकों ने खोजा, उसका अध्ययन किया और उसे उत्पादन पद्धति के विकास का संचालन करनेवाले विशेष वस्तुगत नियम की शक्ल में निरूपित किया। इस नियम को उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास स्तर के साथ उत्पादन संबंधों की अनुरूपता ( correspondence ) का नियम कहते हैं। यह इस बात पर बल देता है कि उत्पादन संबंध, उत्पादक शक्तियों के जितने ज़्यादा अनुरूप हों भौतिक उत्पादन उतनी ही सफलता से विकसित होता है। परंतु यह अनुरूपता, निरपेक्षतः पूर्ण तथा स्थिर कभी नहीं होती है। किसी भी उत्पादन पद्धति के सर्वाधिक गतिशील पक्ष ( mobile side ) होने के नाते उत्पादक शक्तियां, देर-सवेर, अपने विकास में उत्पादन संबंधों से आगे निकल जाती हैं। उनके बीच अननुरूपता ( non-conformity ) या सांमजस्यहीनता ( disharmony ) उत्पन्न हो जाती है। उत्पादन संबंध, अपरिवर्तित रहकर उत्पादन में प्रेरक बल ( motive force ) होने की बजाय उसमें बाधक हो जाते हैं और तब नये उत्पादन संबंध बनाने की वस्तुगत आवश्यकता पैदा हो जाती है। इसके फलस्वरूप एक नयी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) उत्पन्न होती है और साथ ही साथ सारे सामाजिक संबंध तथा सामाजिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों में भी बदलाव हो जाता है।

जैसा कि हम देखते हैं, उत्पादन संबंध, उत्पादन पद्धति के विकास तथा परिष्करण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। जब हम कहते हैं कि ये संबंध लोगों के संकल्प तथा इच्छाओं से स्वतंत्र रूप में स्थापित होते हैं, तो हम उनके वस्तुगत, भौतिक स्वभाव ( material character ) पर बल देते हैं। किंतु, आख़िरकार, एक दूसरे के साथ संबंध क़ायम करते हुए, उदाहरणार्थ, सहयोग के या प्रतिद्वंद्विता और प्रतियोगिता के, पारस्परिक सहायता या संघर्ष के संबंध क़ायम करते हुए लोग यह समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें अपने कर्मों के बारे में कुछ न कुछ हद तक ज्ञान होता है। तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि उत्पादन पद्धति की प्रक्रिया में बने उनके संबंध वस्तुगत होते हैं?

आइये, उत्पादन संबंधों पर कुछ अधिक विस्तार से विचार करें। उनके निम्नांकित घटक हैं : (१) उत्पादन के बुनियादी साधनों, सर्वोपरि, श्रम के उपकरणों पर स्वामित्व ( ownership ) के संबंध, (२) उत्पादन की प्रक्रिया में उत्पन्न प्रत्यक्ष संबंध, और अंतिम (३) श्रम के उत्पादों के वितरण ( distribution ) से जुड़े संबंध, यानी वितरण के संबंध। उत्पादन के इन सारे संबंधों में निर्धारक है स्वामित्व के संबंध ( property relations ), शेष सब उन पर आश्रित हैं। सामाजिक विकास की किसी भी अवस्था में विद्यमान उत्पादन पद्धति की क़िस्म भी, स्वामित्व की क़िस्म पर निर्भर होती है। स्वामित्व के प्रकारों में भेद के अनुरूप ही उत्पादन पद्धति की पांच मुख्य क़िस्में हैं : आदिम-सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वामित्व, जैसा कि पूंजीवादी दार्शनिक और अर्थशास्त्री कहते हैं, वस्तुओं का विशिष्ट लक्षण नहीं है। एक ही मशीन पूंजीवादी व्यवस्था में निजी संपत्ति है और समाजवादी व्यवस्था में सामाजिक संपत्ति। स्वामित्व, उत्पादन के साधनों के संदर्भ में संबंध का एक विशेष रूप है, जो वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता के फलस्वरूप लोगों के बीच स्थापित होता है और जो समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव और स्तर पर निर्भर होता है। मसलन, आदिम समाज में पत्थर के औज़ारों का अस्तित्व था, उस हालत में लोग निजी संपत्ति ( private ownership ) तथा पूंजीवादी मुनाफ़े के विनियोजन ( appropriation ) पर आधारित पूंजीवादी संबंधों की स्थापना नहीं कर सकते थे। उस काल में विद्यमान उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर के लिए मुनाफ़े के उत्पादन को सुनिश्चित बनाना असंभव था। इसलिए, उत्पादन के साधनों पर आम स्वामित्व ( common ownership ) पर आधारित आदिम समाज के सामूहिक संबंध उन आदिम लोगों के संकल्प तथा उनकी चेतना द्वारा नहीं, बल्कि भौतिक उत्पादन की शक्तियों के विकास के स्वभाव तथा स्तर के अनुरूप बने थे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

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