शनिवार, 30 जून 2012

मानसिकताओं में परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया है

हे मानवश्रेष्ठों,

कुछ समय पहले एक मानवश्रेष्ठ से उनकी कुछ समस्याओं पर एक संवाद स्थापित हुआ था। कुछ बिंदुओं पर अन्य मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण करने के उद्देश्य से, इस बार उसी संवाद से कुछ सामान्य अंश यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह बताना शायद ठीक रहे, कि संवाद के व्यक्तिगत संदर्भों को हटा कर यहां सार्वजनिक करने के लिए उनकी पूर्वानुमति प्राप्त कर ली ही गई है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



( संवाद में उन मानवश्रेष्ठ की बातों को एकाध जगह अलग रंग में सिर्फ़ संक्षिप्त रूप में दिया जा रहा है, ताकि बात का सिरा थोड़ा पकड़ में आ सके। बाकी जगह सिर्फ़ समय  के कथनों के अंश है। कुछ जगह संपादन भी किया गया है अतः लय टूट सकती है। )

मैं भी एक हिंदी ब्‍लॉगर हूं और नेट पर मनोविज्ञान से संबंधित सामग्री सर्च करते हुए आपके ब्‍लॉग तक पहुंचा.....मैं स्‍वयं भी बड़ी भयंकर मानसिक समस्‍याओं से जूझ रहा हूं.....क्‍या आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं....

यह कहा जा सकता है, कि आप मानसिक समस्याओं से नहीं जूझ रहे हैं। मतलब यह है कि आप इसे गलत ही मानसिक समस्याओं की संज्ञा दे रहे हैं। आपकी अभी तक की सक्रियता और चिंतन से प्राप्त समझ के कारण आपके मन में परंपरा से प्राप्त कई चीज़ों के प्रति कई अंतर्विरोध पैदा हो गये हो सकते हैं। और इसी वज़ह से हो सकता है ये आपकी मनुष्य को, विश्व को, उनके सापेक्ष अपने आप को और अधिक तथा बेहतरी से समझने की पैदा हो गई भूख और जिज्ञासा से संबंधित हो।

इसमें शायद हम एक-दूसरे की कुछ मदद कर सकते हैं, जरूर कर सकते हैं और करनी ही चाहिए। आखिर आपसदारी और सहकार ही नई राह निकालने की संभावनाएं रखते हैं।

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आप कहीं से भी, कैसे भी संवाद शुरू करिए। लंबे मेल भी लिख सकते हैं। कई बार तो अपनी गुत्थियों को लिखते समय ही, उनसे तरतीबी से जूझने से ही, उन्हें पेश करने की जद्दोज़िहद में ही हम ऐसा महसूस कर सकते हैं कि कुछ गुत्थियां अपने आप सुलझ रही हैं, उन्हें देखने की नई दृष्टि मिल रही है।

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साधारण हो जाना ही, सबसे असाधारण घटना होती है और हमें हमेशा इसका मुरीद तथा इस हेतु प्रवृत्त रहना चाहिए।

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मानसिकताओं में परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया है और व्यवहार में बदलाव और भी धीमी प्रक्रिया। और यह भी कि, यह हमेशा ही सही भी नहीं होता, कभी-कभी कोई अचानक सी चिलकन भी हमारी सोच प्रक्रिया और व्यवहार को अच्छा ख़ासा सा झटका दे जाती है।

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आप व्यवसायिक विशेषज्ञों से राय लेते रहने में कोई कोताही ना बरते, जब भी मौका मिलता है मिलते रहने में कोई हर्ज़ नहीं। हां, यह बात जरूर कहना चाहेंगे कि इस हेतु किसी भी तरह की  गोली-दवाइयों से बचें। इनकी व्यर्थता आप जानते ही हैं, मनोविशेषज्ञ आधारभूत रूप से मौखिक काउनस्लिंग के लिये होते हैं, परंतु अधिकतर ख़ुद ही मानसिक परिपक्वता की पहुंच से दूर होते हैं तथा ना उनके पास और नाही उनके मरीज़ों के पास इतना समय होता है कि वे लंबी मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रक्रियाओं में इसे जाया कर सकें। साथ ही अक्सर मरीज भी अपनी मानसिक अवस्थाओं की वास्तविकताओं को नंगा करने में परहेज बरतते हैं। इन सब परिस्थितियों के चलते गोली-दवाइयों से काम चलाते रहना उनका व्यवसायिक हथकंड़ा हो जाता है। उद्देश्य साफ़ है, मानसिक समस्या है, मतलब दिमाग चलता है, ज़्यादा सोचता है, उसे ही सुन्न कर दिया जाए। अधिकतर समय मस्तिष्क सुन्न रहेगा, इस तरह उसकी प्रक्रियाएं शांत या धीमी रहेंगी और फलस्वरूप व्यक्ति अपने आप को ठीक सा महसूस करेगा और अंततः इन ड्र्ग्स का आदी हो जाएगा। व्यवसाय फलीभूत होता रहेगा।

