शनिवार, 14 मार्च 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका पर विचार शु्रू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - १
( the role of abstraction in knowing - 1 )

मनुष्य अपने क्रियाकलाप में केवल संवेदनों ( sensations ) तथा संवेद जन्य बिंबों ( sensory images ) का ही उपयोग नहीं कर सकता है। वे विश्व को समझने और, उससे भी अधिक, उसी रूपांतरित ( transform ) करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन क्यों? पहला तो इसलिए कि, क्योंकि हम अपने संवेदन दूसरे लोगों को हस्तांतरित नहीं कर सकते, हांलांकि हम उनके बारे में बात कर सकते हैं ; हम दूसरे लोगों के मस्तिष्कों में मौजूद संवेद बिंबों का अनुभव नहीं कर सकते हैं, हालांकि हम उनके बारे में बातचीत से या पुस्तकें पढ़कर जान सकते हैं। दूसरा इसलिए भी कि, दैनिक जीवन तथा विज्ञान दोनों में हमारा वास्ता ऐसे ज्ञान से पड़ता है, जो संवेद प्रत्यक्ष ( sense perception ) के, यानी संवेदनों के ज़रिये हासिल या विकसित नहीं किया जा सकता है।

मसलन, हम एक संख्या, ऐतिहासिक प्रक्रिया, भूतद्रव्य ( matter ), आदि को देख, सुन, सूंघ या स्पर्श नहीं कर सकते, हालांकि हम दो सेबों को देख सकते हैं, युद्ध जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को या प्रथम भूउपग्रह के प्रक्षेपण को देख सकते हैं या किसी एक भौतिक वस्तु को छू और सूंघ सकते हैं, जैसे एक फूल को या कॉफ़ी के प्याले को। एक साकल्य ( whole ) के रूप में विश्व के तथा उसमें जारी प्रक्रियाओं के जटिल ज्ञान को विकसित करने और नये ज्ञान के अंतरण ( pass on or transfer ), भंडारण ( store ) तथा सर्जन ( creation ) के लिए हमें संकल्पनाओं ( concepts ) की तथा उनसे जुड़ी तार्किक प्रक्रियाओं ( logical processes ) की जरूरत होती है। ज्ञान के इन रूपों का संवेदनों के साथ क्या संबंध है? वे कैसे उत्पन्न होते हैं?

संकल्पनाओं की रचना की प्रक्रिया को अक्सर अपकर्षण या अमूर्तकरण ( abstraction ) कहा जाता है, इसलिए संकल्पनाओं को भी बहुधा अमूर्त या अपकर्षित कहा जाता है। अपकर्षण/अमूर्तकरण कई अवस्थाओं ( stages ) में होता है। सबसे पहले हममें, एक से संवेदनों तथा संवेद बिंबों को उत्पन्न करनेवाली विविध वस्तुओं का एक प्रकार का समूहन ( grouping ) होता है। एक पके हुए सेब, गाजर तथा स्तनपायी के रुधिर में उनके सारे अंतरों के बावजूद एक समान अनुगुण ( property ) होता है, जिसकी वज़ह से वे सब हम में एक समान रंग-संवेद, यानी लाल रंग का रंग-संवेद पैदा करते हैं। हम एक वस्तु को दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करनेवाले सारे अंतरों को अपकर्षित करते हैं, यानी सारे अंतरों को छोड़ देते हैं। दूसरी अवस्था में हम एक ही विशेषता के विविध सूक्ष्म भेदों ( nuances ) या प्रकारांतरों का मानो समानीकरण ( equate ) करते हैं या उन्हें तद्रूप ( identify ) बनाते हैं। मसलन, हम एक ही रंग की सारी आभाओं ( shades ) को समरूप मान लेते हैं।

अगली अवस्था में हम ‘शुद्ध’, आदर्श रूप में विभेदित अनुगुणों व संबंधों को घनीभूत बनाते, समेकित ( consolidated ) करते हैं, इस रूप में वे शायद स्वयं प्रकृति या समाज में भी नहीं पाये जाते हैं। इसलिए इस अवस्था को अक्सर आदर्शीकरण ( idealisation ) कहा जाता है। अंत में, चौथी अवस्था पर विभेदित तथा अलग किये हुए अनुगुणों को भाषा में घनीभूत बनाया जाता है। यह नामकरण ( denomination ) की अवस्था है। प्रदत्त अनुगुण को एक पृथक ( separate ) शब्द या शब्दों के समूह के ज़रिये नाम दिया जाता है। इस तरह, शब्दों में व्यक्त एक संकल्पना पैदा होती है। वस्तुओं के जिस समूह का यह हवाला देती है, वह इसका आशय ( meaning ) है, जबकि संकल्पना में घनीभूत तथा परावर्तित अनुगुण या संबंध, उसके अभिप्राय ( sense ) का द्योतक है। संकल्पना ‘लाल’ का अभिप्राय, एक निश्चित ऊर्जा की प्रकाश किरणों की हममें एक निश्चित रंग-संवेद उत्पन्न करने की क्षमता ( capacity ) से है। इस संकल्पना का आशय वे वस्तुएं हैं, जो उस ऊर्जा की किरणों को परावर्तित करती हैं। संकल्पना ‘शोषण’ ( exploitation ) का अभिप्राय है अन्य लोगों के श्रम से मुनाफ़ा खसोटना, इसका आशय है उत्पादन संबंधों की एक निश्चित क़िस्म।

संवेदनों की ही भांति, अपकर्षण/अमूर्तकरण भी वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) का परावर्तन ( reflection ) है।  वास्तविक जीवन में वे एक दीर्घावधि में विकसित और परिष्कृत ( refined ) होते हैं। वे संवेदनों तथा संवेद बिंबों पर आधारित होते हैं। लेकिन संवेदनों के विपरीत, अपकर्षण भौतिक वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के संवेद द्वारा अनुबोधित ( perceived ) केवल बाह्य पक्ष को और केवल उसी को उतना परावर्तित नहीं करते, जितना उनके उन आंतरिक संयोजनों ( inner connections ) तथा संबंधों को करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से संवेद अनुबोधन/प्रत्यक्षण ( perception ) के लिए उपलब्ध नहीं होते हैं। इस तरह अपकर्षण, यथार्थता को अधिक गहराई से, अधिक सत्यता से और अधिक पूर्णता से परावर्तित करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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