शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

द्वंद्ववाद और संकलनवाद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने गति के उद्‍गम को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद और संकलनवाद पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



द्वंद्ववाद और संकलनवाद
( चिंतन में अंतर्विरोधों का परावर्तन )

चिंतन में अंतर्विरोध ( contradiction ) किस तरह परावर्तित ( reflect ) होते हैं?, इस प्रश्न की पूरी समझ के लिए हमें निम्नांकित बातों को ध्यान में रखना चाहिए : हमारा चिंतन केवल तभी शुद्ध होगा जब वह अंतर्विरोध रहित हो। निस्संदेह, एक ही समय में और एक चीज़ के बारे में परस्पर विरोधी रायें प्रकट नहीं की जानी चाहिए। चिंतन में अंतर्विरोधों को आने देने से हम निर्दोष चिंतन के नियमों का उल्लंघन कर देते हैं। मिसाल के लिए, एक ही व्यक्ति के बारे में एक साथ यह कहना असंभव है कि वह जीवित और मृत है। बेशक, मनुष्य मरते हैं, किंतु यदि मनुष्य जीवित है तो हम उसपर इसी अनुगुण को आरोपित करेंगे और इस तथ्य के बावजूद करेंगे कि आज से कुछ वर्षों बाद वह मर जायेगा। और जब ऐसा होगा तो हम उस विचाराधीन मनुष्य के बारे में कहेंगे कि वह मर गया है।

किंतु हम यह देख और साबित कर चुके हैं कि विश्व में घटनाएं व्याघाती ( अंतर्विरोधी, contradictory ) होती हैं। १७वीं सदी से प्रकाशिकी के क्षेत्र में एक विवाद चल पड़ा था - क्या प्रकाश निर्बाध व तरंगनुमा और इसलिए तरंगों के नियमाधीन होता है, या बाधित, कणिकीय और इसलिए कणों के नियमाधीन होता है। प्रकाश के दो परस्पर विरोधी सिद्धांत बन गये : तरंगीय और कणिकीय। इनमें से कौनसा सिद्धांत सही है, कौनसा वास्तविकता ( actuality ) को अधिक सटीक रूप से परावर्तित करता है - इस प्रश्न को लेकर अनेकानेक वाद-विवाद हुए और दोनों के पक्ष में युक्तियां पेश की गयीं। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि इन दो निष्कर्षों में से केवल एक ही सत्य हो सकता है। किंतु विज्ञान के विकास से यह तथ्य निखरकर सामने आया कि यह ‘विलक्षण’ घटना एक अंतर्विरोधी द्वंद्वात्मक ( dialectic ) प्रकृति की है। बाद में यह साबित कर दिया गया कि प्रकाश एक ही काल में तरंग की और कणों की गति है।

१९वीं सदी में यह प्रमाणित कर दिया गया कि तरंगे दृष्ट प्रकाश की ही नहीं, बल्कि विद्युतीय, चुंबकीय तथा कई अन्य प्रक्रियाओं की भी लाक्षणिकता है। इस तरह दृश्य प्रकाश तथा अदृश्य रेडियो तरंगों, एक्स किरणों, बिजली, चुंबकत्व, ताप का विकिरण व अवशोषण, सामान्यतः ऊर्जा तथा प्रकाशीय प्रभाव के बारे में जानकारी के अधिकाधिक बढ़ने के कारण इस प्रकार थे : पहला, उनकी अंतर्निहित अंतर्विरोधी प्रकृति ( inherent contradictory nature ) की छानबीन तथा व्याख्या ( investigation and explanation ), और, दूसरा, खंडित व अविच्छिन्न ( discrete and continuous ) का, क्वांटा तथा तरंगों का, यानि विरिधियों का एक ही एकत्व के रूप में अध्ययन। इसी तरह की स्थिति नाभिकीय भौतिकी में, इलेक्ट्रोनों तथा अन्य प्राथमिक कणों के अध्ययन में भी उत्पन्न हुई। यह साबित हो गया कि उनकी प्रकृति भी व्याघाती ( contradictory ) है, यानि वे एक ही समय में खंडित भी हैं और तरंग-सम भी ; फलतः क्वांटम और तरंग यांत्रिकी का उद‍भव हुआ और फिर वे इस तथ्य के बावजूद एकीकृत ( unified ) हो गयीं कि एक कण तथा एक तरंग के रूप में इलेक्ट्रोन की संकल्पनाएं मूलतः बेमेल प्रतीत होती हैं।

