शनिवार, 3 नवंबर 2012

चीज़ों को उनकी वस्तुगतता में समझना चाहिए

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।



आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



चीज़ों को उनकी वस्तुगतता में समझना चाहिए

क्या यह सही है कि भारतीय इतिहास को अंग्रेजों ने विकृत किया है या करवाया है? यह संदेहास्पद नहीं लगता। मैंने जिस किताब का लिंक आपको भेजा था उसमें कहा गया है कि आर्य बाहर से नहीं आए। वैसे मेरी दिलचस्पी अधिक क्या कम भी इसमें नहीं है कि आर्य बाहर से आए या नहीं क्योंकि इसका असर अब नही पड़ता।

शुरुआती तौर पर इतिहास को इतिहास की तरह लिखने का काम अंग्रेजों के प्रयत्नों से ही संभव हुआ, यह एक वास्तविक तथ्य है। वे शासक थे, और हर सत्ताधारी, प्रभुत्व संपन्न वर्ग की तरह अपनी सत्ता और प्रभुत्व बनाए रखने के लिए उन्होंने ने भी अपने आधिकारिक पुनर्लेखन में अपने हितों के चश्में से चीज़ों को व्याख्यायित करने की कोशिश की, कई जगहों पर वे सफ़ल भी हुए। परंतु ज्ञान अपनी एक अलग राह भी चला करता है, उनके कई मनोनयन किए गये वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विद्वान, विशेषज्ञ यहां की प्राचीन चीज़ों का अध्ययन करते हुए, वैज्ञानिकता से दगा नहीं कर पाए और उन्होंने भारत में इतिहास को वस्तुपरकता के साथ देखे जाने की परंपरा की भी नींव डाली। उन्होंने कई संस्कृत के कई विशेषज्ञ विद्वान पैदा कर दिये, जो कि वैश्विक स्तर पर प्राचीन महत्त्व की सामग्री के आधारों पर मानवजाति के विकास का अध्ययन कर रही परंपरा से अपने को जोड़ते थे, जो कि विज्ञान की तरह ही वस्तुगत दृष्टिकोण के अनुसार थे।

अब आपकी दिलचस्पी है ही नहीं तो फिर आर्यों वाली बात पर लगता है कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आपका यह कहना सही है कि अब इसका असर नहीं ही पड़ना चाहिए।

ईसाई धर्म आज दुनिया के लगभग सभी देशों में है। क्या वह स्वत: फैल गया? या उसे फैलाया गया। एक किताब है धर्मपाल जी की जिसमें ब्रिटिश संसद में 1813 में चल रहे बहस को बताया गया है कि भारत को ईसाई कैसे बनाया जाय? क्या अंग्रेजों के शोषणवादी और साम्राज्यवादी वृत्ति को देखते हुए इसे सच नहीं माना जा सकता है? मेरा इतिहास ज्ञान न के बराबर है लेकिन ये सवाल हैं। और इन्हें निष्पक्ष होकर हल करना है।

आपकी ऊपर वाली बात को यहां भी आप रख सकते हैं कि अब इससे क्या असर पड़ता है। कुछ भी हुआ हो। अभी क्या चल रहा है, उसे ही देखना चाहिए। यह खूब है कि जो चीज़ वक़्ती तौर पर हमारे श्रेष्ठताबोध के घटाघोपों के लिए मुफ़ीद लग रही हो उसे हमें निष्पक्ष होकर हल करना चाहिए और जो बात हमारी पूरी कहानी को ही उलट सकती हो उसके लिए हम कह दें उसे छोडिए उसका असर अब नहीं पड़ता। यह ठीक पद्धति नहीं होती। हमें वह दृष्टिकोण और पद्धति विकसित करनी चाहिए जिससे कि हम सभी चीज़ों को उनकी वस्तुगतता और निरपेक्षता में देख और समझ सकें।

चलिए इसे भी छोडते हैं, फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि विजेता के साथ उसके विश्वास, उसकी संस्कृति, उसकी भाषा, उसका धर्म भी आता है, सहज रूप से भी, और योजनागत रूप से भी। आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रियाएं सहज रूप से भी संस्कृतियों का संक्रमण और समन्वय करती हैं और जबरन रूप से भी। सत्ता की सभी तरह की घटक शक्तियां अपना-अपना काम कर रही होती हैं। सभी साम्राज्यवादी वृत्तियां ऐसी ही होती हैं। मुख्यतया इतिहास की चालक शक्ति आर्थिक कारक हुआ करते हैं, इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