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जब सवाल एक दम तय और सुनिश्चित नहीं होते तो उनके जवाबों की प्रक्रिया का भी अनिश्चित होना लाजमी है। हमें धेर्य बनाए रखना होगा। ज़िंदगी के इतने लंबे अनुकूलन की समस्याओं के बाद तुरत निपटारे की मांग कभी जायज़ नहीं होती और संभव भी। हमारी सचेत सक्रियता ही राह निकालेगी।

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ब्‍लॉग को मेरे व्‍यक्तित्‍व में झांकने का कोई बहुत बड़ा जरिया ना समझें....

सही कहा आपने, कि यह बहुत बड़ा जरिया नहीं है। कितु यह भी हमारी सक्रियता का हिस्सा है, और यहां उद्धृत्त विचार और समझ हमारे इसी मस्तिष्क से निसृत होते हैं। अतएव यह हमारे कुल का परावर्तन भले ही ना हो, परंतु हमारी समझ के एक कोने का परावर्तन तो है ही। इसलिए यह हमारा ही हिस्सा होता है। अतएव आप इसमें अभिव्यक्त हिस्से को अपने उस हिस्से के बरअक्स रखकर देखें जिसे आप अपनी समस्या समझते हैं। प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिलेगी।

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हमारी ज़िंदगी में यह बहुत ही बड़ा अंतर्विरोध होता है। हमारे पास आदर्शों की अलग फहरिस्त होती है, और व्यवहारिकता की अलग। हम इनके अलग-अलग कोने बना लेते हैं, और इनके बीच अंतर्संबंध ( co-relation ) विकसित होने ही नहीं देते। और यही हमारे व्यवहार के अंतर्विरोधों को जन्म देती हैं। जीवन की ठोस परिस्थितियों के बीच की व्यवहारिकता के मानदंड हमारी व्यक्तिगतता को सुनिश्चित करते हैं, और अव्यवहारिक आदर्शों का आभामंड़ल हमारे सार्वजनिक व्यवहार के दिखावटी आलोक को तय करता है।

जो इन चीज़ों को समझने लगते हैं, अपने व्यवहार के इन अंतर्द्वंदों को देखने की क्षमताओं में आ जाते हैं, उनकी चेतना की ईमानदारी इस कारण एक क्षोभ पैदा करने लगती है।

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मैं कुछ समय से पाजिटिव थिंकिंग पर एक पुस्तक पढ़ रहा हूं.....

यह हमने नहीं पढ़ी है इसलिए इस पर कुछ खास नहीं कह सकते। पर यह हम जरूर जानते हैं कि व्यवसायिकता और व्यक्तिवादिता के इस माहौल में जो ऊपर उल्लिखित अंतर्द्वंद हमारी ज़िंदगी में पैदा होते हैं, इस तरह की पुस्तकें उनका तथ्यात्मक चित्रण तो भली-भांति करती हैं ( और इसीलिए हमें यह सत्य के आलोक से भरी नज़र आती हैं और प्राथमिकतः बड़ी ही प्रभावित करती हैं ) पर परिस्थितियों के वस्तुपरक विश्लेषण की जगह यह आत्मपरक विश्लेषण की राह पकड़ती हैं और व्यक्ति को अंतर्निरीक्षण की आत्मगत राह सुझाती है और सफ़लताओं के अपवादों के बरअक्स हमें काल्पनिक प्रभामड़लों में उलझाती हैं और हमारे व्यक्तित्व को सच्चाईयों को स्वीकारने और परिस्थितियों को बदलने की राह दिखाने की बजाए, सिर्फ़ उनसे पेश आने का तरीका सीखाना चाह कर हमारे व्यक्तित्व के दोगलेपन को और उभारती हैं।

मानसिकताएं परिस्थितियों और व्यवहारिक सक्रियता की उपज होती हैं, जाहिर है परिस्थितियों और व्यवहारिक सक्रियता में बदलाव के जरिए ही उनमें ठोस परिवर्तन देखा जा सकता है।

सकारात्मक दृष्टिकोण रखने का मतलब सिर्फ़ बेहतर परिस्थितियों का चुनाव और विपरीत परिस्थितियों से भी सकारात्मक पहलुओं का चुनाव ही नहीं होता। वरन निरंतर अध्ययन और व्यवहारिक चिंतन के जरिए अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार करते रहना भी है ताकि हम परिस्थितियों का सही विश्लेषण करना सीख सकें, सही लक्ष्यों का चुनाव कर सकें, बेहतर योजनाएं बना सकें जिससे हम अपने जीवन में इच्छित परिणाम प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ाते रह सकें।