अतः यदि कोई वस्तु या घटना व्याघाती ( अंतर्विरोधी ) है, तो वह हमारे चिंतन में भी उसी रूप में परावर्तित होनी चाहिए। जीवन भी अंतर्विरोधी है और यथार्थता ( reality ) को समझने के लिए खुले दिमाग़ का होना जरूरी है। जीवन की द्वंद्वात्मकता हमारे चिंतन की, संकल्पनाओं ( concepts ) की द्वंद्वात्मकता में परावर्तित होनी ही चाहिए।

किंतु कुछ दार्शनिकों ने एक दूसरे से असंगत ( inconsistent ) विचारों और सिद्धांतों का मनमाना संकलन ( compilation ) तैयार करके दिमाग़ के खुलेपन का ग़लत अर्थ निकाला। ऐसे दार्शनिकों को संकलनवादी ( eclectics ) कहा गया। संकलनवाद विभिन्न विचार-पद्धतियों के लाक्षणिक विचारों का एक सिद्धांतविहीन और असंगत मेल होता है ; यह इस तथ्य के लिए उल्लेखनीय है कि इसमें उन्हें मिलाने की कोशिश की जाती है, जिन्हें मिलाया नहीं जा सकता है और यह उन वास्तविक संबंध-सूत्रों को देखने में असमर्थ होता है, जो किसी वस्तु को एक एकत्व में परिणत कर देता है।

यदि हम पहले यह कहें कि "भूतद्रव्य ( matter, पदार्थ ) मन को जन्म देता है" और फिर साथ ही यह दावा करें कि "मन स्व-अस्तित्वमान, प्रकृति से स्वतंत्र है" और इसपर भी जोर दें कि यह दो प्रस्थापनाएं परस्पर संगत हैं, तो हमें संकलनवादी कहा जायेगा। इस मामले में संकलनवाद ऐसे मूलतः भिन्न दृष्टिकोणों के यांत्रिक मेल के रूप में प्रकट होता है, जो उसके पूर्वानुमानुसार बराबर मूल्य के हैं, यानि भौतिकवाद ( materialism ) और प्रत्ययवाद ( idealism )। कई आधुनिक विचारक द्वंद्ववाद ( dialectics ) को संकलनवाद से प्रतिस्थापित करने की चेष्टा करते हैं। यह बात मिसाल के लिए, ‘अभिसरण’ के सिद्धांत में स्पष्टतः देखी जा सकती है। इसके अनुसार पूंजीवादी और समाजवादी प्रणालियों को एक दूसरी में संलीन ( coalesce ) किया जा सकता है। कुछ राजनीतिज्ञ राजनीति में भी संकलनवाद का उपयोग करने की कोशिश करते हैं और केवल सिद्धांत में ही नहीं करते। यथास्थितिवादी विचारक और राजनीतिज्ञ विज्ञापनों, प्रचार, सामूहिक संपर्क साधनों - रेडियो, प्रेस, टेलीविज़न, सिनेमा - के द्वारा संकलवाद का लाभ उठाते हैं और कुछ निश्चित धारणाओं के स्थान पर, उनके लक्ष्यों के अनुरूप कुछ अन्य धारणाओं को धूर्ततापूर्वक प्रतिस्थापित करने की, विरोधी धारणाओं के घालमेल करने की कोशिश करते हैं।

जब अधिभूतवादी ( metaphysical ) ढंग से सोचनेवाला व्यक्ति अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन, राजनीतिक संघर्ष में और उद्योग या विज्ञान में अंतर्विरोधों से टकराता है, तो वह उन्हें अपने से परे करने, उनसे बचके निकलने, उनकी तीक्ष्णता को घटाने, आदि का प्रयत्न करता है। प्रत्येक नयी घटना और ख़ासकर अनपेक्षित ( unexpected ) घटनाओं के लिए वह केवल बाहरी कारणों की खोज करता है। इस सबसे, बाह्य जगत में होनेवाले परिवर्तनों के वास्तविक कारणों की समझ में ही रुकावट नहीं पड़ती, बल्कि उसके वैयक्तिक जीवन में भी और मानवजाति के भले के लिए उसके सचेत ( conscious ), सोद्देश्य रूपातंरण ( purposive transformation ) में सक्रिय सहभागिता ( active participation ) भी बाधित ( obstructed ) हो जाती है।

