शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

लेकिन इससे पता चलता है कि लैला-मजनू जैसे किस्से सम्भव नहीं हैं क्योंकि प्रेम अस्थायी होगा ही। कुछ समय के लिए वह भले रहे या बना रहे लेकिन उसे समाप्त होना ही है।

प्रेम के आधार यदि वस्तुगत ( objective ) नहीं है, यदि वह काल्पनिकता के आसमान पर परवान चढ़ाया हुआ है, कोरी भावुकता से परिपूर्ण है, तभी हम कह सकते हैं कि प्रेम अस्थायी होगा, उसे वास्तविकता की कठोर ज़मीन पर आते ही समाप्त होना ही होगा।

प्रेम का होना बहुत जरूरी है। प्रेम ही है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व का, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है। उसे विशुद्ध मानवीयता का पहला पाठ पढ़ाता है, परंपराओं और यथास्थिति से विद्रोह सिखाता है, दुनिया को और बेहतर बनाए जाने की आकांक्षाओं और जुंबिशों से भर देता है। यदि प्रेम वास्तविकता के वस्तुगत आधारों पर परवान चढ़ता है, तो वह इसे सारी मानवता के दायरे तक विस्तार देता है। एक के प्रति प्रेम का अहसास, सभी के प्रति प्रेम के अहसासों से मनुष्य को भर देता है। वह सही मायने में तभी मनुष्य बनने की राह में कदम बढ़ा सकता है। सही समझ के साथ, प्रेम व्यापक होता है, और मनुष्य को व्यापकता देता है

हमारा मंतव्य प्रेम के वस्तुगत आधारों को समझने और समझाने का था, इसे सही राह दिखाने का था। ना कि इसके नकार के प्रतिमान रचना।

आपने प्रेम के मामले में कहा था कि किसी को किसी की मासूमियत पर तो किसी को खास तरह की मुस्कुराहट पर या किसी को अंग विशेष की बनावट पर दिल आ जाता है.......इस खास किस्म की पसन्द के पीछे की प्रक्रिया क्या है? यानी क्यों किसी को किसी खास किस्म की विशेषता पसन्द है? जैसे मान लेते हैं कि हमें हरा रंग अच्छा लगता है, तो हरा ही क्यों? कैसे? इसके पीछे का कारण? या फिर भोजन के मामले में खास तरह की सब्जी ही क्यों पसंद होती है या नहीं भी होती है? यह तो लगता है कि यह दीर्घकालीन संचय है। धीरे-धीरे ऐसा व्यवहार हमारे अचेतन में जमा हो जाता होगा, शायद ऐसा होता हो। इस पर आप ही सुझाएंगे।

हमने पहले यह कहा था, "यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं।"

यहां साफ़ बात है कि व्यक्ति के इस संदर्भ में अपने विशिष्ट मानदंड और मान्यताएं विकसित हो जाती हैं। आप जानना चाह रहे हैं कि ये कैसे विकसित हो जाते हैं? आपने जो सुझाया बात लगभग वैसी ही है, यानि कि व्यवहार का, सक्रियता का, परिवेश के साथ अंतर्गुथन का दीर्घकालीन अनुकूलन। हमारे उपलब्ध परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं में यह अनुकूलन हमें उसका अभ्यस्त बनाता है और हम वैसी ही परिस्थितियों में सहज महसूस करते हैं, अच्छा महसूस करते हैं। इसलिए हमें हमारे परिवेश की चीज़ों की खास बुनावट, आकार, अन्य गुणधर्मों के प्रति एक खास क़िस्म का अनुराग पैदा हो जाता है, उसके पीछे होता यह है कि परिचित, अभ्यस्त बुनावट हमें सहज रखती है जबकि अपरिचित बुनावट हमारा ध्यान बांटती है, हमें उत्तेजित करती है, सहज नहीं रहने देती।

