शनिवार, 6 अप्रैल 2013

भाषाई-प्रेम की भावुक तार्किकी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



भाषाई-प्रेम की भावुक तार्किकी

आज दक्षिणवासियों का 1965 और 1986 का हिन्दी विरोध....क्या यह 5-6 प्रतिशत लोगों का अत्याचार नहीं कि बाकी 94-95(वैसे तो कुछ कम भी) प्रतिशत लोगों के उपर अंग्रेजी थोप दिया गया....यह लोकतंत्र के विरुद्ध है।....इस बात से तो लगता है गैर हिन्दी लोगों का देश ही अलग कर दिया जाना चाहिए...कम से कम तमिल लोगों को....इस बात के लिए तो उदार नहीं हुआ जा सकता कि 6-7 करोड़ लोगों या अधिक से अधिक 15-20 करोड़ लोगों के लिए 70 करोड़ लोगों अंग्रेजी थोपी जाय....भारत बँट जाए तो बुरा नहीं होगा कुछ।

अब आप स्वयं ही देखिए कि सामान्यतः उचित सा लगता हिंदी-प्रेम का आदर्श अंततः अपनी तार्किक श्रृंखला में तर्क को कहां तक और किस हद तक खींच लाया, कि एक राष्ट्रीय चेतना की आकांक्षा को, राष्ट्र के ही टुकडे़ कर देने की मजबूरी तक पहुंचा दिया। हिंदी के ज़रिए संपूर्ण राष्ट्र को एक कड़ी में बांधने की बात इस तरह अंततः हिंदी प्रदेशों तक ही सीमित हो जाने को अभिशप्त होती सी महसूस होने लगी। अगर वास्तविक उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का था तो जाहिरा तौर पर इस आदर्शी आकांक्षा पर पुनर्चिंतन किए जाने की जरूरत है, और यदि बात इस तरह से है कि राष्ट्र जाए भाड़ में, मेरी मान्यता तो सिर्फ़ किसी भाषा की सीमाओं में बंधी है तो फिर कोई आवश्यकता नहीं पुनर्विचार की, इसी विचार को आगे पल्लवित किया जा सकता है।

आप समझ रहे होंगे कि उपरोक्त पंक्तियों को बज़ाए हिंदी-विरोध के वक्तव्य की तरह समझने के, एक बेहतर तार्किक पद्धति विकसित करने की आवश्यकता के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। आप शनैः शनैः शायद यह समझने की राह निकालेंगे कि सत्ता के राजनैतिक निर्णयों के आधार सामान्यतः दिखते हुए तथ्य नहीं वरन् सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के मिलेजुले हितों की रक्षार्थ के छिपे मंतव्य हुआ करते हैं।

सत्ता को यदि कई कारणों से अंग्रेजी रास आ रही थी, वह स्वयं अंग्रेजी को बनाए रखना अपनी राजनैतिक जरूरतों के मद्देनज़र आवश्यक समझ रहा था, तो वस्तुतः उसके द्वारा इसे बनाए रखना ही था, यदि हिंदी-विरोध का बहाना ना मिला होता तो भी किसी और बहाने इसे ही जारी रखा जाना था। यह भी एक तथ्य ही है कि राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने, सत्ता द्वारा हिंदी-हिंदी गाए-बजाए जाने के बाद भी, हिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी की हालत, आम ज़िंदगी, प्रशासनिक कार्यो में, शिक्षा के माध्यमों में, सत्ता के गलियारों में क्या है, यह आप बेहतर जानते ही हैं।

लोकतंत्र का मतलब यदि आप सिर्फ़ बहुमत की तानाशाही ही के रूप में ही देखना चाहते हैं, तो बात अलग है और यदि लोकतंत्र का मतलब इसकी वास्तविक परिभाषाओं के अंतर्गत ही समझना चाहते हैं तो किसी भी व्यक्ति या समूह के वास्तविक हितों ( जो कि वॄहत सामाजिक हितों के वास्तविक विरोध में ना हो ) की सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करने की राह में निकलना ही होगा।

यदि बात को, मातृभाषा को शिक्षा, प्रशासन और निश्चित रोजगार से जोड़ने तथा हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित किए जाने के तर्क से शुरू किया जाए तो अधिक बेहतर हो। ना चाहते हुए भी कुछ अधिक ही कह दिया जाता है, हालांकि तय यह किया था बाद में ही इस पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। अन्यथा नहीं लीजिएगा अभी।

