शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

प्रेम की भावना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में आवेश पर विचार किया था, इस बार हम प्रेम की भावना पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रेम की भावना

बहुत-सी ऐसी स्थायी भावनाएं ( आवेश में बदलनेवाली और न बदलनेवाली स्थायी भावनाएं ) होती हैं कि जिनके दायरे में मनुष्य के सभी विचार और इच्छाएं आ जाती हैं और जिन्हें उसके संवेगात्मक क्षेत्र की अनन्य विशेषताएं कहा जा सकता है। उनमें एक प्रमुख भावना, विशेषतः युवावस्था में, प्रेम की भावना है, जिसे एक स्थायी संवेग माना जा सकता है। अपने व्यापक अर्थ में, यानि एक सामान्य संकल्पना ( general concept ) के अर्थ में प्रेम एक अत्यंत प्रबल सकारात्मक संवेग है, जो अपने लक्ष्य ( वस्तु अथवा व्यक्ति ) को अन्य सभी लक्ष्यों से अलग कर लेता है और उसे मनुष्य की जीवनीय आवश्यकताओं एवं हितों के केंद्र में रखता है। मातृभूमि, संगीत, मां, बच्चों आदि से प्रेम इस कोटि में आता है।

संकीर्ण अर्थ में, यानि एक विशिष्ट संकल्पना ( specific concept ) के अर्थ में प्रेम मनुष्य की एक प्रगाढ़ ( dense ) तथा अपेक्षाकृत स्थिर भावना है, जो शरीरक्रिया की दृष्टि से यौन आवश्यकताओं ( sexual needs ) की उपज होती है और अपनी महत्त्वपूर्ण वैयक्तिक ( individual ) विशेषता द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में इस ढंग से अधिकतम स्थान पा लेने की इच्छा में व्यक्त होती है कि उस व्यक्ति में भी वैसी ही प्रगाढ़ तथा स्थिर जवाबी भावना रखने की आवश्यकता पैदा हो जाए। प्रेम की अनुभूति अत्यंत निजी अनुभूति है और उसके साथ स्थिति के मुताबिक़ पैदा होने और बदलने वाले स्नेह तथा हर्षोन्माद जैसे संवेग, उत्साह अथवा अवसाद की मनोदशा और कभी-कभी उल्लास अथवा दुख जैसे भाव पाए जाते हैं। मनुष्य की यौन आवश्यकता, जो अपने अंतिम विश्लेषण में वंश की वृद्धि सुनिश्चित करती है, और प्रेम, जो मनुष्य को वैयक्तिकरण ( personalization ) के लिए, यानि अपने लिए महत्त्वपूर्ण दूसरे व्यक्ति ( प्रेम के पात्र ) में जारी रहने तथा भावात्मकतः प्रतिनिधीत होने के लिए इष्टतम अवसर प्रदान करनेवाली सर्वोच्च भावना है - इन दोनों का विलयन ( merger ), परावर्तन में उनके एक दूसरे से पृथक्करण ( separation ) को लगभग असंभव बना डालता है।

इस तरह प्रेम की भावना का द्वैध ( duplex ) स्वरूप होता है। किंतु अनेक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संप्रदायों ने उसके शारीरिक ( physical ) और ‘आत्मिक’ ( spiritual ) पहलुओं में से किसी एक पहलू को ही सब कुछ सिद्ध करने का प्रयत्न किया। प्रेम को या तो केवल कामवृत्ति का पर्याय मान लिया गया ( जो समकालीन मनोविज्ञान की बहुसंख्य धाराओं के लिए ही नहीं, अपितु आधुनिक बाजारवादी संस्कृति के लिए भी लाक्षणिक है ), या फिर उसके शारीरिक पहलू को नकारकर अथवा महत्त्वहीन बताकर उसे मात्र एक ‘आत्मिक’ भावना का दर्जा दे दिया गया ( इसकी अभिव्यक्ति ईसाई धर्म द्वारा ‘प्लेटोनिक’ प्रेम को उचित ठहराने और शारीरिक प्रेम को निकृष्ट, गंदा तथा पापमय कर्म सिद्ध करने में देखी जा सकती है )। सत्य यह है कि शारीरिक आवश्यकताएं निश्चय ही पुरुष तथा स्त्री के बीच प्रेम की भावना के पैदा होने तथा बने रहने की एक पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है, किंतु अपनी अंतरंग ( intimate ) मानसिक विशेषताओं की दृष्टि से प्रेम एक समाजसापेक्ष भावना हैं क्योंकि मनुष्य के व्यक्तित्व में शारीरिक तत्व दब जाता है, बदल जाता है और सामाजिक रूप ग्रहण कर लेता है।

किशोर-प्रेम अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण विशेष महत्त्व रखता है।  निस्संदेह, वयस्कों ( adults ) के प्रेम की भांति ही किशोर वय ( teenager ) में किया जानेवाला प्रेम भी शरीरक्रिया की, यौन आवश्यकता की उपज होता है। फिर भी आरंभिक यौवनावस्था तथा ख़ासकर किशोरावस्था का प्रेम, वयस्क प्रेम से बहुत भिन्न होता है। आम तौर पर किशोर इसके मूल में निहित आवश्यकताओं के बीच स्पष्ट भेद नहीं कर पाते और यह भी पूरी तरह नही जानते कि उन्हें तुष्ट कैसे किया जाता है। कभी-कभी वयस्क लोग ( शिक्षक, माता-पिता, परिचित लोग, आदि ) प्रेमी-युगल के संबंधों को देखकर अनजाने ही उनमें अपने निजी यौन अनुभव आरोपित ( superimposed ) कर बैठते हैं ; प्रेमी-युगल प्रायः महसूस कर लेता है कि बड़े लोग उसके संबंधों को ग़लत दृष्टिकोण से देख रहे हैं और इसलिए पूछताछ किए जाने पर किशोर अविश्वास, अवमानना तथा धृष्टतापूर्वक उत्तर देता है और नैतिक भर्त्सना से बचने की कोशिश करता है। यद्यपि इस आयु में प्रेम वस्तुपरक ( objective ) रूप से कामेच्छा पर आधारित होता है, प्रेमियों के व्यवहार का स्वरूप प्रायः कामेच्छा की बात को नकारता है। कतिपय अदूरदर्शी शिक्षक किशोरों के प्रेम को अनुचित, निंदनीय और ‘प्रतिबंधित’ ठहराकर आपस में प्रेम करनेवाले किशोर लोगों को अपने को शेष समूह से अलग-थलग कर लेने और अपने अंतरंग संबंधों के दायरे में और भी ज़्यादा सिमट जाने को बाध्य कर देते हैं।

मनोविज्ञान में एक समेकित पद्धति के नाते प्रेम की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने और इसके विभिन्न घटकों का व्यक्ति की विभिन्न विशेषताओं से संबंध जानने के बहुसंख्य प्रयत्न किए गए हैं। इस क्षेत्र में एक सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मनुष्य की प्रेम करने की योग्यता और स्वयं अपने प्रति उसके रवैये के बीच मौजूद संबंध को जानना था। यह और बहुत-सी अन्य खोजें और विवाह तथा परिवार में प्रेम की बुनियादी भूमिका मनश्चिकित्सा, शिक्षा और मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था में प्रेम संबंधी समस्याओं के महत्त्व को बढ़ा देती हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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