इसके विपरीत जो व्यक्ति द्वंद्वात्मक ( dialectic ) ढंग से सोचता है, वह इन अंतर्विरोधों से जूझता है, उन के आपसी संबंधों को समझने की कोशिश करता है, घटनाओं के कारण के रूप में इनकी एकता और संघर्षों के स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। इसलिए वह प्रकृति, समाज तथा चिंतन में वस्तुगत ( objective ) अंतर्विरोधों की उपस्थिति की बात को समझता ही नहीं, बल्कि उनको जानने, उनका अध्ययन करने, आंतरिक को बाह्य से, बुनियादी को गौण से, प्रतिरोधी को अप्रतिरोधी से पृथक करने, उनके बीच संपर्क व निर्भरता का पता लगाने और इन अंतर्विरोधों को पराभूत ( defeated ) करने, उन्हें सुलझाने के साधनों, रूपों तथा तरीकों को खोजने के प्रयत्न भी करता है।

बेशक, विकास ( development ) की वस्तुगत प्रक्रियाओं को हमेशा और हर जगह प्रभावित नहीं किया जा सकता है। लेकिन जहां प्रकृति और समाज के जीवन की घटनाओं को मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप के अंतर्गत लाया जा सकता है, वहां यह कर पाने की योग्यता, प्राकृतिक तथा इतिहास के क्रम पर मनुष्य की तर्कबुद्धिसम्मत कार्रवाई के लिए विराट अवसर प्रदान करती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

7 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

जरूरी श्रंखला।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग-बुलेटिन: एक रेट्रोस्पेक्टिव मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kalpesh Dobariya ने कहा…

यह शुन्खला क्या ग.किरिलेन्को और ल.कोर्शुनोवा द्वारा लिखित और प्रगति प्रकाशन-मोस्को से प्रकाशित "दर्शन क्या हैं?" पुस्तक का संशोधित उद्धरण हैं?

Kalpesh Dobariya ने कहा…

हा, मैंने देखा, यह श्रुंखला के ग.किरिलेन्को और ल.कोर्शुनोवा द्वारा लिखित और प्रगति प्रकाशन-मोस्को से प्रकाशित "दर्शन क्या हैं?"का शब्दशः उद्धरण हैं। ऐसी कोई बात नहीं की आप इसे लिख नहीं सकते, लेकिन ये न कहे की यह आपके ज्ञान का समेकन हैं। उनका नाम लिख दे कम-से-कम। और एक बात: ये बताइयेगा की एडमिन कौन हैं?

समय अविराम ने कहा…

आदरणीय कल्पेश जी,

यह श्रृंखला ‘दर्शन क्या है’ का भी, इसके अलावा यदि आपके पास उपलब्ध हों तो कुछ अन्य पुस्तकों जैसे ‘दर्शन के आधार’, ‘द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद’ आदि की सामग्री को समेकित कर नेट पर प्रस्तुत करने का प्रयास भर है।

यहां यह कभी भी नहीं कहा गया है कि यह हमारे ज्ञान का समेकन है। सबसे पहले और हर बार ही यह लिखा हुआ आप पाएंगे ही कि, "यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है"। और अंत में यह भी कि, "जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।"

नेट पर इस महत्त्वपूर्ण सामग्री को उपलब्ध करना और हम जैसे ही इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए सुलभ बनाना इन प्रस्तुतियों का लक्ष्य है।

शुक्रिया।

Kalpesh Dobariya ने कहा…

अच्छा ! ठीक हैं। ये एक अच्छा प्रयास हैं। और इस विषय में मैंने जितनी किताबे पढ़ी हैं, फिर भी मेरे कुछ सवाल हैं, कुछ कंफ्यूजन हैं। एक्साक्ट्ली मैं दो विपरीत पहलुओ की एकता-संघर्ष और 'निषेध के निषेध' के मुद्दे पर कन्फ्यूज्ड हूँ। आप से बात हो सकती हैं इस बारे में? यहाँ या मेल-बॉक्स में? स्काइप पे हो पाए तो बेहतर।

समय अविराम ने कहा…

आदरणीय कल्पेश जी,

मेल ( mainsamayhoon@gmail.com ) पर संवाद स्थापित करना ठीक रहेगा। आप अपनी बात, अपने संदेह प्रस्तुत कर सकते हैं, हम कोशिश कर सकते हैं कि उन पर बात आगे बढ़ाई जा सके। उम्मीद है कि हमारा संवाद चीज़ों को समझने में एक-दूसरे की मदद कर सकेगा।

शुक्रिया।

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