शनिवार, 1 जून 2013

दिमाग़ और समझ से ही जीवन नहीं चला करता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



दिमाग़ और समझ से ही जीवन नहीं चला करता

सिर्फ़ पैसे के लिए कोई भी काम करना मेरा दिमाग सही नहीं मानता।...आर्थिक जुगाड़ खुद का है नहीं अब रक।...मेरा दिमाग, मेरी समझ सब मुझे वैसे काम करने से रोकते हैं जहां साम्राज्यवाद हो। क्षेत्र ही नहीं समझ आता मुझे।...

अर्थ के बगैर कैसा आर्थिक जुगाड़। इस अंतर्विरोध से तो पार पाना ही होगा कि हमें इस व्यवस्था में रहते हुए ही इसके परिवर्तन का ताना-बाना बुनना पड़ता है।

हर कोई अच्छी तरह जानता है कि सिर्फ़ दिमाग़ और समझ से ही जीवन नहीं चला करता। जीवन तात्कालिक परिस्थितियों के दायरे में जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति से चला करता है, और दिमाग़ तथा समझ इन परिस्थितियों को और अधिक बेहतर बनाते जाने को प्रयत्नशील रहते हैं। पहली स्थिति हो सकता है दिमाग़ और समझ के माकूल नहीं हो, परंतु दूसरी स्थिति के लिए आधार है, उसके मूल में हैं। इसीलिए इसको छोड़ा या लांघा नहीं जा सकता, इसके साथ भी अपने दिमाग़ की चिरपरिचित संघर्षशीलता के साथ ही जूझना होगा।

मुद्रा, पैसा आधारभूत रूप से, श्रम उत्पादों की विनिमय क्षमताओं के प्रतीक हैं। ये संचित श्रम का ही एक रूप हैं। यानि हम सामाजिक श्रम विभाजन की एक व्यवस्था में, अपना एक निश्चित श्रम-योगदान करते हैं और बदले में अपने जीवनोपयोगी श्रम-उत्पादों का विनिमय कर सकने के लिए कुछ मुद्रा, पैसा पाते हैं।

व्यवस्थाओं का सारा गणित इसी सामाजिक उत्पादन और उसके वितरण के तरीकों पर टिका हुआ रहता है। अभी यह प्रक्रिया ठीक नहीं है, श्रम-योगदान के अवसर सभी को उपलब्ध नहीं है, उसके श्रम-अवदान की तुलना में मिलने वाला मुद्रा प्रतिदान सही अनुपात में नहीं है, किसी को जरूरत भर भी नहीं मिल पा रहा और कुछ हड़पने की अश्लीलताओं में हैं, अभी एक बड़ी श्रम-शक्ति को समाज की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन में लगाने की बजाए मात्र कुछ समूह-वर्ग विशेषों की सुख-सुविधाओं के उत्पादन में झौंका हुआ है, आदि-आदि।

अभी यह ग़लत है, फिर भी आखिर तो मानव-समाज की जीवनीय आवश्यकताओं की पूर्ति इसी से हो रही है। श्रम-अवदान से उत्पन्न पूंजी का बड़ा हिस्सा अभी बुर्जुआ वर्ग द्वारा हड़पा जा रहा है, पर जो भी हिस्सा समाज के एक बडे हिस्से के हाथ में आता है, उनका जीवन इसी से चल रहा है। दिमाग और समझ वाले मानव-श्रेष्ठों को वितरण में न्याय पैदा करने की जरूरत महसूस होती है, इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने की आकांक्षाएं होती है, पर यह थोडे ही ना है कि इसे खत्म ही कर देना है, रोक देना है, इससे बचना है, दूर हो जाना है।

ठीक है हमारी पक्षधरताएं शोषित पक्ष के साथ जुड रही हैं, तो हम अपने श्रम-अवदान के लिए, जीवनोपयोगी पूर्ति लायक ही प्रतिदान चुनें, उसे अश्लील स्तर तक ना ले जाएं। परंतु सामाजिक श्रम-विभाजन की व्यवस्था में हमें अपना समुचित योगदान तो देना ही होगा, ताकि उत्पादन प्रक्रिया से जुड-कर हम अपने लिए आवश्यक साधन जुटा पाएं, और साथ ही अपनी पक्षधरता वाले वर्ग के लिए उस छोटे से हिस्से की आपूर्ति में भी योगदान कर पाएं जो कि इस शोषण-प्रक्रिया से गुजरकर उनके हिस्से तक पहुंच पाती है।

