शनिवार, 3 सितंबर 2011

भावनाओं के रूप - मनोदशा तथा खिंचाव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं के रूपों के अंतर्गत संवेग तथा भाव पर विचार किया था, उसी को आगे बढ़ाते हुए इस बार हम मनोदशा तथा खिंचाव पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनोदशा ( Mood )

मनोदशा ( चित्तवृत्ति ) अपेक्षाकृत लंबी अवधि में मनुष्य के व्यवहार की पृष्ठभूमि का काम करनेवाली सामान्य संवेगात्मक अवस्था ( general impulsive state ) को कहते है। मनोदशाएं आनंदपूर्ण अथवा उदासीभरी, आह्लादमय अथवा विषादभरी, उत्तेजित अथवा विषण्ण ( despondent ), गंभीर अथवा चंचल, चिड़चिड़ी अथवा सह्रदयतापूर्ण, वग़ैरह कैसी भी हो सकती है। दोस्ताना मज़ाक या बात पर आदमी की प्रतिक्रिया काफ़ी हद तक इस पर निर्भर होती है कि उसका मिज़ाज अच्छा या बुरा, कैसा है।

आम तौर पर मनोदशाएं अनैच्छिक ( involuntary ) और अस्पष्ट होती हैं। हो सकता है कि मनुष्य उसपर ग़ौर भी न करे। किंतु कभी-कभी मनोदशा ( उदाहरणार्थ, उल्लास अथवा चिंता ) काफ़ी प्रखर ( intensive ) बन जाती है। ऐसे मामलों में वह मनुष्य की मानसिक सक्रियता ( उसके विचारों के क्रम, मस्तिष्क के द्रुत कार्य ), उसकी गतियों व कार्यों और यहां तक कि वह जो काम कर रहा है, उसकी उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।

मनोदशाओं के तात्कालिक और अप्रत्यक्ष, सभी तरह के कारण हो सकते हैं। मनोदशाओं का मुख्य स्रोत यह है कि मनुष्य अपने जीवन, काम, पारिवारिक जीवन, पढ़ाई, जीवन के विभिन्न द्वंदों के हल के ढंग, आदि से किस हद तक संतुष्ट है। यदि चिंता अथवा अवसाद की स्थिति देर तक बनी रहती है, तो यह इसका निश्चित लक्षण है कि दत्त मनुष्य के जीवन में जरूर कुछ गड़बड़ी है।

मनोदशाएं काफ़ी हद तक मनुष्य के स्वास्थ्य पर, विशेषतः तंत्रिका-तंत्र और जो अंतःस्रावी ग्रंथियां चयापचय का नियंत्रण करती हैं, उनकी अवस्था पर निर्भर होती हैं। रोग का मनुष्य की सामान्य मनोदशा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। शारीरिक व्यायाम और खेलकूद निम्न मनोबल का बड़ा कारगर इलाज है, फिर भी सर्वोत्तम दवा यह है कि मनुष्य अपने काम की उपयोगिता को समझे, उसमें संतोष पाए और अपने साथियों तथा प्रिय व्यक्ति से उसे नैतिक समर्थन मिले

मनुष्य को अपनी मनोदशा के स्रोत की जानकारी होना अनिवार्य नहीं है, फिर भी मनोदशाओं के स्रोतों को जाना जा सकता है, हालांकि इसके लिए कुछ कौशल की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, किसी मनुष्य के उदास रहने का कारण यह हो सकता है कि वह अपना कोई वायदा पूरा नहीं कर पाया है। इस तरह की चूकें उसकी ‘अंतरात्मा’ को कचोटती रहती हैं, हालांकि वह ज़्यादातर यह कहेगा कि उसकी उदासी का कोई उचित कारण नहीं है। ऐसे मामलों में उसे अपनी विषण्णता ( despondency ), उदासी का वास्तविक कारण मालूम करने और यदि संभव हो, तो उस कारण को ख़त्म करने का प्रयत्न करना चाहिए।

खिंचाव ( Stress )

खिंचाव ( स्ट्रेस ) अथवा संवेगात्मक खिंचाव एक विशेष प्रकार का संवेग है, जो अपने मनोवैज्ञानिक लक्षणों की दृष्टि से भाव से और मियाद की दृष्टि से मनोदशा से समानता रखता है। संवेगात्मक खिंचाव ख़तरे, नाराज़गी, शर्म, तनाव, आदि की परिस्थितियों में पैदा होता है, किंतु भाव जितना प्रखर विरले ही बन पाता है। सामान्यतः खिंचाव की अवस्था में मनुष्य का व्यवहार व वाक् अव्यवस्थित हो जाते हैं और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता होने पर भी मनुष्य निष्क्रियता तथा सुस्ती दिखाता है। किंतु जब खिंचाव ज़्यादा नहीं होता, वह मनुष्य को सक्रियता के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित कर सकता है। ख़तरा प्रायः मनुष्य की सोई शक्तियों को जगा देता है और उसे साहस तथा संकल्प के साथ कार्य करने को उकसाता है।

खिंचाव की परिस्थिति में मनुष्य का व्यवहार काफ़ी हद तक उसके तंत्रिका-तंत्र पर, उसकी तंत्रिका-प्रक्रियाओं की शक्ति अथवा दुर्बलता पर निर्भर करता है। खिंचाव पैदा करने वाले कारकों का सामना करने की मनुष्य की क्षमता की एक कसौटी परीक्षा है। कुछ परीक्षार्थी अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, उन्हें कुछ याद नहीं रहता और वे सवालों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते, जबकि कुछ अपनी पूरी ताक़त जुटा लेते हैं और सामान्य स्थितियों से भी बेहतर ढंग से काम करते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

1 टिप्पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post .

मुग़ले आज़म और उमराव जान को भी हिंदी फ़िल्म ही का प्रमाण पत्र दे देते हैं।

क्या है हिंदी ?

कहां है हिंदी ?

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