रविवार, 4 नवंबर 2018

स्वतंत्रता और आवश्यकता - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम स्वतंत्रता और आवश्यकता पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



स्वतंत्रता और आवश्यकता - १
( Freedom and Necessity - 1 )

स्वतंत्रता (freedom) क्या है और क्या मनुष्य स्वतंत्र (free) हो सकता है? - यह दर्शन का एक शाश्वत प्रश्न है। यह दर्शन के एक बुनियादी सवाल की, यानी बाह्य जगत के साथ मनुष्य के संबंध के सवाल की एक अभिव्यक्ति है।

स्वतंत्रता की दार्शनिक संकल्पना (philosophical concept) को, स्वतंत्रता की संकीर्ण धारणा (philistine notion) से नहीं उलझाना चाहिए। संकीर्ण-मना (philistine) लोगों के लिए स्वतंत्रता का मतलब अपनी इच्छानुसार मनमाने ढंग से काम करना, अपनी किसी भी इच्छा को पूरा करना है। क्या ऐसी स्वतंत्रता संभव है? मान लीजिये कि कोई व्यक्ति एक तपते रेगिस्तान के बीच तुरंत शीतल जल-धारा में नहाने की कामना करता है। उसकी इस कामना का पूरा होना असंभव है क्योंकि उस व्यक्ति ने वस्तुगत आवश्यकता (objective necessity) तथा वास्तविक दशाओं (real conditions) को ध्यान में नहीं रखा है। मान लीजिये कि कोई अन्य व्यक्ति परिंदों की तरह उड़ना चाहता है। पर वह अपनी बांहों को पंखों की तरह कितना ही क्यों ना फड़फड़ाये, वह गुरुत्व बल पर क़ाबू नहीं पा सकता है। यहां भी वस्तुगत आवश्यकता उसकी कामना के ख़िलाफ़ आ टकराती है। लेकिन क्या इसका यह मतलब है कि मनुष्य हमेशा आवश्यकता का गुलाम है, कि वह उसे पराभूत नहीं कर सकता और अपनी कामनाओं के अनुरूप काम नहीं कर सकता?

प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का ख़्याल था कि स्वतंत्रता केवल देवताओं के लिए अनुमत (allowed) है। मनुष्य उनके हाथों का खिलौना है। वह अपने भावावेगों (passions) तथा बाहरी आवश्यकता का ग़ुलाम है। यह दृष्टिकोण, सामाजिक विकास के उस स्तर को परावर्तित (reflect) करता था, जब प्राकृतिक शक्तियों के साथ तथा वर्ग शोषण (class exploitation) के ख़िलाफ़ संघर्ष में मनुष्य दुर्बल और निस्सहाय था। ईसाई धर्माधिकारियों तथा दार्शनिकों का विचार था कि मनुष्य स्वतंत्र हो सकता है, किंतु वे स्वतंत्रता का बहुत सीमित अर्थ लगाते थे। उनकी दृष्टि से यह दो रास्तों में से एक के चयन की संभावना में निहित है - मनुष्य या तो ईश्वर को प्रिय कर्म करे और पुरस्कारस्वरूप स्वर्ग को जाये या शैतान को प्रिय काम करे और दंडस्वरूप नरक हो जाये। लगभग ऐसी ही धारणाएं कमोबेश हर धार्मिक दृष्टिकोण में अभिव्यक्त हुयीं।

१७वीं सदी के हॉलेंड के भौतिकवादी चिंतक बारूख़ स्पिनोज़ा का विचार था कि प्रकृति में आवश्यकता का बोलबाला है। तर्कबुद्धि (reason) संपन्न मनुष्य इस आवश्यकता को जानने में समर्थ रहा, अतः स्वतंत्र हो गया। स्पिनोज़ा के अनुसार, स्वतंत्रता आवश्यकता को जानना है। क्या सचमुच ऐसा है? क्या वस्तुगत आवश्यकता पर नियंत्रण कायम करने के लिए, उस पर निर्भर न रहने और स्वतंत्र होने के लिए उसे जानना काफ़ी है?

