शनिवार, 14 मई 2011

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में अनैच्छिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम ऐच्छिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



ऐच्छिक स्मरण - १
( voluntary memorization )

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) किसी वस्तु को स्मृति में अंकित कर लेने की ओर लक्षित विशेष स्मृतिक क्रियाओं का उत्पाद है। इन क्रियाओं की उत्पादकता लक्ष्यों, अभिप्रेरकों और लक्ष्य-प्राप्ति के साधनों की विशिष्टता पर भी निर्भर होती है। विशेष अध्ययनों ने दिखाया है कि ऐच्छिक स्मरण की एक मुख्य पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) सामग्री को सही-सही, पूर्णतः और समुचित क्रम में याद कर लेने के कार्यभार ( assignment ) का स्पष्ट निर्धारण है। विभिन्न स्मरणात्मक लक्ष्य, स्मरण की प्रक्रिया के स्वरूप तथा उचित प्रणालियों के चयन को प्रभावित करते है और इसीलिए प्राप्त परिणामों को भी प्रभावित करते हैं।

एक प्रयोग में छात्रों से दो कहानियां याद कर लेने को कहा गया। उन्हें बताया गया कि पहली कहानी अगले दिन पूछी जाएगी और दूसरी लंबे समय तक याद रखनी होगी। वास्तव में दोनों कहानियां चार सप्ताह बाद पूछी गईं। पाया गया कि दूसरी कहानी, पहली कहानी की अपेक्षा बेहतर याद रही। विदित है कि केवल परीक्षा पास करने के लिए याद की गई सामग्री, दॄढ़ और दीर्घकालिक धारण के लक्ष्य के अभाव में बहुत जल्दी ही भूल जाती है।

इस तरह स्मरणात्मक कार्यभार की भूमिका को, याद करने के इरादे तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। विभिन्न स्मरणात्मक कार्यभार सामग्री, उसकी अंतर्वस्तु, संरचना, भाषागत रूप, आदि के प्रति विभिन्न रवैये पैदा करते हैं और इस तरह से स्मरण की यथानुरूप प्रणालियां तय कर देते हैं।

स्मरण के अभिप्रेरक ( motivational ), ऐच्छिक स्मरण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। छात्र ह्रदयगंम और याद कर ली गई सामग्री को बहुत जल्दी भूल भी सकते हैं, यदि वह उनके लिए दीर्घकालिक महत्त्व की नहीं है। जिन लोगों में कर्तव्य और उत्तरदायित्व की भावना कम होती है, वे अवश्य याद रखी जानेवाली चीज़ों में से प्रायः बहुत कुछ को भूल जाते हैं।

फलप्रद ऐच्छिक स्मरण की सबसे मुख्य शर्त, युक्तिसंगत ( rationalize ) स्मरण तकनीकों ( memorization techniques ) का समुचित प्रयोग है। ज्ञान तथ्यों, संकल्पनाओं और निर्णयों की एक निश्चित पद्धति है। उन्हें याद करने के लिए यह आवश्यक है कि हम कुछ शब्दार्थ इकाइयों को अलग कर लें, उनके बीच संबंध कायम करें और चिंतन की कमोबेश विकसित प्रक्रियाओं से जुड़ी तार्किक प्रणालियां इस्तेमाल करें। समझ तार्किक, सचेत स्मरण की आवश्यक शर्त है। सामग्री को यदि समझ लिया गया है, तो वह अधिक सहजता से याद हो जाती है और स्मृति में अधिक देर तक सुरक्षित रहती है, क्योंकि वह पहले से आत्मसात्कृत ज्ञान से, मनुष्य के विगत अनुभव से सार्थक रूप से जुड़ गई होती है। इसके विपरीत अस्पष्ट या न समझी गई सामग्री सदा एक ऐसी चीज़ होती है कि जो मनुष्य की चेतना की अंतर्वस्तु से अलग है और उसके विगत अनुभव से कोई ठोस संबंध नहीं रखती। सामग्री यदि समझ में नहीं आती, तो मनुष्य आम तौर पर उसमें विशेष रुचि नहीं दिखाता

