बुधवार, 27 मई 2009

प्रेम के मानसिक अंतर्द्वंद और ज़मीनी सच्चाइयां

हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
सोचा था प्रेम की चर्चा खत्म करके कुछ नया शुरू करेंगे, परंतु प्रतिक्रियाओं और मेल पर प्राप्त अन्य जिज्ञासाओं ने प्रेरित किया कि अभी प्रेम के मानसिक अंतर्द्वंदों और वास्तविक निगमनों पर और पन्नें काले किये जा सकते हैं। चलिए, बात शुरू की जाए..और यक़ीन मानिए अगर आप अपने पूर्वाग्रहों को थोड़ी देर ताक में रख देंगे तो इस में ज़्यादा मज़ा आएगा।




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मनुष्य अपनी ज़िंदगी समाज के बीचोंबीच शुरू करता है और स्नेह, वात्सल्य एवं दुलार उसे एक सुरक्षाबोध का अहसास कराते रहते हैं। उसकी दुनिया समाज के इस परिचित परिवेश में सिमटी हुई होती है। थोडी उम्र बढ़ती है, लिंगभेदों की पहचान आकार लेती है और इनके प्रति अनुत्तरित जिज्ञासाएं पनपने लगती हैं। कुछ और उम्र गुजरती है, अब विपरीत लिंगियों के बीच इक अनजानी सी शर्म का अहसास फलतः बढ़ती दूरी, और अनुत्तरित जिज्ञासाओं का अंतर्द्वंद उनके बीच स्वाभाविक तौर पर एक आकर्षण पैदा करता है। यह आकर्षण विपरीत लिंगियों के बीच दिलचस्पी का वाइस बनता है, और शर्म एवं झिझक का अहसास उनके बीच असहजता पैदा करता है। यह असहजता, इसके पहले के आपसी व्यवहार के संदर्भ में होती है और वे अपने आपसी संबंधों में कुछ अनोखापन महसूस करने लगते हैं। जाहिर है यह सब निकट के सामाजिक परिवेश के विपरीत लिंगियों के बीच ही घट रहा होता है। मनुष्य का परिवेश उन्हें निकट के रिश्तों की अनुकूलित समझ दे देता है अतएव यह असहजता इनसे थोडा़ अलग परिवेश के विपरीत लिंगियों के बीच पैदा होती है, और जहां ये थोडा़ अलग संभावनाएं आसपास नहीं होती, तो आप सभी जानते हैं कि शुरूआती तौर पर थोडा़ दूर के रिश्तों के विपरीत लिंगियों के बीच ही इस असहजता और आकर्षण को घटता हुआ देखा जा सकता है।

इन अस्पष्ट सी लुंज-पुंज भावनाओं के बीच आगमन होता है, एक नये सिरे से विकसित हो रही समझ का जो उनके बडों के आपसी व्यवहार को नये परिप्रेक्ष्यों में तौलने लगती है, उनके बीच के संबंधों में कुछ नया सूंघने लगती है। उपलब्ध साहित्य, फिल्मों और टीवी में चल रही कहानियों में भी नये अर्थ मिलने लगते हैं, जिन्हें अपनी जिज्ञासाओं के बरअक्स रखकर वे अपनी इन कोमल भावनाओं को नये शब्द, नयी परिभाषाएं, नये आयाम देने लगते हैं।

और फिर शारीरिक बदलावों के साथ किशोरावस्था की शुरूआत होती है, अब तक वे इन कोमल भावनाओं को ‘प्रेम’,‘प्यार’ के शब्द के रूप में एक नया अर्थ दे चुके होते हैं, जो कि इन शब्दों के बाल्यावस्था वाले अर्थों से अलग होता है। यह नया अर्थ यौन-प्रेम का होता है, और उपलब्ध परिवेश से अंतर्क्रियाओं के स्तर के अनुसार वे इस प्रेम की नई-नई परिभाषाएं, व्याख्याएं गढ़ चुके होते हैं।

