शनिवार, 9 मई 2009

दिमाग़ और दिल, एक दूसरे के रूबरू




हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
ब्लोग का नाम बदल करमै समय हूंसेसमय के साये मेंकर दिया है। खैर, क्या फ़र्क पड़ता है।
चलिए, अपन तो अपनी चौपाल लगाते हैं.....
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समय के साये में एक सम्माननीय आगन्तुक ने एक टिप्पणी में क्या खू़ब बात कही है, एक खू़बसूरत अंदाज़ में.....आप देखिए...
दिमाग को कभी दिल के रूबरू करके देखिये.. फिर कहिए..

समय ने सोचा चलो आज इस बेहद प्रचलित जुमले पर ही बात की जाए।
अक्सर इसका कई विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। दिल की सुनों....दिल से सोचो...दिमाग़ और दिल के बीच ऊंहापोह....दिमाग़ कुछ और कह रहा था, दिल कुछ और....मैं तो अपने दिल की सुनता हूं...दिल को दिमाग़ पर हावी मत होने दो....दिल अक्सर सही कहता है, पर हम दिमाग़ लगा लेते हैं...बगैरा..बगैरा..
इस तरह दिल और दिमाग़ दो प्रतिद्वन्दी वस्तुगत बिंबों, अलग-अलग मानसिक क्रिया करने वाले दो ध्रुवो के रूप में उभरते हैं, जो हमारे अस्तित्व से बावस्ता हैं।

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चलिए देखते हैं, वस्तुगतता क्या है।
अधिकतर जानते हैं कि शारीरिक संरचना के बारे में मानवजाति के उपलब्ध ग्यान यानि शरीर-क्रिया विग्यान के अनुसार दिमाग़ यानि मस्तिष्क सारी संवेदनाओं और विचारों का केन्द्र है जबकि दिल का कार्य रक्त-संचार हेतु आवश्यक दबाब पैदा करना है, यह एक पंप मात्र है जिसकी वज़ह से शरीर की सारी कोशिकाओं और मस्तिष्क को भी रक्त के जरिए आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति होती है।
ऐसा नहीं है कि इन जुमलों को प्रयोग करने वाले इस तथ्य को नहीं जानते, फिर भी इनका प्रयोग होता है।
एक तो भाषागत आदतों के कारण, दूसरा कहीं ना कहीं समझ में यह बात पैठी होती है कि मनुष्य के मानस में भावनाओं और तार्किक भौतिक समझ के वाकई में दो अलग-अलग ध्रुव हैं।

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अक्सरदिल के हिसाब सेका मतलब होता है, प्राथमिक रूप से मनुष्य के दिमाग़ में जो प्रतिक्रिया या इच्छा उत्पन्न हुई है उसके हिसाब से या अपनी विवेकहीन भावनाओं के हिसाब से मनुष्य का क्रियाशील होना। जबकिदिमाग के हिसाब सेका मतलब होता है, मनुष्य का प्राप्त संवेदनों और सूचनाओं का समझ और विवेक के स्तर के अनुसार विश्लेषण कर लाभ-हानि के हिसाब से या आदर्शों के सापेक्ष नाप-तौल कर क्रियाशील होना।
कोई-कोई ऐसे सोचता है कि प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा शुद्ध होती है, दिल की आवाज़ होती है अतएव सही होती है, जबकि दिमाग़ लगाकर हम अपनी क्रियाशीलता को स्वार्थी बना लेते हैं। कुछ-कुछ ऐसे भी सोचते हैं कि दिमाग़ से नाप-तौल कर ही कार्य संपन्न करने चाहिए।

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क्या सचमुच ही प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ शुद्ध और सही होती है?
चलिए देखते हैं।
आप जानते हैं कि एक ही वस्तुगत बिंब लग-अलग मनुष्यों में अलग-अलग भावना का संचार करता है। एक ही चीज़ अगर कुछ मनुष्यों में तृष्णा का कारण बनती है तो कुछ मनुष्यों में वितृष्णा का कारण बनती है जैसे कि शराब, मांस आदि। जाहिर है ऐसे में इनके सापेक्ष क्रियाशीलता भी अलग-अलग होगी। किसी स्त्री को देखकर पुरूष मन में, नर-मादा के अंतर्संबंधों के सापेक्ष उसे पाने की पैदा हुई प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ को सामाजिक आदर्शों के सापेक्ष कैसे शुद्ध और सही कहा जा सकता है? ऐसे ही कई और चीज़ों पर भी सोचा जा सकता है।

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दरअसल, एक जीव होने के नाते हर नुष्य अपनी जिजीविषा हेतु बेहद स्वार्थी प्रवृत्तियों और प्राथमिक प्रतिक्रियाओं या इच्छाओं का प्रदर्शन करता है या करना चाहता है, परंतु एक सामाजिक प्राणी होने के विवेक से संपन्नता और आदर्श प्रतिमानों की समझ उसे सही दिशा दिखाती है और उसके व्यवहार को नियमित और नियंत्रित करती है। अब हो यह रहा है कि आज की व्यवस्था द्वारा प्रचलित और स्थापित मूल्यों में सामाजिकता गायब हो रही है और व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति के हितसाधन को प्रतिष्ठित किया जा रहा है अतएव जब सामान्य स्तर का मनुष्य जब दिमाग़ लगाता है तो नाप-तौल कर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति हेतु प्रवृत होता है। इसीलिए यह विचार पैदा होता है कि वह यदि अपने दिल की आवाज़ पर जो कि साधारणतयाः अपने विकास हेतु समाज पर निर्भर होने के कारण कुछ-कुछ सामाजिक मूल्यों से संतृप्त होती है, के हिसाब से कार्य करे तो शायद ज़्यादा बेहतर रहेगा।