तार्किक स्मरण की एक मुख्य प्रणाली याद की जानेवाली सामग्री की योजना बनाना है। इसमें तीन चरण होते हैं : सामग्री को घटकों ( ingredients ) में बांटना ; उन्हें उपयुक्त शीर्षों ( headings ) के अंतर्गत वर्गीकृत करना अथवा किसी दिये हुए भाग को सारी अंतर्वस्तु से आसानी से संबद्ध कुछ आधारभूत मुद्दों के गिर्द व्यवस्थित करना ; और आधारभूत मुद्दों को साहचर्यों की एक अविभाज्य श्रृंखला में जोड़ना। अलग-अलग विचारों और प्रस्थापनाओं का शब्दार्थमूलक घटकों में समेकन, सामग्री की कुल मात्रा में कमी किये बिना, याद की जानेवाली इकाइयों की संख्या घटा देता है। सामग्री को याद करना इसलिए भी आसान हो जाता है कि योजना सामग्री को एक सुव्यवस्थित और सुविभाजित रूप दे देती है और इस तरह वह पढ़ने के चरण में ही समझ में आ जाने योग्य बन जाती है।

सामग्री के स्मरण के लिए, समझने में मदद करनेवाली योजना के विपरीत निर्मित योजना सभी छोटे मुद्दों को अलग-अलग कर देती है और शीर्ष ( headings ) केवल उसे दिखाते या याद दिलाते हैं जिसे पुनर्प्रस्तुत किया जाना है ( जिसकी वज़ह से वे प्रायः आंशिक या अधूरे होते हैं )।

तार्किक स्मरण के लिए तुलना ( comparison ) और विशेषतः वस्तुओं के बीच अंतरों ( differences ) पर दिये जाने वाले बल बहुत महत्त्व रखते हैं। वस्तुओं के बीच जितने ही स्पष्ट अंतर होंगे, स्मृति में वे उतनी ही जल्दी तथा दृढ़तापूर्वक अंकित हो जाएंगी। इस कारण शुरूआत सदा स्पष्ट अंतरोंवाली वस्तुओं की तुलना से करनी चाहिए और इसके बाद ही कम स्पष्ट ब्योरों पर आना चाहिए। इसी तरह, जब सामग्री का तार्किक संसाधन ( logical processing ) व्यापक बिंबमूलक संबंधों ( image-oriented relations ) के आधार पर किया जाता है, स्मरण अधिक सार्थक तथा दीर्घकालिक बन जाता है। अतः जहां भी संभव हो, स्मरण की जानेवाली सामग्री को समुचित बिंबों से संबद्ध किया जाना चाहिए।

स्मरण का एक मुख्य तरीक़ा सामग्री की पुनर्प्रस्तुति और अपने को सुनाना है। किंतु यह प्रणाली, सामग्री को ह्रदयंगम करने के बाद ही अपनानी चाहिए, ख़ास तौर पर यदि सामग्री दुर्बोध है। सामग्री को अपने शब्दों में दोहराने से उसे बेहतर समझने में मदद मिलती है। यदि सामग्री को ठीक से नहीं समझा गया है, तो यह उसे दोहराने में अटपटी, ‘परायी’ भाषा के इस्तेमाल में प्रकट हो जाता है। दूसरी ओर, यदि उसे समझ लिया गया है, तो उसे आसानी से ‘अपनी’ भाषा में ढ़ाल लिया जाता है। इस तरह से बोलकर सुनाकर हम अपनी कमजोरियां सामने लाते हैं और अपने पर नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं। यह पुनर्प्रस्तुति, प्रत्यास्मरण की योग्यता ही है जो हमें अपने ज्ञान के बारे में आवश्यक आत्म-विश्वास प्रदान करती है



अगली बार भी ऐच्छिक स्मरण पर ही चर्चा जारी रहेगी।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अरे!
ये तो अपने साथ बहुत होता है। हम तो इसी लिए कम नंबर पाते थे कि रट्टा नहीं लगता था। पर जो याद हो गया वो जिन्दगी भर के लिए। अब भी मौके बे मौके रिकार्डरूम से निकल कर आ जाता है।

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