एक तपते हुए रेगिस्तान में नहाने के लिए उपयुक्त तालाब के प्रकट होने के लिए इच्छाओं का कोई महत्व नहीं है। इसके लिए चंद सिंचाई परियोजनाओं को कार्यान्वित करना, नहरें और सिंचाई के तालाब बनाना, पानी के स्रोत को खोजना और नमी को संरक्षित तथा वितरित करना सीखना ज़रूरी है। और इसके लिए क्रमानुसार प्रकृति के नियमों को जानना, सही निर्माण योजना को छांटना और सुआधारित फ़ैसले लेना आवश्यक है। लेकिन केवल फ़ैसले और योजनाएं भी काफ़ी नहीं है। ढेर सारा काम करना और चयनित योजना को वास्तविकता बनाना आवश्यक है; मनुष्य केवल तभी झुलसानेवाली गर्मी से छुटकारा पायेगा और अपनी इच्छा को पूरा कर सकेगा।

उड़ने के लिए केवल कामना करना काफ़ी नहीं है। विश्व में विविध आवश्यकताएं तथा वस्तुगत नियमितताएं (objective laws) संक्रियाशील (operational) हैं। गुरुत्व के नियम के अलावा गतिमान पिंडों के प्रति वायु के प्रतिरोध के नियम भी हैं। हम अपने आप को इनमें से किसी भी नियम से या इन आवश्यकताओं में से किसी भी आवश्यकता से छुटकारा नहीं दिला सकते हैं। लेकिन जब हम वस्तुगत आवश्यकता को जान पाते हैं, तो हम दूसरे पर भरोसा करते हुए उनमें से एक की संक्रिया पर क़ाबू पा सकते हैं। विमानों के डिज़ाइनर ऐसा ही करते हैं, वे गुरुत्व के बल पर क़ाबू पाने के लिए वायु के प्रतिरोध बल का उपयोग करते हैं। लेकिन महज़ आवश्यकता का ज्ञान काफ़ी नहीं है। ज्ञान पर भरोसा करते हुए सही निर्णय लेना, सबसे सही डिज़ाइन तथा निर्मिति का चयन करना और विमान काव्यवहारतः निर्माण करना महत्वपूर्ण है। केवल तभी हम मुक्त रूप से हवा में उड़ सकते है।

इस तरह, स्वतंत्रता की ऐतिहासिक भौतिकवादी संकल्पना (historical materialistic conception) सिर्फ आवश्यकता की जानकारी तक सीमित नहीं की जा सकती है; यह इसे लोगों के व्यावहारिक क्रियाकलाप से जोड़ती है। स्वतंत्र होने का मतलब है वस्तुगत आवश्यकता का संज्ञान (cognition) प्राप्त करना और उस ज्ञान पर भरोसा करते हुए सही लक्ष्य तय करना, प्रमाणित (substantiated) फ़ैसले छांटना और लेना तथा उन्हें व्यवहार में लाना। इसीलिए इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि स्वतंत्रता, वस्तुगत आवश्यकता से काल्पनिक स्वाधीनता (imaginary independence) में नहीं, बल्कि यह जानने में है कि सके ज्ञान सहित निर्णय कैसे लिये जायें।

इस अर्थ में, मनुष्य केवल सामाजिक सत्व (social being) के रूप में ही स्वतंत्र हो सकता है। समाज के बाहर स्वतंत्र होना असंभव है। एक पूर्णतः अलग-थलग रहने वाला व्यक्ति वस्तुगत आवश्यकता को जानने में समर्थ होते हुए भी सबसे अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसले को शायद ही कार्यान्वित कर सकता है। जो पूंजीवादी चिंतक यह समझते थे कि मनुष्य को सबसे पहले समाज के प्रति दायित्वों से मुक्त किया जाना चाहिए, उनका खंडन करते हुए लेनिन ने लिखा: "कोई समाज में रहकर समाज से स्वतंत्र नहीं हो सकता है।" फलतः प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ़ कुछ ऐतिहासिक दशाओं में और ठीक तब प्राप्त की जा सकती है, जब सारा समाज स्वतंत्र हो। ये दशाएं क्या हैं?



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

1 टिप्पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 04/11/2018 की बुलेटिन, " दादा जी, फेसबुक और मंदाकिनी “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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