शनिवार, 29 दिसंबर 2012

कुछ भी मौलिक नहीं होता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कुछ भी मौलिक नहीं होता
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

'कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। ' यह कुछ समझ आता है।

इसकी पृष्ठभूमि में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मौलिकता की अवधारणा को अधिकतर वैयक्तिकता के साथ जोडकर देखा जाता है, परंतु यह पूरा सच नहीं हैं। कुछ भी मौलिक नहीं होता, ऐसा भी कहा जाता है।

सभी भौतिक और वैचारिक अवस्थाएं एक क्रमिक विकास में होती हैं। यानि मानवजाति अपने अनुभव और ज्ञान को संचित करते हुए, उसे आगे की पीढ़ी को अंतरित करते हुए, उसका क्रमिक विकास करती हुई यहां तक पहुंची है, और यही अभी भी जारी है। यानि कि हर स्तर का ज्ञान, अपने पूर्व के ज्ञान पर ही अवलंबित होता है। हर नया विचार या खोज, मानवजाति की पूर्व के अनुभवों के इसी संचय पर निर्भर करती है।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी ज्ञान, विचार या खोज के पीछे पूरी मानवजाति के ज्ञान की थाति अपना काम कर रही होती है, अपना योगदान कर रही होती है, उस खोज की पूर्वपीठिका तैयार करती है। कोई भी व्यक्ति शून्य से शुरू करके, मानवजाति के संचित ज्ञान से अपने को अद्यतन किए बगैर कुछ नहीं कर सकता। यानि क्या वैयक्तिकता का दावा ( यहां आप पेटेंट बगैरा को रख सकते हैं, वैयक्तिक अश्लील रॉयल्टीज़ को रख सकते हैं ) बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?

नितांत नवीन और मौलिक कार्यों के व्यक्तिगत प्रयासों के लिए थोड़ा-बहुत वैयक्तिक श्रेय दिया जा सकता है, ज्ञान की इसी क्रमबद्धता में उनके पड़ाव को उनसे जोड़कर देखा जा सकता है, उनकी सांयोगिक ऐतिहासिकता को दर्ज़ किया जा सकता है। परंतु संपूर्ण मानवसमाज के क्रमिक रूप से संचित ज्ञान और अनुभवों के आधारों पर परवान चढ़ सके इस वैयक्तिक अवदान के लिए उन्हें असामाजिक और अश्लीलता के स्तर तक पहुंचे, किन्हीं विशेष फायदों के लिए लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।

परंतु अभी यही हो रहा है, बाज़ारवाद ऐसे वैयक्तिक अवदानों को अपने हित में प्रोत्साहित करता है, उन्हें एक भरपूर हिस्सा देता है, और उन्हें और खोजों को अपने मुनाफ़ों की सेवा में लगाए रखता है। चारों तरफ़ लूट मची है, और उस लूट में अपनी हिस्सेदारी के लिए अफरातफरी भी। पूरे मानवसमाज के क्रमिक प्रयासों से निर्मित उसकी इस दुनिया को कुछ मानवसमूह अपने हितार्थ जमकर दोहन करने में लगे हैं।

'यानि क्या वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?' यह सवाल...

अगर इस प्रश्न का जवाब दें तो शायद यह हो, ‘ हां, वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब होना चाहिए।’ यही मंतव्य था।

यह अश्लील रॉयल्टी क्या है, समझ नहीं आया।

वैयक्तिक पेटेंट या व्यक्तिगत श्रेयों के लिए, उस का व्यवसायिक प्रयोग करके उसके ज़रिए अकूत मुनाफ़ा कमाने वाले व्यक्ति, समूह अथवा कार्पोरेट्स काफ़ी बड़ी मात्रा में रॉयल्टी के रूप में मुनाफ़े का हिस्सा पहुंचाते हैं, या वह ख़ुद इसे मोटी रकमें लेकर बेचते हैं।

इसे अश्लील, इन श्रेयों के पीछे के सामाजिक अवदानों के सापेक्ष कहा गया है जिसको पिछली बार विस्तार देने की कोशिश की गई थी। यानि जिसके पीछे पूरी मानवजाति, समाज का अवदान हो, उसे भुलाकर, या कहे नकार कर अपने लिए वैयक्तिक रूप से अय्याशी के महल खड़े कए लेना हमें तो अश्लील ही लगता है, खासकर इन हालात में जबकि मानव-समाज का बहुल हिस्सा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से भी महरूम है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

3 टिप्पणियां:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

शानदार अभिव्यक्ति,
जारी रहिये,
बधाई।

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

अरूण साथी ने कहा…

gambheer rachna, aabhar

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