शुक्रवार, 5 जून 2009

सौन्दर्यबोध और व्यवहार

हे मानव श्रेष्ठों,

समय के पास, पहले की एक और जिज्ञासा है, देखिए..
०००००
"पाषाण युग में गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए जाते थे, उपलब्ध संसाधनों के तालमेल से संगीत भी गाया-बजाया जाता था, ग्रामीण लोग आज भी घरों के आगे मांडने बनाते हैं, लोकगीतों की धुन आज भी आकर्षित करती है। ऐसे में इलीट वर्ग के फ़्यूजन संगीत और महंगी तस्वीरों को अपने संग्रह का हिस्सा बनाने की होड़ और प्रकृति से परे इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन को क्या ‘सौन्दर्यबोध’ कहा जा सकता है?"
०००००
कुलमिलाकर यह जिज्ञासा सौन्दर्यबोध के निरूपण और तुलना के संदर्भ में है।
चलिए बात शुरू करते हैं...
०००००००००००००००००००००००००००००००




उपरोक्त जिज्ञासा में पूर्वोक्त तथ्य सामूहिक श्रम-जीवन के सौन्दर्यबोध की सहज और सरल अभिव्यक्तियां हैं, वहीं पश्चोक्त तथ्य सौन्दर्यबोध के विकास की व्यक्तिवादी और अहमवादी दिशा का द्योतक है। इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन में भी दोनों तरह की प्रवृतियां मौजूद हैं।

मनुष्य अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान, विभिन्न सौन्दर्यात्मक गुणों, मुख्य रूप से सुंदर और कुरूप का भावनात्मक मूल्यांकन करने की योग्यता विकसित करता है। यह योग्यता उसके सृजनात्मक कार्यों में प्रकट होती है और उसके आनंद की प्रेरणा स्रोत होती है। उत्तम सौन्दर्याभिरूचियों का अर्थ है वास्तविक सौन्दर्य से आनंद प्राप्त करने की योग्यता, अपने कार्य में, दैनंदिन जीवन, आचरण, कला में सौन्दर्य का सृजन करने की अपेक्षा। निकृष्ट सौन्दर्याभिरूचियां यथार्थ के प्रति मनुष्य के सौन्दर्यात्मक दृष्टिकोण को विकृत करती हैं, वास्तविक सौन्दर्य के प्रति उदासीन बनाती हैं और कभी-कभी परिणाम यहां तक पहुंचता है कि मनुष्य कुरूप वस्तुओं और प्रवृतियों से भी आनंद प्राप्त करता है।
सौन्दर्यबोध सुंदर के चयन और निरूपण से संबंधित मात्र नहीं होता, वरन् सुंदर का असुंदर से भेद और फिर असुंदर को सुंदर बनाने के सचेत क्रियाकलापों से भी संबंधित है। यह सिर्फ़ विश्व के वस्तुगत रूप का मामला ही नहीं, वरन् विचारों की सुंदरता का मामला भी है। यह सौन्दर्य के निरूपण के साथ-साथ असौन्दर्य के साथ संघर्ष और उसके खात्में की प्रक्रिया पर निर्भर है।
विचारों के मामले में शिव और अशिव यानि सुंदर और असुंदर के निर्धारण की कसौटी क्या हो, यह मनुष्य की वर्गपक्षधरता और सौन्दर्याभिरूचियों पर निर्भर करता है। परंतु यदि सामाजिक नज़रिए से देखा जाए तो मोटे तौर पर यह कसौटी निर्धारित की जा सकती है जो विचार अंतत्वोगत्वा संपूर्ण मानव समाज या अधिकतर हिस्से के हितों के अनुरूप हो तो वह शिव है, सुंदर है जबकि जो विचार व्यक्तिगत हितों और प्रभुत्व प्राप्त समूहों के हितों के अनुरूप हो वह अशिव है, असुंदर है।
अब होता यह है कि प्रभुत्व/सत्ता प्राप्त समूह, चूंकि सारे साधन उनकी पहुंच और प्रभाव में होते हैं, ऐसे विचारों और विचारधाराओं का प्रचार और पक्षपोषण करता है जो उनके हितों के अनुरूप हों या ख़िलाफ़ नहीं जाते हों। अंतत्वोगत्वा समाज में और प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छाएं रखने वालों में इन्हीं विचारों का बोलबाला हो जाता है, और सभी क्षेत्रों की सृजनात्मकता और रचनात्मकता इसी प्रभुत्व प्राप्ति के आकांक्षा के साथ गर्भनालबद्ध हो जाती हैं।
उपरोक्त जिज्ञासा को, इसकी पश्चोक्त विकृतियों को इसी नज़रिए के साथ विश्लेषित करना चाहिए।

