शनिवार, 21 जनवरी 2012

चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के संबंधों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।




चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण


चरित्र ( character ) , जो कर्ता की कार्रवाइयों और व्यवहार में, संयुक्त सक्रियता में उसकी सहभागिता ( participation ) के स्तर में अभिव्यक्त होता है, सक्रियता की अंतर्वस्तु ( content ) पर, कठिनाइयों पर क़ाबू पाने में कर्ता की सफलता या विफलता पर, आधारभूत जीवंत ध्येयों की सिद्धि में दूर तथा निकट के परिप्रेक्ष्यों ( perspectives ) पर निर्भर करता है।

अतः चरित्र इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य ( पहले बन चुकी चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर ) अपनी सफलताओं तथा विफलताओं, जनमत तथा अन्य परिस्थितियों के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। इस तरह एक ही कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों में अथवा एक ही उत्पादन-समूह में बराबरी के दर्जे पर काम करने वाले लोगों में चरित्र के भिन्न-भिन्न गुणों का विकास होता है। यह चीज़ इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपना कार्य किस प्रकार निबटाते हैं। कुछ लोग सफलता से प्रेरित होते हैं और पहले से ज़्यादा अच्छी तरह काम या अध्ययन करने के लिए प्रेरित होते हैं, कुछ में आगे आगे मैदान जीतने की कामना नहीं होती, कुछ का विफलताओं से हौसला पस्त हो जाता है, जबकि दूसरों में जुझारू भावना उद्दीप्त होती है।

अतः चरित्र के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व यह होता है कि मनुष्य परिवेश के प्रति, स्वयं अपने प्रति, दूसरों के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाता है। ये दृष्टिकोण चरित्र के प्रमुख गुणों के वर्गीकरण के आधार का काम देते हैं।

मनुष्य का चरित्र, पहले इस चीज़ में प्रकट होता है कि वह दूसरे लोगों ( अपने सगे-संबंधियों तथा मित्रों, सहयोगियों तथा सहपाठियों, परिचितों तथा अजनबियों, आदि ) के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। वह स्थिर अथवा अस्थिर अनुरक्तियों ( attachments ) में, सिद्धांतनिष्ठता अथवा सिद्धांतहीनता में , मिलनसार अथवा गैर-मिलनसार स्वभाव में, सत्यप्रियता अथवा मिथ्यावादिता में, व्यवहारकुशलता अथवा अभद्रता में प्रकट होता है। केवल समूहों में ही, सामाजिकता में ही, दूसरों लोगों से दैनंदिन संसर्ग-संपर्क की प्रक्रिया में ही मनुष्य के ह्र्दय की व्यापकता अथवा संकीर्णता, गैर-मिलनसार स्वभाव अथवा नमनशीलता ( flexibility ), शांतिप्रियता अथवा विवादप्रियता जैसे चारित्रिक गुण सुस्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं।

दूसरे, चरित्र मनुष्य के स्वयं अपने प्रति दृष्टिकोण में, अर्थात आत्मगौरव तथा आत्मसम्मान में अथवा विनम्रता तथा अपनी शक्ति में अविश्वास में प्रकट होता है। कुछ लोगों में स्वार्थ की तथा आत्म-केन्द्रिकता ( अपने को समस्त घटनाओं के बीच में रखने ) की भावना अधिक बलवती होती है, जबकि कुछ अपने हितों को समूह के हितों के मातहत कर देते हैं, संयुक्त ध्येय के लिए संघर्ष में निस्स्वार्थ भाव से भाग लेते हैं।

तीसरे, चरित्र काम के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण में प्रकट होता है। चरित्र के सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में निर्मल अंतःकरण, कार्य-कुशलता, गंभीरता, उत्साह, प्राप्त कार्य के प्रति उत्तरदायित्व ( responsibility ) की भावना तथा उसके परिणामों के लिए चिंता शामिल है। परंतु कुछ लोगों के चरित्र में कैरियरपरस्ती, छिछोरापन, श्रम के प्रति कोरा औपचारिक दृष्टिकोण पाया जाता है।

चौथे, चरित्र व्यक्ति के वस्तुओं के प्रति दृष्टिकोण मे, केवल सामाजिक संपत्ति के प्रति ही नहीं, अपितु अपने निज़ी माल-असबाब, वस्त्रों, जूतों, आदि के प्रति दृष्टिकोण में भी प्रकट होता है।




इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
सूचनार्थ!

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

इतना कम लिखना अच्छा नहीं लगा। बहुत कम है इस बार। शायद समय कम मिला हो।

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