शनिवार, 12 जुलाई 2014

प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण
( philosophical approaches on categories )

प्राचीन काल में ही अन्य संप्रत्ययों ( concepts ) से प्रवर्गों ( categories ) का भेद जान लिया गया था और तबसे ही प्रवर्गों के बारे में दार्शनिकों के बीच निरंतर विवाद चल रहा है। विभिन्न दार्शनिकों ने प्रवर्गों के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं।

इनमें से एक सिद्धांत की विवेचना करें, जिसे काण्ट  ने प्रतिपादित किया था। काण्ट इस बात पर विशेष बल देते हैं कि चूंकि हर प्रवर्ग उसमें सम्मिलित बहुसंख्य संकीर्णतर संप्रत्ययों की समष्टि है, इसलिए वह हमारे समस्त ज्ञान ( knowledge ) को एक सूत्र में पिरोता है और उसका संश्लेषण ( synthesis ) करता है और इसीलिए संज्ञान ( cognition ) में प्रवर्गों की बहुत ही बड़ी भूमिका है। इस निष्कर्ष के पीछे काण्ट का यह तर्क है : जब लोगों ने पहली बार ऐसी धातु देखी, जिसे जंग नहीं लगता, तो उन्होंने ‘सोना’ संप्रत्यय बनाया। सागरयात्रियों ने जब आर्कटिक महासागर में विराट तैरते हिमपर्वत देखे, तो ‘हिमशैल’ संप्रत्यय पैदा हूआ। इस तरह सभी आम संप्रत्यय भौतिक वस्तुओं के साथ लोगों के संपर्क के परिणाम, हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर इन वस्तुओं के प्रभाव, अर्थात अनुभव ( experience ) के परिणाम हैं। इसलिए वे सब भौतिक विश्व की परिघटनाओं ( phenomena ) के बारे में हमारा ज्ञान हैं।

किंतु प्रवर्ग के साथ दूसरी ही बात है। जिस परिघटना को हम पहले नहीं जानते थे, उससे साक्षात्कार होने पर हम तुरंत उसका कारण ( cause ) ढूंढ़ने लगते हैं, यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसमें सांयोगिक ( coincidental ) क्या है और अनिवार्य ( essential ) क्या है, आदि। इन प्रवर्गों के इस्तेमाल के बिना वस्तुओं के साथ कोई भी संपर्क नहीं होता, कोई भी अनुभव हासिल नहीं किया जाता : हम अभी नहीं जानते कि दत्त ( given ) परिघटना का कारण क्या है, मगर हमें विश्वास है कि उसमें कुछ सांयोगिक और कुछ न कुछ अनिवार्य अवश्य है। इस आधार पर काण्ट  निष्कर्ष निकालते हैं कि हम भौतिक विश्व की वस्तुओं के साथ संपर्क में आने, उनका अनुभव प्राप्त करने से पहले ही अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण आदि के प्रवर्गों से परिचित रहते हैं। काण्ट के अनुसार, प्रवर्ग अनुभव का परिणाम नहीं होता, अपितु अनुभव से पहले ही विद्यमान रहता है, यानि वह अनुभव की पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) है।

काण्ट  आगे कहते हैं : चूंकि प्रवर्ग हमारे मस्तिष्क में अनुभव से पहले ही विद्यमान रहते हैं ( जो बात आम संप्रत्ययों के लिए नहीं की जा सकती ), इसलिए उनमें भौतिक विश्व का कोई ज्ञान नहीं होता ; यथार्थ वास्तविकता ( actual reality ) में ऐसा कुछ नहीं है, जो प्रवर्गों से मेल खाता हो। वे सब, यानी अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण, आदि प्रवर्ग मनुष्य के मस्तिष्क में ही कल्पित ( assumed ) किये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय - प्रवर्ग - भौतिक विश्व पर निर्भर नहीं है और इसी को आगे बढ़ाएं तो चिंतन पदार्थ पर निर्भर नहीं है। इस प्रत्ययवादी ( idealistic ) धारणा के आधार पर काण्ट दावा करते हैं कि प्रवर्ग पैदा नहीं होते, अपितु मानवजाति की उत्पत्ति के क्षण से ही मानव चेतना में शाश्वत रूप से विद्यमान हैं। फिर प्रवर्गों की संख्या और उनका अर्थ भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं : आज जितने प्रवर्ग हैं, उतने ही हजारों साल पहले भी थे और आज उनका जो अर्थ है, वही हमारे प्राचीनतम पुरखों के काल में भी था।

