बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य के जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप
( perception and its specific format )

प्रत्यक्ष ( perception ) वस्तुओं या परिघटनाओं का ज्ञानेन्द्रियों पर उनके सीधे प्रभाव के फलस्वरूप मनुष्य की चेतना में होने वाला परावर्तन हैं। प्रत्यक्ष के दौरान संवेदन ( sensation ) वस्तुओं और घटनाओं के बिंबों में समेकित ( consolidated ) हो जाते हैं।

संवेदनों के विपरीत, जो क्षोभकों के अलग-अलग गुणधर्मों को परावर्तित करते हैं, प्रत्यक्ष वस्तु को समग्रतः और उसके गुणधर्मों की एकता के रूप में परावर्तित करता है। प्रत्यक्ष अलग-अलग संवेदनों की समष्टि नहीं, बल्कि ऐंद्रिक ज्ञान की एक गुणात्मकतः नई अवस्था है, जिसके अपने विषिष्ट लक्षण होते हैं। प्रत्यक्ष की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताएं वस्तुपरकता ( objectiveness ), समग्रता ( totality ), संरचनात्मकता ( structuredness ), स्थिरता ( stability ) तथा सार्थकता ( meaningfulness )। हम इन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता तथाकथित वास्तवीकरण ( realization ) की क्रिया में, यानि बाह्य जगत से प्राप्त जानकारी को इस बाह्य जगत से संबद्ध ( related ) करने में व्यक्त होती है। ऐसी वस्तुसापेक्षता के बिना प्रत्यक्ष मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में दिग्दर्शन ( referent ) तथा नियमन ( regulation ) का कार्य नहीं कर पाएगा। प्रत्यक्ष की बाह्य वस्तुओं से संबद्धता सहज गुण नहीं है। मनुष्य क्रियाओं की एक निश्चित पद्धति के ज़रिए, जिसमें स्पर्श और गति मुख्य भूमिका अदा करते हैं, विश्व के वस्तुपरक रूप का पता करता है। वस्तुपरकता का गुण उन प्रक्रियाओं के आधार पर पैदा होता है, जो अपने को हमेशा स्वयं वस्तु से संपर्क सुनिश्चित करनेवाली बाह्य प्रेरक क्रियाओं में प्रकट करती हैं। गति के बिना हमारे प्रत्यक्ष वस्तुसापेक्ष, अर्थात वस्तुजगत से संबद्ध नहीं होंगे।

एक ऐसे ही विशेष केस में, जिसमें रोगी का चाक्षुष प्रत्यक्ष क्षतिग्रस्त होने पर भी उसके चाक्षुष विश्लेषक की क्षमता ज्यों की त्यों बनी हुई थी। मस्तिष्क पर आघात से उसके नेत्रगोलक पूरी तरह गतिशून्य हो गये थे। वह जो कुछ भी देखता था, उसे लगता था कि यह या तो प्रकाश की अजस्र धारा है या ऐसा कुहरा कि जिसे एक प्रकाश किरण भेदने की कोशिश कर रही है। शुरुआती ईलाज़ के दौरान उसे धब्बे दिखाई देने लगे, जो अस्पष्ट तथा निरर्थक और चमक तथा आकार की दृष्टि से अलग-अलग तरह के थे। फिर भी रोगी की दृष्टि संवेदनों से आगे न जा सकी और वह किसी भी वस्तु अथवा उसकी विशेषताओं का मौखिक अथवा काग़ज़ पर चित्र प्रस्तुत करने में असमर्थ था। केवल तीन महिने बाद ही वह प्रत्यक्ष की क्षमता पुनः प्राप्त कर सका।

यानि कि यहां ग्राही पर क्षोभक द्वारा पड़ने वाले प्रभाव से दृष्टि संवेदन तो पैदा हो रहे थे, पर प्रत्यक्षमूलक क्षमता के बिना रोगी उस क्षोभक वस्तु का प्रत्यक्ष करने में, उसका वस्तुपरक बिंब अपनी चेतना में परावर्तित करने में असमर्थ था। इससे स्पष्ट है कि दृष्टि संवेदन स्वयं ही वस्तु का चेतना में परावर्तन सुनिश्चित नहीं कर देते।

