शनिवार, 16 जून 2012

और तब ईश्वर का क्या हुआ? - 4


और तब ईश्वर का क्या हुआ?
स्टीवन वाइनबर्ग



( 1933 में पैदा हुए अमेरिका के विख्यात भौतिक विज्ञानी स्टीवन वाइनबर्ग, अपनी अकादमिक वैज्ञानिक गतिविधियों के अलावा, विज्ञान के लोकप्रिय और तार्किक प्रवक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में काफ़ी ठोस लेखन कार्य किया है। कई सम्मान और पुरस्कारों के अलावा उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है।

प्रस्तुत आलेख में वाइनबर्ग ईश्वर और धर्म पर जारी बहसों में एक वस्तुगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बखूबी उभारते हैं, और अपनी रोचक शैली में विज्ञान के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हैं। इस आलेख में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का जिक्र करते हुए, अवैज्ञानिक तर्कों और साथ ही छद्मवैज्ञानिकता को भी वस्तुगत रूप से परखने का कार्य किया है तथा कई चलताऊ वैज्ञानिक नज़रियों पर भी दृष्टिपात किया है। कुलमिलाकर यह महत्त्वपूर्ण आलेख, इस बहस में तार्किक दिलचस्पी रखने वाले व्यक्तियों के लिए एक जरूरी दस्तावेज़ है, जिससे गुजरना उनकी चेतना को नये आयाम प्रदान करने का स्पष्ट सामर्थ्य रखता है। )



अंतिम भाग
( और तब ईश्वर का क्या हुआ : पहला भागदूसरा भागतीसरा भाग )

कट्टरपंथियों और धार्मिक रूढ़िवादियों की अपेक्षा उदारपंथी, वैज्ञानिकों से अपने रुख़ में एक मायने में ज़्यादा दूर हैं। धार्मिक रूढ़ीवादी, वैज्ञानिकों की तरह, कम से कम जिन चीज़ों पर विश्वास करते हैं, उसके बारे में बतायेंगे कि ऐसा वे इसलिए करते हैं क्योंकि वही सत्य है, न कि इसलिए क्योंकि वह अच्छा है या ख़ुश करता है। लेकिन, बहुत सारे धार्मिक उदारपंथी यह सोचते हैं कि अलग-अलग लोग अलग-अलग परस्पर सम्बद्ध चीज़ों पर विश्वास कर सकते हैं, और उनमें से कोई भी गलत नहीं होता जब तक कि उनका विश्वास उनके काम आता है। एक पुनर्जन्म में विश्वास करता है तो दूसरा स्वर्ग और नरक में, तीसरा यह मान सकता है कि मृत्यु के बाद आत्मा समाप्त हो जाती है। लेकिन कोई भी तब तक गलत नहीं कहा जा सकता जब तक कि उन्हें इन विश्वासों में आध्यात्मिक संतोष की तेज़ धार मिलती है। सुसान सॉनटैग के मुहावरे में कहें- यह मुझे बर्ट्रेड रसेल के उस अनुभव की कहानी की याद दिलाता है, जब् १९१८ में युद्ध का विरोध करने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया था। जेल के नित्यकर्म के बाद जेलर ने रसेल से उनका धर्म पूछा। रसेल ने जवाब दिया कि वे अज्ञेयवादी हैं। कुछ क्षण के लिए जेलर भौंचक्का रह गया, फिर उसका चहरा खिला और वह बोल पड़ा- मेरा अनुमान है यह एकदम ठीक है। हम सभी एक ही ईश्वर की पूजा करते हैं। क्या ऐसा नहीं है?

वुल्फगैंग पॉली से एक बार पूछा गया कि क्या वे सोचते हैं कि वह अमुक अत्यंत कुविचारित शोध-पत्र गलत था। उन्होंने जवाब दिया कि ऐसा वर्णन उसके लिए काफ़ी नर्म होगा। वह शोध-पत्र तो गलत भी नहीं था। मैं सोचता हूं कि रूढ़ीवादी जिस पर विश्वास करते हैं वह गलत है। लेकिन कम से कम, विश्वास करने का मतलब क्या है, वे यह तो नहीं भूले। धार्मिक उदारवादी तो मुझे गलत भी नहीं लगते।

हम प्रायः सुनते हैं कि धर्म के संबंध में धर्मतत्व शास्त्र उतना महत्वपूर्ण नहीं है- महत्वपूर्ण है कि यह हमें जीवन में कैसे मदद करता है। घोर आश्चर्य। ईश्वर का अस्तित्व और उसकी प्रकृति, दया और पाप तथा स्वर्ग और नरक महत्वपूर्ण नहीं है। मेरा अंदाज़ है कि लोग अपने माने हुए धर्म के धर्मतत्वशास्त्र को इसलिए महत्वपूर्ण नहीं मानते क्योंकि वे ख़ुद यह स्वीकार नहीं कर पाते कि वे किसी में विश्वास नहीं करते। लेकिन पूरे इतिहास के दौरान और आज भी दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने एक् धर्मतत्वशास्त्र या दूसरे में विश्वास किया है और उनके लिए यह बहुत महत्वपूर्ण रहा है।