कहना यह था कि...सब कुछ के बाद भी कोई नहीं मानता या समझना चाहता तब हमेशा के लिए स्थापित होने वाली अंग्रेजी का जिम्मेदार तमिलनाडु अलग हो जाय तो कोई बड़ी बात नहीं....मूल लक्ष्य निश्चय ही भारत और दुनिया के लोगों के बीच अधिक से अधिक चैन-शान्ति-समानता के लिए कोशिश करना ही होना चाहिए।

यानि यदि इसी तरह की बचकानी भावुक बातों और तर्क श्रृंखला पर चला जाए, और इन्हें ही प्राथमिक बना लिया जाएगा तो मान लीजिए आपकी अभी तक की सूचनाओं में एक तमिलनाडु ही आया है, वह आपके इन तर्कों और बातों से सहमत नहीं तो उसे अलग कर दीजिए, कल यदि कोई और प्रदेश या समूह मसलन केरल, कर्नाटक, बंगाल, उडीसा, महाराष्ट्र आदि-आदि भी हमारी इन बातों और तर्कों से मुतमइन नहीं हो तो उन्हें भी अलग कर देंगे और कोई बड़ी बात नहीं होगी। दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे और फिर भी कहेंगे यही कि हमारा मूल लक्ष्य तो भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में एका और शांति कायम करना है। बहुत अच्छा है। :-)

आपका कहना है कि अलगाववादी लोगों से नफ़रत होनी ही चाहिए....फिर ऐसे लोगों से, ऐसे नेताओं से नफ़रत नहीं करें तो क्या करें...?

आप किसी भी कारण से इस तरह का छद्म प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्तियों को, जिनका प्रतिनिधित्व किया जा रहा है उस आमजन से अलग नहीं कर पा रहे हैं। आप ऐसे व्यक्तियों, नेताओं को, समग्र जनता समझने की भूल कर रहे हैं। यानि आप कुछ नेताओं बगैरा को संपूर्ण दक्षिण जनता समझ रहे हैं। और वहां के आमजन की उभारी गई सिर्फ़ भाषाई दुश्चिंताओं के साये में, उनकी सारे देश की आम जनता के साथ, अन्य वास्तविक जीवनीय जरूरतों, तकलीफ़ों, समस्याओं की एकरसता को भुला दे रहे हैं।

मित्र इस तरह के गांव के चोरों के साथ नफ़रत कीजिए, आप उनके साथ गांववालों से नफ़रत करने की क्यों सोच रहे हैं। सिर्फ़ बाहरी चोरों से की जा रही लड़ाई के दौरान जब इस तरह की परिस्थितियां पैदा होती हैं कि अंदरुनी चोर लड़ाई को इस तरह का मोड़ दे रहे होते हैं, तो अब आप शायद समझ सकें कि किस तरह इन अंदरुनी चोरों के चक्करों में हम अपनी ही मूल लड़ाई को भुलाकर, बाहरी चोरों और अंदरुनी चोरों को छोडकर, अपनी लड़ाई को अपने ही लोगों, अपने ही गांववालों की तरफ़ किस तरह मोड़ दे सकते हैं। अब ऐसी अवस्थाओं में अंदरुनी और बाहरी चोरों द्वारा मिलकर, हम जैसे लोगों को ठिकाने लगाना और किस तरह आसान हो जाता है।

दस करोड़ लोगों के चलते हम भारत के 80-90 करोड़ लोगों को ऐसे ही सताते रहें और अभी कई दशकों तक इतनी विशाल आबादी से खिलवाड़ करते रहें...?

सही है, आपकी चिंता जायज़ है। आपको इन दस करोड़ लोगों के चलते बाकी ८०-९० करोड़ लोगों से खिलवाड़ की चिंता सता रही है। और हम लगभग इतने ही यानि दस करोड़ उच्च मध्यमवर्गियों, अमीरों, पूंजीपतियों और राजनीतिकों के चलते, देश की बाकी संपूर्ण १००-११० करोड़ जनता की विशाल आबादी का बर्बादे-हाल देख रहे हैं, और इसकी चिंता करना चाहते हैं। और यह भी क्या खूब है कि हमें सिर्फ़ चिंताएं ही तो करनी है, जहां मन हो, मुफ़ीद लग रहा हो वहां करली। :-)



इस बार इतना ही।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

14 टिप्पणियां:

Amit Kumar Singh ने कहा…

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