शनिवार, 4 मई 2013

कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता


हम इस बात पर सहमति रखते हैं कि सारे क्रांतिकारी मार्क्स-लेनिन से लेकर धार्मिक-जन, जैसे बिस्मिल-नेताजी तक, अधिकतर भावनाओं के कारण लड़े। सहानुभूति से उत्पन्न दुख भावनाओं का खेल है।...हमारी समझ से यह चिंतन के साथ भावनाओं का गठजोड़ है ही।

कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता के बीच समझ और विवेक का अंतर होता है। भावनाएं यदि कुछ समाजोन्मुखी मूल्यों के साथ व्यक्ति के व्यवहार में नियामक ( regulatory ) भूमिका नहीं निभाती तो ये समाज के हितों के विपरीत भी जा सकती हैं, खतरनाक भी हो सकती हैं। इसलिए हमें भावनाओं और उनसे जुडे व्यवहार में भी अंतर करना सीखना होगा।

आपका शायद ‘समय के साये में’ पर ही भावनाओं वाली मनोविज्ञान श्रृंखला से गुजरना हुआ हो। भावनाएं, मनुष्य के चीज़ों के प्रति रवैयों पर निर्भर होती है, और व्यक्ति के रवैये की जड़े उसके दृष्टिकोण, उसके समग्र व्यक्तित्व में होती हैं। इसका मतलब यह होता है कि अलग-अलग व्यक्ति एक ही चीज़ के प्रति अपने अनुकूलन के अनुसार अलग-अलग भावनाएं महसूस कर सकता है। यहीं आकर भावनाओं के दायरों और उनकी सामाजिक उपादेयता पर भी तुलनात्मक रूप से विचार करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। हर तरह की भावना को जायज़ और सही नहीं ठहराया जा सकता।

वृहत सामाजिक मूल्यों से असंपृक्त कोरी भावुकताएं ही, जो किसी भी विभाजक तथ्यों के लिए पैदा होती हैं, या किसी व्यक्ति या समूह के द्वारा उभारी जा सकती हैं; उस तरह की कई नकारात्मक परिघटनाओं के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिनका जिक्र आपने अपने भाषण में किया था। वहीं वृहत सामाजिक मूल्यों से संपृक्त उच्च स्तरीय भावनाएं ऐसी कई व्यक्तिगत अवदानों का कारण बन सकती हैं जिनका कि भी जिक्र आपने किया था। अभी अधिक नहीं कहते हैं, पर इतना जरूर कह सकते हैं कि सिर्फ़ भावनाओं के कारण या उनके सहारे सार्थक लड़ाइयां नहीं लड़ी जा सकती, उसके लिए और भी कई चीज़ों और परिपक्व समझ की आवश्यकता है।

हमारे कहने का मतलब था कि प्राथमिकतः भावनाएं ही होती हैं, इन्हें सार्थक लड़ाई के लिए वृहत सामाजिक मूल्य से लैस करना ही होता है। सिर्फ़ भावनाओं के कारण नहीं, लेकिन बिना भावनाओ के हम लड़ ही नहीं सकते। शुरुआत तो भावनाओं से होती है, फिर हम आगे उच्च स्तर तक आते जाते हैं।

आप की बात कहीं से भी ग़लत नहीं है, हम बस यह बात आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम भावनाओं के इस द्वंद को भी समझने की कोशिश करें। सभी तरह की भावनाओं का पैदा होना कोई जैविक सहजवृत्ति का परिणाम नहीं है, हमारी भावनाएं भी हमारे अनुकूलन पर आधारित होती हैं। एक जैसी ही चीज़ें, या परिस्थितियां सभी मनुष्यों में एक ही सी भावनाएं पैदा नहीं करती। यानि भावनाओं का पैदा होना और उनके ज़रिए अपने व्यवहार को नियमित करना, द्वंदवादी अन्योन्यक्रियाएं हैं। हमारा व्यवहार और मान्यताएं, हमारी भावनाओं को तय करते हैं और अपनी बारी में, पैदा हुई भावनाएं हमारे व्यवहार और मान्यताओं को नियमित करती हैं। इसलिए भावनाओं को स्पष्ट रूप से प्राथमिक मानना, कई चीज़ों की ग़लत समझ तक ले जा सकता है।