पंचायत व्यवस्था पर धर्मपाल जी की एक किताब है जिसमें मद्रास में 1830 के आस-पास की पंचायत व्यवस्था का जिक्र किया गया है। उनकी एक किताब है विज्ञान और तकनीक पर। उसमें एस्ट्रोफ़िज़िक्स पढ़ाने की बात लिखी है 1820-30 के आस-पास। क्या ये सब गलत मान लिए जाएँ। एक किताब है ब्यूटीफ़ुल ट्री जिसमें भारत में 1820 के आस-पास की शिक्षा पर पूरी रिपोर्ट तक दी गयी है। तो क्या ये सब धार्मिक कारणों से है?

एस्ट्रोफिजिक्स क्या होती है, हमें नहीं मालूम। १८२०-३० के आसपास के समय को पता नहीं आप किस नज़रिए से देख रहे हैं। उस वक़्त भारत में राजाराममोहन राय जैसे कई अन्य महानुभाव सक्रिय थे, जिन्हें सामाजिक सुधारों और शिक्षा पर किये अपने रूढ़ीविरोधी कामों के लिए ही जाना जाता है। विज्ञान और तकनीक का काफ़ी विकास हो चुका था, भौतिकी पर काफ़ी कुछ कार्य न्यूटन १६९० तक कर चुके थे, १७८९ में ही फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति हो चुकी थी यानि राजतंत्र का उन्मूलन और गणतंत्र की स्थापना हो चुकी थी, लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों की घोषणा हो चुकी थी। ये विचार पूरे विश्व में फैल रहे थे। डार्विन और मोर्गन अपने अध्ययनों और शोध में व्यस्त थे, जिन्होंने हुछ ही वर्षों बाद, डार्विन ने जैविक क्रम विकास की अवधारणा को और मॉर्गन ने सामाजिक क्रम-विकास की अपनी अवधारणा को सामने रखा।

आपका मंतव्य स्पष्ट नहीं हुआ। उपरोक्त तथ्य, जिनके सच ही होने की संभावनाएं ही अधिक है, और धार्मिक कारणों के बीच आप क्या अंतर्संबध देखना चाहते हैं।

आपने राममोहन राय का नाम लिया है। उनके सुधार निश्चित ही महत्व के और प्रशंसनीय रहे है।.............अब यह कैसे शुरु हुई और क्यों शुरु हुई, यह शोध और अध्ययन का विषय है।

राजाराममोहन राय का नाम सिर्फ़ उस समय की समकालिकता दर्शाने की वज़ह से लिया गया था। उन पर बहस करना मंतव्य नहीं था। यह सिर्फ़ यह दर्शाने के लिए था कि वह काफ़ी आधुनिक समय था, और काफ़ी कुछ प्रगतिशील घट रहा था, भारत में भी और पूरी दुनिया में भी। वैसे यह जरूर कहना चाहेंगे, कि किसी भी व्यक्ति या विचार को उसके समय के सापेक्ष ही बेहतरी से समझा जा सकता है। सती प्रथा पर जो आपने कहा है, उससे लगता है कि आपको अभी भारतीय समाज संरचना के बारे में काफ़ी कुछ जानना है। काफ़ी शोध और अध्ययन किये जा चुके हैं, आपकी पहुंच धीरे-धीरे हो जाएगी उन तक। यह आपके लिए खोजने और जानने का विषय जरूर है।

भरद्वाज का लिखा विमानशास्त्र वैमानिकी का ग्रंथ है।....इसे सच या उपयोगी मानना अलग बात है। ....जब यह विषय संस्कृत में लिखा जा सकता है तब आज हम हिन्दी में क्यों नही पढ़ा सकते।

हिंदी में कोई भी विषय पढ़ाया जा सकता है, हिंदी में ही क्या किसी भी भाषा में पढ़ाया जा सकता है। अगर किसी भी भाषा की वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली सीमाएं सामने आती हैं, तो नये व्युत्पन्न शब्द गढ़े जा सकते हैं, कई शब्दों को जैसे का तैसा लिया जा सकता है। ज्ञान को तो मनुष्य के पास उसकी मातृभाषा में ही समन्वित करके पहुंचना चाहिए। विशिष्ट और गहरे शोधों के लिए मूल भाषाओं का प्रयोग और उनमें दक्षता हासिल की जा सकती है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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