अब आइये, देखें कि प्रवर्गों के प्रति यह प्रत्ययवादी दृष्टिकोण कहां तक सही है, जो कि आज भी प्रत्ययवादियों के द्वारा किसी न किसी रूप में काम में लिया जाता है। हममे से हर कोई प्रतिदिन भौतिक विश्व की परिघटनाओं के संपर्क में आता है और पाता है कि संप्रत्ययों - मोटर, स्विच, विद्युत धारा, टेलीविज़न, उद्योग, मूल्य, श्रम उत्पादिता, आक्सीजन, जीवाणु, आदि-आदि के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इनमें से कोई भी संप्रत्यय हमने स्वयं अपने अनुभव के आधार पर नहीं बनाया है। इनके बारे में हमने अपने शिक्षकों, किताबों, इत्यादि से जाना है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाये कि ये संप्रत्यय अनुभव की उपज नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क में किसी भी अनुभव से पहले ही विद्यमान थे? निस्संदेह, नहीं। यद्यपि हमने और अपने ही अनुभव से किसी संप्रत्यय की रचना नहीं की है, किंतु हमसे बहुत पहले अन्य लोगों ने अपने अनुभव से उनकी रचना अवश्य की थी और बाद में और लोगों ने नये अनुभव-दत्तों के आधार पर उनमें कुछ और जोड़ा, सटीक बनाया और आगे विकास किया।

इस प्रकार जब हम कहते हैं कि हम जीवन में बने-बनाये संप्रत्यय इस्तेमाल करते हैं, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे किसी के भी अनुभव का परिणाम नहीं हैं। लोगों द्वारा बने-बनाये संप्रत्ययों का इस्तेमाल उनके अनुभवेतर ( beyond experience ) मूल का प्रमाण नहीं है। इसके उलट इसके प्रबल प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि सभी प्रवर्गॊं का स्रोत ( source, origin ) अनुभव है।

यदि सभी प्रवर्ग मानव मस्तिष्क में मानवजाति के आविर्भाव ( emersion ) के क्षण से ही मौजूद होते, तो वे उन जनजातियों के चिंतन में भी पाये जाने चाहिए, जो आदिम ( primitive ) गोत्रात्मक व्यवस्था के चरणों में अभी भी विद्यमान हैं। किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि न्यू गिनी के पपुआ लोग अनेक प्रवर्गों को नहीं जानते, यद्यपि कार्य और कारण, इत्यादि कुछ प्रवर्गों से वे परिचित थे। मालों के विनिमय ( exchange of goods ) के समय वे उन्हें एक दूसरे के सामने रखते थे, क्योंकि उन्हें गिनना नहीं आता था। न केवल परिमाण ( quantity ) का प्रवर्ग, अपितु संख्या ( number ) का प्रवर्ग भी उनके लिए अपरिचित था। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि बहुत सी आदिम जातियों को न ऐसा अनुभव था और न संख्या का ज्ञान ही, परिमाण और पदार्थ जैसे प्रवर्गों की जानकारी तो और भी दूर की बात है।

दूसरे, यदि प्रवर्ग अनुभव से पहले ही मस्तिष्क में होते, तो बच्चे को भी उनका ज्ञान होना चाहिए था। किंतु वास्तविकता तो यह है कि दो वर्षीय बच्चा बहुत से दूसरे संप्रत्ययों को सीख-जान जाने के बावजूद संख्या के संप्रत्यय ( और इसलिए परिमाण के संप्रत्यय से भी ) से परिचित नहीं होता। ये तथ्य अकाट्यतः प्रमाणित करते हैं कि अन्य सभी संप्रत्ययों की भांति प्रवर्ग भी अनुभव की उपज होते हैं, कि कुछ प्रवर्ग पहले पैदा होते हैं और कुछ बाद में और इसलिए उनकी संख्या स्थायी कतई नहीं है। निस्संदेह, नये प्रवर्गों की उत्पत्ति में संकीर्ण सप्रत्ययों की अपेक्षा कई गुना समय लगता है और यह प्रक्रिया ( process ) आज भी जारी है।

इस तरह हम देखते हैं कि सामान्यतः सभी संप्रत्ययों की भांति सभी प्रवर्ग अनुभव से निकाले गये हैं और वे वास्तविकता के प्रतिबिंब ( reflection, image ) हैं। इन अत्यधिक व्यापक संप्रत्ययों की विशिष्टता यह है कि वे यथार्थ वास्तविकता के लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं, जो ब्रह्मांड की कुछेक नहीं, अपितु सभी परघटनाओं में पाये जाते हैं। इसीलिए इन मूल व्यापक संप्रत्ययों यानि प्रवर्गों का इतना बड़ा संज्ञानकारी महत्त्व है। प्रवर्ग, मनुष्य के समक्ष फैले हुए प्रकृति की परिघटनाओं के जाल में पृथक्करण ( segregation ), अर्थात विश्व के संज्ञान के चरण हैं और इस जाल के वे मुख्य बिंदु हैं जो उसे जानने और उसपर काबू पाने में मनुष्य की मदद करते हैं।

प्रवर्गों का भी विकास होता है और सभी प्रवर्ग परस्पर संबद्ध ( associated ) भी होते हैं, क्योंकि वे परिवेशी विश्व की, जिसकी सभी परिघटनाएं मिलकर एक समष्टि ( a whole ) बनाती हैं, विभिन्न प्रक्रियाओं, पक्षों और लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं। यहां हम अगली बार से भौतिकवादी द्वंद्ववाद के कुछ प्रमुख प्रवर्गों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, थम गया हुल्लड़ का हुल्लड़ - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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