वे इस प्रेम के भावनात्मक आवेग के जरिए जीवन में पहली बार अपने अस्तित्व का, समाज से विलगित रूप में अहसास करते हैं और समाज के सापेक्ष अपनी एक अलग पहचान, अपनी एक व्यक्तिगतता को महसूस करते हैं। शायद इसीलिए किसी मानव श्रेष्ठ ने कहा है कि प्रेम, मनुष्य का समाज के विरूद्ध पहला विद्रोह है। जाहिर है ये बडी ही विशिष्ट अवस्था है, और परिवेश द्वारा इस अवस्था से किस तरह निपटा जाता है यह उन किशोरों की कई भावी प्रवृतियों को निर्धारित करने वाला होता है।

अभी भी अधिकतर रूप में प्रेम की भावना के परिवेशजनित अर्थों में विपरीत लिंगी के प्रति एक आत्मिक लगाव, एक बिलाशर्त समर्पण, और एक गहन जिम्मेदारी और त्याग का भाव निहित रहता है, परंतु कहीं-कहीं जहां परिवेश में पश्चिमी प्रभाव ज्यादा घुलमिल रहा है प्रेम की भावना का अर्थ संकुचित होकर यौनिक आनंद तक सिमट रहा है। खैर इस दूसरे अतिरेक को छोड़ते हैं और पहले वाले अतिरेक पर ही लौटते हैं।

सामान्य भारतीय परिवेश में यौन-प्रेम वर्जित है, क्योंकि यह अपनी उत्पत्ति में किसी भी भाषिक, जातीय, आर्थिक और धार्मिक बंधनों को आड़े नहीं आने देता है जो कि अभी किशोर मन में अपनी जडे़ नहीं जमा पाए होते हैं और कमजो़र होते हैं और साथ ही इस भावना को सामान्यतयाः गलत नज़र से यानि कि व्यस्कों के यौन-अनुभवों की दृष्टी से भी देखा जाता है। जाहिरा तौर पर ये अव्यक्त, चोरी-छिपे की भावनाएं उनके अपरिपक्व मन में उथल-पुथल मचाए रहती हैं और इन वर्जनाओं और यौनिक दृष्टीकोणों के सापेक्ष किशोर मन इनके आत्मिक रूपों को अतिश्योक्तियां देता है, जिनका कि आधार उसे साहित्य और हिंदी सिनेमा से ज्यादा मिलता है।

इस दौर में आकर एक चीज़ और हो सकती है और वो यह कि सहज उपलब्ध विपरीत लिंगी के बजाए किशोर मन, किसी भी पसंद के व्यक्ति को सचेत रूप से अपने प्रेम का लक्षित बना लेता है और उसके मन में भी अपने लिए वैसी ही भावनाएं पैदा कर पाना अपनी तात्कालिक ज़िंदगी का लक्ष्य बना लेता है।

अक्सर सभी मनुष्य प्रेम की इन भावनाओं से दो-चार होते हैं, कहीं ये भावनाएं इकतरफ़ा रूप में दबी रह जाती हैं, कहीं ये अभिव्यक्त होकर थोड़ा सा दबा छिपा प्रेमाचार कर पाती हैं और भुला ली जाती हैं, कहीं ये पुरज़ोर रूप में सामने आती हैं और गंभीरता से अपनी परिणति की लडाई लडती हैं और सामाजिक अवसरवाद या सामाजिक मूल्यों के आगे दम तोड देती हैं और कहीं ये खुला विद्रोह कर अपने अंज़ाम तक पहुंच भी पाती हैं। अक्सर ये देखा जाता है, विरले ही रूप में परिणति तक पहुंचे प्रेम विवाह भी असफल रहते हैं। यह वहीं होता है जहां इन प्रेम-विवाहों के मूल में प्रेम का आत्मिक, प्रबल भावावेगों और मानसिक घटाघोपों वाला रूप होता है और ज़मीनी हक़ीकतों से, ज़िंदगी की ठोस भौतिक परिस्थितियों से अलगाव होता है। जाहिर है, प्रबल आत्मिक भावावेगों का हवाई बुलबुला ठोस ज़मीन पर जल्दी ही फूट जाता है।

