रविवार, 15 अक्तूबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल के रूप में वर्ग और वर्ग संघर्ष पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा शुरू करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १
( the state in the system of the superstructure - 1 )

राज्य ( state ) हमेशा विद्यमान नहीं था। समाज के वर्गों ( classes ) में विभाजित होने तक सैकड़ों-हज़ारों वर्ष के दौरान लोग राज्य तथा शासकीय निकायों व एजेंसियों के बिना ही काम चला लिया करते थे। तो फिर राज्य का जन्म क्यों हुआ? और यह है क्या?

अंग्रेज दार्शनिक टामस हाब्स (१५८८-१६७९) यह मान कर चले कि प्राकृतिक दशाओं में लोग लगातार एक दूसरे से लड़ते हैं क्योंकि ‘आदमी आदमी का दुश्मन है’। कभी बंद न होनेवाले इस संघर्ष में, न मरने के लिए लोग एक सामाजिक अनुबंध ( contract ) करने और सार्विक पुनर्मिलन ( universal reconciliation ) के एक निकाय ( body ) के रूप में, एक राज्य बनाने के लिए विवश हो गये। बाद में बुर्जुआ सिद्धांतकारों ने इस विचार को ही कई संस्करणों में विस्तारित ( elaborate ) किया और आज हमारे युग में भी कमोबेश यही विचार जारी है। वे दावा करते हैं कि राज्य समाज में मेल-मिलाप कराने और, वर्गीय तथा प्रतिरोधी अंतर्विरोधों सहित, सारे अंतर्विरोधों के नियमन ( regulation ) का निकाय है। इसलिए समाज के सारे संस्तरों ( strata ) को चाहिए कि वे एक ऐसे संस्थान ( institution ) के रूप में राज्य का समर्थन करें, जो संपूर्ण समाज के तथा प्रत्येक व्यक्ति के हितों में काम करता है, न कि कुछ निजी समूहों या वर्गों के।

ऐसे विचार वास्तविकता ( reality ) से मेल नहीं खाते हैं। तथ्य यह दर्शाते हैं कि दासों पर स्वामित्ववाला पहला राज्य समाज के वर्गों में बंटने के बाद बना। राज्य, प्रभावी वर्गों ( dominant classes ) के हितों के लिए संघर्ष करने तथा उनकी रक्षा करनेवाले लोगों के विशेष समूहों की सकलता ( ensemble ) है

वास्तव में, राज्य ‘एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर प्रभुत्व क़ायम रखने का कार्यतंत्र ( mechanism ) है’। शोषक राज्य ( exploiter state ) कई घरेलू और विदेशी कार्य करता है। इसका मुख्य घरेलू कार्य शोषित ( exploited ) वर्गो के वर्ग संघर्ष ( class struggle ) को दबाना है। इस काम को अंजाम देने के लिए उसमें कई अभिकरण ( agencies ), संगठन और संस्थान शामिल किये जाते हैं, जैसे सेना, पुलिस, जासूसी और प्रतिजासूसी सेवाएं, अदालतें, दंडाधिकारी, सरकार तथा उसकी कार्यकारी एजेंसिया और विधि ( legislative ) निकाय। विधी निकाय, क़ानूनी प्रणाली ( क़ानून, मानक, क़ायदे ) को निरूपित करता है, जो सामाजिक व्यवस्था पर प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों तथा दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करते हैं और उनके संकल्प ( will ) तथा प्राधिकार ( authority ) को सुदृढ़ बनाते हैं।

अदालतें तथा क़ानून लागू करने वाले निकाय, इन क़ानूनों के सख़्ती से अनुपालन को सुनिश्चित बनाते हैं, अपराधियों का पीछा करते हैं और उन्हें निर्ममता से दंड देते हैं। यह बात प्रभुत्वशाली वर्ग के उन अलग-अलग सदस्यों पर भी लागू होती है, जो प्रभावी वर्गों के लिए लाभप्रद क़ानून को तोड़ते हैं या क़ानून द्वारा स्थापित व्यवहार के मानदंड का अनुपालन नहीं करते हैं। राज्य, व्यक्तिगत हितों ( personal interests ) की नहीं, बल्कि वर्ग के समान हितों ( common interests ) की रक्षा करता है। इसलिए पूंजीवादी सिद्धांतकारों द्वारा. प्रभुत्वशाली वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के ख़िलाफ़ राजकीय उपायों और दंडात्मक कार्रवाइयों के तथ्य को, वर्ग समाजों में राज्य के राष्ट्रीय स्वभाव के साक्ष्य ( evidence ) के रूप में पेश करने के प्रयास नितांत सारहीन ( insubstantial ) हैं।

कोई भी शोषक राज्य, एक या दूसरे प्रभुत्वशाली वर्ग की तानाशाही ( dictatorship ) होता है। इसके अनुसार शोषक राज्यों के तीन प्रकारों में भेद किया जाता है: दासप्रथात्मक ( slave-owning ) राज्य, सामंती ( feudal ) राज्य तथा पूंजीवादी ( capitalist ) राज्य। फलतः, राज्य का प्रकार अंततोगत्वा स्वामित्व ( ownership ) की प्रचलित क़िस्म पर और इस क़िस्म के ही आधार पर बनने वाले प्रमुख उत्पादन संबंधों ( relation of production ) पर निर्भर करता है। अपने कार्य करते हुए राज्य अपने आधार को दृढ़ बनाता और उसकी रक्षा करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

1 टिप्पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ८६ वीं जयंती पर डॉ॰ कलाम साहब को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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