शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

इच्छाशक्ति ( volition, will power )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



इच्छाशक्ति ( volition, will power )
व्यक्ति की क्रियाशीलता का एक रूप

इच्छाशक्ति, मनुष्य द्वारा अपनी सक्रियता और व्यवहार का सचेतन संगठन व स्वतःनियमन है, ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में सामने आनेवाली कठिनाइयों को लांघा जा सकेइच्छाशक्ति मनुष्य की क्रियाशीलता का एक विशिष्ट रूप और स्वेच्छा से निर्धारित लक्ष्यों द्वारा निदेशित उसके व्यवहार के संगठन का एक प्रकार है। इच्छाशक्ति की उत्पत्ति श्रम के दौरान होती है, जब मनुष्य प्रकृति के नियमों का ज्ञान प्राप्त करता है और इस तरह उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बदलता है।

इच्छाशक्ति दो परस्परसंबद्ध कार्य करती है : अभिप्रेरणात्मक ( motivational ) और प्रावरोधात्मक ( prohibitory )।

अभिप्रेरणात्मक कार्य का मूल मनुष्य की क्रियाशीलता में है। प्रतिक्रियाशीलता ( reactivity ) के विपरीत, जब मनुष्य की क्रिया पूर्ववर्ती स्थिति पर निर्भर होती है ( बुलाए जाने पर मुड़कर देखना, अपनी ओर फेंकी गई गेंद को वापस फेंकना, बेहूदी बात पर नाराज़ होना, वगै़रह ), क्रियाशीलता क्रिया को जन्म मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के विशिष्ट स्वरूप के कारण देती है, जो अपने को क्रिया के निष्पादन ( execution ) के क्षण में प्रकट करती है ( उदाहरण के लिए, आवश्यक सूचना पाने के लिए मनुष्य अपने साथी को बुलाता है, या अच्छी मनःस्थिति में न होने के कारण बेहूदगी से बात करता है, वगै़रह )।

क्षेत्र व्यवहार के विपरीत, जिसकी विशेषता अनैच्छिकता है, क्रियाशीलता में संकल्प का तत्व होता है, यानि वह किसी सचेतन लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट ( directed ) होती है। क्रियाशीलता का वर्तमान स्थिति द्वारा, इसकी मांगों को पूरा करने और निर्धारित सीमाओं के भीतर काम करने की इच्छा द्वारा उत्प्रेरित होना आवश्यक नहीं है। इसका स्वरूप स्थिति-निरपेक्ष होता है, यानि वह आरंभिक लक्ष्यों की सीमाओं को लांघती है और उसमें मनुष्य की दत्त स्थिति की अपेक्षाओं के सार से ऊपर उठने तथा आरंभिक लक्ष्यों से ऊंचे लक्ष्य रखने की योग्यता ( उदाहरणार्थ, ‘जोखिम के लिए जोखिम उठाना’, सृजनात्मक उत्साह, आदि ) महत्त्व रखती है।

मनुष्य की सामाजिक क्रियाशीलता की एक अभिव्यक्ति उसका सामान्य कर्तव्य-बोध से ऊपर उठकर ऐसे कार्यकलाप में प्रवृत्त होना है, जो उसके अपने लिए आवश्यक नहीं है ( यदि उसे वह नहीं करता है, तो कोई इसके लिए उसपर उंगली नहीं उठाएगा ), मगर जो सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप है।

संकल्पात्मक प्रक्रियाओं ( volitive processes ) की एक और विशेषता है, जो इच्छाशक्ति के अभिप्रेरणात्मक कार्य के रूप में सामने आती है। यदि मनुष्य के लिए कोई ऐसा कार्य करना तत्काल ज़रूरी नहीं है, जिसकी वस्तुपरक आवश्यकता ( objective need ) को वह समझता है, तो इच्छाशक्ति कुछ अतिरिक्त अभिप्रेरण ( motive ) पैदा कर देती है, जो उस कार्य के अर्थ को बदल देते हैं और मनुष्य को उसके परिणामों का पूर्वानुमान लगाने को प्रेरित करके उसे और अधिक महत्त्वपूर्ण बना डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक स्कूल की बालीबाल की टीम का कप्तान यदि थका हुआ है, तो अपनी बची-खुची ताक़त जुटाकर अभ्यास के लिए शहर के दूसरे छोर पर स्थित जिम में जाने में वह कठिनाई महसूस कर सकता है। फिर भी जब वह सोचता है कि उसकी टीम की की सफलता और उसके स्कूल की प्रतिष्ठा उसकी कप्तान के रूप में तैयारी पर निर्भर है, तो वह अपनी सारी इच्छाशक्ति जुटा लेता है और कठिन कार्य के लिए एक अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा कर डालता है।

इच्छाशक्ति का प्रावरोधात्मक कार्य अभिप्रेरणात्मक कार्य से एकता बनाए रखते हुए अपने को क्रियाशीलता की अवांछित अभिव्यक्तियों को रोकने में प्रकट करता है। मनुष्य सामान्यतः अपने अभिप्रेरकों और कार्यों पर अंकुश लगा लेता है, जो उसके विश्व-दृष्टिकोण, विचारों और विश्वासों से मेल नहीं खाते। अवरोध के बिना व्यवहार का नियमन असंभव होता। ‘प्रावरोधात्मक आदतों’ का विकास परिपक्व और सुरुचीपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण के लिए एक आवश्यक शर्त है। शिक्षकों को बच्चों में अपनी अति-चंचलता, बातूनीपन और शोर-शराबे को नियंत्रित करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। यह नियंत्रण बच्चे के शरीर के लिए उपयोगी है, सुरुचि का सूचक है और सामूहिक जीवन की अपेक्षाओं के अनुकूल है।

मनुष्य की कार्य करने की प्रेरणा बुनियादी आवश्यकताओं ( भोजन, वस्त्र तथा आवास ) से लेकर नैतिक, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक आवश्यकताओं तक विभिन्न अभिप्रेरकों के सोपानतंत्र का प्रतिनिधित्व करती है। इच्छाशक्ति का प्रयोग करके मनुष्य अपने निम्नतर अभिप्रेरकों पर, जिनमें कुछ जीवनावश्यक अभिप्रेरक भी हैं, अंकुश लगाता है और उच्चतर अभिप्रेरकों को बढ़ावा देता है। अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

3 टिप्पणियां:

रेखा ने कहा…

अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।
सार्थक चिंतन ....

रविकर ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
शुभ-कामनाएं ||

http://neemnimbouri.blogspot.com/2011/10/blog-post_15.html

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

कुछ बेहतर बातें और समझीं।

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