अब ये आसानी से समझा जा सकता हैं कि प्रेम की विभिन्न परिभाषाओं और व्याख्याओं के मूल में क्या निहित होता है। जब प्रेम में पगा मन अपनी भावनाओं के वश में अपने प्रेमी या प्रेम के लक्षित के इंतज़ार में ही आनंद पाने को विवश होता है, तो उसे लगता है कि इंतज़ार ही प्रेम है। जब प्रेम का लक्षित सबसे महत्वपूर्ण हो उठता है, जागते-सोते उसके नाम की माला जपना जब सबसे आनंददायक मानसिक शगल हो उठता है, तो उसे लगता है कि प्रेम भगवान है, पूजा है। जब प्रेम में डूबा हुआ मन कोई असामान्य हरकत कर बैठता है, तो शायद उसे लगता है कि प्रेम एक पागलपन है, दीवानगी है। जब इकतरफ़ा प्रेम असफलता या इंकार की संभावना से डरा होता है तो उसे ये सोचना अच्छा लगता है कि प्रेम एक त्याग है और बदले में प्रेम पाने की आंकाक्षा एक दूसरे पर कब्ज़ा करना है जो कि प्रेम का लक्ष्य नहीं है।

अधिकतर मनुष्य, किशोरावस्था की इन्हीं अनगढ़ एकांतिक भावनाओं को, दमित आकांक्षाओं को मन में समेटे हुए ही अपनी आगे की ज़िंदगी को परवान चढा़ते हैं। ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों के आभामंड़ल के बीच, इन कोमल भावनाओं की स्मृति और कल्पनाएं उसे एक गहरा मानसिक सुकून देती हैं। किशोरावस्था के प्रेम की ये स्मृतियां कभी उसे गुड जैसा मीठा अहसास देती हैं, कभी एक भुला नहीं सकने वाली तल्ख़ी, कभी वे एक बचकाना दीवानापन लगती हैं और कभी भावों का जलेबी सा उलझा हुआ पर मीठा रसीला आनंद। मनुष्य ताउम्र अपनी कठोर ज़िंदगी से मिले फ़ुर्सत के क्षणों में इन मीठे और कोमल अहसासों की जुगाली करता रहता है।

मनुष्य अपनी बाद की ज़िंदगी में यौन-प्रेम की भौतिक तुष्टि पा चुका होता है, इसीलिए जाहिरा तौर पर अपने मानसिक सुकून के लिए वह अपने शुरूआती यौन-प्रेम की स्मृतियों की, जिनमें अक्सर यौनिक दृष्टिकोण पृष्ठभूमि में होता है, पवित्रता बनाए रखने के लिए उन्हें और भी अधिक आत्मिक परिभाषाओं और व्याख्याओं के नये आयामों तक विस्तार देता रहता है।

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तो हे मानव श्रेष्ठों !!
मुझे लगता है अब प्रेम पर ये काफ़ी सामग्री हो गयी है, जिसमें से आप प्रेम की भावनाओं को समझने के कई इशारे पा सकते हैं, और इस पर अपना अनुसंधान जारी रख सकते हैं।
निरपेक्ष विश्लेषण ही आपको सत्य की राह पर पहुंचा सकता है।

समय

17 टिप्पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

achchha lekh hai

ajay kumar jha ने कहा…

bahut hee umdaa lekh hai bhai.... aapkee shailee aur rawaangee ne baandhe rakha....yun hee likhte rahein......

Udan Tashtari ने कहा…

प्रेम के मूल को समझाते हुए एक बेहतरीन विश्लेषणात्मक आलेख. आनन्द आया पढ़कर. आभार इन सदविचारों का.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} ने कहा…