सिर्फ़ परिस्थितियों के गुलाम और उन पर निर्भर रहने के बजाए, अनुकूल परिवेश और परिस्थितियों का निर्माण करना सीखना भी सकारात्मक दृष्टिकोण का महती लक्ष्य होता है।



इस बार इतना ही। अगली बार इसी संवाद के कुछ और अंश प्रस्तुत किए जाएंगे।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

5 टिप्पणियां:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

अत्यंत उपयोगी पोस्ट है यह. इसके लिए आपका कोटिशः आभार.
औषधियों की व्यर्थता के बारे में मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ. अपनी कतिपय समस्याओं के समाधान के लिए मैंने परिवेश में सुधार और परिस्तिथियों के निर्माण करने की दिशा में ही कार्य किया है.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

उपयोगी पोस्ट लगी।

Pallavi saxena ने कहा…

मानसिकताओं में परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया है और व्यवहार में बदलाव और भी धीमी प्रक्रिया। और यह भी कि, यह हमेशा ही सही भी नहीं होता, कभी-कभी कोई अचानक सी चिलकन भी हमारी सोच प्रक्रिया और व्यवहार को अच्छा ख़ासा सा झटका दे जाती है आपकी इस बात से पूर्णतः सहमति है बाकी आँय बातें भी अपनी जगह सही है। जानकारी पूर्ण एवं उपयोगी पोस्ट है। विचारणीय आलेख

सिद्धार्थ जोशी ने कहा…

आप व्यवसायिक विशेषज्ञों से राय लेते रहने में कोई कोताही ना बरते, जब भी मौका मिलता है मिलते रहने में कोई हर्ज़ नहीं। हां, यह बात जरूर कहना चाहेंगे कि इस हेतु किसी भी तरह की गोली-दवाइयों से बचें। इनकी व्यर्थता आप जानते ही हैं, मनोविशेषज्ञ आधारभूत रूप से मौखिक काउनस्लिंग के लिये होते हैं, परंतु अधिकतर ख़ुद ही मानसिक परिपक्वता की पहुंच से दूर होते हैं तथा ना उनके पास और नाही उनके मरीज़ों के पास इतना समय होता है कि वे लंबी मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रक्रियाओं में इसे जाया कर सकें। साथ ही अक्सर मरीज भी अपनी मानसिक अवस्थाओं की वास्तविकताओं को नंगा करने में परहेज बरतते हैं। इन सब परिस्थितियों के चलते गोली-दवाइयों से काम चलाते रहना उनका व्यवसायिक हथकंड़ा हो जाता है। उद्देश्य साफ़ है, मानसिक समस्या है, मतलब दिमाग चलता है, ज़्यादा सोचता है, उसे ही सुन्न कर दिया जाए। अधिकतर समय मस्तिष्क सुन्न रहेगा, इस तरह उसकी प्रक्रियाएं शांत या धीमी रहेंगी और फलस्वरूप व्यक्ति अपने आप को ठीक सा महसूस करेगा और अंततः इन ड्र्ग्स का आदी हो जाएगा। व्यवसाय फलीभूत होता रहेगा।


वर्ष 1999 में मैं ऐसा सोचता था। एक साइकोलॉजिस्‍ट थे सीएल पाठक साहब। उनका अब निधन हो चुका है। बहुत सुलझे हुए और मस्‍त इंसान थे। प्रोफेशनल नहीं थे, मैं उस दौर में साइकोलॉजी सार नहीं समझता था, लेकिन उनके साथ बैठने का बहुत फायदा हुआ। किसी के भी साथ चला जाता, बिना कारण ही... सर्दियों की गुनगुनी धूप में एक बार मैंने उनसे पूछा था कि शरीर परमाणुओं से बना है और परमाणु का अधिकांश हिस्‍सा खाली है। ऐसे में केवल नाभिकों और उनके चारों ओर घूम रहे इलेक्‍ट्रॉन सारी क्रियाएं करा रहे हैं, तब उन्‍होंने एक तरंग थ्‍योरी बताई थी। पूरा ब्रह्माण्‍ड तरंगों पर चलता है। ब्रह्माण्‍डीय तरंगों से लेकर फोटोन तक सबकुछ तरंग ही है...


आपने फिर मनोविज्ञान में फंसा दिया... मैं फिर से भाग खड़ा होने को उद्यत हूं... ;)

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

'पोजिटिव थिंकिंग' जैसी कुछ किताबें देखने को मिली हैं... वे वास्तव में व्यक्ति को व्यक्तिवादिता की ओर और समाज से कटकर सिर्फ पूँजीवादी सफल लोगों की ओर धकेलने में सारे पन्ने भरती हैं... और उनके लेखक करोड़पति बनते जा रहे हैं, जिनका बस एक ही काम है, कंपनियों और प्रोफेशनलों को ज्यादा लुटेरा बनाना, उदाहरण के लिए 'यू कैन सेल'... ...

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