धार्मिक उदारपंथ के बौद्धिक निस्तेज से कोई निराश हो सकता है, लेकिन यह रूढ़ीवादी कट्टर धर्म है जिसने क्षति पहुंचाई है। निस्संदेह इसके महान नैतिक और कलात्मक योगदान भी हैं। लेकिन मैं यहां यह तर्क नहीं करूंगा कि एक तरफ़ धर्म के इन अवदानों और दूसरी तरफ़ धर्मयुद्ध और ज़िहाद एवं धर्म परीक्षण और सामूहिक हत्या की लंबी निर्मम कहानी के बीच हमें किस प्रकार संतुलन बैठाना चाहिए। लेकिन इस बात पर मैं अवश्य जोर देना चाहूंगा कि इस तरह से संतुलन बैठाते हुए यह मान लेना सुरक्षित नहीं है कि धार्मिक अत्याचार और पवित्र धर्म युद्ध सच्चे धर्म के विकृत रूप हैं। मेरे विचार से यह धर्म के प्रति उस मनोभाव का दुष्परिणाम है, जिसमें गहरा आदर और ठोस निष्ठुरता का सम्मिश्रण है। दुनिया के महान धर्मों में से कई यह सिखाते हैं कि ईश्वर एक विशेष धार्मिक विश्वास रखने और पूजा के एक खास रूप को अपनाने का आदेश देता है। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ लोग जो इन शिक्षाओं को गंभीरता से लेते हैं वे किन्हीं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों जैसे सहिष्णुता, करुणा या तार्किकता की तुलना में इन दैनिक आदेशों को निष्ठापूर्वक सबसे ज़्यादा महत्व दें।

एशिया और अफ्रीका में धार्मिक उन्माद की काली ताकतें अपनी जड़ मजबूत करती जा रही है और पश्चिम के धर्मनिरपेक्ष राज्यों में भी तार्किकता और सहिष्णुता सुरक्षित नहीं है। इतिहासकार ह्यू ट्रेवर-रोपर ने कहा कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यह विज्ञान के उत्साह का फैलाव ही था जिसने अंततोगत्वा यूरोप में डायनों का जलाना समाप्त कर दिया। हमें एक स्वस्थ दुनिया के संरक्षण के लिए फिर से विज्ञान के प्रभाव पर भरोसा करना होगा। वैज्ञानिक ज्ञान की निश्चितता नहीं बल्कि अनिश्चितता ही उसे इस भूमिका के लिए अनुकूल बनाती है। वैज्ञानिकों द्वारा पदार्थ के बारे में अपनी समझ, जिसका प्रत्यक्ष अध्ययन प्रयोगशाला में प्रयोगों द्वारा हो सकता है, बार-बार बदलते हुए देखने के बावज़ूद, धार्मिक परम्परा या पवित्र ग्रंथों द्वारा पदार्थ के उस ज्ञान, जो मानवीय अनुभव से परे है, के दावे को गंभीरता से कौन लेगा?

निश्चित रूप से, दुनिया की तकलीफ़ों को बढ़ाने में विज्ञान का भी अपना योगदान है। लेकिन सामान्य तौर पर विज्ञान एक दूसरे को मारने का साधन भर उपलब्ध कराता है, उद्देश्य नहीं। यहां विज्ञान के प्राधिकार का उपयोग आतंक को जायज ठहराने के लिए होता रहा है जैसे कि नाज़ी वंशवाद या सुजनन-विज्ञान ( ऎउगेन्-इच्स् ), वहां विज्ञान को भ्रष्ट किया गया है। कार्ल पॉपर ने कहा है-  यह एकदम स्पष्ट है कि तार्किकता नहीं बल्कि अतार्किकता, धर्मयुद्धों के पहले और बाद में, राष्ट्रीय शत्रुता और आक्रमण के लिए जिम्मेदार रही है। लेकिन कोई युद्ध वैज्ञानिक के लिए वैज्ञानिकों की पहल पर लड़ा गया हो, यह् मुझे नहीं मालूम।

दुर्भाग्यवश, मुझे नहीं लगता कि युक्तिसंगत दलील पेश करने से तार्किकता की वैज्ञानिक पद्धति को स्थापित करना संभव है। डेविड ह्यूम ने बहुत पहले बताया था कि सफल विज्ञान के पुराने अनुभवों के समर्थन में हम बहस की उस तर्क पद्धति की प्रामाणिकता मानकर चलते हैं जिसे हम स्थापित करना चाहते हैं। इस प्रकार सभी तर्कपूर्ण बहसों को केवल तर्कपद्धति को अस्वीकार कर मात दिया जा सकता है। इसलिए. अगर हमें प्रकृति के नियमों में आध्यात्मिक सुख नहीं मिलता, तो भी हम इस प्रश्न से नहीं बच सकते हैं कि इसकी खोज अन्य जगहों पर एक या दूसरे प्रकार के आध्यात्मिक प्राधिकार में या धार्मिक विश्वास को स्वतंत्र रूप से बदल कर हम क्यों नहीं कर सकते?

