शनिवार, 18 अप्रैल 2015

तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - २
( rational cognition or abstract thinking - 1 )

चिंतन-प्रक्रिया में संकल्पनाएं ( concepts ) आम तौर पर निर्णयों के अवयव ( elements of judgments ) होती हैं। निर्णय एक प्रकार का विचार ( thought ) है, जो इस बात को उचित या ग़लत ठहराता है कि कुछ लक्षण ( features ) एक निश्चित वस्तु या वस्तु-समूह के हैं, या जो वस्तुओं के बीच एक संबंध ( relation ) के होने या न होने का दावा करते हैं। मसलन, ऐसे विचार कि, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, ‘एशियाई, अफ़्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों के पिछड़ेपन के लिए उपनिवेशवाद ( colonialism ) दोषी है’ और ‘समाजवाद ( socialism ) सामाजिक न्याय का समाज है’ निर्णय हैं। इनमें से पहला विचार मनुष्य और समाज के बीच संबंध, दूसरा उपनिवेशवाद तथा अनेक अल्पविकसित देशों के बीच तथा तीसरा समाजवाद और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को निश्चित करता है।

एक निर्णय, प्रत्यक्ष प्रेक्षण ( observation ) से भी निरूपित किया जा सकता है और अन्य निर्णयों के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से भी। चिंतन के जिस रूप के द्वारा एक या कई अन्य निर्णयों से एक नया निर्णय निगमित ( deduced ) किया जाता है, उसे अनुमान ( inference ) या अनुमिति ( conclusion ) कहते हैं। जिन निर्णयों से अनुमान का निष्कर्षण ( drawn ) होता है, उन्हें आधारिका ( premises ) और नये निर्णय को निष्कर्ष ( conclusion ) या परिणाम ( consequence ) कहते हैं। अनुमान का एक उदाहरण ऐसे लिया जा सकता है : "पितृसत्तात्मक (  patriarchal ) समाजों में स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की होती है। भारत के अधिकतर हिस्सों में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना अभी भी कायम है। फलतः, भारत के अधिकतर हिस्सों में अभी भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है।" यहां पहले दो निर्णय इस प्रकार संबंधित हैं कि उनसे ऐसे नये निर्णय का अनुमान करना संभव हो जाता है, जिसमें एक नया प्रत्यय ( idea ) निहित हो।

जिन घटनाओं को प्रत्यक्षतः नहीं देखा जा सकता है, परंतु जो ज्ञात नियमों से संचालित ( governed ) हैं, उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुमानों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। अनुमान, विभिन्न प्रस्थापनाओं ( propositions ) की सत्यता अथवा तर्कदोष ( fallacy ) को प्रमाणित करने, स्थापित तथ्यों और नियमों को स्पष्ट करने और अन्वेषित नियमानुवर्तिताओं ( discovered uniformities ) के बल पर वैज्ञानिक भविष्यवाणियां करने में सहायक होते हैं।

संज्ञान की संवेदनात्मक ( sensory ) और बौद्धिक ( rational ) अवस्थाएं घनिष्ठता से अंतर्संबंधित ( interconnected ) हैं। वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तु या घटना के अलग-अलग पक्षों तथा संबंधों के प्रत्यक्ष अवबोधन ( perception ) से शुरू होता है। फिर प्रयोग किये जाते हैं, जिनमें सामान्य (general ) को प्रकाश में लाने के लिए, इन पक्षों और संबंधों की तुलना तथा मिलान करने के लिए सामग्री प्राप्त होती है। इसके उपरांत अपकर्षण ( abstraction ) होता है, यानी वस्तुओं और घटनाओं के कुछ अनुगुणों ( properties ) और संबंधों से ध्यान हटाना तथा सामान्यीकरण, यानी महत्त्वपूर्ण निर्णायक अनुगुणों और संबंधों को प्रकट करना। इससे आगे वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तुओं और प्रक्रियाओं के आंतरिक संबंधों, उनकी अंतर्क्रियाओं ( interactions ) तथा कायांतरणों ( transmutations ) और उनके विकास की निर्णायक नियमानुवर्तिताओं को उद्‍घाटित करता है।

हमारे ज्ञान के गहराने के साथ ही इन संयोजनों, संबंधों और स्वयं वस्तु का परावर्तन ( reflection ) भी संवेदनात्मक बिंब ( sensory image ) को गंवाने लगता है, लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया जारी रहती है, क्योंकि वैज्ञानिक अपकर्षण उसको भी समझना संभव बना देता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण नहीं हो सकता है। यहां यह मुद्दा ध्यान में रखना चाहिये कि संवेदनात्मक संज्ञान की ही भांति चिंतन भी व्यवहार ( practice ) पर, व्यावहारिक मानवीय आवश्यकताओं पर आश्रित तथा उनसे संबंधित होता है और व्यवहार से हासिल जानकारी पर भरोसा करता है

मानव संज्ञान के विकास का नियम, आभास ( appearance ) ) से सार ( essence ) की ओर, बाह्य ( external ) से आंतरिक ( internal ) की ओर होनेवाली हरकत ( movement ) है। विज्ञान का सारा इतिहास इसका गवाह है। मसलन, पहले के कई अर्थशास्त्रियों ने पण्यों ( commodities ) के बाहरी अनुगुण देखे थे, यानी उनकी उपयोगिता ( उपयोग मूल्य ) तथा विनिमय क्षमता ( विनिमय मूल्य )। लेकिन पण्यों के अनुगुणों की इन बाह्य अभिव्यक्तियों में गहरे आंतरिक संबंध छुपे हुए हैं। वह मार्क्स थे, जिन्होंने इनका पता लगाया और सारे पण्यों के सर्वनिष्ठ ( common ) गुण को, यानी उनके उत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम ( social labour ) को उद्‍घाटित किया। पण्य का मूल्य, श्रम की सामाजिक प्रकृति को, लोगों के बीच सामाजिक संबंधों को व्यक्त करता है।

वैज्ञानिक सैद्धांतिक चिंतन की भारी अहमियत इस बात में है कि यह विश्व के संज्ञान में एक ऐसा सशक्त औज़ार है, जो मनुष्य को सत्य ( truth ) की समझ में समर्थ ( enable ) बनाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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