समय के उक्त सम्माननीय आगन्तुक की टिप्पणी का शायद यही मतलब है।

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जाहिर है, जिस मनुष्य का ग्यान और समझ का स्तर अपेक्षाकृत निचले स्तर पर होता है, उसके व्यवहार का स्तर इन प्राथमिक प्रतिक्रियाओं या इच्छाओं या दिल की आवाज़ पर ज़्यादा निर्भर करता है और जो अपने ग्यान और समझ के स्तर को निरंतर परिष्कृत करते एवं विवेक को ज़्यादा तार्किक बनाते जाते हैं, उनके व्यवहार का स्तर भी तदअनुसार ही ज़्यादा संयमित, विवेकसंगत और सामाजिक होता जाता है।

आज के लिए इतना ही.....


6 टिप्पणियां:

विनय ने कहा…

बहुत उच्च विचार हैं इनसे मैं पूर्णतया सहमत हूँ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

समय जी!
प्रणाम!
आप की आज की कक्षा बहुत अच्छी लगी। इस ने ज्ञान बढ़ाया।
अब तो आप के स्कूल में भरती हो गए हैं। पढ़ने आते रहेंगे।

बेनामी ने कहा…

samay ji!
pranam!
hum bhi samay ke sayen main aane se na ach sake.

shashi ने कहा…

आपका ये जीव विज्ञान से सम्बंधित है फिर मानव श्रेष्ठ इन्हें स्वीकार तो करते है किन्तु अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए दिल ओर मस्तिष्क की बात करते है ओर सभी उनके स्वार्थो पर निर्भर करता है की उन्हें सामने वाले व्यक्ति से क्या कहने पर उनका स्वार्थ सिद्ध हो रहा है उसी समय वो अपने विवेक से फैसला करते है की मुझे क्या कहना श्रेयस्कर होगा की ये कहना की में दिल से सोचता हूँ या ये की में दिमाग से सोचता हूँ जबकि हम सभी जानते है की दिल सिर्फ रुधिर साफ़ करके शिराओं ओर रुधिर वाहिकाओं में प्रवाहित करने के लिए एक धोंकनी का कार्य करती हे
अतः आपका लेख ज्ञानवर्धक है ओर उन लोगो के लिए अब चुनौती बन जाएगा जो कहते है की वे दिल से सोचते है

ओर भाई मेरे कोई भावना विवेकहीन नहीं होती क्योंकि बिना विवेक के भावना जन्म ही नहीं ले सकती क्यों की मनुष्य जो भी करता है उसका सञ्चालन मस्तिष्क ही करता है

ओर भी बहुत कुछ है जो कहा जा सकता है विवेक के बारें में पर फिर कभी क्योँ की टाईप कर्ण
में मैं अपने को कमजोर पाता हूँ

समय ने कहा…

समय यहां थोडा़ सा जोड़ना चाहता है...

भावनाएं और विवेक दोनो मस्तिष्क के ही क्रियाकलाप हैं। भावनाएं, उस परिस्थिति विशेष के लिए मस्तिष्क का अपने अनुभवों द्वारा, अपने पूर्वाभ्यास द्वारा हुआ अनुकूलन है, यह मस्तिष्क की एक प्रतिक्रियात्मक अवस्था है।
विवेक मनुष्य के मस्तिष्क की तर्किक विश्लेषण प्रणाली है जिसके सहारे वह प्रदत्त परिस्थितियों का विश्लेषण करता है, उन्हें अपने पूर्व अनुभवों, अपनी अर्जित समझ और आदर्श प्रतिमानों के सापेक्ष नाप-तौल कर, वह परिस्थिति विशेष के लिए किए जाने वाले प्रतिक्रियात्मक व्यवहार को नियमित या नियंत्रित करता है।
यानि इसे ऐसे समझा जा सकता है कि परिस्थिति विशेष के लिए भावना पहले जन्म लेती है, और फिर मनुष्य अपने विवेकानुसार उक्त परिस्थिति विशेष के लिए अपना व्यवहार तय करता है। मनुष्य अपने विवेक को परिष्कृत करके अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित और नियमित करता है, और अपने व्यवहार को भी।

अतएव, यह कहा जा सकता है कि भावना बिना विवेक के ही जन्म लेती है, और कई प्राथमिक भावनाएं अक्सर विवेकहीन ही होती है। यह सच है कि मनुष्य लगातार अभ्यास से अपने मस्तिष्क की प्रतिक्रियात्मक अवस्थाओं का विवेक के द्वारा अनुकूलित करके अपनी भावनाओं को अधिक विवेकसंगत बना सकता है।

भावनाओं के तहत किए गए अपने व्यवहार पर बाद में पछताते हुए लोगों से जो यह कहते हैं कि उनकी प्रतिक्रिया विवेकसंगत नहीं थी, यह आसानी से जाना जा सकता है।

इस विषय पर समय, विस्तृत रूप से बाद में चर्चा करेगा।

संवाद के लिए धन्यबाद!

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

बाप रे! बेहद खतरनाक और करोड़ों लोगों के अनुसार - "दिमाग से लिखा हुआ आलेख"

लेकिन सरल और सुन्दर व्याख्या, खासकर अन्त की आपकी टिप्पणी। लाजवाब! इसीलिए मनोविज्ञान ही पढ़ने का मन करता है।

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