विश्वास करना है या नहीं करना है, इसका निर्णय पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है। अगर मैं सोचूं कि यदि मैं चीन के बादशाह का उत्तराधिकारी होता तो मैं ज़्यादा सुखी और सभ्य होता, लेकिन मैं अपनी इच्छाशक्ति पर चाहे जितना जोर डालूं मुझे यह विश्वास नहीं हो सकता, ठीक उसी तरह जैसे मेरे दिल की धड़कन को रोकने की चाहत ऐसा नहीं कर सकती। तब भी, ऐसा लगता है कि बहुत सारे लोग अपने विश्वास को थोड़ा नियंत्रित करते हैं और उन्हीं विश्वासों को चुनते हैं जो उन्हें लगता है कि उन्हें अच्छा और खुश रखेगा।

यह नियंत्रण कैसे कार्यान्वित होता है, इसका मेरी जानकारी में सबसे दिलचस्प वर्णन जार्ज ऑरवेल के उपन्यास १९८४ में मिलता है। नायक विन्सटन स्मिथ अपनी डायरी में लिखता है- दो धन दो चार होता है, यह कहने की छूट की मुक्ति है। धर्म परीक्षक ओब्रायन इसे एक चुनौति के रूप में लेता है और उसकी सोच को मजबूरन बदलने के लिए उपाय करता है। उत्पीड़न में स्मिथ यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार है कि दो धन दो पांच होता है, लेकिन ओब्रायन केवल यह नहीं चाहते थे। अंत में जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है, तो उससे बचने के लिए स्मिथ अपने को आप को एक क्षण के लिए यह विश्वास दिलाता है कि दो धन दो पांच ही होते हैं। ओब्रायन उस क्षण संतुष्ट हो जाते हैं और उत्पीड़न रोक दिया जाता है। ठीक इसी प्रकार अपने और अपने चहेतों की संभावित मृत्यु से सामना होने का दर्द् हमें अपने विश्वासों में फेरबदल के लिए मजबूर करता है, ताकि हमारा दर्द कम हो जाए। पर सवाल उठता है कि अगर हम अपने विश्वासों में इस तरह से समझौता करने में सक्षम हैं, तो ऐसा क्यों ना किया जाए?

मुझे इसके खिलाफ़ कोई वैज्ञानिक या तार्किक कारण नहीं दिखलाई पड़ता कि हम अपने विश्वासों में समझौता करके- नैतिकता और मर्यादा के लिए, कुछ सांत्वना हासिल क्यों ना करें! हम उसका क्या करें जिसने खुद को यह विश्वास दिला दिया हो कि उसे तो एक लॉटरी मिलनी ही है क्योंकि उसे रुपयों की बहुत-बहुत जरूरत है? कुछ लोग भले उसके क्षणिक विशाल ख्वाब से ईर्ष्या रखते हों पर ज़्यादातर लोग यह सोचेंगे कि वह एक वयस्क और तार्किक मनुष्य की सही भूमिका में, चीज़ों को वास्तविकता की कसौटी पर देख पाने में, असफल है। जिस प्रकार उम्र के साथ बढ़ते हुए, हम सभी को यह सीखना पड़ता है कि लॉटरी जैसी साधारण चीज़ों के बारे में ख्वाबपूर्ण सोच के लोभ से कैसे बचा जाए, ठीक उसी प्रकार हमारी प्रजाति को उम्र के साथ बढ़ते हुए यह सीखना पड़ेगा कि हम किसी प्रकार के विराट ब्रह्मांड़ीय नाटक में किसी हीरो की भूमिका में नहीं हैं।

फिर भी, मैं एक मिनट के लिए भी यह नहीं सोचता कि मृत्यु का सामना करने के लिए धर्म जो सांत्वना देता है, विज्ञान वह उपलब्ध कराएगा। इस अस्तित्ववादी चुनौति का मेरी जानकारी में सबसे बढ़िया विवरण ७०० ईस्वी के आसपास पूज्य बेडे द्वारा रचित पुस्तक् द इक्लेजियास्टिक हिस्ट्री ऑफ द इंग्लिश ( अंग्रेजों का गिरजा-संबंधी इतिहास ) में है। बेडे ने लिखा है कि नॉर्थम्ब्रीया के राजा एडविन ने ६२७ ईस्वी में यह तय करने के लिए कि उनके राज्य में कौनसा धर्म स्वीकारा जाए, एक परिषद की बैठक बुलाई, जिसमें राजा के प्रमुख दरबारियों में से एक ने निम्नलिखित भाषण दिया:
    
