शनिवार, 18 जुलाई 2015

सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार किया था, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों के अंतर्गत सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १
( theory and hypothesis - 1 )

विज्ञान ( science ) संज्ञान ( cognition ) का उच्चतम रूप है। हमारे सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इस प्रभाव का आधार उद्योग तथा सामाजिक प्रशासन में वैज्ञानिक उपलब्धियों का अनुप्रयोग ( application ) है, जिससे वैज्ञानिक-तकनीकि प्रगति होती है। वैज्ञानिक संज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और लाक्षणिक ( characteristic ) विशेषता क्या है ?

प्राचीन बेबीलोन खगोलविद ( astronomers ) तारों और ग्रहों की संस्थिति ( location ) के बारे में अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने सूरज और चंद्रमा के दर्जनों ग्रहणों ( eclipses ) का प्रेक्षण किया था। किंतु वे उनकी गति के प्रक्षेप पथों ( trajectories ) की गणना नहीं कर पाये, यानी भावी ग्रहणों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाये। कमोबेश यही स्थिति प्राचीन विश्व में हर सभ्यता में थी। यही नहीं, वे यह भी नहीं बता पाये कि आकाशीय पिंड क्यों घूमते हैं और ग्रहण क्यों होते हैं। आज बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी ही नहीं, स्कूली छात्र भी इन प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं और खगोलविद केवल अलग-अलग ग्रहों की गति की अति सटीकता से भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि सारे नक्षत्रों की गति की गणना भी कर सकते हैं और दूरस्थ तारों में जारी भौतिक प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण भी दे सकते हैं।

ऐसा क्योंकर हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) पर भरोसा करता है और ये सिद्धांत पहले से ही विद्यमान घटनाओं का स्पष्टीकरण देने तथा नयी घटनाओं का पूर्वानुमान ( prediction ) लगाने में समर्थ होते हैं। बेबीलोन के खगोलविदों के जमाने में वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं थे और वे स्वयं उनकी रचना करने में अक्षम थे। वैज्ञानिक सिद्धांत क्या होता है ?

एक विकसित वैज्ञानिक सिद्धांत, विज्ञान के अंतर्संबंधित नियमों ( interconnected laws ) की एक प्रणाली ( system ) या श्रृंखला ( chain ) होता है। नियमों को तर्कशास्त्र के नियमों तथा गणितीय रूपांतरणों ( transformations ) के ज़रिये अन्य नियमों से निगमित ( deduce ) किया जा सकता है। इन रूपांतरणों के दारा हमें अंततः प्रकृति की उन घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है जो प्रस्तुत क्षण पर अस्तित्वमान हैं या भविष्य में होंगी। वैज्ञानिक सिद्धांत का एक सरल उदाहरण है केपलर द्वारा निरूपित सूर्य के गिर्द ग्रहों के घूमने का सिद्धांत। इसमें गणित में व्यक्त तीन नियम शामिल हैं। प्रेक्षणों से प्राप्त कुछः निश्चित प्रारंभिक आधार-सामग्री होने पर एक खगोलविद को नये प्रेक्षण करने की ( जैसा कि बेबिलोनियाइयों को करने होते थे ) कोई आवश्यकता नहीं होती। वह इस आधार सामग्री को केपलर के नियमों को व्यक्त करने वाले सूत्रों में रखकर कुछ गणनाएं कर सकता है और सही-सही बता सकता है कि प्रदत्त क्षण पर अमुक-अमुक ग्रह कहां होगा।

जब न्यूटन द्वारा अन्वेषित ( discovered ) गुरुत्व के नियमों को केपलर के नियमों से जोड़ दिया जाता है, तो हमें एक नये, अधिक शक्तिशाली सिद्धांत की प्राप्ति होती है, जिसकी सहायता से हम आकाशीय पिंडों की संस्थिति का स्पष्टीकरण तथा उसकी भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि उनकी गति के कारण, आदि के बारे में भी जान सकते हैं। इसलिए, सिद्धांत भौतिक जगत की घटनाओं के कमोबेश विस्तृत क्षेत्रों को अपने में सम्मिलित ( embrace ) करते हैं, उनके बारे में अत्यंत गहन, विश्वसनीय ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे हम फ़िलहाल जटिल और थका देने वाले प्रेक्षणों का उपयोग किये बिना सारी अपेक्षित सूचना प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

1 टिप्पणियां:

Harsh Wardhan Jog ने कहा…

बात समझ में आई पर दो बार पढ़ के. सरल सी और आम बोल चाल की भाषा होती तो ज्यादा अच्छा था.

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