आगे बढ़ते हैं, जैसे कि मान लेते हैं किसी को अपनी मां से विशेष स्नेह है, सभी को होता है, मां एक विशेष अंदाज़ में मुस्कुराती है, मां के आंचल के सुरक्षाबोध के साथ, स्नेह और अपनत्व के साथ, सुक़ून के अहसास के साथ वह विशेष मुस्कुराहट उसकी चेतना में इतना घुलमिल जाती है कि धीरे-धीरे सिर्फ़ वह मुस्कुराहट ही इन सभी अहसासों का भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगती है। मतलब कि उस मुस्कुराहट को देखते ही, दिमाग़, मन इन्हीं भावनाओं और अहसासों ( सुरक्षा, स्नेह, अपनत्व, सुक़ून आदि ) की अवस्था में आ जाता है और वह मुस्कुराहट इन सबका पर्याय बनती जाती है। अब यह विशेष मुस्कुराहट यदि और भी कहीं उसे देखने को मिलती है, यानि अपनी मां से अलग, किसी और के चहरे पर, तो वहां भी उसके मानस में यही अहसास पैदा होते हैं। जाहिर है, जिसके चहरे पर ये मुस्कान की यह विशिष्ट अदा होगी वह उसे अच्छा लगेगा, पसंद आएगा। वह उसके अंदर वैसे ही व्यक्तित्व की आशा से भर उठेगा।

बाकी सौन्दर्यबोधों को भी ऐसे ही समझा जा सकता है। रंगों और स्वादों के मामलों को भी। बचपन से ही हरे रंग के बीच पला-बढ़ा बच्चा उसी रंग के साथ सहजता और सुक़ून महसूस करता है और वह उसकी पसंद बन जाता है। दादी द्वारा चूल्हे पर दाल पर हींग और लहसुन के छौंक की गंध उसके मानस पर और उसकी स्मृति में इस तरह समा जाती है कि वह हमेशा उसी तरह की प्रिय लगने वाली गंध और स्वाद के लिए हमेशा लालायित रह सकता है। एक विशेष परिवेश में पले व्यक्ति में बचपन से ही चिकन करी की गंध और स्वाद उसकी पसंद से इस तरह नाभीनालबद्ध हो सकते है कि वही उसके लिए दुनिया का बेहतरीन स्वाद हो सकता है, वहीं दूसरे परिवेश का व्यक्ति के लिए यह घृणा पैदा करने वाली गंध और स्वाद हो सकता है और वह बचपन से ही खाते आ रहे बैंगनों के साथ अधिक पसंद का लगाव रखा हो सकता है।

अब आप शुक्रिया शब्द लिखने की कृपा न करें क्योंकि मैं आपका समय ले रहा हूँ और मेरे लिए कुछ दे रहे हैं। मेरे लायक कुछ सहायता बन पड़े तो बताइएगा।

शुक्रिया, आपसी संवाद के चलते रहने और हमारी स्वयं की समझ तथा चेतना के परिष्कार की संभावनाएं देते रहने की महत्त्वपूर्ण बात पर व्यक्त किये जानेवाला औपचारिक आभार है।

संवाद हमें भी अवसर देता है आपस में कुछ सीखने का, अपने विषयगत विचारों को स्थिर और अभिव्यक्त कर पाने का। कई बार यह होता है कि समझाने की प्रक्रिया में कई चीज़ों पर हमारी समझ भी साफ़ और तार्किक होती जाती है। हमें भी कई चीज़ें और बेहतरी से समझ में आती हैं। कई नये अंतर्संबंध और बेहतर तार्किकताएं सामने आती हैं।

और आप, आपसे संवाद, यह अवसर उपलब्ध करवा रहा है, तो हमारा आपके प्रति शुक्रगुज़ार होना लाज़िमी है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

3 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बेहतर संवाद।

Arvind Mishra ने कहा…

युवा मित्र के उद्धरण और मछलियों के चित्र ने इस पोस्ट पर अभिस्वीकृति को उकसाया -पढता तो रहता ही हूँ गाहे बगाहे !

वन्दना ने कहा…

बढिया संवाद

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