शनिवार, 18 मई 2013

संवाद और लेखन की प्रासंगिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



संवाद और लेखन की प्रासंगिकता

कहीं मेरे लिखे से या लम्बे संवाद से, आप परेशानी तो नहीं महसूस करते? कहीं आप इससे नाराज तो नहीं होते?...

कभी-कभी आप थोड़ा भावुक हो उठते हैं। हमारे पास अपनी कार्य-योजनाएं हैं जिनके अनुसार हमें अपने वक़्त का अधिकतम उपयोग करना होता है। आपको हमने स्वयं ही अपनी संवाद प्रक्रिया में लिया है। अब यह भी एक जरूरी कार्य मात्र है, हालांकि थोड़ी बहुत भावनाएं भी इससे जुड गई हैं, क्योंकि आपमें हमें संभावनाएं नज़र आती हैं। हमारी वैयक्तिक मानसिक हलचल के लिए भी यह संवाद एक अवसर पैदा करता है। यह दो तरफ़ा मामला है अतएव आप एकतरफ़ा रूप से परेशान ना हुआ करें।

हमें जब परेशानी होती है, जब वक़्त नहीं मिलता तो आपने देख ही लिया है कि संवाद में देर हो जाती है। बस इतनी सी बात है। परंतु जब फिर आपसे रूबरू होते हैं तो पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से, बिना किसी समस्या और तकलीफ़ के आपके साथ होते हैं। इसलिए आप परेशान ना हुआ कीजिए कि हमें कोई परेशानी या नाराज़ी हो रही होगी। आप हमारी देरी को अन्यथा नहीं लिया कीजिए। जब ऐसा कुछ भी लगेगा या होगा, हम साफ़ आपसे जिक्र कर देंगे। और वैकल्पिक व्यवस्था बना लेंगे। आप निश्चिंत रह सकते हैं।

आप इतना जरूर सुझाएँ कि क्या मैं लिखना छोड़ दूँ? वैसे मैंने लिखना शुरू भी इसी साल किया था। सरकारों और शोषक-वर्ग की अलोचना में क्या गलत करता हूँ मैं?...

अगर आप ऐसा लिखते हैं कि किसी को समस्या होगी तो फिर होगी ही, इसमें परेशान होने वाली बात क्या है? अपना मत प्रस्तुत करने में कुछ भी ग़लत नहीं, लिखना कोई ग़लत बात नहीं। हां आप यह भी साथ ही चाहें कि लोग उससे मुतमइन भी हों तो फिर ग़लत बात हो सकती है। लिखना आपका काम है, और आपको जरूरी लगता है तो आप करते रहिए। स्वीकार करना, नहीं करना या फिर अपने मतभेद पेश करना औरों का अधिकार है। इसमें हर्ज भी क्या हो सकता है।

आपको यदि जरूरी लगता है तो बहस शुरू करें, नहीं लगता है तो नहीं करें। जरा सा भी विरोध या अनेपेक्षित प्रतिक्रिया पर हमारी बेचैनी, हमारी अपरिपक्वता को ही प्रदर्शित करती है। यह होता है कि कई बार हम अपनी बात को बहुत सही या जरूरी मान रहे हों, और दूसरों की प्रतिक्रियाएं इस पर सवाल उठाती हो तथा उनका जवाब हमसे भी नहीं सूझ पा रहा हो तो ऐसे में हमें अपनी मान्यताओं पर ही शक होने लगता है। यह हमारा खोखलापन होता है और बेचैनी पैदा करता है। इसका मतलब इतना सा ही है कि हम अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार करें, उन पर अपनी समझ बढ़ाएं, ग़लत लगती हों तो उन्हें बदलें और यदि सही लगती हों तो उन पर उठी जिज्ञासाओं के जवाब देने में अपने को और अधिक सक्षम बनाएं।

कुछ लोग हमारे शुभचिंतक हो सकते हैं और हमें राय दे सकते हैं, कि काहे व्यर्थ में समय जाया कर रहे है। उनकी हमारे से अपेक्षाएं अलग हो सकती हैं।

यह जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि बिना पूरी तैयारियों के, बिना ठोस आधार तैयार किए, बिना उसके बारे में सही समझ विकसित किए यदि हम आम मान्यताओं से हटकर, अपनी कुछ मान्यताओं को बनाते हैं, अपने कुछ विश्वास चुनते हैं और फिर तुरंत ही आम मैदान में उनका झुनझुना बजाने, उनका ढिंढोरा पीटने में लग जाएंगे तो तकलीफ़ पैदा हो सकती है। क्योंकि ऐसे में ये सिर्फ़ आपके श्रेष्ठताबोध का प्रतिनिधित्व करती नज़र आएंगी। और जरा सा संवाद या बहस आपकी सतही समझ की पोल खोल देगी।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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