शनिवार, 27 सितंबर 2014

अनिवार्यता और संयोग - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि इन प्रवर्गों पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोण क्या कहते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अनिवार्यता और संयोग - २
( necessity and chance ) - 2

हमारे परिवेशी विश्व में अनिवार्यता और संयोग के बीच आपस में क्या संबंध है?

एक उत्तर इस प्रकार है : ऐसा कुछ नहीं है, जिसे अवश्यमेव घटना है, और ऐसा भी कुछ नहीं है, जो घट न सके। सब कुछ, सभी घटनाएं, चाहे वे हमें कितनी भी असंभाव्य क्यों न लगें, घट सकती है और ऐसे भी घट सकती हैं और वैसे भी। इस दृष्टि से यथार्थ वास्तविकता में कुछ भी असंभव नहीं है : अनिवार्य ( necessary ) नाम की कोई चीज़ नहीं है और विश्व में जो कुछ भी घटता है, वह नितांत संयोग ( chance ) है।

इस दृष्टिकोण के सार को एक उपन्यास, जिसका नायक कान से पैदा हुआ था, के इन शब्दों में लेखक ने सटीक ढंग से व्यक्त किया है : "मुझे लगता है कि आपको इतने अजीब जन्म पर विश्वास नहीं हो रहा है....आप कहेंगे कि इसमें तनिक भी सच नहीं है....किंतु अगर भगवान ने ऐसा ही चाहा था, तो क्या आप कहेंगे कि वह ऐसा नहीं कर सकता था?....इसीलिए मैं आपसे कह रहा हूं कि भगवान के लिए कुछ भी असंभव नहीं है और अगर वह चाहता है, तो सभी औरतें कानों से ही बच्चे पैदा करतीं।"

जो व्यक्ति अनिवार्यता को नहीं मानता और सोचता है कि दुनिया में सब कुछ संभव है ( इस दृष्टिकोण को अनियतत्ववाद indeterminism कहते हैं ), उसे यह भी मानना होगा कि वह जिस पत्थर पर बैठा था, वह हालांकि अभी तो ख़ामोश है, मगर सर्वथा यह संभव है कि कभी शास्त्रीय गीत गाने लगे, या यह कि यद्यपि कुत्ता चौपाया जानवर है, मगर बिल्कुल मुमकिन है कि उसका पिल्ला बीस पैरोंवाला होगा, या यह कि दो और दो अभी तो चार होते हैं, मगर शायद शाम तक दो और दो एक भी हो सकता है।

अनियतत्ववादी ( indeterminists ) कहने को तो अनिवार्यता और प्रकृति के नियमों को नहीं मानते, मगर व्यवहार में उन्हें अनिवार्यता और प्रकृति के नियमों को मानना ही पड़ता है। यह दिखाता है कि उपरोक्त सिद्धांत कितना अयुक्तिसंगत ( irrational ) है। यहां तक कि धर्म के सरमायेदार भी, जो यह दोहराते नहीं थकते कि ईश्वर के लिए अनिवार्यता कुछ नहीं है, कि उसके लिए सब कुछ संभव है, क़दम-क़दम पर अपने अनियतत्ववाद से पीछे हटते हैं। उन्हें यह मानने पर मज़बूर होना पडा है कि वास्तविकता के बहुत से क्षेत्रों में अनिवार्यता का ही राज है और ‘सर्वशक्तिमान’ ईश्वर भी उसे नहीं बदल सकता : ईश्वर अतीत को नष्ट नहीं कर सकता, वह ऐसा नहीं कर सकता कि त्रिभुज के तीनों कोणों का योग दो समकोणों के बराबर न हो या झूठ सच बन जाये, वग़ैरह-वग़ैरह।

अनियतत्ववाद का विरोध यांत्रिक नियतत्ववाद ( mechanical determinism ) के समर्थक भी करते हैं। वे कहते हैं कि धार्मिक विश्वास में प्राकृतिक नियमों के सभी तरह के उल्लंघनों और सभी तरह के चमत्कारों के लिए जगह है, जबकि विज्ञान सिद्ध करता है कि विश्व में सब कुछ प्रकृति के नियमों और अपरिहार्य अनिवार्यता के अनुसार घटता है। घटनाएं जिस रूप में घटती हैं, उससे भिन्न रूप में वे नहीं घट सकती। यदि एक भी घटना नियमों के विपरीत घटती या ऐसी एक भी घटना होती, जो नहीं घट सकती थी ( संयोग ), तो वह कारणहीन तथ्य या चमत्कार ही होता। किन्तु चमत्कार न तो होते हैं और न हो ही सकते हैं। इस प्रकार की तर्कणा के आधार पर स्पिनोज़ा  ने निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति में कुछ भी सांयोगिक नहीं है, कि विश्व में केवल अनिवार्यता है और सब कुछ पूर्वनिर्धारित है।