दरअसल किसी भी क्रिया को बेहतर तरीके से करने की प्रवृति मनुष्य के सौन्दर्यबोध पर निर्भर करती है। एक समुचित और उच्चतर सौन्दर्यबोध का विकास और निर्माण मनुष्य के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया या व्यवहार को सचेत नियंत्रित और निर्देशित करता है।
सौन्दर्यबोध यानि सुंदरता का अहसास, सौन्दर्य के आदर्श प्रतिमानों की समझ, हर वस्तु, क्रिया या विचारों का उन प्रतिमानों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण, सुंदर और असुंदर के बीच तार्किक विभेद स्थापित कर सकने की योग्यता और साथ ही मनुष्य की संवेदनाओं का सौन्दर्य के हित और हेतु परिष्कार।
सौन्दर्यबोध मनुष्यों को हर क्रिया को बेहतर रूप से करने, आदर्श रूप में करने के लिए सचेत प्रेरित करता है, मनुष्यों के विचारों को बेहतरी की ओर अग्रसर करता है। स्वयं को और बेहतर, पर्यावरण और दुनियां को और बेहतर बनाने में मनुष्य की दिशा तय करता है।
जाहिर है एक उत्तम सौन्दर्यबोध का निर्माण और विकास, सिर्फ़ एक निश्चित क्रियाकलाप तक अपने आपको सीमित नहीं रख सकता, यह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में अपनी श्रेष्ठता के साथ सक्रिय रहने की क्षमता प्रदान करता है।
००००००००००००००००००००००००००००००

आज इतना ही...
अगली बार कुछ और नयी जिज्ञासाएं.......

समय

4 टिप्पणियां:

श्यामल सुमन ने कहा…

विचारों से भरा आलेख। वाह।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

kaustubh ने कहा…

सही बात है । ऐसे विरोधाभास आज समाज में जगह-जगह नजर आ जाते हैं । ड्राइंग रूम में तो आदमी एथनिक कलेक्शन सजाता है, हैंडीक्राफ्ट दीवारों पर टांगता है, पर खुद अपनी जड़ों से ही जुदा होता जा रहा है । खुद को हाईफाई दिखाने के लिए । यह दोहरापन इतना गहरा है कि अचानक खुद पर नजर डाले तो शायद आदमी खुद को ही न पहचान पाए ।
कोलाहल से कौस्तुभ

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

"जाहिर है एक उत्तम सौन्दर्यबोध का निर्माण और विकास, सिर्फ़ एक निश्चित क्रियाकलाप तक अपने आपको सीमित नहीं रख सकता, यह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में अपनी श्रेष्ठता के साथ सक्रिय रहने की क्षमता प्रदान करता है।"

"अब होता यह है कि प्रभुत्व/सत्ता प्राप्त समूह, चूंकि सारे साधन उनकी पहुंच और प्रभाव में होते हैं, ऐसे विचारों और विचारधाराओं का प्रचार और पक्षपोषण करता है जो उनके हितों के अनुरूप हों या ख़िलाफ़ नहीं जाते हों। अंतत्वोगत्वा समाज में और प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छाएं रखने वालों में इन्हीं विचारों का बोलबाला हो जाता है, और सभी क्षेत्रों की सृजनात्मकता और रचनात्मकता इसी प्रभुत्व प्राप्ति के आकांक्षा के साथ गर्भनालबद्ध हो जाती हैं।"


इतना समझने के बाद फिलहाल कोई सवाल नहीं है।

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

फ़ेसबुक से गुजरते हुए यहाँ प्रेमविषयक सभी आलेख फिर से पढ़े। …जीवन के हर पहलू में श्रेष्ठता का अर्थ मुझे लग रहा है कि आदमी घर के सामान भी ढंग से, एक अलग अन्दाज में रखता है, किताबों को भी सलीके से पढ़ता है, हर काम वह सिस्टमेटिक, सिलसिलेवार या बेतरतीबी से नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से करता है…

एक टिप्पणी भेजें

अगर दिमाग़ में कुछ हलचल हुई हो और बताना चाहें, या संवाद करना चाहें, या फिर अपना ज्ञान बाँटना चाहे, या यूं ही लानते भेजना चाहें। मन में ना रखें। यहां अभिव्यक्त करें।

Related Posts with Thumbnails

ताज़ातरीन प्रविष्टियां