शनिवार, 12 अप्रैल 2014

अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत अंतर्विरोधों के रूपों पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अंतर्विरोधों के अन्य रूपों पर बात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम - चौथा भाग
प्रतिरोधी और अप्रतिरोधी अंतर्विरोध

सामाजिक जीवन में अंतर्विरोध ( contradiction ) प्रतिरोधात्मक और ग़ैर-प्रतिरोधात्मक हो सकते हैं। सामाजिक अंतर्विरोधों को उनकी तीव्रता तथा उनके समाधान की विधि के अनुसार प्रतिरोधी ( antagonistic ) तथा अप्रतिरोधी ( non-antagonistic ) अंतर्विरोधों में विभाजित किया जाता है।

अंतर्विरोधों को प्रतिरोधात्मक बनाने वाली चीज़ है समाज का असंगत हितों ( inconsistent interests ) वाले वर्गों में विभाजन, ऐसा वह विभाजन जो उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व से उत्पन्न होता है। इन वर्गों के बीच के अंतर्विरोध प्रतिरोधी हुआ करते हैं। प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का विभेदक लक्षण ( distinguishing feature ) उनकी घोर तीव्रता और एक प्रदत्त समाज में विभिन्न समूहों तथा वर्गों के विरोधी हितों, लक्ष्यों तथा स्थितियों के पुनर्मेल ( reconciling ) की असंभाव्यता ( impossibility ) है। इसीलिए प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान उसी सामाजिक प्रणाली की दशाओं के अंतर्गत नहीं हो सकता है, जिसने उन्हें जन्म दिया है। उनका समाधान प्रबल तथा दृढ़ संघर्ष ( fierce and stubborn struggle ) के द्वारा होता है और नियमतः प्रतिरोधी पक्षों में से एक के उन्मूलन ( elimination ) से समाप्त होता है। यानि उन्हें वर्ग संघर्ष ( class struggle ) तथा ऐसी सामाजिक क्रांति ( social revolution ) से ही हल किया जा सकता है, जो पुरानी प्रणाली का मूलोच्छेदन तथा नयी की स्थापना करती है।

इस तरह के प्रतिरोधी अंतर्विरोध, वर्ग आधारित दास-प्रथात्मक, सामंती और पूंजीवादी समाजों के लाक्षणिक अंतर्विरोध हैं। इस तरह के हर समाज में ये अंतर्विरोध पनपते हैं, विकसित होते हैं और अंततः उसके अवश्यंभावी पतन तक पहुंचा देते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज में मजदूर वर्ग तथा पूंजीवादी वर्ग के बीच प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान एक वर्ग के रूप में पूंजीवादी वर्ग के उन्मूलन द्वारा समाजवादी क्रांति से ही हो सकता है। बेशक यहां ‘उन्मूलन’ का सरलीकृत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। यह एक प्रदत्त वर्ग के सदस्यों के भौतिक विनाश, या शारीरिक उच्छेदन का मामला नहीं है, बल्कि समाज में पूंजीपति वर्ग के उन आर्थिक व राजनीतिक आधारों की समाप्ति है जो उन्हें प्रभुत्व ( dominance ) में बनाता है, एक वर्ग के रूप में उनके समग्र प्रतिरोध के खात्मे तथा उत्पादन के साधनों ( means of production ) पर निजी पूंजीवादी स्वामित्व ( private capitalist ownership ) के उन्मूलन का मामला है। इस प्रतिरोधी अंतर्विरोध के समाधान के रूप स्वयं भी बहुत भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि वे प्रत्येक देश विशेष में उसके विकास की निश्चित अवस्था में विद्यमान ठोस ऐतिहासिक दशाओं ( concrete historical conditions ) पर निर्भर होते हैं।

अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की विशेषता उनकी कम तीक्ष्णता ही नहीं, बल्कि उनकी समाधेयता का ढंग भी है। अप्रतिरोधी अंतर्विरोध तब उत्पन्न होते हैं, जब एक समाज में विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के जीवन-हित सर्वनिष्ठ ( common ) होते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज के अंतर्गत किसानों और मजदूर वर्ग के बीच के अंतर्विरोध, प्रतिरोधी नहीं , बल्कि अप्रतिरोधी होते हैं। किसानों के पास भूमि, पशु और खेती के उपकरणों के रूप में उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है और वे उस संपत्ति को अपने पास बनाए रखने तथा बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी तरफ़, मजदूरों के पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते, उनके पास केवल अपनी श्रम-शक्ति होती है जिसे वे उत्पादन के साधनों के स्वामियों को बेचने के लिए मजबूर होते हैं, इसलिए उनका वर्गहित स्वाभाविक रूप से इनके उन्मूलन में दिलचस्पी रखता है। फलतः किसानों और मजदूरों के हितों के बीच एक निश्चित अंतर्विरोध होता है। लेकिन अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण मुख्य मुद्दे पर इन सामाजिक श्रेणियों के हित समान हैं, क्योंकि दोनों ही पूंजपति वर्ग द्वारा शोषित हैं। इसीलिए पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में इनका एका बनता है, मजदूर वर्ग किसानों को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो जाता है, इनके संघर्ष साझे होने लगते हैं।

प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से भिन्न अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों के समाधान में विरोधियों ( opposites ) में से किसी एक का उन्मूलन करने की जरूरत नहीं होती है। उनका समाधान नियमतः शांतिपूर्ण तरीक़े से विभिन्न सामाजिक समूहों की अवस्थितियों तथा हितों को शनैः शनैः, लगातार सचेत ढंग से एक दूसरे के निकटतर लाने के ज़रिये किया जाता है। किंतु यह ‘निकटतर आना’ विरोधियों के संघर्ष के बिना नहीं हो सकता। अंतर्विरोध अप्रतिरोधी ही सही परंतु अंतर्विरोध तो हैं ही, इसलिए उनके बीच भी विरोधियों की एकता और संघर्ष का द्वंद्ववाद का नियम लागू होता ही है। चूंकि अंतर्विरोध अप्रतिरोधी हैं तो उनके समाधान एकता की ओर हल किये जाने चाहिए। समाज में विभिन्न समूहों के बीच विशेष अप्रतिरोधी अंतर्विरोध होते है, जो उसके विकास से उत्पन्न होते हैं तथा उस विकास को प्रभावित करते हैं।

यदि ऐसे अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों को समय पर समुचित रूप से सुलझाया तथा हल नहीं किया जाये, तो वे अत्यंत तीक्ष्ण ( acute ) बन सकते हैं और समाज के विकास को रोकना आरंभ कर सकते हैं। जैसे कि हमारे भारतीय समाज की विविधता के रूपों में विभिन्न जातियो, धर्मों, क्षेत्रों, भाषा समूहों आदि के बीच के अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की उपस्थिति से हम इसे समझ सकते हैं। इनका समाधान एकता की ओर हल करने में किया जाना चाहिए, परंतु कुछ शक्तियां इन्हें उभारने और तीक्ष्ण करने में ही अपने हित देखती हैं, और परिणाम ये सामने आता है कि मूल प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से समाज का ध्यान हटता है, उनके समाधानों में व्यवधान उत्पन्न होते हैं, गतिरोध पैदा होते हैं, और ये सापेक्षतः गौण अप्रतिरोधी अंतर्विरोध मुख्य से होने लगते हैं, समाज की ऊर्जा इनमें ही खपाने की कोशिशे होती हैं, स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होता है और यथास्थिति ना सिर्फ़ बनी रहती है बल्कि और भी खतरनाक प्रतिगामी ( regressive ) रूप अख़्तियार करने लगती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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