क्लासिक यांत्रिकी ( classical mechanics ) से इस दृष्टिकोण की पुष्टि हुई। क्लासिक यांत्रिकी के नियम पृथक पिण्ड की गति के प्रक्षेप-पथ को पूर्ण परिशुद्धता ( accuracy ) और अचूक अपरिहार्यता के साथ पूर्वनिर्धारित करते हैं, इस मान्यता के आधार पर वैज्ञानिक आश्चर्यजनक यथातथ्यता ( preciseness ) के साथ आकाशीय तथा पार्थिव पिण्डों के स्थान-परिवर्तन की भविष्यवाणी किया करते थे। किन्तु जब विज्ञान का पृथक पिण्डों की गति के प्रक्षेप-पथ से कहीं अधिक जटिल परिघटनाओं से वास्ता पड़ा, तो स्पष्ट हो गया कि यांत्रिक नियतत्ववादियों का दृष्टिकोण भी अयुक्तिसंगत है।

जैसे कि जीवों तथा वनस्पतियों के संबंध में प्रकृति का नियम है कि उनमें से कोई भी नित्य नहीं है। किंतु कुछ ऐसे नियम है, जिनके अनुसार कतिपय जीव तथा वनस्पति जातियों का जीवन अत्यधिक लंबा होता है। बरगद के वृक्ष हज़ारों वर्ष जीवित रह सकते हैं, मगर बरगद के हर अलग पौधे के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती : वह दूसरे, बीसवें या हज़ारवें दिन ही मर सकता है। ऐसा कोई नियम नहीं है, जो हर अलग पौधे या जीव की मृत्यु के दिन या घंटे को पूर्वनिर्धारित कर सके।

हर घटना अनिवार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है और उसके घटने में, उसकी ‘घड़ी आने’ में कुछ भी बाधक नहीं बन सकता, यह स्वीकृति हमें नियतिवाद ( fatalism ) पर ले आती है। एक उपन्यास के नायक ने तब इसी तरह सोचा था, जब उसने अपनी कनपटी पर पिस्तौल तानते हुए कहा था कि यदि यह अनिवार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है कि मैं इसी क्षण मर जाऊं, तो यह होकर ही रहेगा, चाहे मैं गोली चलाऊं या नहीं, और अगर यह पूर्वनिर्धारित है कि आज मुझे ज़िंदा बचना है, तो मैं घोड़ा दाबूं या नहीं, इसके बावजूद मैं ज़िंदा रहूंगा ही। नियतिवाद लोगों के रोजमर्रा के व्यवहार से इतना असंगत है कि उसे स्वीकार करने को यांत्रिक नियतत्ववाद के घोरतम समर्थक भी तैयार न हुए। किंतु घटनाओं को अपरिहार्य रूप से पूर्वनिर्धारित मानने के बाद नियतिवाद से कैसे बचा जा सकता है, यह कोई भी यांत्रिक नियतत्ववादी नहीं बता सका। नियतिवाद, यांत्रिक नियतत्ववाद का अनिवार्य परिणाम है

कभी-कभी प्राकृतिक वरण ( natural selection ) के महत्त्वपूर्ण जीववैज्ञानिक नियम का यह अर्थ लगाया जाता है कि हर प्राणी भाग्य के हाथ की कठपुतली है : यदि उसने अपने को जीवन के लिए औरों से कम अनुकूल बनाया है, तो वह जल्दी मर जायेगा और उसका वंश नहीं बढ़ पायेगा, और यदि उसने अपने को जीवन के लिए औरों से बेहतर अनुकूल बनाया है, तो वह बहुत समय तक जियेगा और उसका वंश ख़ूब बढ़ेगा। किंतु इस नियम की ऐसी व्याख्या सरासर ग़लत है। औरों से कम अनुकूलित अकेला प्राणी अपनी जाति के अन्य प्राणियों जितने लंबे समय तक ज़िंदा भी रह सकता है और जन्म के तुरंत बाद मर भी सकता है। उसके सामने बहुत सी दूसरी संभावनाएं भी है। नियम यह पूर्वनिर्धारित नहीं करता कि उस प्राणी के मामले में इनमें से कौनसी संभावना पूरी होगी। जड़ प्रकृति में भी नियम इसी तरह काम करते हैं।

कुछ दार्शनिक अनियतत्ववाद और यांत्रिक नियतत्ववाद की त्रुटिपूर्णता को देखकर मध्यम मार्ग अपनाते हैं। वे कहते हैं कि हर घटना या तो अनिवार्यता है या संयोग। छोटी, अमहत्त्वपूर्ण घटनाएं संयोग हैं और बड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाएं अपरिहार्यता, अनिवार्यता। सांयोगिक घटनाओं में कोई अनिवार्यता नहीं होती, इसलिए वे किन्हीं भी नियमों से नियंत्रित नहीं हैं और उन्हें चमत्कार ही माना जाना चाहिए। जहां तक अनिवार्य घोषित घटनाओं का संबंध है, तो इन दार्शनिकों के अनुसार उनमें से हर एक अपरिहार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है और हम नियतिवादियों की तरह अवश्यंभाविता के मूक दर्शक ही बन सकते हैं। मध्यमार्गी दृष्टिकोण में पूर्वोक्त दो दृष्टिकोणों जैसी त्रुटियां तो हैं ही, पर इसके अलावा वह इसका निर्धारण पूरी तरह मनुष्य की मर्ज़ी पर छोड़ देता है कि कौन सी घटनाएं चमत्कार है और कौन सी अवश्यंभावी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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