समय महोदय आप चूक तो कर ही बैठे हैं ,भाई अब अपनी करम-कृषि को काटना तो पड़ेगा ही ,ऐसे कैसे भागे जा रहे हैं 'मा पलायनम् : मा पलायनम् | शायद ' समय ' ने इससे बड़ा बहुरुपिया न देखा होगा ? इसके रूप तो देखिये ममता ,वात्सल्य ,स्नेह ,प्रेम , वासना , भक्ति ,समर्पण कहाँ तक गिनाया जाये | मेरी समझ में यह संभवता अकेली विधा है जो कंही से शुरू कर ..कहीं से होकर कहीं और यांनि समाधी तक भी पहुंचा सकती है | लिखिये लिखिए लिखिए क्योंकि समय द्वारा समय - पत्र पर वक्त की स्याही से लिख का समय - पात्र में सुरक्षित रख देने पर , वही भविष्य काल के किसी वर्तमान समय द्वारा गत समय के प्रेमी के रूप में सामने लाया जाता है तो वही इतिहास कहलाता है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

समय महाराज की जय!
आप अब तक कहाँ थे महाराज। आप तो प्रेम पर लिखने वाले अब तक के तमाम लेखकों, प्रवचनकर्ताओं और मनीषियों से आगे निकल गए। इस से अधिक सुंदर, कल्याणकारी और यथार्थ व्याख्या अभी तक तो पढ़ी नहीं गई है।
आप को प्रणाम!

shashi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
shashi ने कहा…

aapne prem par jo likha hai us par kuchh bhi kahna suraj ko diya dikhane jaisa hai aapka vishlashan wakai tarif-e-kabil hai

हर्षवर्धन ने कहा…

बड़े 'प्रेम' से लिख मारा है

woyaadein ने कहा…

क्या गज़ब का लेख लिखा है आपने प्रेम का विश्लेषण करते हुए.....मैं तो पढ़कर आनंद की चरम सीमा पर पहुँच गया. यूं ही लिखते रहिये....मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है....

साभार
हमसफ़र यादों का.......

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

प्रेम के विभिन्न स्वरूपों का सटीक चित्रण किया है आपने। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Arvind Mishra ने कहा…

बहुत बढियां आलेख !

shikha varshney ने कहा…

kafi achcha lekh hai.gyaan bardhan ke liye shukriya

saurabh ने कहा…

achcha hai..... lekin agar ek scientist ki nazar se dekhte hain to ek mandir bhi sirf eet aur cement ka hota hai lekin puja karne wale ke liye vo jagah eet ,cement se badkar hoti hai prem ko shabd dena galat use to jee kar hi jana ja sakta hai ... thank u

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

इस बार पता चला बहुत कुछ। द्विवेदी जी की बात से सहमति। कुछ सवाल रहे लेकिन मन में। लेकिन हिन्दी सिनेमा और साहित्य की बात सच सी लगी। शानदार! बेहद महत्वपूर्ण!

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

लेकिन अगर सभी में विद्रोह कभी पैदा होता है, खासकर भारत में तब हमारा देश ऐसा क्यों है?

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

पिछले भाग में अमर जी(अब दिवंगत)की बात यानी दूसरी टिप्पणी की समीक्षा अन्त में अच्छे से दिखती है…अब हुआ यह कि यहाँ अमर जी आए ही नहीं या आए तो कुछ बोले नहीं…

मेरी दूसरी टिप्पणी में जो सवाल था, उस पर विचार रखे नहीं गए हैं…

'परिवेश द्वारा इस अवस्था से किस तरह निपटा जाता है यह उन किशोरों की कई भावी प्रवृतियों को निर्धारित करने वाला होता है।'…भावी प्रवृत्तियों पर विस्तार से प्रकाश डालते तो अच्छा लगता…ताकि समझने का मौका मिलता कि क्या-क्या और कौन-सी प्रवृत्तियाँ किस ओर ले आती हैं व्यक्ति को…


'प्रेम, मनुष्य का समाज के विरूद्ध पहला विद्रोह है।'…इसका सन्दर्भ और इस वाक्य के निर्माता का नाम जानने की इच्छा है…

एक जिज्ञासा और है कि व्यक्ति 'क' अगर 'ख' से प्रेम करता है तो 'ख' 'क' से कैसे प्रेम करने लगता है…प्रेम मतलब वही प्राथमिक अर्थ में…

समय ने कहा…

@ चंदन जी,

लेकिन अगर सभी में विद्रोह कभी पैदा होता है, खासकर भारत में तब हमारा देश ऐसा क्यों है?

