शनिवार, 29 सितंबर 2012

प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि


एक सवाल है प्रेम पर। जैसाकि आपने कहा है और मैं सबको सही मानता हूँ लेकिन ऐसा लोग कहते हैं कि दस सुन्दर व्यक्ति हैं तब भी आपका प्रेमपात्र कोई एक ही क्यों? और अगर शरीर महत्व का है तब प्रेमपात्र से बहुत सुन्दर शरीर के लोग होग सामने होते हुए भी और अन्य सभी गुणों में भी प्रेमपात्र से आगे होते हुए भी एक ही व्यक्ति क्यों और कैसे पसन्द आ जाता है। कुछ तो समझ में आया लेकिन ये सवाल है।

इस चीज़ को आप यदि दूर से, निरपेक्षता से देखेंगे तो इसे समझने में इस तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं। जब हम चीज़ों को समझने की प्रक्रिया में होते हैं, तो हमें उस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर मिलती जुलती प्रक्रियाओं को दूरस्थ परिवेश की जगह अपने पास के, अपनी ख़ुद की ज़िंदगी, या अपनी ज़िंदगी के निकट और जुड़ी हुई चीज़ों और प्रक्रियाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

प्रेम की भावना भी, अन्य भावनाओं की तरह ही मनुष्य की जैविक और जीवनीय आवश्यकताओं और उनकी तुष्टि की संभावनाओं के आधार पर ही पैदा होती और परवान चढ़ती है।

हम देखते हैं ( और हमें अपने स्वयं के जीवन में झांकना चाहिए, अपनी ख़ुद की भावनाओं की पडताल करनी चाहिए ) कि अक्सर प्रेम दो ऐसे विपरीत लिंगियों के बीच में पनपता है, जो किसी ना किसी रूप में एक दूसरे के साथ अंतर्संबद्ध हैं, यानि कि उनके बीच ऐसे संबंध पनपने की संभावनाएं है। अक्सर वे एक दूसरे के परिचित परिवेश के होते हैं, अडौस-पडौस के, एक ही गांव के आदि, यानि कि जहां उनकी दैनिक आपसी अंतर्क्रियाएं सम्पन्न होती हों। यह स्वाभाविक परिणति है।

यानि किन्हीं भी दस को खड़े करने और उनमें से चुनने की बात नहीं है, यह स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी वरन अपने किन्हीं सौन्दर्यबोध के प्रतीकों के चलते प्रबलीकृत ( forced ) आकांक्षाएं होंगी। यह अधिकतर सक्रियता का दायरा बढ़ने और समझ बढ़ने के बाद की नियतियां है। जैसे कि स्कूल या कॉलेजों में सहपाठी विपरीत लिंगियों के बीच संभावनाएं होती हैं। वहां अक्सर आपको ऐसे लड़के या लड़कियां मिल जाएंगी जो किसी ना किसी गुण को लक्षित करके, जिसमें अधिकतर दिखता सौन्दर्य शामिल होता है, किसी को अपने प्रेम का लक्षित बना लेते हैं, एकतरफ़ा भावनाएं पाल लेते हैं। पर यदि उनके बीच संपर्क नहीं है, तो बात को आगे बढ़ने की नौबत नहीं आने पाती।

एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी, लगाव और समरसता की भावना के रूप में शुरुआती आकर्षण तभी ढल सकता है जब उनके बीच अंतर्क्रिया होती हों, एक दूसरे के गुणों और व्यवहार के बीच धीरे-धीरे सम्मान और संपात की स्थिति पैदा होती हो।

यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं। 

सुंदरता के भी अपने-अपने मानदंड बन जाते हैं, और वह उन्हीं से मिलते जुलते संरूपों को पसंद करता है। हो सकता है कि कोई ऐश्वर्या की सुंदरता के आगे, दीप्ति नवल को प्राथमिकता देता हो। किसी को मासूम मुस्कुराहट में दिलचस्पी हो सकती है, किसी को शक्ल या उसके अंगों की एक खास बनावट में, कोई घरेलू मासूमियत के भावों को वरीयता देता हो वहीं कोई सैक्सी दर्शनीयता को, किसी के मन में छरहरता ( slimness ) की संकल्पना ज़्यादा हावी हो सकती है, आदि-आदि। यानि कि उसका चुनाव इन्हीं जैसी कई चीज़ों पर निर्भर होता है, ना कि एकदम सांयोगिक और किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा के।

आप देखेंगे कि शुरुआती आकर्षण और चुनाव में शारीरिक गुणों की महती भूमिका होती है, पर असली परीक्षा तो आपसी अंतर्क्रियाओं में, यानि व्यक्तित्व के आंतरिक व्यावहारिक गुणों के परीक्षण में होती है। आपके पास ऐसे कई उदाहरण होंगे, जिनमें कुछ ही मुलाकातों में शारीरिक आकर्षण गायब हो जाता है और व्यवहार की एकरसता नहीं पैदा हो पाने के कारण अलगाव हो जाता है। ऐसा भी होता है, कि शारीरिक आकर्षण या किन्हीं विशेष गुणों पर व्यक्ति की दीवानगी के कारण, वह दूसरी चीज़ों को जबरन स्थगित करता रहे और संबंधों को आगे बढ़ाता रहे। पर ऐसे में यह भी अवश्यंभावी है कि फिर उनकी तुष्टि होते ही, मोहभंग पैदा हो सकता है, और बाकी ज़मीनी सच्चाइयां हावी होने लगती है और बहुत बाद में भी अलगाव की संभावनाएं होती है।

व्यक्ति किसी विशेष सौन्दर्य का उपासक होने के नाते, अडौस-पडौस में स्थित कई सारे विपरीत लिंगियों में से अपनी मानदंड़ों के अनुसार किसी एक का सचेतन चुनाव कर सकता है, परंतु होता यह है कि उस विपरीत लिंगी के भी इसी चुनाव के मामले में अपने मानदंड होते है जो जरूरी नहीं कि संपाती हो जाएं। तो जाहिर है कुछ शुरुआती अंतर्क्रियाओं के बाद ही शनैः शनैः जाने-अनजाने में, यह छंटनी की प्रक्रिया चलती है और किसी एक व्यक्ति के साथ बाह्य और आंतरिक गुणों के बीच एक सामंजस्य, एक सहजता स्थापित हो जाती है। और हम इसे निरपेक्ष रूप से देखते वक्त इसकी गहराई में जाने के बजाए सिर्फ़ एक रहस्यमयी, पहले से नियत संयोग के रूप में देख सकते हैं। जैसी कि प्रवृत्ति आपके सवाल में परिलक्षित हो रही है।

तो यदि आप इसी दिशा में और चिंतन-मनन करेंगे, तो शायद आप समझ पाएंगे कि किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा की उपस्थिति के असली मायने क्या हैं। शायद इसे हेतु हम पर्याप्त इशारे कर पाए हों। कोई और शंका हो तो बात आगे बढ़ाई जा सकती है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

2 टिप्पणियां:

Rotana baba ने कहा…

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diyana tabulle ने कहा…

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