अक्सर मेंढ़क के दृष्टिपटल को ‘कीटों का संसूचक’ कहा जाता है। ज्यों ही, उदाहरणार्थ किसी मक्खी की छाया दृष्टिपटल पर पड़ती है, यह ‘संसूचक’ जिह्वा में परावर्ती गतियां पैदा कर देता है। मेंढ़क की आंख किसी भी वस्तु के कुछेक लक्षणों को ही दर्ज करती है, मस्तिष्क को उसकी गति तथा उसकी आकृति में कोणों की मौजूदगी की ही सूचना पहुंचाती है और अन्य सभी जानकारियों की उपेक्षा कर देती है। ऐसी स्थिति में क्या मेंढक मक्खी का वस्तुपरक बिंब बना सकता है? उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक होगा और उसके सही होने की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि चारों ओर मरी हुई मक्खियां पड़ी होने पर भी मेंढक भूख से मर सकता है।

प्रत्यक्ष के एक गुण के रूप में वस्तुपरकता, व्यवहार के नियमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मिट्टी की ईंट या बारूद का डला देखने या छूने में एक जैसे हो सकते हैं, किंतु उनके गुण बिल्कुल भिन्न हैं। हम वस्तुओं को सामान्यतः बाह्याकृति से नहीं, बल्कि व्यवहार में हम उन्हें जिस ढंग से इस्तेमाल करते हैं, उससे या उनके मुख्य गुणों से पहचानते हैं। इसमें प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता हमारी मदद करती हैं। वस्तुपरकता स्वयं प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाओं के आगे के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जब मनुष्य बाह्य जगत और उसके परावर्तन के बीच असंगति पाता है, तो उसे प्रत्यक्ष की ऐसी नई प्रणालियां खोजनी पड़ती हैं, जो अधिक सही परावर्तन सुनिश्चित कर सकें।

प्रत्यक्ष की एक और विशेषता उसकी समग्रता है। जहां संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालने वाली वस्तु के अलग-अलग गुणों को परावर्तित करता है, वहीं प्रत्यक्ष दत्त वस्तु का एक समेकित बिंब प्रस्तुत करता है। निस्संदेह यह समेकित बिंब विविध संवेदनों के रूप में प्राप्त वस्तुओं की विशेषताओं और गुणधर्मों के हमारे ज्ञान के सामान्यीकरण से पैदा होता है।

प्रत्यक्ष की समग्रता से ही घनिष्ठतः जुड़ी हुई उसकी संरचनात्मकता है। प्रत्यक्ष हमारे क्षणिक संवेदनों से तात्विकतः भिन्न होता है और वह उनका योगफल भी नहीं है। वास्तव में हम इन संवेदनों के एक अपाकर्षण का ही प्रत्यक्षण करते हैं, जो एक ऐसी सामान्यीकृत संरचना है कि जिसके पैदा होने में समय लगता है। जब आदमी कोई धुन सुनता है, तो पहले के स्वर उसके कानों में तब भी गूंजते रहते हैं, जब वह वास्तव में नया स्वर सुन रहा होता है। प्रायः श्रोता संगीत-रचना को समझता है, अर्थात उसकी संरचना को समग्रता में ह्रदयंगम करता है। स्पष्ट है कि अंत में सुने हुए स्वर ही रचना को समझने का आधार नहीं बन सकते, श्रोता का मस्तिष्क सभी परस्परसंबद्ध घटकों सहित धुन की समस्त संरचना को याद रखता है।

लय के प्रत्यक्षण की प्रक्रिया भी इसी से मिलती-जुलती है। हम एक बार में एक ही ताल सुन सकते हैं, किंतु लय तालों का योगफल नहीं, बल्कि एक दूसरी से एक निश्चित ढंग से जुड़ी हुईं तथा थिरकन पैदा कर देनेवाली तालों की पद्धति है। तालों की इस परस्परसंबद्धता पर ही लय का प्रत्यक्ष निर्भर होता है। प्रत्यक्ष की समग्रता तथा संरचनात्मकता का स्रोत, एक ओर, परावर्तित वस्तुओं के गुण हैं और, दूसरी ओर, मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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