"भावनाएं ( अनुभूतियां ) मनुष्य के वे आंतरिक रवैये हैं, जिन्हें वह अपने जीवन की घटनाओं और अपने संज्ञान व सक्रियता की वस्तुओं के प्रति, विभिन्न रूपों में अनुभव करता है।"
"ऐसे आंतरिक वैयक्तिक रवैये की जड़ें सक्रियता और संप्रेषण में होती हैं, जिनके दायरे में उसका जन्म, परिवर्तन, सुदृढ़ीकरण ( strengthening ) अथवा विलोपन ( deletion ) होता है"

यानि कि भावनाओं के प्रस्फुटन के आधार में व्यक्ति का परिवेश, और इस परिवेश में उसकी सक्रियता तथा संप्रेषण का दायरा होता है, जिसके दायरे में वह सक्रियता और चेतना की अन्योन्यक्रियाओं के जरिए विकसित होता है। जहां व्यवहार, प्रवृत्तियों, विचारों का सुदृढ़ीकरण होता है, परिवर्तन होता है, विलोपन होता है और एक व्यक्तित्व आकार लेता है।

'उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही आप आपकी शान में की गई इन गुस्ताखियों को आया-गया करते रहेंगे।' यह वाक्य.....अयोग्य शिष्य और अहंकारी साबित करता है।.....बहसों से बचा करूगा या संभव हुआ तो करूंगा ही नहीं......लेकिन इस बात से मैं दुखी हूँ कि आप मुझे ऐसा मानते हैं(?)।.....कुछ कुछ निराशा हुई इस वाक्य से।

ये संवादों के दौरान के औपचारिक वाक्यांश या कथन है, हम अक्सर ऐसे ही कुछ वाक्यों का प्रयोग करते रहते हैं। पर आपकी प्रतिक्रिया से लगा कि इसे आपके साथ प्रयुक्त करने की जरूरत नहीं थी, यह हमसे कुछ ग़लत सा हुआ। अब क्षमा चाहेंगे तो फिर यह कहियेगा कि फिर से हमने आपको निराश किया है, दुखी किया है, इसलिए नहीं कहते।

हम यहां संवाद कर रहे हैं तो महज इसलिए कि हम एक दूसरे में कुछ संभावनाएं देखते हैं। यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है और एक दूसरे के प्रति लिहाज़ और सम्मान का सबूत ( आपके शब्दों में ही ) भी, इसलिए इस तरह की भावनाओं में बहने की हमें लगता है आवश्यकता नहीं ही होनी चाहिए।

आपकी इस मासूम सी बात, ‘क्या एक नए शहर में किसी बच्चे को थोड़ी उछल-कूद करने की इजाजत नहीं है?’ ने हमें काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर किया है। हम शायद कुछ अधिक ही रुखेपन और कठोरता से पेश आ जाते हैं, हमें अपनी पद्धतियों में सुधार करना चाहिए। हमें यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए अगर आप बुरा ना माने तो क्या हम आपके शुक्रगुज़ार हो सकते हैं? आपका यह वाक्य लाजवाब है। शुक्रिया।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

4 टिप्पणियां:

कविता रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया गंभीर चिंतन से ओत-प्रोत प्रस्तुति ...

ARUN SATHI ने कहा…

विचारणीय।

Beenu Kabir ने कहा…

कितने दिन ,महीने ,साल से कितने सवाल उलझा रहे थे ,कोई नहीं मिला जिसके सामने बात रख सके ,सवाल पूछ सकें .मित्र विहीन सी स्थिति थी .......आज यहाँ कितना कुछ स्पष्ट हो गया , उत्तर मिले ,दिशा मिली ....

समय अविराम ने कहा…

आदरणीया बीनू कबीर जी,
हम सभी लगभग ऐसी ही स्थितियों में हैं। सवालों के ज़खीरे हैं और परिवेश से जवाब नदारद हैं, पहुंच से दूर कर दिये गये हैं। आप जब भी जरूरी समझें, हम कुछ सवालों के जवाब ढूंढने में एक दूसरे की मदद कर सकते हैं, मेल पर संवाद कर सकते हैं।
शुक्रिया।

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