कहने का मतलब यह है कि हो सकता है हमारे योगदान के एक बड़ा हिस्सा पूंजीपति और साम्राज्यवादियों की जेब में जा रहा है, परंतु एक छोटा हिस्सा ही सही, हमारी और हम जैसों की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी काम आ रहा है। इसलिए जिस भी तरह का जुगाड़ हो पा रहा है करिए, अगर चुनाव के विकल्प मौजूद हैं तो अधिक बेहतर यानि कम खराब विकल्प चुनिएं, सामाजिक उत्पादन और सेवाओं में अपना योगदान दीजिए, और इस प्रक्रिया का अंग बनकर, शोषकों के तबकों के आधार कमजोर कीजिए, उनकी कब्र खोदने के संघर्ष में जुडिए।

नौकरियां, चाहें सरकार के जरिए हों या निजी पूंजिपतियों के ज़रिए, उत्पादन अंतत समाज के काम ही आना है। शिक्षक को सरकार लगाए या निजी व्यक्ति, उसे पढ़ाना तो इसी समाज के बच्चों को है। कहीं ना कहीं, अंत में जाकर हर प्रक्रिया समाज की आवश्यकताओं से जुड़ती है। अभी की व्यवस्था में जैसी भी परिस्थितियां हैं, जिस भी तरह के रोजगार के अवसर हैं, समाज इन्हीं के हिसाब से अपनी उत्तरजीविता सुनिश्चित करता है। हम भी इसी समाज के अंग हैं, और इसकी इन प्रक्रियाओं से अपने-आपको विलग नहीं रख सकते। हमारी यही भागीदारी हमें संघर्ष की प्रक्रियाओं से जुड़ने और चलाते रह पाने की उर्जा प्रदान करती है। सामाजिक उत्पादन की इस प्रक्रिया से विलगाव अंततः इसे न्यायपूर्ण करने के संघर्षों से विलगाव ही है। हमारे द्वारा अपने व्यक्तिगत आदर्शों और मान्यताओं को, समाज से ऊपर मान लेना भी एक तरह का बौद्धिक-विलास, एक तरह से अपने अहम की पराकाष्ठा ही है जो किसी भी तरह से समाजोपयोगी नहीं हो सकती।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

3 टिप्पणियां:

प्रवीण ने कहा…

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@ अपने व्यक्तिगत आदर्शों और मान्यताओं को, समाज से ऊपर मान लेना भी एक तरह का बौद्धिक-विलास, एक तरह से अपने अहम की पराकाष्ठा ही है जो किसी भी तरह से समाजोपयोगी नहीं हो सकती।

गहरी व विचारणीय बात... पर हर व्यक्ति को मिलाकर ही समाज बनता है... ऐसे में यह कथ्य क्या बहुमत के ही साथ जाने को बाध्य सा नहीं कर रहा...


...

समय अविराम ने कहा…

आदरणीय प्रवीण जी,

आपने कहा कि हर व्यक्ति को मिलाकर समाज बनता है, परंतु हमें लगता है यह सतही समझ है। बात बिल्कुल उल्टी भी निकल सकती है, क्योंकि मानवजाति का इतिहास हमें सिखाता है कि समाज के अंतर्गत ही वैयक्तिकताएं परवान चढ़ा करती हैं।

समाज दरअसल सामाजिक संबंधों का ताना-बाना है। यदि व्यक्तियों द्वारा मिलकर कुछ नये समूहों का निर्माण करते देखे जाने के अनुभवों के दायरे में, सीमित परिप्रेक्ष्यों के साथ देखते है तो ऐसा भी लग सकता है कि व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है। परंतु व्यापकता में देखने पर इस निष्कर्ष पर पहुंचना लाजिमी हो जाता है कि सामाजिक संबंधों के इसी ताने-बाने, यानि समाज में ही एक व्यष्टि पैदा होता है और इन्हीं सामाजिक संबंधों के ताने-बाने में, सामाजिक संरक्षण में अपनी वैयक्तिकता को प्राप्त होता है। यानि ऐसा कहा जा सकता है कि व्यक्ति को मिलाकर समाज नहीं बनता, बल्कि समाज में व्यक्ति का उद्भव होता है। समाज मूलभूत और प्राथमिक है, व्यक्ति इसकी एक इकाई मात्र है। व्यक्ति का समाज के बगैर कोई अस्तित्व नहीं हो सकता। दरअसल वैयक्तिकता भी और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों के संदर्भों में ही उसकी विशिष्ट स्थिति की अभिव्यक्ति मात्र है।