क्योंकि परम्पराओं से विद्रोह के इस अंकुर के पास सैद्धांतिक व्यापकता नहीं होती। समझ नहीं होती। वैकल्पिक अवधारणाएं नहीं होती। यह कूपमंडूकता वैयक्तिकता में ही उलझकर रह जाती और व्यापक सामाजिक परिवर्तनों की आकांक्षा से नाभीनालबद्ध नहीं हो पाती। कमजोर वैयक्तिक प्रयास, मजबूत सामाजिक और राजनैतिक संरचनाओं से टकरा-टकरा कर दम तोड देते हैं।

'परिवेश द्वारा इस अवस्था से किस तरह निपटा जाता है यह उन किशोरों की कई भावी प्रवृतियों को निर्धारित करने वाला होता है।'

इसका तात्पर्य यह था, किशोरों के मन की इन कोमल भावनाओं और उनकी अभिव्यक्ति को उनके अभिभावकों तथा अन्य अंतर्संबंधित अन्य वयस्कों द्वारा किस तरह देखा जाता है, लिया जाता है, और उन पर किस तरह की प्रतिक्रियात्मक कार्यवाहियां की जाती हैं, यह उनके मनोजगत पर कई प्रभाव छोड़ता है। नकारात्मक पद्धतियां और व्यवहार उनके अंदर कई नकारात्मक प्रवृत्तियां पैदा कर सकती है और सकारात्मक पद्धतियां और व्यवहार उनके अंदर कई सकारात्मक प्रवृत्तियां पैदा कर सकती हैं जो उसकी समाजोन्मुखता को उत्प्रेरित करती हैं और उसे एक व्यापक प्रेम की भावना से भर सकती हैं। अभी इतना ही।

'प्रेम, मनुष्य का समाज के विरूद्ध पहला विद्रोह है।'…संदर्भ याद नहीं। काफ़ी पहले कहीं पढ़ा था, या इस तरह भी कहा जा सकता है कि कई जगह पढ़ा गया है, ऐसा ही कुछ।

तो 'ख' 'क' से कैसे प्रेम करने लगता है…इसके लिए आपको सिर्फ़ यह करना है कि आप ख़ुद किस तरह किसी के प्रति लगाव महसूस करने लगते हैं, इस प्रक्रिया को समझने की कोशिश करें। फिर इसे आगे प्रेम तक व्यापकता दें। कई चीज़ें ख़ुद-ब-ख़ुद साफ़ होती जाएंगी। कुछ इशारे हम भी कर देते हैं।

पिछली पोस्ट का यह वाक्यांश देखें, "यह भावना, मनुष्य में अपनी महत्वपूर्ण वैयक्तिक विशेषता द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में इस ढंग से अधिकतम स्थान पा लेने की इच्छा में अभिव्यक्त होती है कि उस व्यक्ति में भी वैसी ही प्रगाढ़ तथा स्थिर जवाबी भावना रखने की आवश्यकता पैदा हो जाये।"

यौन-आकर्षण तो होता ही है, सारे के सारे घटाघोप जिनका कि जिक्र इस प्रविष्टि में किया गया है होते ही हैं, ऐसे में 'क' यदि 'ख' के प्रति कोमल भावनाएं प्रदर्शित करता है, अनुराग, दिलचस्पी, समर्पण और प्रेम का भाव दिखाता है, और यदि 'क' के प्रति कोई गंभीर नकारात्मक भावनाएं उस 'ख' के मन में नहीं है, तो 'ख' के मन को यह बात छूने लगती हैं, अच्छी लगने लगती हैं, और उसकी आवश्यकताएं उसके मन में भी वैसे ही जवाबी भाव पैदा करने लगती हैं, और हम कह सकते हैं कि 'ख' भी 'क' से प्रेम करने लगता है। यह प्रक्रिया कई सारी परिस्थितियों और आपसी अंतर्क्रियाओं की प्रकृति के सापेक्ष, कम समय में भी घट सकती है, और एक लंबा समय भी ले सकती है।

शुक्रिया।

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