   " हे महाराज! जब हम पृथ्वी पर मनुष्य के आज के जीवन की तुलना उस समय से करते हैं जिसकी कोई जानकारी हमारे पास नहीं है, तो हमें लगता है जैसे एक अकेली मैना, शाही-दावत वाले हॉल में द्रुत उड़ान भर रही हो, जहां आप किसी जाड़े की रात में अपने नवाबों और दरबारियों के साथ दावत में बैठे हों। ठीक बीच में, हॉल में आनन्दमयी गर्मी प्रदान करने के लिए आग जल रही हो और बाहर जाड़े की तूफ़ानी बारिश या बर्फ का प्रकोप हो। मैना हॉल के एक दरवाज़े से होते हुए दूसरे दरवाज़े तक द्रुत उड़ान भर रही है। जब तक वह अंदर है, बर्फीले तूफ़ान से सुरक्षित है। लेकिन कुछ क्षणों के आराम के बाद, वह उसी कड़ाके की ठंड़ वाली दुनिया में, जहां से वह आई थी, हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है। इसी तरह, आदमी थोड़े समय के लिए पृथ्वी पर दिखता है। इस जीवन के पहले क्या हुआ और बाद में क्या होगा, इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते।"

बेडे और एडविन की तरह इस विश्वास से बच पाना मुश्किल है कि उस दावत वाले हॉल के बाहर हम लोगों के लिए कुछ अवश्य होगा। इस ख्याल को तिलांजलि देने का साहस ही उस धार्मिक सांत्वना का छोटा सा विकल्प है और यह भी संतुष्टि से विहीन नहीं है।


स्टीवन वाइनबर्ग का यह संपूर्ण आलेख एक साथ यहां से डाउनलोड़ किया जा सकता है:
और तब ईश्वर का क्या हुआ? - स्टीवन वाइनबर्ग
aur tab ishwar ka kya hua - steevan wienberg, free downloadable pdf file, size-167 kb


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

6 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आवश्यक आलेख।
किन्तु सामान्य पाठक वर्ग के लिए नहीं। यदि कुछ सहज अनुवाद होता तो शायद बेहतर होता।

अजय कुमार झा ने कहा…

गूढ विषय और बेहतीन विश्लेषण । द्विवेदी जी से सहमत । आम पाठकों के लिए थोडा सा कठिन मगर जरूरी भी

Sidharth Joshi ने कहा…

मैंने टिप्‍पणी की थी, पता नहीं कहां गई। यहां थी या वर्डप्रेस पर यह भी भूल गया।

अच्‍छी जानकारी, मनोविज्ञान शृंखला खत्‍म होने के साथ ही फिर से आपका पाठक बन गया हूं।

समय ने कहा…

मित्र सिद्धार्थ,
आपकी टिप्पणियां वर्डप्रेस पर सुरक्षित हैं।
शुक्रिया।

समय ने कहा…

वर्ड प्रेस पर सिद्धार्थ जोशी की टिप्पणी:

Sidharth Joshi commented on और तब ईश्वर का क्या हुआ? - 4

एक शानदार शृंखला... आभार, धन्‍यवाद, साधुवाद।

गीता के प्रथम अध्‍याय में कृष्‍ण कहते हैं अनुभव से प्राप्‍त ज्ञान ही विज्ञान है...

क्‍या इतना ही बहुत है... :)

बहुत दिन बाद फिर से आपका नियमित पाठक बना हूं। आपको मुझे मिठाई खिलानी चाहिए... :) भगवान भक्‍तों के लिए क्‍या नहीं करते, वैसे ही लेखकों को अपने पाठकों के लिए करना चाहिए... पता नहीं क्‍यों मुझे लगता है कि मैं आपको जानने लगा हूं।

समय ने कहा…

वर्ड प्रेस पर ही समय की टिप्पणी:

प्रिय सिद्धार्थ,
इतना ही बहुत नहीं है। :-)

मिठाई तो आपकी पक्का बनती है। शायद कभी अवसर बने।
आप हम प्रस्तोता भक्तों के, पाठक भगवान है, अतएव जैसी की वास्तविकता है, भक्त अपने भगवानों को भोग लगाने को अभिशप्त हैं। हे देव, आप अपने भाग को ग्रहण कीजिए। :-)

शुक्रिया।

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