सामाजिक ताने-बाने में अपनी वैयक्तिकता को प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान और उसके बाद भी, व्यक्ति यह महसूस कर सकता है कि कई मामलों में उसकी वैयक्तिकता इस सामाजिक ताने-बाने के साथ अंतर्विरोध में होती है। समाज का पूर्व स्थापित ढांचा व्यक्ति की वैयक्तिकता का अपने मानदंडों के अनुकूल नियंत्रण और नियमन करने की कोशिश करता है, वहीं व्यक्ति अंतर्विरोधी मानदंडो के खिलाफ़ अपनी वैयक्तिकता को स्थापित और मजबूत करने के संघर्षों में होता है। चूंकि वर्तमान व्यवस्था में यह संभव है, इसीलिए हम व्यक्तियों को सत्ता, प्रभुत्व और शक्ति प्राप्त करने के प्रयासों में मुब्तिला पाते हैं ताकि वे सामाजिक आवश्यकताओं एवं मूल्यों के बरखिलाफ़, वैयक्तिकता का निर्बाध प्रदर्शन और उपभोग कर सकें। और फिर यही प्रभुसत्ता इसी तरह की वैचारिकी को प्रचारित और स्थापित करने की भी कोशिश करती है ताकि इन व्यक्तिवादी मूल्यों का सामाजिक मूल्यों के ताने-बाने के साथ घालमेल किया जा सके, अपनी व्यक्तिवादिता के व्यापक अनुमोदन के आधार पैदा किए जा सकें।

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बहुमत के साथ जाने की बाध्यता में भला क्या तकलीफ़ हो सकती है? हां, वर्तमान के सीमित अनुभवों के दायरे में ही जो बहुमत के मायने बहुप्रचारित चल रहे हैं, उनकी वास्तविक अभिव्यक्तियां हो रही हैं, आप उन्हीं के संदर्भों में रखकर इसे देखेंगे तो आप सही कह रहे हैं। आस्थावानों के, विशिष्ट धार्मिक संप्रदायों के, नस्लीय श्रेष्टताओं, स्थापित कर दी गईं समाजविरोधी विचारधाराओं और मान्यताओं आदि के बहुमतों के साथ जाने की बाध्यता के संबंध में आपकी चिंता जायज है। हमें बहुमत की इन नकारात्मक अभिव्यक्तियों को समाज के वृहत हितों के सापेक्ष परखने और इनसे बचने की कोशिशों में रहना ही चाहिए। हमें इस तरह के पैदा किए जा रहे बहुमत के शग़ूफ़ों के साथ जाने की बाध्यता को निरंतर प्रश्नांकित करते रहने और इनके ख़िलाफ़ जाने की दृढता का प्रदर्शन भी करना होगा। परंतु यह भी ध्यान में रखना होगा, कि इस तरह के शगूफ़ों पर व्यापार करने वाले शक्ति समूहों तथा आम लोगों ( जिनमें कि इनसे प्रभावित सामान्य मानसिकता भी शामिल होती हैं ) के साथ किए जाने वाले व्यवहार और पद्धतियों में भी तद्‍अनुकूल ही पर्याप्त अंतर भी रखना सीखना होगा।

जाहिर है कि हमारा मंतव्य वृहत्तर समाज की आवश्यकताओं और हितों के साथ नाभिनाल बद्ध है। वृहत्तर समाज के हितों के अनुरूप कार्यवाहियों को ही समाजोपयोगी कहा जा सकता है। इसी वास्तविक सामाजिक हितबद्धता की कसौटी के आधार पर ही हमने वैयक्तिक मान्यताओं और आदर्शों को सर्वोपरी मानलेने और इसी बहाने से समाज की वास्तविक स्थिति में हस्तक्षेप और सक्रियता से पलायन का मौका तलाशने की मानसिकता को बौद्धिक-विलास और अहम की पराकाष्ठा की संज्ञा से नवाज़ने की कोशिश की थी। सामाजिक हितबद्धताओं से जुड़े हुई सैद्धांतिक मान्यताएं और विचारधाराएं भी यदि वास्तविकता में कोई हस्तक्षेप ना करके सिर्फ़ श्रेष्ठताबोधों के प्रदर्शन का जरिया भर बन कर रह जाने को अभिशप्त रह जाए तो यह भी तो एक तरह का बौद्धिक विलास ही हुआ ना, जिसकी अंततः कोई सामाजिक उपयोगिता नहीं रह जाती। वास्तविक कसौटी वृहत्तर सामाजिक हितबद्धता और उससे नाभिनालबद् वास्तविक हस्तक्षेपी सक्रियता-व्यवहार ही है।

शुक्रिया।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कभी तो आदमी बन जाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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