शनिवार, 16 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २
( what is scientific and technological progress - 2 )

किंतु आधुनिक अर्थ में तकनीक पद कोई भिन्न चीज़ है। इसकी विशिष्टता क्या है? बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में हमें उन सब संसाधनों की सीमित प्रकृति का बोध हो गया है, जिन्हें मनुष्य अब तक इस्तेमाल करता रहा। प्राकृतिक, तकनीकी, ऊर्जा, खाद्य, भूमि के, मानवीय तथा वित्तीय संसाधन अत्यधिक, असंयमित उपयोग से समाप्त या नष्ट हो सकते हैं। इसके साथ ही विराट परिमाण में ऊर्जा तथा कच्चे माल व शक्तिशाली मशीनों का उपयोग करनेवाली नयी, शक्तिशाली उत्पादन प्रणालियों का विकास शुरू हो गया है। उत्पादन के ये सभी नये रूप मनुष्य की ज़रूरत के उपयोगी उत्पाद बनाने के साथ ही काफ़ी ज़्यादा अवांछित ( undesirable ) और हानिकारक फल भी उत्पन्न करते हैं। 

उदाहरण के लिए, परमाणविक बिजलीघरों का निर्माण जहां बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली हासिल करना, तेल व कोयले की बचत करना संभव बनाता है, वहां इससे रेडियो सक्रिय अपशिष्ट ( waste ) भी बनते हैं और मनुष्य तथा प्रकृति दोनों के लिए ख़तरनाक रेडियो सक्रियता बढ़ जाती है। बड़े रासायनिक कारख़ाने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए मूल्यवान सामग्री व अन्य चीज़ों का उत्पादन करते हैं, लेकिन उनसे उत्पन्न होनेवाले अपशिष्टों को विशाल इलाक़ों में जमा कर दिया जाता है या नदियों में डाल दिया जाता है, उनसे ज़मीन और पानी दूषित हो जाते हैं जिससे मनुष्यों और जानवरों के लिए भारी ख़तरा पैदा हो जाता है।  इन सारे तथा अन्य अवांछित परिणामों से बचने के लिए, अपशिष्ट रहित उद्योग का निर्माण करने और स्वयं औद्योगिक अपशिष्टों को पुनर्प्रयोज्य ( re-usable ) सामग्री में रूपांतरित करने तथा नये उत्पादन चक्रों में इस्तेमाल करने के लिए हमारे लिए ज़रूरी है कि तकनीक को ही बदला जाये। अतः अब लोग महज़ नयी मशीनों और उपकरणों के बजाय नयी तकनीक की बातें करते हैं।

नई तकनीकों का विकास हर प्रकार के प्राकृतिक तथा सामाजिक संसाधनों के अधिकतम किफ़ायती ( economic ) उपयोग के ज़रिये समाज और उत्पादन के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंधों की स्थापना में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इन तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण सूचना तकनीक ( information technology ) है जो अन्य सब पर निर्धारक प्रभाव डाल रही है। इसमें शामिल हैं प्रति सेकंड खरबों संक्रियाएं ( operations ) करने में समर्थ तथा विराट स्मृति ( memory ) से संपन्न आधुनिक कंप्यूटरों का डिज़ाइन बनाना तथा निर्माण करना, ऐसे माइक्रोप्रोसेसर बनाना जो कंप्यूटरों को संहत ( compact ) बनाते हैं, हर प्रकार के कार्यक्रम लिखना और ऐसी विशेष कार्यक्रमीय भाषाओं ( programming languages ) का विकास, जो सूचना के भंडारण, प्रोसेसिंग, पुनर्प्राप्ति ( retrieval ) तथा निबटान ( disposal ) से संबंधित अत्यंत जटिल समस्याओं के समाधान को सुविधापूर्ण बना देती है। इसकी वज़ह से सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी तकनीकी अवस्था का मूलाधार और उत्प्रेरक बनती जा रही है और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक शक्तिशाली क्रांतिकारी कारक ( factor ) में तब्दील होती जा रही है। 

इसका महत्व लगातार बढ़ रहा हैं, क्योंकि यह संसाधनों का एक ही ऐसा प्रकार है, जिसे मानवजाति अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान ख़र्च नहीं करती, बल्कि इसके विपरीत उसे संवर्द्धित करती और बढ़ाती रहती है। यही नहीं, वैज्ञानिक सूचना के परिमाण की, प्रकृतिवैज्ञानिक, तकनीकी तथा मानवीय ज्ञान के सारे प्रकारों सहित वृद्धि, उन सारे ख़तरों को मिटाने की बुनियाद डाल रही है जिनका जिक्र निराशावादी और आशावादी के संवाद में किया गया है। एक ऐसी संभावना भी प्रकट हो रही है, जिससे उन संसाधनों को संरक्षित ही नहीं, बल्कि नवीकरण ( restoring ) तथा संवर्द्धित भी किया जा सकेगा, जिन्हें मनुष्यजाति ने अब तक इतने अविवेकपूर्ण ढंग से बर्बाद किया है। परंतु इस संभावना को व्यावहारतः कार्यान्वित करने के लिए कुछ विशेष दशाओं तथा निश्चित प्रकार के सामाजिक विकास की दरकार है

सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सभी प्रक्रियाओं की तरह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी जटिल और अंतर्विरोधी ( contradictory ) है। सरल, असंदिग्ध समाधान ख़ुद-ब-ख़ुद हासिल नहीं होते। यह प्रगति, प्रकृति और समाज के बीच संबंधों में एक नयी अवस्था है। वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति की पृष्ठभूमि में श्रम प्रक्रिया, अधिकाधिक नयी प्राकृतिक संपदा, ऊर्जा साधनों, पृथ्वी के अविकसित भूक्षेत्रों, विश्व महासागरों और अंतरिक्ष से भी संबंधित होती है। इसलिए दो सर्वथा विरोधी संभावनाएं प्रकट हो रही हैं। इनमें से एक प्रकृति व समाज के बीच अधिकाधिक अंतर्विरोधों की तरफ़ ले जाती है; और दूसरी उनके बीच मूलतः नयी अंतर्क्रिया ( interaction ) की, उनके बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण संबंधों तथा सर्वाधिक कठिन अंतर्विरोधों के उन्मूलन ( elimination ) की ओर ले जाती है। इनमें से कौनसी संभावना ऊपर उभरेगी तथा वास्तविकता बनेगी - यह प्रश्न भूमंडलीय पैमाने पर समाज के आमूल सामाजिक रूपांतरणों ( radical social transformations ) पर निर्भर है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

2 टिप्पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " दिल धड़कने दो ... " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

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